Wednesday, March 11, 2026
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जौनसारी संस्कृति में प्रचलित हैं बाजदियां, बोईदोदी और बेवा विवाह पद्धति।

जौनसारी संस्कृति में प्रचलित हैं बाजदियां, बोईदोदी और बेवा विवाह पद्धति।

(मनोज इष्टवाल)

जौनसार बावर में प्रचलित विवाह पद्धतियों के अनुसार यहां पर तीन प्रकार के विवाह किए जाते हैं। बाजदियां, बोईदोदी और बेवा। बाजदिया जोजोड़ (विवाह) बाजे गाजे के साथ किया जाने वाले श्रेष्ठ विवाह है। बोईदोदी जोजोड़ (विवाह) मध्यम स्तर का विवाह तथा बेेवा विवाह  सामान्य विवाह की श्रेणी में आता है। यहां विवाह की परंपरा के अनुसार बारात दुल्हन के घर से दूल्हे के घर तक जाने का प्रचलन है, लेकिन अब सामाजिक परिवर्तन के चलते श्रीगणेश हो चुका है। यहां कन्या पक्ष की अपेक्षा वर पक्ष को विवाह में अधिक खर्च करना पड़ता है।

जौनसारी समाज में दहेज का प्रचलन नहीं है। दहेज में मात्र दैनिक प्रयोग की वस्तुएं ही दी जाती हैं। जिसमें पांच भड्याई, पांच बर्तन, गाय, ओखलीदराती, रस्सी आदि। विवाह के समय पिता अथवा परिजन मिलकर कन्या की कोथड़ी (पर्स) में कुछ धन देते हैं। जो केवल कन्या ज्वाड (बैंक खाता) होती है। वह उसका अपनी इच्छानुसार अपने ढंग से प्रयोग करती है। यद्यपि महिलाएं परिवार की आर्थिक और खुशहाली की रीढ होती है, परन्तु उन्हें चल-अचल संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता है। पुत्रों का ही अधिकार होता है। पुत्रियों को तो बस अच्छे घर में विवाह कर उन्हें उन्नत कोटी के वस्त्रभूषण दिए जाते हैं। ये गहने ही उनकी सम्पत्ति होते हैं। यहां तक तलाक (छूट) का भी प्रचलन है किन्तु यह तलाक कोर्ट कचहरी में नहीं बल्कि आपसी सहमति के आधार पर होता है। तलाक होने पर महिला को गहने छोड़ने पड़ते हैं।

(फाइल फोटो)

उसको नई ससुराल में मन पसंद गहने और कपड़े मिल जाते हैं। प्रेम विवाह का भी यहां रिवाज है। परन्तु विवाहित जोड़े प्रेम विवाह करें तो यह बहुत बड़ा अपराध माना जाता है। इस सामाजिक अपराध की इन्हें धन देकर कीमत चुकानी पड़ती है। जिसे ग्राम पंचायत तय करती है।

जौनसार बावर की महिलाओं को लाल, पीले, नीले और गुलाबी जैसे चटख रंगों के परिधान पसंदीदा होते हैं। महिलां लहंगा, कुर्ता, सिर में ढाटू पहनती है। महिलाओं की यह पोशाक यहां के भौगोलिक परिवेश को ध्यान में रखकर पहनी जाती है वास्तव में यह पोशाक वैज्ञानिक होती है। इसी तरह यहां की महिलांए नाक में लौंग (फुल्ली नथ (बुखाज), कानों में तुगंल, मुरकी, उतराइयां, गले में कंठी काडूडी, सूच, दोसरू, खगाइकी, कंठा, माला, हाथों में चूड, चुड़ियां, कांगुठे (कड़ा), पांवों में पेालिया (बिछुए), अंगुलियों में छाप (अंगूठी) पहनती है। लेकिन वक्त के साथ-साथ नई पीढ़ी का इन वस्त्रों एंव आभूषणों से मोह भंग हो रहा है। अब जौनसार की महिलाएं अपने पारम्परिक वस्त्र त्याग कर सलवार कमीज, साडी पहनना यहां की महिलाओं का शौक बन गया है।

यहां की महिलाओं में आ रहे इस तीव्र परिवर्तन के चलते लड़कियां सरकारी और गैर सरकारी नौकरियों के ओर उन्मुख होने लगी है। वे स्वंय आत्मनिर्भर होकर अपने समाज को उन्नत देखना चाह रही है। काफी महिलाएं सरकारी नौकरियां कर रही है। कुछ देश के उच्च प्रशासनिक पदों पर पहुंच गई हैं। जौनसार बावर की पौराणिक मान्यताओं और परम्पराओं के बंधन से बाहर निकल ये महिलाएं समाज की मुख्य धारा से जुड़कर महिला सशक्तिकरण के व्यापक अर्थ को सार्थक सिद्ध कर रही है। स्वंय को सामाजिक, शैक्षिक और राजनैतिक स्तर पर मुखर कर रही है।

जौनसार बावर की प्राचीन परिपाटी के अनुसार यदि ससुराल में विवाहित महिला की मृत्यु हो जाती थी तो उसके परिजनों की उपस्थिति में ही दाह संस्कार की वैधता मान्य है। अब तक इस समाज में यही मान्यता चली आ रही है। परिवार चलाने के लिए भी यहां पुरूष और महिला दोनों को बराबर अधिकार है। दोनों ही संयुक्त रूप से परिवार का प्रबंधन करते हैं। महिला मुखिया को बितरो का बाठा’ कहा जाता है।

दोनों के ही संयुक्त निर्णय और मार्ग दर्शन से घर चलता है। यही नहीं लोक मानस के हर कार्य, व्यवहार में सर्वत्र उपस्थिति नारी का लोमहर्षक स्वरूप विद्यमान है। धूप, वर्षा, शीत, खेत, खलिहान, गीत, नृत्य, संगीत, घाटी, सममतल, पर्वत, साहित्य, कला और संस्कृति में नारी के बिना समाज की कल्पना करना ही बेईमानी है।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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