Saturday, July 13, 2024
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“हिमालयी बुग्याल और उनका बिगड़ता स्वरुप एक भू वैज्ञानिक दृष्टकोण”

(महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट की कलम से)

रुद्रनाथ-यात्रा :  पार्ट 2 

हम सभी जानते हैँ पहाड़ों की सुन्दर वादियों में एक हिमालयी बुग्याल यानी अंग्रेजी में बोलें तो High Altitude Pasture Land यूरोप में इसे Alpine Meadows कहते हैँ और मेरे भू विज्ञान की भाषा में इसे High Altitude Planation Surfaces कहते हैँ। वहीँ हमारे देश के अन्य प्रदेशों में इसे भिन्न भिन्न नाम जैसे कश्मीर में मर्ग (गुलमर्ग, सोनामर्ग) तो कहीं खर्क,आदि नाम से पुकारा जाता है। यूँ तो मैंने अपने जीवन में लगभग छोटे बड़े 50-60 बुज्ञालों का भ्रमण किया हैँ। जिनमें वेदनी, आली, औली, दयारा, लपतल, रताकोणा, रिमखिम, छूजन, बरमतीया,मन्नाग, वाशुकी, सरसों पाताल, धरांशी, लाता खर्क, सेनी खर्क, चोपता, पंवाली, मनपाई, मेरीखर्क इत्यादि प्रमुख हैँ ।

बुग्यालों की उत्पत्ति 

बुग्यालों की आज की स्थिति को समझने से पहले ये जानना जरुरी है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ये भू आकृति बनती कैसी है?? दरअसल इनके बनने की शुरुआत हिमालय की उत्पत्ति के बाद जब यह भू भाग हिमाछादित होता गया तत्पश्चात हज़ारों वर्षों तक इन गगनचुंभी पहाड़ियों में जमा बर्फ अधिक भार व गुरुत्वाकर्षण के कारण यह बीसियों फुट बर्फ निम्न ढालों में खिसकने लगी। सतही चट्टानों को घर्षण कर यह बर्फ अब धीरे धीरे चट्टानों की सतह को बड़े बड़े सपाट तल का रूप देने लगी, भू विज्ञान में हम इसे “सीट अपर्दन” कहते हैँ। लाखों बर्षो के बाद इन सीट या लगभग समतल से दिखने वाली चट्टानों के ऊपर अब अधिक बर्फ जमा होने लगी, जो सारे साल भर बीसियों फुट एकत्रित रहती थी, या यूँ कहें कभी नहीं पिघलती थी। अब इसी बीच एक और प्राकृतिक भू भौतिकी प्रक्रिया सुरु होती है, जिसे हम frost action कहते हैँ। साथ ही साथ अपक्षयण प्रक्रिया यानी weathering process भी (दोनों भौतिक एवं रासायनिक प्रक्रिया) जिस कारण चट्टानों की ऊपरी सतह या यूँ कहें बर्फ की चादर की निचली सतह में धीरे-धीरे चट्टानें अब मिट्टी का रूप लेने लगी. मित्रों कालांतर में जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ता गया बर्फ की मोटी चादर पिघलती गयी और मिट्टी और नमी के चलते हरी बुग्गी घास या औषधीय पादप ने इन खाली स्थानों को घेर लिया। जिसे हम आजकल सुन्दर बुग्याल कहते हैँ। मानव के हस्तक्षेप के चलते सर्बप्रथम ये हिमालयी क्षेत्र में भेड़ – बकरी पालकों के जीविकोपार्जन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते गये। और धीरे-धीरे पहले तीर्थाटन और अब पर्यटन के केंद्र बनते चले गये।

बुग्यालों का बिगड़ता स्वरुप 

दोस्तों प्रकृति में भू आकृतियाँ बनती और बिगड़ती रहती है। ये उसका एक स्वाभाविक गुण है। भू आकृति विज्ञान में यह कहा गया है कि “पृथ्वी का बाह्य आकार सदा परिवर्तनशील है” समय के अनुरूप प्रक्रिया में घटत बढ़त हो सकती है परन्तु ये सतत चलने वाली प्रक्रिया है। हाँ ये भी महत्वपूर्ण है कि इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बढ़ाने वाले कारक में अब मानव भी शामिल हो गया है। चिंता इस बात की है कि बिगत 40-50 सालों में अचानक बुग्यालों के स्वरुप में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है। कई किलोमीटर सुन्दर हरी बुग्गी घास से अच्छादित बुग्याल में जैसे बाघ के पंजों की खरोंच दिखने लगी हैँ। ये खरोंच इतनी गहरी हो गयी है कि देखते ही देखते गहरी घाटी का रूप लेने लगी हैँ। और हरी घास की जगह मिट्टी कंकण, पत्थर और तो और निचले सतह की चट्टाने भी दिखने लगी हैँ। बुग्यालों की लाखों वर्षों की काली मिट्टी इन नालों में बहने लगी हैँ।

soil creep यानी मृदा विसर्पण इन बुग्यालों की एक सामान्य प्रक्रिया थी, जिसमें यहाँ की मिट्टी बहुत ही मंद गति से पहाड़ी ढालों पर मिलिमीटर प्रति बर्ष की दर से सरकती थी। अब तो यह प्रक्रिया बर्षा जनित क्षेत्रों में होने वाली gully erosion के साथ साथ गहरी खायी (deep incision) बनने लगी हैँ। एक समय था जब बुग्यालों में बारिश न के बराबर होती थी, थोड़ा कोहरा लगा नहीं और सीधे बर्फ की फुहार, भेड़ बकरी पालक (पालसी लोग) बकरी के उन से बने दयूंखा (जैकेट) से सारा चौमासा गुजार लेते थे। और रॉक शेल्टर में विश्राम करते थे। अब छाता या प्लास्टिक के रेन कोट और टेंट से अपने को पानी से बचाते हैँ। यानि धरती के तापमान के बढ़ने के साथ ही कम बर्फ बारी और अधिक बर्षा का होना इन बुग्यालों के स्वरुप को बदल रहा हैँ। परन्तु इसके साथ ही मानव के हस्तक्षेप को भी नाकारा नहीं जा सकता, चाहे भेड़ बकरियों के चलने से soil erosion की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला है या फ़िर मानव की अन्य गतिबिधियां जैसे लाखों की संख्या में लोगों का आवागमन, और वन बिभाग ने तो हद ही कर डाली बुग्यालों को खोद खोद कर नीचे के पत्थर निकाल कर करोड़ों रूपये खर्च कर चाल खाल बना डाली। इन विद्वानों को किसने ये पट्टी पढ़ाई होगी मेरे समझ से परे है, और बुग्यालों के नाम पर धन जरूर वशूल करने लगे हैँ। ये अच्छी बात है परन्तु उसका सदुपयोग अवश्य करना चाहिए।

जब इन जंगलातिओं को चार साल पहले मेरे यू सैक के बैज्ञानिकों ने एक तकनीक समझाई थी कि कैसे इन gullies को जूट मेश तकनीक के द्वारा गहरे होने से बचाया जा सकता है, जिसका नमूना दयारा बुग्याल में किया था, जो कि काफ़ी हद तक कारगर भी साबित हुआ। परन्तु उस आड़ में जब अन्य बुग्यालों में इस कार्य को किया गया उसकी एक बानगी आप लोग रुद्रनाथ जाते वक्त पनार बुग्याल में देख सकते हैँ। छायाचित्र संलग्न हैँ। मजे की बात है कि सैंचूरी हो या बायोस्फोयर रिज़र्व इनके अधिकारिओं के लिए आलीशान हट जरूर चाहिए।

पर्यटकों को भी शायद इस बात का ज्ञान नहीं कि बुग्यालों की ये काली मिट्टी जिसे हम परिपक्व soil कहते हैँ इसके एक सेंटीमीटर परत को बनने के लिए कम से कम 200 – 300 साल लगते हैँ। जब आप अपने टैंट लगाने के लिए बुग्याल में छै इंच की मिट्टी काटते हो तो अंदाजा लगा लीजिये कि आपने प्रकृति को कितनी बड़ी छति पहुँचाई है।

अतः मित्रों इस लेख के माध्यम से मुझे यकीन है कि बुग्यालों के विज्ञान को मैं कुछ हद तक आप लोगों से जोड़ पाया हूंगा। विषय बड़ा लम्बा है। परन्तु कम शब्दों में इतना कहूंगा कि प्रकृति की प्रक्रिया के इतर हमें अपनी इन प्राकृतिक धरोहरों को बचाने का भरसक प्रयास करना चाहिए। ये मेरे #Geotourism का महत्वपूर्ण विषय भी है।

Himalayan Discover
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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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