(सम्पादकीय वरिष्ठ पत्रकार क्रांति भट्ट की कलम से)
उत्तराखंड के जंगल धू धू कर रहे हैं। करोड़ों की वन सम्पदा और वन क्षेत्र स्वाहा हो रहे हैं। पोण पंछी ( पांखी, पक्षियां ) जल कर खाक हो रहे हैं। वन्य प्राणि इस दावानल के बीच जान बचाने के लिये मारे मारे भटक रहे हैं । जंगलों की आग बुझाने के लिये ग्रामीण आगे आये हैं । अपने प्राणों की आहुति तक दे दी है । (गैरसैण के गांवों में लगी आग बुझाते समय एक वृद्ध पूरी तरह झुलस गये।) नारायण बगड़ के जंगलों में वनाग्नि बुझाते लोग झुलस गये। पौड़ी गढ़वाल के चैलुसैण का एक 18 बर्षीय युवा अपनी भेड़ बकरियां व नाबालिक बहनों को बनाग्नि से बचाते व बनाग्नि बुझाते बुरी तरह जलकर कोटद्वार अस्पताल में भर्ती है। अन्य स्थानों पर लोग वनाग्नि को रोकने के लिये आगे आ रहे हैं ।
” ये वे लोग हैं जो वनों , पर्यावरण संरक्षण पर बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते ! सेमिनारों में शब्दों की लफ्फाजी नहीं करते ! जल जमीन और जंगल जैसे शब्दों की चाशनी के चटकारे और स्वघोषित पर्यावरणवादी के लबादे नहीं ओढ़ते ।
“वन” से “मन ” मे जुड़े वे ग्रामीण जो ” पर्यावरणवादी होने की पहचान और इसके लिये बड़े-बड़े पुरस्कारों की लालसा से दूर बहुत दूर हैं, और पर्यावरण पुरस्कार या इसका तगमा पा कर जो लोग झूमते नहीं हैं। क्या असल में संकट की इस घड़ी में वो ही वनाग्नि बुझा रहे हैं?
उत्तराखंड में जल-जमीन और जंगल की बात पर असल में और जमीन पर इन तीनों से दूर ” स्वनाम धन्य पर्यावरणवादी जीवी और जीवियों और इसके लिये भारी-भारी पुरस्कारधारियों की कोई कमी नहीं है लेकिन तब-जब उत्तराखंड के जंगल स्वाहा हो रहे हैं। “ये दिब्य पर्यावरणवादी हैं कहां ! जंगलों की आग बुझाने के लिये ब्यक्तिगत तौर पर नहीं दीखते। इन “आसमानी पर्यावरणवादियों” और वनों की बात करने वालों की आवाज कहां खो गयी! या ये समझ गये हैं कि “वन, पर्यावरण, जल, जमीन और जंगल की बात जब हम करते हैं तो वे केवल वातानुकूलित सेमिनारों में तालियां बटोरने, भारी भरकम पुरस्कार पाने और इन पुरस्कार देने वालों की समझ में आते हैं। जमीन पर इनकी बात सुनने वाला कोई नहीं। और ना ही इनमें इतना आत्मबल है कि लोग इनकी बात सुनें।
इधर जंगल जल रहे हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं । पांखी झुलस गयीं । वन्य प्राणी दावानल के बीच जान बचाने के लिये मारे-मारे भटक रहे हैंं।
*अब कुछ दिनों बाद देखिये तो सही….. ! हमारे ये पुरस्कारजीवी, पर्यावरणवादी अखबारों में आर्टिकल और सेमिनारों में “जल जमीन और जंगल” पर फिर किस कदर दीख जायेंगे । यह बात अलग है कि अभी या कभी भी जंगल और जमीन पर नहीं दिखे ।

