Thursday, April 30, 2026
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आंग्ल नववर्ष 2022 जबकि 2 अप्रैल से सनातन हिन्दू धर्म मनाएंगा 5121वां नव बर्ष। जुलियट सीजर से 3099 बर्ष पुराने हैं हम ।

चैत्र नवरात्र प्रारम्भ होते ही कलयुग के 5121 बर्ष पूरे हुए!
(मनोज इष्टवाल)
हिन्दू संवतसर चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष 2079 के प्रारम्भ होते ही जहाँ हिन्दुओं के चैत्र नवरात्र जिन्हें चेटी नाम से भी पुकारा जाता है, के प्रारम्भ होते ही महाभारत के 5121 बर्ष भी पूरे हो गए हैं। यानि द्वापर युग के समाप्त होने के पश्चात महाभारत हुआ और कलयुग का प्रारम्भ बर्ष महाभारत समाप्त होने के बाद से समझा गया।  क्योंकि कलयुग के प्रथम राजा अर्जुन के पौत्र राजा परीक्षित का राज्याभिषेक हुए 5121 बर्ष बीत गए हैं व कलयुग का 5121 बर्ष प्रारम्भ हुआ। वहीँ त्रेता में राम रावण युद्ध को 88,0163 बर्ष बीत गए हैं और अब हम त्रेता के बाद 880164 में प्रवेश कर चुके हैं।
इसे परमार वंशी कंश के वंशज भोज का प्रारम्भ बर्ष भी कहा जाता है जिसे हिन्दू संवतसर के नाम से भोजवंशी अपने आप को पुकारते हैं. अर्थात भोज संवत्सर के 2079 बर्ष में हम प्रवेश कर चुके हैं, श्रीकृष्ण अवतार कब हुआ यह तो साफ़ कह पाना मुश्किल है लेकिन विद्वान् श्रीकृष्ण अवतार को उनके पूजा बर्ष 52247 मानते हैं यानि द्वापर युग को लगभग 52 हजार बर्ष पूरे हो गए हैं, क्योंकि कृष्ण जन्म से ही द्वापर युग का प्रारम्भ माना जाता रहा है।
हिन्दू संवतसर 2079 के प्रारम्भ होते ही इसका स्वामी नल व इसका राजा शनि है एवं मंत्री गुरु विद्वान् ब्राह्मण। अतएव यह साफ़ है कि इस बर्ष के बाद न्याय और देश काल व्यवस्थाओं में कई परिवर्तन दिखने को मिलेंगे। अग्नि भय, राजभय, जनता भय, असमाजिक तत्वों में वृद्धि, आतंकी घटनाएं, बम विस्फोट, रोग, युधाग्नि इत्यादि घटनाओं की संभावनाएं ज्यादा हैं। धनेश स्वामी शनि होने के कारण आर्थिक संकट, दुर्गेश स्वामी- बुद्ध होने के कारण रक्षा व सुरक्षा प्रबन्ध ठीक रहेंगे, रोहिणी निवास समुद्र में होने के कारण बर्षा कृषि उत्पादन के हिसाब से ठीक होगा। समय का निवास माली के घर होने के फ़लस्वरूप पैदावर वृद्धि होगी, समय का वाहन भैंसा होने के कारण अतिवृष्टि व प्राकृतिक प्रकोप से जन धन हानि की संभावनाएं होंगी। इस बर्ष का मंत्री गुरु होने के कारण जनता में धार्मिक कार्यों की अधिकता रहेगी व जनता की सुख समृद्धि में वृद्धि होगी। देश पर आर्थिक संकट की छाया मंडराती रहेगी।
दूसरे हिसाब को अगर हम पूरी दुनिया के बरसों से अपनी तुलना करें तो सनातन हिन्दू अभी भी कलयुग के 3099 साल दुनिया से आगे हैं व आंग्ल हिसाब से नवबर्ष की बात करें तब भी हम शक संवत के हिसाब से पूरी दुनिया से 57 बर्ष आगे चल रहे हैं।
क्यों मनाया जाता है 1 जनवरी को नवबर्ष।
1 जनवरी नवबर्ष मनाने का चलन 1582 ई. में ग्रेगेरियन कलेंडर को पॉप ग्रेगरी अष्टम ने 1582 में तैयार किया, जिसका नया साल 14 जनवरी से शुरू होता है। रूस, जॉर्जिया, येरुशलम व सर्बिया आज भी अपना नवबर्ष 14 जनवरी से मनाते हैं जबकि पूरे विश्व का सबसे पुराना सनातन हिन्दू धर्म उदारवादिता व सेकुलरी जमात के हावी होने से अपनी धार्मिक परम्पराओ को तार-तार करके 1 जनवरी से ही नवबर्ष मनाने लगा है जबकि हमारा नव बर्ष इस बार 2 अप्रैल से प्रारम्भ होगा व हम हिन्दू शक संवत नवबर्ष 2079 मना रहे होंगे। एक मात्र हिन्दू राष्ट्र नेपाल आज भी अपनी धार्मिक परम्पराओं के आधार पर तारिक के स्थान पर गते शब्द का उल्लेख करता है व हिन्दू रीति रिवाजों के आधार पर चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष से नवबर्ष मनाता है।
रोम जो कि आज नाम भी मिट गया फिर उसके राजा जूलियस सीजर के कलेंडर का अभी भी इस्तेमाल क्यों?

1 जनवरी को नया साल मनाने की शुरुआत 15 अक्तूबर 1582 में हुई थी। पहले नया साल कभी 25 मार्च को, तो कभी 25 दिसंबर को लोग मनाते थे। रोम के राजा नूमा पोंपिलस ने रोमन कैलेंडर में बदलाव कर दिया जिसके बाद जनवरी को साल पहला महीना माना गया।  इससे पहले मार्च को साल का पहला महीना कहा जाता था।

आईए जानते हैं क्या है इसके पीछे की कहानी…

मार्च का नाम मार्स (mars) ग्रह पर रखा गया है। मार्स यानी मंगल ग्रह को रोम में लोग युद्ध का देवता मानते हैं। सबसे पहले जिस कैलेंडर को बनाया गया था उसमें सिर्फ 10 महीने होते थे। ऐसे में एक साल में 310 दिन होता था और 8 दिन का एक सप्ताह माना जाता था।

रोमन शासक जूलियस सीजर ने कैलेंडर में बदलाव किया। उसने ईसा पूर्व पहली शताब्दि में ही अपने ज्योतिष सोसिजिनीस की सहायता से कलेंडर बनवाया। सीजर ने ही 1 जनवरी से नए साल की शुरुआत की थी। जूलियस द्वारा कैलेंडर में बदलाव करने के बाद साल में 12 महीने कर दिए गए। जूलियस सीजर ने खगोलविदों से मुलाकात की, जिसके बाद पता चला कि धरती 365 दिन और छह घंटे में सूर्य की परिक्रमा करती है। इसको देखते हुए जूलियन कैलेंडर में साल में 365 दिन कर दिया गया।

पोप ग्रेगरी ने साल 1582 में जूलियन कैलेंडर में लीप ईयर को लेकर गलती खोजी थी। उस समय के मशहूर धर्म गुरू सेंट बीड ने बताया कि एक साल में 365 दिन, 5 घंटे और 46 सेकंड होते हैं। इसके बाद रोमन कैलेंडर में बदलाव किया गया और नया कैलेंडर बनाया गया। तब से ही 1 जनवरी को नया साल मनाया जाने लगा।

12 महीनों की उत्पत्ति/संरचना।

1- जनवरी = रोमन देवता जेनस के नाम से।

2- फरवरी =लेटिन भाषाई शब्द फैबरा से।

3- मार्च = रोम का देवता “मार्स”

4- अप्रैल = लेटिन शब्द स्पेरायर

5- मई =  रोमन देवता “मइया”।

6- जून = लेटिन शब्द जेन्स

7- जुलाई =  रोमन सम्राट ” जुलियट सीजर के उपनाम “जुला” से। इसी माह वह पैदा हुआ व यही माह उसकी मृत्य का भी है।

8- अगस्त = सीजर के भतीजे राजा आगस्टस सीजर के नाम।

9- सितम्बर = लेटिन शब्द सिप्टे से।

10- अक्टूबर = लेटिन शब्द ऑक्ट से

11- नवम्बर = लेटिन शब्द नोवेम्बर से

12- दिसम्बर = लेटिन शब्द डेसेम से।

इस कलेंडर को पहले रोम, अरब, यूनान ने अपनाया। ब्रिटिश राज में अंग्रेजों ने इसे विश्व भर के देशों तक फैलाया जबकि सत्य यह है कि धरती का सबसे पुरातन समय केंद्र उज्जैन रहा है।

हिन्दू नवबर्ष की शुरुआत यानि चैत्र प्रतिपदा शुक्ल पक्ष ।

1) इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।

2) सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन राज्य स्थापित किया। इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है।

3) प्रभु श्री राम के राज्याभिषेक का दिन यही है।

4) शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र का पहला दिन यही है।

5) सिखों के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म दिवस है।

6) स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं कृणवंतो विश्वमआर्यम का संदेश दिया।

7) सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।

8) राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना। विक्रम संवत की स्थापना की ।

9) युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी दिन हुआ।

2- बैशाख मास।

वैशाख हिन्दू सनातन धर्मानुकुल व भारतीय गणना शास्त्र परम्परा  के अनुसार बर्ष का दूसरा माह है। इस माह को एक पवित्र माह के रूप में माना जाता है। जिनका संबंध देव अवतारों और धार्मिक परंपराओं से है। ऐसा माना जाता है कि इस माह के शुक्ल पक्ष को अक्षय तृतीय के दिन विष्णु अवतारों में नर-नारायण, परशुराम, नृसिंह और हृयग्रीव के अवतार हुआ और शुक्ल पक्ष की नवमी को देवी सीता धरती से प्रकट हुई। कुछ मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग की शुरुआत भी वैशाख माह से हुई। इस माह की पवित्रता और दिव्यता के कारण ही कालान्तर में वैशाख माह की तिथियों का सम्बंध लोक परंपराओं में अनेक देव मंदिरों के पट खोलने और महोत्सवों के मनाने के साथ जोड़ दिया। यही कारण है कि हिन्दू धर्म के चार धाम में से एक बद्रीनाथधाम के कपाट वैशाख माह की अक्षय तृतीया को खुलते हैं।  इसी वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को एक और हिन्दू तीर्थ धाम पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी निकलती है। वैशाख कृष्ण पक्ष की अमावस्या को देववृक्ष वट की पूजा की जाती है। यह भी माना जाता है कि भगवान बुद्ध की वैशाख पूजा ‘दत्थ गामणी’ (लगभग 100-77 ई. पू.) नामक व्यक्ति ने लंका में प्रारम्भ करायी थी।

3- जेष्ठ मास।

नाम से ही इंगित है कि यह महीना बड़ा मास कहा जाता है। ज्येष्ठ भारतीय काल गणना (हिन्दू पंचांग) के अनुसार मास का तीसरा माह है। यों तो अंतिम मास फागुन की विदाई के साथ ही गर्मी शुरू हो जाती है लेकिन इस माह तक पहुँचते-पहुंचते गर्मियां अपना रंग दिखाना शुरू कर देती हैं इसीलिए इस माह को गर्मी का महीना भी कहा जाता है।

4- आषाढ़ मास।

चैत्र नवरात्र की सभी देशवासियों को मंगल कामनाये।
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