(हिमालयन डिस्कवर)
बाबा रामदेव की कोरोनिल औषधि पर मुकदमा दायर करने वाले वकील मनि कुमार को लेने के देने पड़ गये। हाई कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता मनि कुमार पर गलत तथ्य पेश करने से समाज में गलत प्रभाव पड़ता है, साथ ही इस सब से कोर्ट का समय भी बर्बाद हुआ है अतः
बाबा रामदेव की ओर से कोरोना वायरस की दवा कोरोनिल लांच किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका में गलत तथ्य पेश करने पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए जुर्माने की राशि एक सप्ताह के भीतर अधिवक्ता मनि कुमार को एडवोकेट वेलफेयर फंड में जमा करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि गलत तथ्य पेश करने से समाज में गलत प्रभाव पड़ता है।
ज्ञात हो कि याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका को वापस लेने के लिए कोर्ट से प्रार्थना की थी। जिस पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि कुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई करते हुए उन पर जुर्माना लगाया है।
ज्ञात हो कि अधिवक्ता मनि कुमार ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण ने हरिद्वार में कोरोना वायरस से निजात दिलाने के लिए पतंजलि योगपीठ की दिव्य फॉर्मेसी कंपनी की ओर से निर्मित कोरोनिल दवा लांच की थी।
याचिका में कहा गया था कि बाबा रामदेव की दवा कंपनी ने आईसीएमआर की गाइडलाइन का पालन नहीं किया। कंपनी ने आयुष मंत्रालय भारत सरकार की अनुमति भी नहीं ली। आयुष विभाग उत्तराखंड में भी दवा बनाने के लिए आवेदन नहीं किया गया। जो आवेदन किया गया था, वह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया गया था।
इसकी आड़ में बाबा रामदेव ने कोरोनिल दवा का निर्माण किया। कंपनी ने निम्स विश्वविद्यालय राजस्थान से दवा परीक्षण होना बताया गया, जबकि निम्स का कहना है कि उन्होंने ऐसी किसी भी दवा का क्लिनिकल परीक्षण नहीं किया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि बाबा रामदेव लोगों में अपनी दवा का भ्रामक प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। यह दवा न ही आईसीएमआर से प्रमाणित है और ना ही इनके पास इसे बनाने का लाइसेंस है। इस दवा का अभी तक क्लिनिकल परीक्षण भी नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने दवा पर पूर्ण रोक लगाने की मांग की थी।
वहीं दूसरी ओर बाबा रामदेव की पतंजलि की ओर से पक्ष रखते हुए साफ किया गया है कि उन्होंने रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का लाइसेंस लिया था।

