Wednesday, April 8, 2026
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इतिहास के आईने में चमचमाती 161 साल पुरानी मैसमोर इंटर कॉलेज बिल्डिंग

(मनोज इष्टवाल)

एक मिशन के तहत सच्चे व दृढ़ संकल्प के साथ किया जाने वाले कार्य की परिणति हमेशा ही आपके हृदय में आदर व सम्मान जागृत करने में सक्षम होती है। यह वह दौर था जब हम गोरखा शासन से त्रस्त होकर ब्रिटिश शासन के पाँव पसारने के बाद भी उपेक्षित से था। हमारे निर्बल एवं शिल्पकार समाज रोटी, कपड़ा और मकान से बेजार थे। अधिकांश सवर्ण समाज भी भुखमरी से ही जूझ रहा था। ऐसे में यूरोपियन मिशनरी संस्था के दो संस्थापक सर मैसमोर और मिस्टर थोरवन ने गढ़वाल कमीशनरी पौड़ी में शिक्षा के प्रचार-प्रसार को माध्यम बनाया और 1865 में मैसमोर ने लोअर चोपड़ा नामक स्थान जोकि चोपड़ा गाँव पौड़ी के ऊपर है व इसका छोटा सा भू-भाग गड़ोली गाँव से लगा हुआ है, में एक स्कूल बनाने का संकल्प लिया। वहीं इसी दौर में गड़ोली गाँव में थोरवन द्वारा थोरवन प्रायमरी स्कूल की स्थापना की गई।

गड़ोली स्थित चाय बागान में भुखमरी की निजात से बचने वाले गढ़वाली श्रमिकों ने धीरे-धीरे ईसाई धर्म स्वीकार करना शुरू कार दिया, जिसके बदले में उन्हें वहीं बसासत के लिए ज़मीन भी मिलनी शुरू हो गई। उस दौर के इस बदलते परिवेश में ऐसा नहीं था कि सब सुगमता से हो रहा था। सवर्ण समाज द्वारा एजेंसी में कूली प्रथा व चोपड़ा गड़ोली में ईसाई धर्म स्वीकार्यता पर आंदोलन छेड़ना शुरू कर दिया, जिसके कारण 1865 में निर्माणाधीन मैसमोर इंटर कॉलेज के बनने में व्यवधान पड़ना शुरू हुआ। लेकिन मिस्टर मैसमोर ने हार नहीं मानी। वह लगातार एक मिशन के तहत इस कॉलेज के लिए फंड जुटाते रहे। ब्रिटिश सरकार ने भी इसमें अपना सहयोग देना शुरू किया और आखिरकार 41 बर्ष की जद्दोजहद के बाद 1918 में यह भवन बनकर तैयार हुआ। जो शुरुआती दौर में मिडिल स्कूल फिर जूनियर हाई स्कूल और अंत में इंटर कॉलेज के रूप में संचालित हुआ और लगभग 108 बर्ष से शिक्षा के क्षेत्र में अपनी यश कीर्ति बिखेर रहा है।

मैसमोर इंटर कालेज की भव्य इमारत का निर्माण बर्ष भले ही 1865 रहा हो लेकिन इसके शिक्षा संचालन के 108 साल हो गए हैं। कटवा पत्थर और उड़द व अन्य दालों को मिलाकर बनी यह इमारत ऐतिहासिक प्रतीकों में से एक कही जा सकती है। मैसमोर इंटर कॉलेज में लगी देवदार, साल, शीशम, सागौन व अन्य ईमारती लकड़ी पौड़ी के पास गडोली के जंगलों से ही नहीं बल्कि गढ़वाल मण्डल के कई स्थानों से यहाँ तक लायी गई है। ऊपर मंजिल सम्पूर्ण लकड़ी से बना है। व इसके सभागार की काष्ठ कलात्मकता अद्भुत है। आपको हैरत होगी कि इस हाल में सीसीएफ के छात्र-छात्राओं को मध्यान्तर में फल, बॉईल एग, ब्रेड व तरल पदार्थ बांटे जाते हैं। यह हाल इसलिए भी गरिमामयी लगता है क्योंकि यहाँ हाई परसेंटेज से पास हुए छात्र -छात्राओं के शिलापट पर नाम अंकित हैं। ये नाम सचमुच अन्य छात्र-छात्राओं को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (अ. प्राप्त)भुवन चंद्र खण्डूडी, लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी और हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्तवाल सहित कई जानी मानी हस्तियां इसी स्कूल में पढ़ी हैं। एक अपवाद है कि इस स्कूल में हिमालय पुत्र उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री हिमवती नंदन बहुगुणा, प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी यहां दाखिले के लिए आए थे। प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी यहां दाखिले के लिए आए थेए लेकिन फिर उन्हें पारिवारिक परिस्थिति के कारण कासंखेत जीआईसी में दाखिला लेना पड़ा। तब स्कूल में कक्षा छठवीं से अंग्रेजी की शिक्षा प्रारंभ हो जाती थी। मैसमोर में 1968 में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी बहन विजय लक्ष्मी पंडित के साथ भ्रमण के लिए आए थे। यहां के शैक्षणिक माहौल और दूसरी सांस्कृतिक खेलकूद आदि गतिविधियों से वे बहुत प्रभावित हुए थे। मेरा सौभाग्य है कि मैं भी इस स्कूल में सातवीं कक्षा का छात्र रहा हूँ।

मिशनरी संस्था से आए मैसमोर और थोरवन जैसे लोगों ने इस क्षेत्र में शैक्षणिक माहौल बनाने और बच्चों को पढ़ाने लिखाने के लिए काफी मेहनत की। सर मैसमोर ने चोपडा में आज के मुख्य स्कूल के नीचे एक स्थान पर स्कूल खोलकर शैक्षणिक माहौल तैयार किया। वह आगे चलकर मिशनरी संस्था से जुड़े और नार्वे से आए मिस्टर वीक ने सर मैसमोर के निधन के पश्चात इस स्कूल के भव्यतम रूप में इजाफा किया और चोपड़ा गाँव के पास टीचर्स हॉस्टल के साथ-साथ छात्रावास निर्माण में अपना योगदान दिया है। यह गर्व करने योग्य बात है कि 161साल की यह ईमारत आज भी अपनी जयगाथा सुनाती नजर आती है। वर्तमान में कहीं पर मामूली से लकड़ी के कार्य के अलावा विद्यालय भवन आज भी बुलंदियों को छू रहा है।

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