Wednesday, May 29, 2024
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ताराकुण्ड… अतुलनीय! जहां से स्नान कर उदय होता है भोर का तारा। कुंड की बैणी व तारा कुंड के गर्म पानी मे स्नान करती हैं स्वर्ग की अप्सराएं।

ताराकुण्ड… अतुलनीय! जहां से स्नान कर उदय होता है भोर का तारा। कुंड की बैणी व तारा कुंड के गर्म पानी मे स्नान करती हैं स्वर्ग की अप्सराएं।

कुंड की बैनी कहीं वही स्थान तो नहीं जहां देवी तारा ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए तप किया।

तो क्या यहीं स्नान करने उतरते थे तारे?

◆ कत्यूरी शैली से निर्मित ताराकुंड मंदिर हो सकता है आठवीं सदी का।

(मनोज इष्टवाल)

ढाईज्यूली….अर्थात पौड़ी गढ़वाल की शिवालिक श्रेणियों का वह क्षेत्र जो राठ क्षेत्र के सबसे ऊंचाई के भू-भाग पर क्षितिज के करीब हो। माफ करना यह शब्दार्थ मेरा नहीं बल्कि उन बुजुर्गों का है जो इस पट्टी में रचे बसे गांव व वहां की आबोहवा को लेकर यह सब कहते हैं। इसी ढाईज्यूली पट्टी के शीर्ष में वह खूबसूरत ताल हैं जहां से जुन्याली (भोर का तारा) स्नान करके बाहर निकलता है। …यह भी मेरा कहना नहीं है बल्कि यह यहाँ की लोकमान्यताओं में शामिल है। और ना ही यह बात अमीर खान निर्मित “तारे जमीं पर”….की ही है। यह तो एक ऐसे तारामंडल के ताराकुण्ड की है जहां देवी तारा ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए व तंत्र साधना के साथ अघोर तपस्या की।

ताराकुण्ड यूँ तो बड़ेथ-नौडी की सरहद के शीर्ष में स्थित है। इसमें शामिल वन भूमि मूलतः बड़ेथ गांव व नौडी गांव की ही मानी जाती है। यह वही नौडी है जिसके बारे में एक बहुत पुरानी कहावत है कि “नौ बाटा पौड़ी, सौ बाटा नौडी। “ (नौ रास्ते पौड़ी के और सौ रास्ते नौडी के)। जिसका सीधा सा अर्थ है कि यह कुमाऊँ गढ़वाल का वह क्षेत्र हुआ जो ब्रिटिश काल में पौड़ी से ज्यादा बसासत वाला गांव रहा है। नौडी में कहां बरजाति ब्राह्मण (12 जाति से अधिक ब्राह्मण) रहते हैं वहीं बड़ेथ पूरा गांव राजपूतों का है जिनमें चौहान व रावत बहुतायत संख्या में रहते हैं। नौडी सम्पूर्ण पंडितों का गांव है जो ढाईज्यूली पट्टी का सबसे बड़ा गांव माना जाता है। यहां पंडितों के अलावा टम्टा, रुढ़ियाआवजी जाति के लोग रहते हैं।

यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है, जिस ताराकुण्ड ताल का जिक्र पुराणों व ग्रन्थों में पढ़ने जानने को मिलता है व जहां के विधायक रहे डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा उत्तर प्रदेश में विधायक मंत्री रहते हुए व उत्तराखंड में मुख्यमंत्री रहते हुए “ताराकुण्ड” को पर्यटन के मानचित्र पर लाने की हर संभव कोशिश की, वही ताराकुण्ड उनके हरिद्वार सांसद बनते ही वीरान हो गया जबकि उनके काल में यहां ताराकुण्ड समिति हर बर्ष मेला आयोजित करवाती थी, लेकिन दुर्भाग्य देखिये इतने महत्वपूर्ण धार्मिक व पर्यटकों के लिए स्वर्ग जैसे स्थान से पर्यटक तो छोड़िए ग्रामीणों ने भी मुंह मोड़ लिया है।

ताराकुण्ड का आसमानी ताल।
यह यकीनन सौंदर्य से लबरेज बेहद ख़ूबसूरत आभामंडल लिए एक ऐसा ताल है जिसके किनारे ताराकुण्ड महादेव का पौराणिक मंदिर है। ताराकुण्ड ताल के मंदिर के निकट के गर्म जल की मान्यता बद्रीनाथ के तप्तकुंड व केदारनाथ क्षेत्र के गौरीकुंड के पवित्र जल के समान है।

ताराकुंड पौड़ी जिले का एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। ताराकुंड नामल स्थान अपनी प्रकृतिक सुंदरता व मनमोहक दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह स्थान बहुत ही रमणीक व शांत है। इस स्थान पर स्थित झील व प्राचीन मंदिर इस स्थान के प्रमुख आकर्षण हैं।

ताराकुंड तक यात्रा करने के लिए हमें उत्तराखण्ड के पौड़ी जनपद के मुख्यालय पौड़ी से 58 किमी की दूरी सड़क मार्ग से पैठानी तक से तय करने के लिए पौड़ी-बुबाखाल- चोपड्यूं-पाबौ- मुसागली-पैठाणी होकर बड़ेथ गांव तक मोटर वाहन से यात्रा करनी होगी। वैसे कई लोग थैलीसैण ब्लॉक के पैठाणी के निकट कमरगढ़ नामक गाँव से भी यहां तक पहुंचते हैं व ताराकुण्ड को कमरगढ़ गांव का हिस्सा ही मानते हैं क्योंकि इसी गांव के ऊपर समुद्रतल से लगभग 2200 मीटर की ऊंचाई पर ताराकुण्ड स्थित है। अगर आप पैठाणी राहू मंदिर से ताराकुण्ड तक ट्रैक करते हैं तब यह ट्रैक रूट 08 किमी. लम्बा पड़ता है और अगर आपको बड़ेथ तक पैठाणी सड़क मार्ग से  चलना है तब आप 14 किमी सड़क से बड़ेथ व वहां से 05 किमी ट्रैक कर ताराकुण्ड पहुंचते हैं।

वैसे ताराकुण्ड पहुंचने के लिए आप पौड़ी से इसी मार्ग होते हुए पैठानी- चाकीसैण- बड़ेथ होते हुए लगभग 65 किमी की दूरी तय कर भी बडेथ से लगभग 5-6 किमी., पल्लीसैण-सिरतोली से 4किमी व नौडी से लगभग 7 किमी पैदल यात्रा कर इस खूबसूरत ताल (झील) के दर्शन कर सकते हैं। यहां पहुंचने के लिए सबसे अच्छा समय अगस्त- सितंबर व अक्टूबर माह माना जाता है। नवम्बर-दिसम्बर व जनवरी में यह ताल बर्फ से आच्छादित रहता है व कड़ाके की ठंड होती है। आप फरवरी से लेकर अप्रैल तक भी यहां के वातावरण का आनंद उठा सकते हैं व नयनाभिराम दृश्यों का अवलोकन कर सकते हैं। मई जून-जुलाई ये तीन महीने बरसात के लिहाज से बाधक कहे जा सकते हैं व अक्सर गर्मियों में इस ताल (झील) का पानी कम हो जाया करता है व इन महीनों में खरक के जानवर यहां आ जाया करते हैं।

ताराकुंड की इस झील के किनारे एक प्राचीन शिब मंदिर है, ये दोनों मिलकर इस इस स्थान की सुंदरता व महत्व दोनों को बढाते हैं। इस झील का आकार काफी बड़ा है। क्षेत्र के लोगों का मानना है कि यह झील पौड़ी जिले कि सबसे बड़ी प्रकृतिक झील है। मंदिर के पास ही एक कुंड (कुंवा) है, मान्यता है कि यह कुंड 9 बांस गहरा है।

लोकमान्यताओं के अनुसार ।
द्वापर युग में स्वर्गारोहण के समय पांडव इस स्थान पर आए थे और उन्होने इस स्थान पर कुछ समय निवास किया था। इसी दौरान उन्होने इस स्थान पर भगवान शिव के इस मंदिर का निर्माण किया था। इसलिए भगवान शिव का यह मंदिर को। द्वापर युगीन भी कहा जाता है। श्रावण माह में पूर्व में यहां विशाल मेला लगता था जो ताराकुण्ड समिति की अगुवाई में लगाया जाता था लेकिन अब काफी बर्षों से यहां मेला आयोजित नहीं होता है। फिर भी श्रावण महीने में भगवान शिव को जल चढाने के लिए श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहता है। मंदिर के पास स्थिति कुंड के जल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है।

कुंड की बैणी की गुफा। 

यह अचंभित करने वाली बात है कि कुंड के किनारे बड़ा सा पत्थर है जिसके नीचे एक गुफा है। यहां पूर्व में एक माई रहा करती थी जिन्हें लोग कुंड की बैणी (कुंड की बहन) नाम से पुकारा करते थे। उनके काल-कलवित होने के बाद से अब तक भी इस पत्थर वाली गुफा को कुंड की बैणी नाम से ही जाना जाता है। लोकमान्यता है कि जब यह माई रहती थी तब उनकी गुफा के बाहर रात भर उनकी रक्षा के लिए शेर व बाघ पहरा देते थे। वे अब भी निरन्तर यहां अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं।

आँछरियों का निवास स्थल।

ताराकुण्ड आँछरियों के ताल के रूप में भी प्रसिद्ध है। कालांतर में यहां स्वर्ग की अप्सराएं एक निमित तिथि तक प्रवास करती थी। कहा तो यह भी जाता है कि यहाँ यहाँ राजा दक्ष पुत्री व माँ सती की बहन तारा ने शिब जी को प्रसन्न करने के लिए अघोर तपस्या की थी। कई लोकमान्यताओं में तारा नामक आँछरी (स्वर्ग परी) यहाँ रहा करती थी। उस दौरान जब उनका रथ चलता था तब अगर कोई महिला या अन्य खरक में अपने पालतू जानवरों के साथ 06 माह के प्रवास पर रहते थे तब वह उन्हें दूध घी मक्खन अर्पित करते थे। साथ ही उनके लिए खाजा-न्याजा भी रखा करते थे जो उनके लिए यह सब करना भूल जाता था उन पर उनका छल-बैकार शुरू हो जाता था और वे नाचना खेलना शुरू कर देते/देती थी। फिर गण पूछ के बाद उनका छल पूजन किया जाता था।

ताराकुण्ड में स्नान को उतरता भोर का तारा/ध्रुव तारा।

लोकमान्यताओं में यह बेहद प्रमुखता से प्रचलित था कि जुन्याली/सर्ग तारा/ध्रुव तारा (सुबह का संकेत देने वाला तारा जिसे भोर का तारा कहा जाता है), ताराकुण्ड में स्नान करके ही निकलता है। भले ही इस मत पर इस क्षेत्र के पूर्व जेष्ठ प्रमुख बालकिशन चमोली उदाहरण देते हुए बताते हैं कि ताराकुण्ड की ऊंचाई पर अवस्थित कठयूड़ गांव में अक्सर जुन्याली में ताराकुण्ड किसी पारे की तरह चमकदार दिखाई देता है। क्योंकि ताराकुण्ड बहुत ऊंचाई पर है इसलिए उस झील के पानी पर जब भोर के तारे की परछाई पड़ती है तो लगता है मानों भोर का तारा यहीं से निकल रहा हो। इसीलिए अक्सर यह मान लिया गया होगा कि ताराकुण्ड में तारे स्नान करने आते हैं। वैसे लोकमान्यताओं के आधार पर यह माना जाता है कि तभी इस ताल का नाम ताराकुण्ड पड़ा है।

सर्ग तारा अर्थात भोर का तारा की खूबसूरती का ब्याख्यान गढवाळी लोकगीतों में भी उदरित है। लगता है यह किसी ऐसी महिला की ही कल्पना का वह समुद्र रहा होगा जिसमें उसने इतनी खूबसूरत पंक्तियां भिगोकर पिरोई हैं- “सर्ग तारा जुन्याली राता, कू सूणलो तेरी मेरी बाता. .सर्ग तारा।

श्रीमदमहादेवी भागवत पुराण के आठवें अध्याय में भी देवी तारा की घोर तपस्या का उल्लेख मिलता है। जो उन्होंने महादेव को प्रसन्न करने के लिए की थी।

तंत्र साधकों की देवी तारा।

जैसा कि मैं पूर्व में भी कह चुका हूँ कि देवी तारा कनखल हरिद्वार के राजा दक्ष की पुत्री व माता सती की बहन हुई जिसने इस स्थान पर महादेव को प्रसन्न करने के लिए अघोर तपस्या की थी। पौराणिक काल में तारामंडल के ताराकुंड में तंत्र साधक देवी तारा को प्रसन्न करने के लिए तंत्र साधना किया करते थे। पूजा का विधान है जिन्हें तांत्रिकों की प्रमुख में से एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक प्राचीन काल में सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने देवी तारा की आराधना की थी। इनके तीन स्वरूप हैं, तारा, एकजटा और नील सरस्वती।

मंत्र-
नीले कांच की माला से 12 माला प्रतिदिन ‘ ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट्‘ मंत्र का जाप करें।

शाबर मंत्र-
ॐ तारा तारा महातारा, ब्रह्म-विष्णु-महेश उधारा, चौदह भुवन आपद हारा, जहाँ भेजों तहां जाहि, बुद्धि-रिद्धि ल्याव, तीनो लोक उखाल डार-डार, न उखाले तो अक्षोभ्य की आन, सब सौ कोस चहूँ ओर, मेरा शत्रु तेरा बलि, खः फट फुरो मंत्र, इश्वरो वाचा।
मान्यता है गुप्त नवरात्रों में इस मंत्र का 10,000 बार जाप करके इसको सिद्ध किया जा सकता है।

माता तारा को तांत्रिक की देवी माना जाता है। तांत्रिक साधना करने वाले तारा माता के भक्त कहे जाते हैं। चैत्र मास की नवमी तिथि और शुक्ल पक्ष के दिन तारा देवी की तंत्र साधना करना सबसे ज्यादा फलकारी माना जाता है।

कौन हैं माता तारा देवी, जिन्हें हिंदू-बौद्ध दोनों पूजते है।

हिमाचल के शिमला में देवी तारा का मंदिर है जहां हिंदू व बौद्ध माँ तारा की पूजा करते हैं, लेकिन पौड़ी जनपद के राठ क्षेत्र में अवस्थित ताराकुंड में अज्ञानता के कारण लोग वर्तमान में सिर्फ़ महादेव मंदिर में जल चढ़ाकर इतिश्री कर अपनी मनोकामना पूरी करते हैं।तारा एक महान देवी है जिनकी पूजा हिंदू और बौद्ध दोनों धर्म में होती हौ। तारने वाली कहने के कारण भी माता तारा को तारा देवी के नाम से जाना जाता है।

मुझे लगता है कि कहीं कुंड की बैनी कहीं वही स्थान तो नहीं जहां देवी तारा ने महादेव को प्रसन्न करने के लिए तप किया।

पूर्व जेष्ठ प्रमुख बताते हैं कि ताराकुण्ड के विकास व इसे पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए इसके अध्यक्ष लदवाड़ी गांव के कैप्टेन राणा, बड़ेथ गांव के पूर्व प्रमुख शंकर सिंह रावत व सिरतोली गांव के से.नि. खंड विकास अधिकारी थैलीसैण आशाराम पन्त ने काफ़ी प्रयास किये व उन्होंने जब डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ विधायक बने थे, तब से लेकर उनके मुख्यमंत्री काल तक लगातार ताराकुण्ड में मेलों का आयोजन करवाया व डॉ निशंक द्वारा हर बार इस आयोजन के लिए ताराकुण्ड समिति को यथासंभव सहयोग भी प्रदान करवाया। साथ ही उन्होंने ताराकुण्ड के सुदृढ़ीकरण हेतु यहां धर्मशालाओं का निर्माण भी करवाया है।

कत्यूरी शैली से निर्मित ताराकुंड मंदिर हो सकता है आठवीं सदी का।

यह आश्चर्यजनक सा लगता है कि हमने कभी भी ताराकुंड जैसे धार्मिक व धार्मिक पर्यटन से जुड़े स्थान पर शोध करने का मन नहीं बनाया जिसके कारण ताराकुंड से सम्बंधित जानकारियाँ अपर्याप्त हैं। लेकिन मेरे अनुसार यह स्थान पौड़ी स्थित क्यूँकालेश्वर मंदिर काल में ही निर्मित है क्योंकि इस मंदिर की अवस्थापना भी 2200 मीटर की ऊँचाई पर हुई है व क्यूंकालेश्वर मंदिर की भी। ये दोनो ही शिवलिक श्रेणियों में बेहद दर्शनीय स्थल कहे जाते हैं। जहां दूर-दूर से लोग क्यूंकालेश्वर का सूर्यास्त देखने आते हैं वहीं ताराकुंड में भोर का तारा अर्थात् सुबह होने की सूचना देने वाले तारे को देखना अद्भुत लगता है। केदारनाथ, क्यूँकालेश्वर व ताराकुंड सभी कत्यूरी काल में निर्मित बताये जाते हैं व सभी के राजप्रसाद एक जैसे ही हैं। कत्यूरी राजाओं द्वारा पुरातन केदारनाथ का बारहवीं सदी में पुन: रख-रखाव किया जिसके फलस्वरूप आर्क्लोजिकल सर्वे ने कार्बन डेंटिंग मेंयह मान लिया कि केदारनाथ 11-12वीं सदी में निर्मित है जबकि मेरा मानना है कि केदारनाथ द्वापर में पांडवों द्वारा फिर आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा व फिर कत्युरी काल में क़त्यूरी राजाओं के रख-रखाव में रहा है।

बहरहाल ताराकुंड जैसा मनोरम मंदिर भी पूर्व में बिना रख-रखाव के जीर्ण-शीर्ण हो गया था लेकिन डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के इस क्षेत्र के विधायक बने रहने से लेकर उनके मंत्री मुख्यमंत्री रहने तक इसका स्वर्णिम युग लौटा है, ऐसा कहा जा सकता है क्योंकि उनके काल में यहाँ काफ़ी कार्य हुये लेकिन वर्तमान में जनउपेक्षाओं के चलते व धर्म पर्यटन विभाग के उदासीन रवैये के फलस्वरूप इसके रख-रखाव में परेशानियाँ सामने आ रही हैं।

ताराकुंड से निकलने वाली नदियाँ।

ताराकुंड ताल से यूँ तो छोटी मोटी नदियाँ बहुतेरी निकलती हैं लेकिन मूलतः यह स्थान पश्चिमी नयार नदी का उद्ग़म स्थल भी कहा जाता है। जो दूधातोली पर्वत शिखर का उत्तुंग स्थान है। यहाँ से निकलने वाली नदी को यहाँ के लोग दुतोली गाड़ जो पैठानी राहु मंदिर के पास स्योलिखंड क्षेत्र से निकलने वाली काणी गाड़ के साथ संगम बनाकर आगे पश्चिमी नयार के रूप में परिवर्तित होती है व आगे चलकर सतपुली के निकट बड़खोलू के पास पूर्वी नयार में शामिल होकर नयार नदी क़ा रूप लेकर ब्यासचट्टी में गंगा नदी में समा जाती है। पूर्वी व पश्चिमी नयार दोनो ही दूधातोली शिखर से निकलती हैं। ये पहली दो ऐसी हिमालयी नदियाँ हैं जो बिना ग्लेशियर के कही जाती हैं।

ताराकुंड के आस-पास के खरक।

(गुणखिल खरक में चारापत्ती के साथ पूर्व जेष्ठ प्रमुख बालकिशन चमोली)

ताराकुंड के आस पास छोटे-छोटे मनोरम बुग्यालों में तित्तरी, गुणखिल, धौंरख़ाली, कंडोडांड़ा दुतोली खरक हैं। दुतोली को छोड़ दिया जाय तो बाक़ी खरक क्रमशः गाँव के हिसाब से बडेथ, नौड़ी, आंताखोली, मझोली, बंदानी सौंट गाँव के हैं। इन खरकों में इन गाँव के ग्रामीण अपने पशुधन को लेकर 06 माह का प्रवास करते हैं।

पूर्व जेष्ठ प्रमुख बालकिशन चमोली बताते हैं कि वह स्वयं भी अपने खरक अर्थात् नौड़ीगाँव के खरक गुणखिल में रहे हैं। यहाँ की दिनचर्या यह होती है कि पहले दिन हम अपनी गाय बच्छी, भेड़ बकरियाँ लेकर पहुँचते हैं व उनके रखरखाव के संसाधान जुटाते हैं। दूसरे दिन सुबह हम दूध दूहकर सुबह सबेरे गाँव लौटते हैं व माँ बहने खरक आ जाती हैं पशुधन के लिए चारापत्ती की व्यवस्था करने। कभी नौड़ी गाँव की जनसंख्या का अनुमान लगा पाना कठिन था इसीलिए राठ का नौड़ी व सलाण का पौड़ी की तुलना होती थी।

(नौडी के अपने पैतृक आवास व हाल ही में दिल्ली रह रहे किसी व्यक्ति के आधुनिक आवास के साथ बालकिशन चमोली)

वे मायूस होकर कहते हैं कि राज्य बनने के बाद अपने बच्चों के भविष्य बनाने की चिंता के कारण सबसे अधिक पौड़ी गढ़वाल से ब्राह्मण गाँवों से पलायन हुआ,ऐसे में भला हम कहाँ से पलायन की जद से बच पाते। नौड़ी भी पलायन की अंधी दौड़ में लगभग ख़ाली होने लगा। मैने ज़िद करके स्वयं पहले पहल करते हुये अपने गाँव में सुख-सुविधा सम्पन्न आवास निर्माण किया। तनिक रुककर कहते हैं कि ऐसा नहीं कि जब वह जेष्ठ प्रमुख थे तब उन्होंने यहाँ पहल नहीं की। बर्ष 2009-10 में उन्होंने गाँव में कई शौचालयों का निर्माण करवाया था लेकिन तब तक विकास की अंधी दौड़ पर पलायन की मार बदस्तूर जारी थी लेकिन अब वह खुश हैं कि उनके बाद गाँव में पुन: रिवर्स माइग्रेशन हुआ है व दर्जनों लोगों ने अपने पुराने व नए आवास बनाए हैं। नौड़ी गाँव में हाल ही के दिनों में यहीं के एक सम्भ्रांत व्यक्ति जो दिल्ली रहते हैं ने लगभग डेढ़ करोड़ का मकान बनाया है।

उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों की बड़ी इच्छा थी कि ताराकुंड धर्म-पर्यटन की धुरी का केंद्रबिंदु बने जिसके लिए सभी गाँव के ग्रामीण वहाँ तक सड़क ले जाने की लगातार माँग करते रहे हैं लेकिन वनभूमि होने के कारण वहाँ तक सड़क ले जाना संभव भी नहीं है।

मेरा निजी अनुभव भी यही कहता है कि ऐसे सुरम्य स्थलों को सड़क मार्ग से दूर ही रखना चाहिए क्योंकि तभी यहाँ देवताओं का वास हो सकता है व प्रकृति की सुंदरता का यशोगान भी।

खरकों में यहाँ का जनमानस अपने 06 माह के प्रवास के दौरान मूला, आलू, भांग, चौलाई व हरी सब्ज़ियाँ उगाते हैं। भांग के बीज आलू-मूला के साग में, भंगल्टा अर्थात् डंडी-टहनियाँ जलाने के काम में व उसकी छाल रेशे रस्सी बनाने के लिए इस्तेमाल में लाते हैं।

काँगडयियों का भेडाली पड़ाव। 

कभी भेड़-बकरियों के झुंड के झुंड लिए हिमाचल काँगड़ा क्षेत्र के पशुचारक भेडाल भी छः माह के प्रवास हेतु शिवालिक श्रेणियों के ताराकुंड क्षेत्र से मस्ती में गंगी गाते हुए ऋंग ऋषि की तपस्थली दूधातोली तक का सफ़र इसी रास्ते से किया करते थे। वह इन्हीं खरकों से गुज़रकर कंडोडंडा होते हुए दूधातोली होते हुए कर्णप्रयाग या कोदियाबगड़ होते हुए वापस काँगड़ा लौटते हैं। ऐसे में यह अनुमान भी लगाया जा सकता है कि हिमाचल की देवी तारा कहीं कालांतर में इन्हीं पशुचारक भेड़ालों के साथ शिमला तो नहीं गयी होंगी क्योंकि उन्हें आखेटक देवी भी कहा जाता है। भेडाल जहां भी डेरा डालते हैं वहाँ सर्वप्रथम वनदेवियों की स्थापना करते हैं, सिधवा-विधवा रमोला का स्मरण कर ऋंग ऋषि का आवाहन भी करते हैं।

बालकिशन चमोली बताते हैं कि इन पशुचारकों को उनके क्षेत्र में काँगड़ी ही बोलते हैं। इनसे हमारे क्षेत्र के लोग भेड़ बकरियों के मेमने ख़रीदते थे जो साल दो साल पालने के बाद ख़रीदी गयी रक़म से 06 से 07 गुना अधिक धनराशि उन्ही मेमनों को पालकर प्राप्त कर लेते हैं।

बहरहाल मेरा मानना है कि ताराकुंड को पर्यटन के मानचित्र में स्थापित करने के प्रयास अभी भी नाकाफ़ी हैं। पर्यटन विभाग को ताराकुंड के विकास के लिए अतुलनीय प्रयास करने होंगे ताकि धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में अछूता यह स्थल नयी सम्भावनाओं को जन्म दे सके। अभी भी ताराकुण्ड पर वृहद शोध की आवश्यकता है।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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