Friday, August 14, 2026
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तम्बोला घुघूती के बच्चों का बदला लेते हुए सूर्यवंशी गोल्जू देवता ने ऊँचा डोटी गढ़ उजाड़ डाला!

 अपनी वंशावली में 22 वें राजा हुए गोरिल या गोलू राई..!

(मनोज इष्टवाल)

कुमाऊं मंडल का चमत्कारी देवता गोरिल/गोल्जू कितना न्याय प्रिय रहा यह हम सब जानते हैं. अक्सर हम चम्पावत, चितई और घोडाखाल के तीन मंदिरों के बारे में जानकारी ही इतिश्री कर देते हैं कि गोल्जू के ये तीन स्थान हैं लेकिन इतिहास के पन्ने पलटते- पलटते आप जब गोल्जू पर पूरे मनोयोग से कार्य प्रारम्भ करते हैं तब पता लगता है कि गोरिल/गोलू/गोल्जू/ग्वेल सहित दर्जनों नामों से पुकारे जाने वाले गोरिल को उच्च हिमालयी से लेकर मध्य हिमालयी क्षेत्र के सभी लोग पूजते हैं. चाहे असम मेघालय, शिलोंग हो या फिर गढ़ कुमाऊं हिमाचल नेपाल व जम्बू कश्मीर! फर्क इतना आया कि इस न्याय प्रिय देवता के हर स्थान पर नाम बदलते रहे जिन्हें संजोने की आज तक इतिहासकारों ने जरुरत महसूस नहीं की.

तम्बोला घुघूती के बच्चों का बदला लेते हुए सूर्यवंशी गोल्जू देवता ने ऊँचा डोटी गढ़ उजाड़ डाला!

गोरिल देवता की वंशावली में उनके दादा हलराई पिता झलराई व माँ कलिंका व छ: अन्य माँ का जिक्र है. हर कदम पर बदलते इतिहास की अपभ्रंशता ने अवश्य ही यहाँ इतिहासकारों के लिए परेशानी पैदा की होगी. लेकिन इमानदारी से कहें तो गोरिल देवता पर कार्य करने का ईमानदार प्रयास आज तक किसी भी इतिहासकार ने नहीं किया, तभी तो जितनी किताबें उठाओ सब में एक से सन्दर्भ मिलते हैं और चुनिन्दा कुछ मंदिर!

गोरिल की जागरों को कभी किसी ने फोकस नहीं किया और यही कारण भी रहा कि हम उस गूढ़त़ा से लिख नहीं पाए. यूँ भी गढ़-कुमाऊं का इतिहास या उस से सम्बन्धित जितने भी लोक कथाएं दन्तकथाएं प्रचलित थी वे 1797 से पहले सिर्फ भाट, चारण, भद्दी, या गुनिजन आवजी के मुखार्बिंदु से बहकर एक सदी से दूसरी सदी तक टहलती रही. अंग्रेजी लेखक जी ए गरिएरअटकिन्सन ने तत्कालीन बीए पास बृजमोहन घिल्डियाल के माध्यम से इस बिखरे हुए इतिहास को लिपिबद्ध या कलमबद्ध करने का जिम्मा उठाया और उसके बाद जो हमें मिला वह लगातार मिलता रहा.

एक जागर जोकि टिहरी रियासत में गाई व बजाई जाती थी जिसमें गोल्जू देवता को नचाया खिलाया जाता था या कहें उनकी आत्मा को अवतरित किया जाता था उसमें तम्बोला नामक घुघूती का बर्णन आता है जो जम्बू द्वीप से चलकर गोरिल चौड़ (चम्पावत) आती है जहाँ गोलू देवता का मंडोला था वहीँ रूईणी वृक्ष में वह अपना आवास बनाकर रहना शुरू कर देते है. इस पक्षी से गोरिल देवता को इतना प्यार होता है कि वे उसे अपनी धर्मबहन बना देते हैं.

अपना घोंसला बनाकर अब तम्बोला घुघूती उसमें अंडे देती है. फिर उसके बच्चे होते हैं जिन्हें वह अपनी चोंच में पाणी लाकर पिलाती है बाजू में दबाकर लाया दाना चुगाती है. अब वे घोंसलें से छोटे छोटे पंख भी फडफडाने लगते हैं. गोरिल अपने भांजों को अपनी जान से ज्यादा मानता है.

एक दिन जब तम्बोला-घुघूती बच्चों के लिए दाना लेने गयी होती है, तब डोटीगढ़ नेपाल के ग्वाले आकर रुईणी के पेड़ में उन बच्चों का कलरव सुनते हैं. वे उदंडी घोंसला उजाड़ देते हैं व बच्चों को वहीँ पटकर मार डालते हैं. जब तम्बोला घुघूती आकर अपनी बच्चों को मृत पाती है तब वह खूब रोती बिलाप करती है. उसके आंसू गोलू देवता के त्रिशूल में पड़ते हैं. गोलू देवता तम्बोला से बोलता है कि आखिर ऐसी किसकी शामत आ गयी जिसने मेरी बहन को इस तरह रुलाया है.

घुघूती अपनी ब्यथा सुनाती है और सूर्यवंशी गोरिल देबता बदला लेने डोटी गढ़ आ धमकता है. राजा व उसके द्वारपाल सफ़ेद घोड़े में सवार होकर आये इस नौजवान का दुखड़ा सुनने की जगह उसे दुत्कारते हैं तो गोरिल का गुस्सा भड़क जाता है. भयंकर युद्ध छिडता है और गोल्जू ऊँचे डोटी गढ़ को तहस-नहस कर देता है.

गमशारी का घाम साधने के बाद गोरिल जब वापस गोरिल चौड़ पहुँचता है तब वह अपने कलश से अमृत जल छिडककर तम्बोला घुघूती के बच्चों को जीवित करता है. तब से गोरिल महिलाओं की फ़रियाद पहले सुनता है और उनके साथ हुए अन्याय के लिए अन्यायी को उतना ही कठोर दंड देता है.

(डोटी गढ़ नेपाल के भग्नावशेष)

गोरिल देबता की दुर्लभ वंशावली आखिरकार अपने शोध से मैं जुटा पाया हूँ. क्योंकि आज तक हम सब सिर्फ गोरिल की माता कालिंका, भाई कलुवा, हरुवा, छ; सौतेली माँ, दादा हलराई और पिता झलराई के बारे में ही जानते थे जबकि उनकी वंशावली में श्रृष्टि निर्माण के समय से लेकर वर्तमान तक का दृश्य परिलक्षित होता है. उनकी वंशावली इस प्रकार है-

  • उन्वाकार (ओंकार), 2- ध्वान्कार, 3- धुमियाकार, 4- बेकरतार, 5- श्रृष्टिकरतार, 6- अग्निराई, 7-शीशराई, 8- कंसराई, 9- सूरजमल, 10- कटारमल, 11- दूधराई, 12- उदराई, 13- गोपीपाल, 14- पृथ्वीपाल, 15- सिलराई, 16- पिलराई, 17- आसवराई, 18- कासवराई, 19- गौतम राई, 20- हालू राई (हलराई) 21- झालूराई (झलराई) 22- गोलू राई (गोरिल/गोल्जू/ग्वेल/ग्वल)

उनकी माँ का नाम हम किताबों में कलिंका पढ़ते आये हैं. या फिर कई जागरों में भी उन्हें कालिंका कहा गया है लेकिन यहाँ उन्हें माता कलंदरा नाम से पुकारा गया है. विगत 14 जून 2016 को  दिपायल (नेपाल) के ऊँचे टीबे में स्थित डोटी गढ़ के खंडहरों तक हमारी टीम पहुँचने में कामयाब रही जहाँ आज भी गोल्जू को बटुकनाथ भैरव के रूप में पूजा जाता है.

यो रुमनी-झूमनी संध्या का बखत में॥
जै गुरु-जै गुरु
माता पिता गुरु देवत
तब तुमरो नाम छू इजाऽऽऽऽऽऽ
यो रुमनी-झूमनी संध्या का बखत में॥
तै बखत का बीच में,
संध्या जो झुलि रै।
बरम का बरम लोक में, बिष्णु का बिष्णु लोक में,
राम की अजुध्या में, कृष्ण की द्वारिका में,
यो संध्या जो झुलि रै,
शंभु का कैलाश में,
ऊंचा हिमाल, गैला पताल में,
डोटी गढ़ भगालिंग में…जै गुरु-जै गुरु
माता पिता गुरु देवत
तब तुमरो नाम छू इजाऽऽऽऽऽऽ
यो रुमनी-झूमनी संध्या का बखत में॥
तै बखत का बीच में,
संध्या जो झुलि रै।
बरम का बरम लोक में, बिष्णु का बिष्णु लोक में,
राम की अजुध्या में, कृष्ण की द्वारिका में,
यो संध्या जो झुलि रै,
शंभु का कैलाश में,
ऊंचा हिमाल, गैला पताल में,
डोटी गढ़ भगालिंग में
कि रुमनी-झुमनी संध्या का बखत में,
पंचमुखी दीपक जो जलि रौ,
स्योंकार-स्योंनाई का घर में, सुलक्षिणी नारी का घर में,
जागेश्वर-बागेश्वर, कोटेश्वर, कबलेश्वर में,
हरी हरिद्वार में, बद्री-केदार में,
गुरु का गुरुखण्ड में, ऎसा गुरु गोरखी नाथ जो छन,
अगास का छूटा छन-पताल का फूटा छन,
सों बरस की पलक में बैठी छन,
सौ मण का भसम का गवाला जो लागीरईए
गुरु का नौणिया गात में,
कि रुमनी- झुमनी संध्या का बखत में,
सूर्जामुखी शंख बाजनौ,उर्धामुखी नाद बाजनौ।
कंसासुरी थाली बाजनै, तामौ-बिजयसार को नगाड़ो में तुमरी नौबत जो लागि रै,
म्यारा पंचनाम देबोऽऽऽऽऽऽ………!
अहाः तै बखत का बीच में,
नौ लाख तारों की जोत जो जलि रै,
नौ नाथन की, नाद जो बाजि रै,
नौखण्डी धरती में, सातों समुन्दर में,
अगास पाताल में॥
कि ऎसी पड़नी संध्या का बखत में,
नौ लाख गुरु भैरी, कनखल बाड़ी में,
बार साल सिता रुनी, बार साल ब्यूंजा रुनी,
तै तो गुरु, खाक धारी, गुरु भेखधारी,
टेकधारी, गुरु जलंथरी नाथ, गुरु मंछदरी नाथ छन, नंगा निर्बाणी छन, खड़ा तपेश्वरी छन,
शिव का सन्यासी छन, राम का बैरागी छन,
कि यसी रुमनी-झुमनी संध्या का बखत में,
जो गुरु त्रिलोकी नाथ छन, चारै गुरु चौरंगी नाथ छन,
बारै गुरु बरभोगी नाथ छन, संध्या की आरती जो करनई।
गुरु वृहस्पति का बीच में।
…….कि तै बखत का बीच में बिष्णु लोक में जलैकार-थलैकार रैगो,
कि बिष्णु की नारी लक्ष्मी कि काम करनैं,
पयान भरै। सिरा ढाक दिनै। पयां लोट ल्हिने,
स्वामी की आरती करनै।
तब बिष्णु नाभी बै कमल जो पैद है गो,
तै दिन का बीच में कमल बटिक पंचमुखी ब्रह्मा पैड भो,
जो ब्रह्मा-ले सृष्टि रचना करी, तीन ताला धरती बड़ै,
नौ खण्डी गगन बड़ा छि।
….कि तै बखत का बीच में बाटो बटावैल ड्यार लि राखौ,
घासिक घस्यार बंद है रौ, पानि को पन्यार बंद है रौ,
धतियैकि धात बंद है रै, बिणियेकि बिणै बंद है रै,
ब्रह्मा वेद चलन बंद है रो, धरम्क पैन चरण बंद है गो,
क्षेत्री-क खण्ड चलन बन्द है गो, गायिक चरण बन्द है गो,
पंछीन्क उड़्न बंद है गो, अगासिक चडि़ घोल में भै गईं,
सुलक्षिणी नारी घर में पंचमुखी दीप जो जलण फैगो……..
……कि तै बखत का बीच में संध्या जो झुलनें,
दिल्ली दरखड़ में, पांडव किला में,
जां पांच भै पाण्डवनक वास रै गो,
संध्या जो झूलनें इजूऽऽऽ हरि हरिद्वार में, बद्री केदार में,
गया-काशी,प्रयाग, मथुरा-वृन्दावन, गुवर्धन पहाड़ में,
तपोबन, रिखिकेश में, लक्ष्मण झूला में,
मानसरोबर में नीलगिरि पर्वत में……।
तै तो बखत का बीच में, संध्या जो झुलनें इजू हस्तिनापुर में,
कलकत्ता का देश में, जां मैय्या कालिका रैंछ,
कि चकरवाली-खपरवाली मैय्या जो छू, आंखन की अंधी छू,
कानन की काली छू, जीभ की लाटी छू,
गढ़ भेटे, गढ़देवी है जैं।
सोर में बैठें, भगपती है जैं,
हाट में बैठें कालिका जो बणि जैं।
पुन्यागिरि में बैठें माता बणि जैं,
हिंगलाज में भैटें भवाणी जो बणि जैं।
….कि संध्यान जो पड़नें, बागेश्वर भूमि में, जां मामू बागीनाथ छन।
जागेशवर भूमि में बूढा जागीनाथ रुनी,
जो बूढा जागी नाथन्ल इजा, तितीस कोटि द्याप्तन कें सुना का घांट चढ़ायी छ,
सौ मण की धज चढ़ा छी।
संध्या जो पड़ि रै इजाऽऽऽ मृत्युंद्यो में, जां मृत्यु महाराज रुनी, काल भैरव रुनी।
तै बखत का बीच में संध्या जो झुलनें,
सुरजकुंड में, बरमकुंड में, जोशीमठ-ऊखीमठ में,
तुंगनाथ, पंच केदार, पंच बद्री में, जटाधारी गंग में,
गंगा-गोदावरी में, गंगा-भागीरथी में, छड़ोंजा का ऎड़ी में,
झरु झांकर में, जां मामू सकली सैम राजा रुनी,
डफौट का हरु में, जां औन हरु हरपट्ट है जां, जान्हरु छरपट्ट है जां…….।
गोरियाऽऽऽऽऽऽ दूदाधारी छै, कृष्ण अबतारी छै।
मामू को अगवानी छै, पंचनाम द्याप्तोंक भांणिज छै,
तै बखत का बीच में गढी़ चंपावती में हालराई राज जो छन,
अहाऽऽऽऽ! रजा हालराई घर में संतान न्हेंतिन,
के धान करन कूनी राजा हालराई…….!
तै बखत में राजा हालराई सात ब्या करनी…..संताना नाम पर ढुंग लै पैद नि भै,
तै बखत में रजा हालराई अठुं ब्या जो करनु कुनी,
राजैल गंगा नाम पर गध्यार नै हाली, द्याप्ता नाम पर ढुंग जो पुजिहाली,……
अहा क्वे राणि बटिक लै पुत्र पैद नि भै…….
राज कै पुत्रक शोकै रैगो
एऽऽऽऽऽ राजौ- क रौताण छिये……!
एऽऽऽऽऽ डोटी गढ़ो क राज कुंवर जो छिये,
अहाऽऽऽऽऽ घटै की क्वेलारी, घटै की क्वेलारी।
आबा लागी गौछौ गांगू, डोटी की हुलारी॥
डोटी की हुलारी, म्यारा नाथा रे……मांडता फकीर।
रमता रंगीला जोगी, मांडता फकीर,
ओहोऽऽऽऽ मांडता फकीर……।
ए…….तै बखत का बीच में, हरिद्वार में बार बर्षक कुम्भ जो लागि रौ।
ए…… गांगू…..! हरिद्वार जै बेर गुरु की सेवा टहल जो करि दिनु कूंछे……!
अहा…. तै बखत का बीच में, कनखल में गुरु गोरखीनाथ जो भै रईं……!
ए…… गुरु कें सिरां ढोक जो दिना, पयां लोट जो लिना…..!
ए…… तै बखत में गुरु की आरती जो करण फैगो, म्यरा ठाकुर बाबा…..!
अहा…. गुरु धें कुना, गुरु……, म्यारा कान फाडि़ दियो,
मून-मूनि दियो, भगैलि चादर दि दियौ, मैं कें विद्या भार दी दियो,
मैं कें गुरुमुखी ज बणा दियो। ओ…
दो तारी को तार-ओ दो तारी को तार,
गुरु मैंकें दियो कूंछो, विद्या को भार,
बिद्या को भार जोगी, मांगता फकीर, रमता रंगीला जोगी,मांगता फकीर।

गोरिल देवता का कुछ इस तरह का आवाहन किया जाता है.

 

Himalayan Discover
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