Tuesday, March 5, 2024
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तो कोट भ्रामरी, बाराही या झालीमाली है खैरालिंग (मुंडनेश्वर) की काली माँ..!

7-8 जून 2022 (खैरालिंग मेला)

कभी कभी आप ठगे से रह जाते हैं। बदलते सामाजिक परिवेश के साथ मनुष्य की अवधारणाएं बदलती रहती हैं लेकिन सनातन हिन्दू धार्मिक परम्पराओं के रसातल पर पहुंचने के बाद फिर एकाएक उभरकर ऊंचाई छूना यकीनन हृदयस्पर्शी लगता है। आज से 30 बर्ष पूर्व तक जून माह आया नहीं कि पूरे पर्वतीय समाज के लोग अपने अपने गांव लौट आते थे। इसे मूलतः घर गांव के लोग गर्मियों की छुट्टियों में घर आना कहते थे। लेकिन जून माह पूरे पर्वतीय समाज के लिए डोंर थाली ढोल व डोली गुड्डी चढ़ाने, छाया पूजने जैसे कई धार्मिक अनुष्ठानों के हुआ करते थे। 

फिर उत्तराखंड राज्य नई सदी के प्रारम्भ यानि 09 नवम्बर 2000 को बनता है और हमारे पहाड़ी समाज के ताने बाने बिखरने शुरू होने लगते हैं। सबको बोरिया बिस्तर समेटने की जल्दबाजी हो जाती है जैसे लोग लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी जी का गाया व बीरेंद्र पंवार जी के लिखे गीत “होणी खाणी देहरादून, सभी धाणी देहरादून” की आपाधापी में बोरिया बिस्तर समेटने लगे हों। देखते ही देखते इन 22 बर्षों में प्रदेश के लगभग 22 हजार गांव खाली तो हुए लेकिन ले गए यहां की सभ्यता, समाज, धार्मिक अनुष्ठान व लोक परम्पराएं, संस्कृत, लोक त्यौहार व मेले कौथिग…! बचे निर्जन पहाड़, बंजर खेत, मकानों का मखौल उड़ाती धूर उजड़ी फटालें व आंगन की खुरदुरी हो चुकी दीवार की फटालें..! जहां कभी टाट पैबंद, मन्द्रियाँ, दन्न, गदेलियाँ बिछती थी व उन में बैठकर गांव समाज का ठट्ठा मजाक हंसी खुशी दुःख सुख बंटते थे। 

नीरस होते ऊंचे डांडे में देव आस्था के साथ देवी देवताओं के थाने व उन्हीं मंदिरों की मोरियों से बाहर झांकते देवता अपनों के इंतजार आंखें पथराते..! न ढोल ध्वजा बागी बकरा,न जलेबी तरबूज की दुकान और न पण्डों का शोर न भीमसेण की रिंगोंण..! सब मिटता गया …और फिर अच्छप्प हो गया।

लेकिन फिर अयोध्या में रामराज की कल्पना क्या हुई सनातन हिन्दू जागृत हो उठे। फिर लौटे अपने मंदिरों को चुनने बुनने व धार्मिक अनुष्ठानों के लिए। पहल में कुछ बुद्धिजीवी जुटे तो कुछ न देवास्था में श्रमदान की जगह धनदान दिया। उदाहरण के तौर में असवालस्यूं नैल गांव के झाली माली व राजराजेश्वरी मंदिर व असवालस्यूं का भव्य मेला स्थल खैरालिंग/मुंडनेश्वर मंदिर..! सालों बाद इस बर्ष खूब रौनक़ लौटी। लेकिन भव्य मेले में न ढोल न दमो… ऊपर से 05किमी लम्बा जाम। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह कि मंदिर के अंदर माँ काली की मूर्ति का न होना। जबकि जिसके नाम पर यह मेला अयोजित किया जाता है वही असवाल जाति की कुलधात्री देवी माँ काली जो बाहर आले में विराजमान हुआ करती थी वही मंदिर में दर्शनार्थियों को नहीं दिखती। मन्दिर बिहंगमता लिए है लेकिन माँ काली की वह पौराणिक मूर्ति जिसे गोरखाओं द्वारा एक तरफ तोड़ दिया गया था वह मन्दिर प्रांगण में नहीं होना आश्चर्यजनक है? क्या इस ओर मन्दिर समिति का ध्यान नहीं गया या फिर कोई अन्य बात कोई रहस्य लिये है।

बहरहाल यह लम्बा बिषय है जिसे स्वयं मन्दिर समिति को सुलझाना होगा। लेकिन इस साल हुए भव्य आयोजन को देखते हुए जैसा कि मिर्चोडा के ठाकुर रतन सिंह असवाल ने बताया कि थौळ (जहां मंडाण लगता है) भी दुकानों के लिए बांट दिए गए जिससे ढोल व मन्डाण का आयोजन नहीं हो पाया लेकिन अगले बर्ष इन कमियों को सुधार लिया जाएगा। उधर नौली गांव के रवि नेगी ने फेसबुक में फोटो साझा कर 05 किमी लंबे जाम की कथा-व्यथा सुनाते हुए लिखा कि कई लोग इसीकारण दर्शन नहीं कर पाए व बिना दर्शन के ही वापस लौट गए। मुझे लगता है कि आगामी बर्ष इन सब विषयों पर मन्दिर समिति ध्यान देगी व कमियों को सुधारेगी। कुछ मित्रों ने फेसबुक पर खैरालिंग मेला व उससे जुड़े इतिहास को जानने की उत्सुकता जताई तो ढूंढने पर मुझे अपना 2016 का लिखा 06 साल पुराना यह लेख मिल गया जो मूलतः 15वीं सदी में असवालों के कुल पुरोहित रहे नैल गांव की देवियों झाली माली व राजराजेश्वरी पर केंद्रित होती हुई खैरालिंग की माँ काली का बर्णन सुनाती दिखेगी।

तो कोट भ्रामरी, बाराही या झालीमाली है खैरालिंग (मुंडनेश्वर) की काली माँ..!

(मनोज इष्टवाल 20 जून 2016)

(फोटो साभार- मुकेश खुगशाल)

कई बार अति-अध्ययन भी आपकी मानसिक स्थिति को ऊहापोह की दिशा और दशा में ले जाता है। यहाँ भी कुछ ऐसा ही होता प्रतीत हो रहा है। विकास खंड कल्जीखाल के नैल गॉव में आयोजित माँ राज-राजेश्वरी और झालीमाली के अनुष्ठान के बाद प्राप्त साहित्य की भाषा ने आतुर कर दिया है कि इस स्टोरी का ट्विस्ट पॉइंट कैसे प्रारम्भ हो.

माँ झालीमाली राजराजेश्वरी विकास समिति की गहन शोध पुस्तक व प्रसिद्द लेखक अरुण कुकुसाल की झालीमाली देवी पर हाल ही में प्रकाशित पुस्तक के अध्ययन के बाद अब इतना कहने में समर्थ हूँ कि खैरालिंग की माँ काली ही बाराही या कोटभ्रामरी है या फिर झालीमाली।

कुमाऊं की बाराही या कोटभ्रामरी युद्ध की देवी मानी गयी है। वहीँ झालीमाली को कत्युरी राजा की ऐसी बेटी जो नौ मण का गद्दासमसीर लेकर लड़ाई के मैदान में जमकर दुष्टदलन करती है और मानव रक्त पिपासा को लालायित रहती है। झालीमाली को सदेई से जोड़कर भी इन पुस्तकों ने माँ का आवाहन कुछ इसी प्रकार किया है।

सदेई जोकि ससुराल में रहकर अपनी कुलदेवी से विनयपूर्वक भाई मांगती है और उसे माँ उसकी मन्नत के बाद भाई देती है बदले में फिर भाई की ही बलि मांगती है लेकिन वह अपने दोनों पुत्रों (उमरा/सुमरा) के शीश माँ को चढ़ा देती है। भले ही माँ अपने चमत्कार से उन्हें पुन: जीवित भी कर देती है, का यह रूप बाराही माँ कोट भ्रामरी से मेल खाता नजर आता है क्योंकि इन्होने हमेशा ही मानव बलि मांगी है। जिसका प्रतीक आज भी वीरता स्वरुप देवीधुरा (कुमाऊं) का पाषाण युद्ध माना जाता है। जिसमें वर्तमान तक एक व्यक्ति के रक्त के बराबर माँ बाराही जिसे कोट भ्रामरी भी कहा जाता है वह बहाया जाता है।

झालीमाली मारछा जाति की भी कुलदेवी है, पिथौरागढ़ के जोहार घाटी में यह पूजी जाती है। इसे वनरावतों की वंशज भी कहा गया है और कत्युरी राजाओं की बेटी भी। कहीं कहीं इसकी शुद्ध सात्विक पूजा भी होती है। अर्थात या देवी सर्वरूपेशु मातृरूपेण संस्थिता वाली बात है।

पंडित भवानंद नैलवाल (शिमला) की पांडूलिपि के अनुसार झालीमाली ही खैरालिंग की काली माँ है, जिसका त्रिशूल स्थापना 1865 में असवाल और नैलवाल जाति में कौथिग (मेले) के दौरान हुई रंजिश के बाद इसे देवीधार नामक स्थान पर स्थापित किया गया था। इस त्रिशूल स्थापना को इसलिए भी किया गया था क्योंकि गोरखों द्वारा माँ काली की मूर्ति को इसलिये खंडित कर दिया था क्योंकि वह व खैरालिंग महादेव तब किसी भी आक्रमण से पहले धावड़ी लगाकर ग्रामीणों को सचेत कर देते थे। (किंवदंतियों के अनुसार)

सन 1500 ई. में जब नागपुर गढ़ के गढ़पति असलदेव के पुत्र गढ़पति  रणपाल असवाल ने अपने अधीन 84 गांव हस्तगत कर असवालों की राजधानी की नगरकोट (वर्तमान में नगर गांव) की स्थापना करवाई थी तब वे नाथ सम्प्रदाय के बहुत निकट थे और नाथों की दीक्षा से ही उनकी बाबा केदार पर अटूट श्रद्धा रही है। उसी दौर में उनके साथ उनके शासनी यानि न्याय गुरु नैलवाल भी क्वाँरौ (नैल का पूर्व नाम) आकर बसे, और नगरकोट में असवालगढ़ के पीपल चौंरा में उन्हीं के द्वारा रणदेवी काली जिसे उपरोक्त सभी नामों से जाना जाता है कि स्थापना इन्ही के मार्गदर्शन में हुई। नगर के साथ भट्टीगॉवबलद गॉव में बलोधी जाति के पंडित कब इनके कुलगुरु हुए यह कह पाना कठिन है क्योंकि इस पर मेरा शोध अधूरा है। लेकिन यह तय है कि नगरकोट बसाते समय एक गढ़ भट्टीगॉव की सीमा पर जिसके खंडहर आज भी मौजूद हैं तो एक गढ़ चौंरा गढ़ जिसे थरपगढ़ भी कहा गया है, नैल सीमा पर बनाया गया है। जो पूर्ववर्ती राष्ट्रीय पैदल राजमार्ग पर पड़ता था और जिसे राजा का बिश्राम स्थल भी कहा गया। कालान्तर में अपने 84 गॉव की मालगुजारी को इकठ्ठा करने के लिए असवाल जाति द्वारा सरासुमिर्चौडा गॉव में अपनी बसागत बढ़ाई। नैल गॉव ही उस दौर में एकमात्र ऐसा गॉव रहा जो असवाल जाति की खैकरी में शामिल नहीं था।

झालीमाली को कई विद्वान शुद्ध वैष्णवी मानते हैं जबकि मेरा मत इस से बिलकुल भिन्न है क्योंकि अगर झालीमाली वैष्णवी रही है तो प्रश्न उठता है उसमें पूर्व में बलि क्यों दी जाती थी? भले ही सभ्य समाज ने पुरातन पद्धत्ति की पूजा अनुष्ठान में तब्दीली कर उन तमाम निरीह पशुओं की बलि पर रोक लगाने की हर सम्भव कोशिश कर समाज को सनातन धर्म “सर्वे सन्तु सुखिन, सर्वे सन्तु निरामय” की ओर अग्रसर किया है लेकिन हम उन बलियों को नहीं झुठला सकते जो मन्दिर मंदिर प्रांगणों में सदियों से दी जाती रही हैं। उन्हीं में झालीमाली भी एक है।

नैलगांव  में माँ राजराजेश्वरी व माँ झालीमाली को एक ही मंदिर में अनुष्ठाथित करना बहुत बड़ा साहसिक कार्य है क्योंकि ऐसा करने में किसी भी बड़े अनिष्ट की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता था। इसमें उन सभी नैलवासी नैलवाल/ चमोली वंशजों के अलावा खर्कवाल, कुकरेती,बचंदोला, डुकलाण, नैथानी, इष्टवाल, सुन्दरियाल,आवजी अग्रजों व बुद्धिजीवियों को नमन जिन्होंने यह साहसिक निर्णय लेकर एक उजड़ते गॉव की बसागत में अपना अमूल्य योगदान दिया क्योंकि इस मंदिर की स्थापना के बाद यहाँ रिवर्स पलायन होना शुरू हो गया है और लगभग 14 परिवारों ने अपने टूटे मकान अब तक बना भी दिए हैं।

मुझे लगता है कि सिर्फ झालीमाली ही नहीं राजराजेश्वरी के बारे में भी हमें शास्त्र सम्मत तथ्यों को ध्यान में रखकर इस पर व्यापक व विस्तृत साहित्य लाना होगा ताकि हम कभी इसे रक्त पिपासा देवी, रणदेवी, कभी वनदेवी तो कभी वैष्णवी न कहकर एक ऐसा नाम दें जिसमें सबके प्राण बसते हों। हर जाति सम्प्रदाय जिसमें एकाकार होगा अपने श्रद्धासुमन अर्पित करे। माँ राजराजेश्वरी व माँ झालीमाली भले ही एक स्थान पर स्थापित हो गयी हैं लेकिन परिक्रमा के दौरान पौराणिक मंदिर को भी अपनी एकआध परिक्रमा से जोड़कर जिस तरह कुछ जन परिक्रमा कर रहे थे उस से यही आभास हो रहा था कि उन्हें यह डर जरुर है कि कहीं पुराने मंदिर में स्थापित माँ राजराजेश्वरी या झालीमाली नाराज न हो जाय। हमें यह डर समाप्त करना होगा क्योंकि माँ तो सर्वत्र है।

झालीमाली को खैरालिंग की माँ काली से यदि जोड़कर देखा भी गया है या उन्हें कोट भ्रामरी या बाराही स्वरुप समझा भी गया है तो मुझे नहीं लगता कि यह गलत है।  क्योंकि आप ध्यान अवस्था में जाकर माँ झालीमाली के वर्तमान स्वरुप को अपनी आँखों में केन्द्रित करेंगे तो आपको उनमें माँ कोटभ्रामरी के साक्षात दर्शन होंगे और माँ काली के भी।  माँ बाराही (देवीधुरा) की मूर्ती के दर्शन शायद ही किसी ने किये हों क्योंकि वह नग्नअवस्था में मिली थी तब से वह बाहर नहीं निकाली जाती ऐसी जनश्रुति है। मैं भाग्यवान हूँ कि मैंने माँ झालीमाली के भी दर्शन किये हैं तो जोहार कि काली माँ के भी और चम्पावत की माँ कोटभ्रामरी के भी, व मुंडनेश्वर की काली माँ के भी..! इसलिए सभी रूप आपकी ध्यान अवस्था में एकाकार होकर आ जायेंगे यह मेरी सोच है। बहरहाल मेरा शोध तो यही कहता है कि असवालों की कुलधात्री देवी माँ काली का कुमाऊं की कोटभ्रामरी, माँ बाराही या झालीमाली से नहीं बल्कि रणथम्भोर, राजस्थान के चौहान रजवाड़ों की कुलदेवी माँ काली से है, जिन्हें असलपाल/असलदेव चौहान द्वारा चारधाम यात्रा के दौरान गंगा स्नान के बाद सन 888 में नागपुर गढ़ में थरपा गया था और लगभग 720 साल बाद गढ़पति रणपाल असवाल ने 1500 ईशवी में नगर गांव में।

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