Saturday, July 13, 2024
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तो क्या विधायक उमेश कुमार ने उठा लिया है वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के वंशजों की लीज जमीन का जिम्मा?

(मनोज इष्टवाल)

अश्वत्थामा हतो हतः इति नरो वा कुंजरो वा”   हम सभी जानते हैं कि द्वापर युग में कुरुक्षेत्र के शंखनाद में आखिरी के ये शब्द दबकर कहीं अनंत में लोप हो गए थे, लेकिन फिर भी सत्यवादी राजा युधिष्ठर पर दोषारोपित आज कलयुग तक भी होता आ रहा है। ऐसा हि कुछ इस प्रकरण में भी नजर आता है। उत्तर प्रदेश से पृथक होने के बाद उत्तराखंड राज्य निर्माण के पश्चात भी बेहद आर्थिक तंगी में गुजर बसर कर रहे वीर चन्द्र सिंह गढवाली के परिजन सन 1975 से लेकर वर्तमान तक इस 10 एकड़ जमीन की लीज का पैंसा जमा नहीं कर पाए जिसके कारण विगत योगी सरकार में 2020-21 में उत्तर प्रदेश वन विभाग द्वारा उन्हें जमीन खाली करने का नोटिस जारी किया गया था। खबर प्रकाश में आने के बाद तत्कालीन वन मंत्री डॉ हरक सिंह रावत द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात कर उपरोक्त पर कार्यवाही की मांग की।

(फोटो साभार-नवीन कंडवाल)

वीर चन्द्र सिंह गढवाली की पुत्रवधु श्रीमती विमला देवी गढवाली धर्मपत्नी स्व. कुशलचन्द्र गढ़वाली बताती हैं कि उन दिनों यकीनन उनकी नींद हराम थी। घर में चार चार पुत्र बेरोजगार व खेती ही कमाई का साधन था। वह बताती हैं कि तब उत्तर प्रदेश वन विभाग के डीएफओ घर आये थे व मुझे व मेरी जेठानी श्रीमती कपोत्री देवी गढवाली धर्मपत्नी स्व. आनंद गढवाली से क्षमा याचना करते हुए बोले थे कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि यह जमीन पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्र सिंह के परिजनों की है। वह यह भी बताती हैं कि भले ही तब से विभागीय नोटिस नहीं आया लेकिन तब भी मन में हमारी असुरक्षा की भावना बनी रहती है।

बिमला देवी कहती हैं मेरी उम्र 64 पार होने वाली है अब ऐसे में जबकि चारों पुत्र बेरोजगार हों और खेती ही एक मात्र सहारा हो तो स्वाभाविक है चिंता बनी हि रहेगी वहीँ वह बताती हैं कि उनकी जेठानी की उम्र 70 बर्ष के आस पास है व उनकी दो बेटियाँ शादी-शुदा हैं व मेरी एक बेटी की भी शादी हो गयी है। उनके दो पुत्र आलोक गढवाली व रुपेश गढवाली हैं जिनमें से उनके छोटे पुत्र रुपेश व मेरी पुत्री को राज्य बनने बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. नित्यानंद स्वामी द्वारा आईटीओ में नौकरी दी गयी थी। मेरी पुत्री की शादी के बाद मेरे चारों पुत्र रविन्द्र गढवाली, संजय गढ़वाली, राहुल व देशबंधु गढवाली बेरोजगार हैं।

क्या कहना हैं खानपुर विधायक उमेश कुमार का। 

विगत 16 जून 2022 को हरिद्वार जिले के खानपुर विधायक उमेश कुमार ने वीर चन्द्र सिंह गढवाली के पड़पोते  प्रधुमन सिंह गढवाली व प्रधुमन के नाना के साथ उत्तराखंड के वनमंत्री सुबोध उनियाल से मुलाक़ात कर एक पत्र सौंपा जिसमें यह मांग उठाई गयी थी कि सरकार इस जमीन को उत्तर प्रदेश सरकार से लीज मुफ्त करवाए या फिर सन 1975 से लेकर वर्तमान तक का लीज भार उठाये जिसे यह गरीब परिवार चुका नहीं पाया है। फेसबुक पर अपनी बात ट्वीट करते हुए लिखा “पेशावर काण्ड के महानायक स्वर्गीय वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जी के पडपोते प्रधुमन व उनके नाना के साथ मंत्री श्री सुबोध उनियाल जी से मुलाक़ात की। सुबोध उनियाल जी ने तत्काल उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री को पत्र लिखने व वन मंत्री से फोन पर बात करके उनकी समस्या के समाधान का आश्वासन दिया ।

परिवार को झेलना पड़ रहा है बेरोजगारी का दंश। महानायक को एक अतिक्रमणकारी की धमकियां मिल रही है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक ण होने के कारण 1975 से आज तक परिवार नहीं करवा पाया है लीज-डीड, उत्तर प्रदेश सरकार दे रही है जमीन खाली करने की धमकी” 

सरकार अगर लीज के पैंसे देने में सक्षम नहीं तो बताये मैं अपनी विधायक निधि से देता हूँ- उमेश कुमार।

विगत विधान सभा  के बजट सत्र के दौरान विधान सभा भवन में पत्रकारों से बातचीत करते हुए खानपुर विधायक उमेश कुमार ने सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कि उन्होंने विधान सभा सत्र में प्रश्न लगाया था कि पेशावर काण्ड के महानायक वीर चन्द्र सिंह गढवाली के परिजनों को अभी तक उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद क्या क्या सहयोग किया गया या आर्थिक सहायता दी गयी उसके जबाब मिला कि पर्यटन विभाग से उन्हें कोई सहयोग नहीं मिला दिया गया है। उमेश कुमार ने कहा कि जिस महानायक के नाम पर इतनी बड़ी योजना, स्वरोजगार पर्यटन इत्यादि की चल रही हैं, सोशल मीडिया, प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में गुणगान होता है। उनके जन्मदिन 25 दिसम्बर व पुण्यतिथि 1 अक्टूबर पर पूरे प्रदेश में बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित होते हैं, बड़े बड़े विज्ञापन जारी होते हैं वहीँ दूसरी ओर हमारी राज्य सरकार के पास इस परिवार की आर्थिक तंगी दूर करने के लिए कोई योजना नहीं है और न ही यह सरकार  सरकार ने आजतक इनकी 10 एकड़ जमीन के लीज की राशि हि चुकाई है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार अगर लीज के पैंसे देने में सक्षम नहीं तो बताये मैं अपनी विधायक निधि से देता हूँ।

वीर चन्द्र सिंह गढवाली के नाम पर चलाई जा रही योजनायें।

वीर चन्द्र सिंह गढवाली पर्यटन स्वरोजगार योजना:-इस योजना में बस/टैक्सी परिवहन सुविधाओं का विकास, मोटर गैराज/ वर्कशाप निर्माण, फास्टफूड सैन्टर की स्थापना, साधना कुटीर/ योग ध्यान केन्द्रों की स्थापना, 8-10 कक्षीय मोटेलनुमा आवासीय सुविधाओं की स्थापना, साहसिक क्रियाकलापों हेतु उपकरणों का क्रय, पी.सी.ओ. सुविधायुक्त आधुनिक पर्यटन सूचना केन्द्रों की स्थापना तथा टैन्टेज आवासीय सुविधाओं के विकास, स्थानीय प्रतीकात्मक वस्तुओं के विक्रय केंद्र, स्टार गेजिंग एवं बर्डवाचिंग, एंगलिग उपकरणों के क्रय हेतु, माउंटेन टैरेन बाइक्स के क्रय हेतु, कैरावैन/मोटर होम टूरिज्म अन्तर्गत कैरावैन क्रय हेतु, कैरावैन/मोटर होम टूरिज्म अन्तर्गत पार्किंग निर्माण हेतु, क्याकिंग/नाव का क्रय, लॉन्ड्री की स्थापना, बेकरी स्थापना, स्मरणीय वस्तु युक्त संग्रहालय की स्थापना, फ्लोटिंग होटल का निर्माण, ट्रैकिंग उपकरणों, सूट, जैकेट इत्यादि को किराये पर उपलब्ध कराये जाने हेतु केन्द्रों की स्थापना, हर्बल टूरिज्म तथा क्षेत्र विशेष के आकर्षणों एवं विशेषताओं के अनुरूप किसी पर्यटन अभिनव परियोजना पर भी विचार किया जा सकता है ।

वहीँ वीर चन्द्र सिंह गढवाली होम स्टे योजना सहित उनके नाम पर प्रदेश भर में कई योजनायें क्रियान्वित हैं।

कौन थे वीर चन्द्र सिंह गढवाली?

(वीर चन्द्र सिंह गढवाळी की पुत्रवधू श्रीमती विमला देवी गढवाळी व उनके पौत्र फ़ोटो- नवीन कंडवाल )

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म 25 दिसम्बर 1891 में पौड़ी गढवाल के विकास खंड थैलीसैण के मासों गाँव में हुआ था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 3 सितम्बर 1914 को चन्द्र सिंह सेना में भर्ती होने के लिये लैंसडौन पहुंचे और गढवाल राइफल्स में भर्ती हो गये।  अपनी बेसिक ट्रेनिंग पास करते ही उन्हें 1 अगस्त 1915 में चन्द्रसिंह को अन्य गढ़वाली सैन्य पलटन  के साथ ब्रिटिश शासन द्वारा फ्रांस भेज दिया गया। जहाँ से वे युद्ध समाप्ति के पश्चात 1 फ़रवरी 1916 को वापस लैंसडौन आ गये। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ही 1917 में चन्द्रसिंह ने अंग्रेजों की ओर से मेसोपोटामिया के युद्ध में भाग लिया। जिसमें अंग्रेजों की जीत हुई थी। 1918 में उन्होंने बगदाद की लड़ाई में भी हिस्सा लिया।

यह आश्चर्यजनक किन्तु सच है कि प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो जाने के बाद अंग्रेजो द्वारा कई सैनिकों को निकालना शुरू कर दिया और जिन्हें युद्ध के समय तरक्की दी गयी थी उनके पदों को भी कम कर दिया गया। इसमें चन्द्रसिंह गढवाली भी शामिल थे। इन्हें भी हवलदार से सैनिक बना दिया गया था। जिस कारण इन्होंने सेना को छोड़ने का मन बना लिया, लेकिन उच्च अधिकारियों द्वारा इन्हें समझाया गया कि इनकी तरक्की का खयाल रखा जायेगा और इन्हें कुछ समय का अवकाश भी दे दिया। इसी दौरान चन्द्रसिंह गढवाली स्वतंत्र भारत के लिए आन्दोलन कर रहे महात्मा गांधी के सम्पर्क में आये।

कुछ समय पश्चात इन्हें इनकी बटालियन समेत 1920 में बजीरिस्तान भेजा गया। जिसके बाद इनकी पुनः तरक्की हो गयी। वहाँ से वापस आने के बाद इनका ज्यादा समय आर्य समाज के कार्यकर्ताओं के साथ बीता। और इनके अंदर स्वदेश प्रेम का जज़्बा पैदा हो गया। पर अंग्रेजों को यह रास नहीं आया और उन्होंने इन्हें खैबर दर्रे के पास भेज दिया। इस समय तक चन्द्रसिंह मेजर हवलदार के पद को पा चुके थे।

गढवाली सीज फायर…!

उस समय पेशावर में स्वतंत्रता संग्राम की लौ पूरे जोर शोर के साथ जली हुई थी तो दूसरी ओर अंग्रेज इसे कुचलने की पूरी कोशिश कर रहे थे। इसी काम के लिये 23 अप्रैल 1930 को इन्हें पेशावर भेज दिया गया। जहाँ पेशावर में पठान आन्दोलनरत थे, उनकी टुकड़ी के अंग्रेज कमांडेंट ने हवलदार मेजर चन्द्र सिंह गढ़वाली को आदेश दिए कि वे अपनी पलटन को गोली चलाने का आदेश दें। लेकिन चन्द्र सिंह गढवाली निहत्थी जनता पर गोली चलाने से साफ मना कर दिया। ब्रिटिश सेना कमांडेंट ने इस इनकार के बाद झुंझलाकर स्वयं आदेश जारी किया – “गढवाली फायर….! जैसे ही गढवाली सेना की राइफल्स कंधे तक पहुंची वैसे ही उन्हें अपने प्लाटून कमांडेंट चन्द्र सिंह की कड़कदार आवाज सुनाई दी- “गढवाली सीज फायर..!” सभी राइफल्स कंधे से एक झटके में नीचे उतर गई। अंग्रेजों की आज्ञा न मानने के कारण इन सैनिकों पर मुकदमा चला। गढ़वाली सैनिकों की पैरवी मुकुन्दी लाल द्वारा की गयी जिन्होंने अथक प्रयासों के बाद इनके मृत्युदंड की सजा को कैद की सजा में बदल दिया। इस दौरान चन्द्रसिंह गढ़वाली की सारी सम्पत्ति ज़प्त कर ली गई और इनकी वर्दी को इनके शरीर से काट-काट कर अलग कर दिया गया।

कहा जाता है कि इसी ने पेशावर कांड में गढ़वाली बटेलियन को एक ऊँचा दर्जा दिलाया और इसी के बाद से चन्द्र सिंह को चन्द्रसिंह गढ़वाली का नाम मिला और इनको पेशावर कांड का नायक माना जाने लगा।

1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिये ऐटबाबाद की जेल में भेज दिया गया। जिसके बाद इन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानान्तरित किया जाता रहा। लेकिन जेल में अच्छे अनुशासन के चलते  इनकी सज़ा में कटौती कर इन्हें 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को आजाद कर दिया। परन्तु इनका गढवाल प्रवेश प्रतिबंधित रहा। जिस कारण इन्हें यहाँ-वहाँ भटकते रहना पड़ा और अन्त में ये वर्धा गांधी  के पास चले गये। गांधी जी इनके बेहद प्रभावित रहे। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रहकर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिये गिरफ्तार हुए। 1945 में इन्हें पूर्व रूप से आजाद कर दिया गया जिसके बाद यह गाँव लौटे व उसके बाद इन्होने अपनी कर्मभूमि कोटद्वार व पौड़ी चुनी। स्वंत्रतता आन्दोलन में भागीदारी के लिए इन्हें उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. हेमवती नंदन बहुगुणा सरकार  ने शासनादेश 8829142 दिनांक 21 जनवरी 1975 को कोटद्वार भाबर  क्षेत्र के हल्दुखाता  में 10 एकड़ जमीन लीज के रूप में दी गयी, जो वर्तमान में उत्तर प्रदेश के अधीन आता है। वहीँ लालपुर में इन्होने अपना आवास बनवायाअंग्रेजों की आज्ञा न मानने के कारण इन सैनिकों पर मुकदमा चला। कहा तो यह भी जाता है कि गढवाल के सुप्रसिद्ध मूर्तिकार अवतार सिंह पंवार द्वारा उन्हें उनकी असंख्य मूर्तियों के साथ यह आवास दिया गया था। लेकिन दूसरा मत है कि उन्होंने उनके आवास में बहुत सारी मूर्तियाँ बनाई थी। वर्तमान में वह वहीँ कहीं संग्रहालय में रखी गयी हैं। यह आवास उनकी पुत्री के पुत्र भाजपा नेता शैलेन्द्र सिंह बिष्ट “गढवाली” के हिस्से में आया बताया जाता है।

22 दिसम्बर 1946 में कम्युनिस्टों के सहयोग के कारण चन्द्रसिंह फिर से गढ़वाल में प्रवेश कर सके। 1957 में इन्होंने कम्युनिस्ट के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा पर उसमें इन्हें सफलता नहीं मिली। 1 अक्टूबर 1979 को चन्द्रसिंह गढ़वाली का लम्बी बीमारी के बाद देहान्त हो गया। 1994 में भारत सरकार द्वारा उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया। तथा कई सड़कों के नाम भी इनके नाम पर रखे गये।

बहरहाल वीर चन्द्र सिंह गढवाली की पुत्रवधु श्रीमती बिमला देवी गढवाली इस बात से खुश हैं कि उनके पास प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ओएसडी का फोन आया था व उन्होंने मुख्यमंत्री से अपने पुत्र के साथ मुलाक़ात करने का अनुरोध किया था, उन्हें आश्वस्त भी किया गया है कि जल्दी ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी उन्हें मुलाक़ात के लिए बुलायेंगे। उन्होंने इस बात की भी आशा जताई है कि कोई न कोई समाजसेवी, राजनेता या पत्रकार उनकी एक मुलाक़ात उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से करवाएगा ताकि उन तक भी वह अपने परिवार की समस्या उठा सके।

मुद्दा यों तो काफी बड़ा है जिसे 22 बर्षों के इस राज्य में आज तक कोई उत्तराखंड तो क्या पौड़ी जनपद का विधायक व मंत्री या फिर मुख्यमंत्री कभी मजबूती से सामने नहीं ला पाया। उसे एक निर्दलीय विधायक के रूप में जिस तरह उमेश कुमार लेकर आये हैं उसने जनता के मध्य फिर उन्हें सुर्खियाँ दी हैं व उनके इस बयान के बाद कई साकारात्मक प्रतिक्रिया भी सामने आ रही हैं। यकीनन ऐसे जनप्रतिनिधि जो जनता के बीच मजबूती से खड़े रहते हैं भला उन्हें जनता कैसे भुला सकती है। विधायक उमेश कुमार के इस कृत्य के लिए उन्हें बिग सलूट..!

 

 

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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