पौड़ी गढ़वाल (हि. डिस्कवर)
पौड़ी जनपद के विकास खण्ड द्वारीखाल के सिमल्या गांव
के युवा ने अपनी जान की परवाह न करते हुए अपनी 35 बकरियों में से 30 बकरियों के प्राण बचा लिए व अपनी दो चचेरी अबोध बहनों को भी भयावक रूप से आग के घेरे से बचा लिया। बहनों को गांव की तरफ दौड़ लगाने को कहकर अकेले दम पर झाड़ी से आग बुझाते-बुझाते प्राण रक्षा को रंभाती आग व धुंवे के घेरे में कैद बकरियों की जान बचाते बचाते सतबीर के हाथ पैर व मुंह बुरी तरह झुलस गए।
मौत के साथ संघर्ष में जिंदगी की जीत हुई और 18 साल के सतबीर ने अपने साहस से न केवल खुद को, बल्कि अपनी दो
चचेरी बहन किरन (11) और रिश्ते की बहन सिमरन (13) को भी मौत के मुंह से बाहर निकाला। यह घटना चैलुसैण के सिमल्या गांव डांडा की है।
कोटद्वार बेस अस्पताल में उपचार करा रहे सतबीर ने बताया कि जंगल में दूसरी ओर आग लगी हुई थी, लेकिन जिस तरफ वे अपनी बकरियां चुगा रहे थे, वहां सब कुछ ठीक ही लग रहा था। कुछ देर में उन्हें बकरियों को लेकर गांव लौटना था। इस बीच हवा चलने लगी। सतबीर के अनुसार वे बातों में इस कदर मशगूल थे कि पता ही नहीं चला के वे आग की लपटों के घेरे में आ चुके हैं। भयंकर दवानल के इस विकराल रूप को देख तीनों सहम गए। दो बहनें रोने लगी, लेकिन सतबीर ने हिम्मत नहीं हारी। उसने तुरंत ही पेड़ों की हरी टहनियां तोड़ीं और आग से जूझ पड़ा। इससे लपटों के बीच से निकलने का रास्ता बन गया। उसने तत्काल अपनी बहनों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। इसके बाद वह बकरियों को लेने पहुंचा। आग से पांच बकरियों की जान चली गई, लेकिन 30 को बचा लिया गया। हालांकि इस प्रयास में सतबीर काफी झुलस गया। उसके कपड़ों ने आग पकड़ ली थी। ऐसे में सतबीर तेजी से करीब तीन सौ मीटर दूर नदी की ओर भागा। उसने नदी में छलांग लगा दी। इस बीच घर पहुंची बहनों ने गांव में सूचना दे दी।
सतबीर की दोनों चचेरी बहनों किरन (11) और सिमरन (13) ने गांव पहुँचकर घटनाक्रम की जानकारी दी तब बड़ी संख्या में ग्रामीण जंगल की ओर दौड़ पड़े। सतबीर बेसुध सा नदी से निकल कर तट पर लेटा हुआ था। गांव के लोग उसे एंबुलेंस से कोटद्वार स्थित बेस चिकित्सालय लेकर पहुंचे। चिकित्सकों के अनुसार उसकी हालत खतरे से बाहर है। 11वीं कक्षा के छात्र सतबीर ने कहा कि यह उसके पिता और भगवान का आशीर्वाद है। सतबीर के पिता चंद्रमोहन कहते हैं कि उन्हें अपने बेटे के साहस पर गर्व है।



