Monday, March 23, 2026
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25 बर्ष बाद वापसी कर रही है अपने समय की सुप्रसिद्ध गायिका संतोष शर्मा बडोनी।

60-70 ऑडियो कैसेट्स में बिखेर चुकी है अपनी आवाज का जादू

(मनोज इष्टवाल)

एक सुंदर सी बड़ी-बड़ी आँखों की शर्मीली सी लड़की को मैंने तब पहली बार आर के पुरम सेक्टर 6 की स्कूल में स्कूली कार्यक्रम के दौरान हिंदी गाना गाते सुना था। उसके एक या दो साल बाद (1987-88) आरके पुरम में ही स्थित आरबीआई कालोनी के एक गढवाली कार्यक्रम के दौरान मैंने उसी लड़की को गढवाली गीत गाते सुना। नाम इसलिए याद रहा क्योंकि नाम लड़कों जैसा था- संतोष । और निक नेम भी लड़कों सा-बंटी।

(सन्तोष शर्मा बडोनी विभिन्न मुद्राओं में)

तब यह लड़की बमुश्किल 13-14 साल की रही होगी। यहां मेरा इसलिए जाना हुआ था क्योंकि तब भारतीय कला केंद्र में एक नृत्य निर्देशक राजेन्द्र नेगी मेरे मित्र हुआ करते थे वे उन दिनों मैं भी मंडी हाउस व भारतीय कला केंद्र के ज्यादा चक्कर काटा करता था। मुझे दिल्ली आए तब जुम्मा-जुम्मा 4 साल हुए थे। तब दिल्ली में गढवाली कार्यक्रम तो होते थे लेकिन गिने चुने! राजेन्द्र नेगी के साथ मैं तब शकुंतला नृत्य नाटिका के लिए एक प्रोजेक्ट तैयार कर रहा था जिसमें उनकी भांजी सुनीता मुख्य किरदार में थी। राजेन्द्र ने कहा- इष्टवाल भाई चलो आज आपको आरके पुरम ले चलूं वहां दो भाई बहनों ने एक शानदार गढवाली टीम बनाई है। नाम हुआ लक्ष्मी रावत व अनिल रावत।

(अनिल रावत व लक्ष्मी रावत के साथ सन्तोष शर्मा बडोनी)

अनिल रावत से पहले उनकी बहन लक्ष्मी रावत गढवाली कार्यक्रमों में भाग लिया करती थी। उस समय लड़कियां इस फील्ड में किसी ऐसे परिवार की ही भाग ले पाती थी जिनका पारिवारिक माहौल खुला हुआ हो वरना आम गढवाली की यह धारणा हुआ करती थी कि नाच गाना गीत इत्यादि घर की लड़कियों के अनुकूल नहीं होता। 

बंटी यानि सन्तोष शर्मा तब गाती ही नहीं थी मेरे हिसाब से स्टेज में परफॉर्म भी करती थी। तब अनिल रावत ने अपने आरबीआई क्वार्टर में गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया था व अपनी बहन लक्ष्मी से परिचय करवाते हुए कहा था कि अगर दिल्ली में टीम की आवश्यकता होगी तो निसंकोच कह देना भाई। 

1990 में फिर मैं अनिल रावत के घर गया तब वे किसी कार्यक्रम से लौटे थे वे सिर पर गोल हैट लगाए यह औसत कद के युवा अपनी चिरपरिचित मुस्कान लिए मिले। इस बार मैंने उन्हें बताया कि मैं हिमाचली ऑडियो कैसेट “सूलिया टँगोई गई जान” नीलम कैसेट कम्पनी से रिकॉर्ड करवा रहा हूँ उसके लिए कोई हिमाचली लड़की चाहिए। अनिल रावत ने बड़ा दिल दिखाते हुए अपने ही कालोनी के एक परिवार को आश्वस्त करवाया और उनकी लड़की रिहर्सल हेतु सरोजनी नगर के पंचायती मंदिर में आ पहुंची। तब यह हिमाचल में पहली कैसेट चंबा-चौगाना क्षेत्र में जाने वाली थी। एक गादी गीत “उठ मिये उठ रेशो चा बणाई दे” काफी प्रचलित था।

खैर यह था शुरुआती परिचय। बंटी को फिर मैंने दिल्ली के एक स्टेज में परफॉर्म करते सुना। मैं बोला-अरे कमाल है। इस लड़की को यह गीत कैसे मिला। अभी हाल ही में तो इसे देवेश जुयाल के साथ मिलकर हमने सुप्रसिद्ध संगीतकार वीरेंद्र नेगी के संगीत में ढालकर निकलवाया था। गीत के बोल थे-“तीलै धारू बोला, घरवलि कनि मीकू जोरा, ब्वाद दिल्ली चली जा।”

 

विगत दिनों इंडिया टुडे में कार्यरत छोटे भाई व मित्र प्रदीप भंडारी का अधिकार पूर्वक व्हाट्सएप सन्देश मिला जिसमें उन्होंने लिखा कि मेरी दीदी सन्तोष शर्मा दुबारा कई बर्षों बाद इस फील्ड में कदम रखना चाहती है। अब मैं नहीं जानता कि आप उसे कैसे प्लेटफॉर्म देते हैं। बहुत आत्मीयता व प्यार भरा यह सन्देश मैं टाल नहीं सका तो सन्तोष शर्मा को फोन किया व उन्हें कहा वह अपनी डिटेल भेजें। 

शाम होते-होते अनिल रावत का फोन आता है व वे कहते हैं भाई सन्तोष शर्मा का फोन आया था तो आपके बारे में बता रही थी। फिर बोले कि उन्होंने सन्तोष से पूछा कि वह मनोज इष्टवाल को कैसे जानती हैं? खैर ये बातें होती रही दूसरे दिन अनिल रावत मुझे सन्तोष शर्मा का प्रोफाइल भेजते हैं तो मुझे अटपटा सा लगा कि जिस लड़की के बारे में मुझे लिखना है वह अपनी डिटेल्स मुझे भेजने की जगह अनिल रावत को क्यों भेज रही हैं। आख़िर सन्तोष से बात हुई तो लगभग 30 -32बर्ष पुरानी यादें ताजा हो गयी कि यह तो बंटी है।

संतोष शर्मा मूलतः पौड़ी गढ़वाल, चौंदकोट के मवालस्यूं पट्टी के पंचुर गाँव के वेदवाल परिवार से हैं। लगभग 9 साल उत्तराखण्डी संगीत जगत को समर्पित करने में बाद 1995 में इन्होंने टिहरी गढ़वाल के ग्राम फैगुल पट्टी-मखलोगी के बडोनी परिवार में शादी करने के बाद उत्तराखण्डी संगीत जगत को गुड़ बाय कर दिया और गृहणी के तौर पर घर की जिम्मेदारियां सम्भालनी शुरू कर दी। 

उस दौर यानि विगत सदी के नब्बे के दशक में सुप्रसिद्ध गायिकाएं रेखा धस्माना, सुनीता बेलवाल, विधोत्तमा नेगी उर्फ विधि जैन (चन्द्र सिंह राही जी की पुत्री) इत्यादि का नाम ही बतौर गायिका का रूप में प्रचलन में आया था। यह आश्चर्यजनक है कि इन सभी गायिकाओं ने शादी के बाद यह फील्ड एकदम छोड़ ही दिया।

सन्तोष शर्मा बताती हैं कि मैंने लगभग सन 1987-88 से गढ़वाली सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेना शुरू कर दिया था। उसके बाद मैंने कई गढ़वाली कैसिटों में गाना प्रारम्भ किया। जिसमें जौनसारी गायक – देविंदर प्रसाद चमोली जी के साथ “पप्पू का पिताजी” ऑडियो अल्बम की जो काफी सफल रही।

ततपश्चात नत्थी लाल नौटियाल जी के साथ “विद्या कसम बाई गॉड”,  वीरेंद्र सिंह रावत जी के साथ “चोरी-चोरी सुपनियोंम” की जिसके गीतों ने कई साल तक स्टेज प्रोग्राम में धूम मचाई। इनमें “चोरी-चोरी सुपनियोंम आंदि तू”, “तैल्या मेल्या सारी हरि-भरी होली”, “फर्रा- फरफर घघरी घूमैं दे”, आदि गीतों में नृत्य किये जाने लगे जो स्टेजों में सुपरहिट रहे।

(संगीतकार सलिल चौधरी, अनिल विश्वास व मीना कपूर के साथ सन्तोष शर्मा बडोनी)

संतोष शर्मा बडोनी बताती हैं कि शुरुआती दौर के बाद जब मैं स्थापित हो गयी तो उसके बाद मैंने उत्तराखंड के कई जाने-माने व उभरते उस दौर के हर नए कलाकारों के साथ काम किया जिनमेें स्वर्गीय चन्द्र सिंह राही जी, देवराज रंगीला, दिनेश उनियाल, स्वर्गीय हीरा सिंह राणा जी, शिव दत्त पंत जी, बिशन सिंह हरियाला तथा जगदीश बकरोला जी व अन्य कई कलाकारों के साथ कैसेट्स व स्टेज प्रोग्रामस किये। इसके अलावा मैंने सी०पी०सी० दूरदर्शन में लगातार तीन साल तक बॉलीवुड के जाने-माने संगीतकार सलिल चौधरी जी, अनिल विश्वास जी व मीना कपूर जी के साथ काम किया। इसके अलावा मैंने लगभग साठ-सत्तर (60-70) गढ़वाली कैसेटों में काम किया।

उन्होंने सबसे ज्यादा काम ठेठ कलाकार जगदीश बकरोला जी के साथ किया। और मैंने उनके साथ कई पुरानी कैसेटों के रीमेक गाये। मैंने रामा कैसेट, सरस्वती, सोनोटोंन, नीलम कैसेट, टी० सीरीज आदि कंपनियों में रिकॉर्डिंग की। 

यकीनन सन्तोष शर्मा बंटी ने गीतकार गणेश वीरान के गीतों को जगदीश बकरौला के साथ खूब रीमेक गाये जिनमें सुनीता बेलवाल का गाया गाना जब इन्होंने रीमिक गाया तो उसने उस दौर में धूम मचा दी। गीत के बोल थे- “डांडा मुनि आदिम बूढ़ीडि तमासा नि जाणु” सुपरहिट था। यह किसकी रचना रही होगी यह तो जानकारी नहीं है लेकिन यह गीत खैरालिंग मेले के उस दौर को बयां करता है जिसमें जबरदस्त बारिश के बाद छोटे बड़े गदेरों में बाढ़ आ गयी थी व उसमें पयासू गांव की एक महिला खरगढ़ या गंगदर नदी में बह गई थी। गीत रचना मूलतः किसी बादी समाज के व्यक्ति की बताई जाती है लेकिन उसमें घेळचु जी के नातियों के बहने का भी बर्णन है। अब ये कौन थे इसकी जानकारी मुझे भी नहीं पता। 

इस गीत में दो तीन प्रसंग बहुत खूबसूरती के साथ उठाये गए हैं जिसमें एक तत्कालीन समय के माली हालात का बर्णन करते हुए महिला अपने पति को कहती है कि मुझे मेले हर हाल में जाना है चाहे कुछ हो जाय क्योंकि मेरे मायके वाले वहां आये होंगे। मेरे लिए किसी के घर से तन ढकने के लिए आंगडी मांगकर ले आओ। परिवार नियोजन पर कटाक्ष करती पंक्तियों में पुरुष कहता है कि तेरे दुधमुंहे बच्चे को देखकर तेरे मायके के लोग हमारा मजाक उड़ाएंगे तो पत्नी कहती है कि हर बर्ष एक बच्चा पैदा करने में तुम्हारा ही मरा हुआ है, तुम्हारी ही करतूत है।

गीतकार व संगीतकार गणेश वीरान कहते हैं बंटी तो बिल्कुल 17-18 साल की युवती थी, उसमें पिकअप की गजब क्षमता थी। गढवाली बोलना न जानते हुए भी वह गढवाली के उच्चाहरण को शुद्ध रूप से करती थी। उसने मेेरे गीत, महावीर बडोलाकुंजबिहारी मुंडेपी कलजुगी के गीतों से सजी कैसेट “बुढया खसणु चा” के सुपरहिट गीत गाये जो उस दौर में खूब चले। इन गीतों में बुढ़या खसणु च, राम कसम स्वामी मी दिल्ली घुमै द्या, म्यारा बासमत्ती का चौंल इत्यादि प्रमुख थे। जो 90 के दशक में खूूूूब प्रचलित थे।

इसी दौर में थडिया-चौंफला धुन का लोकप्रिय गीत “कन जैली बौ कालोंडांडा नुरचुर-नुरचुर” भी सुपरहिट रहा। अनिल रावत बताते हैं बंटी क्योंकि उनकी बहन लक्ष्मी की जुनियर थी। एक कार्यक्रम में जब मैंने देखा कि गा तो लड़कियां रही हैं लेकिन लड़कियों के अभिनय हेतु लड़कों ने लड़कियों के कपड़े पहने हुए हैं तो मैंने लक्ष्मी को बोला कि तू और मैं मिलकर क्यों न ऐसा करें कि लड़की लड़कों को जोड़कर स्टेज परफॉर्म करें। लक्ष्मी व मेरी अथक मेहनत फलीभूत हुई और हमने एक ग्रुप बनाया। लक्ष्मी गायिका के रूप में सन्तोष शर्मा उर्फ बंटी जो अब सन्तोष शर्मा बडोनी को लाई व पहली बार हमने अपनी ही कालोनी में उसके साथ मंच साझा किया। अनिल कहते हैं बंटी अब 25 साल बाद वापसी कर रही हैं इसे हम उसका सिल्वर जुबली ईयर कहेंगें। हम सबको चाहिए कि उन्हें प्रोत्साहित किया जाय।

सन्तोष शर्मा बडोनी के पिता इंडियन एयरलाइन्स में थे तब वह इंडियन एयरलाइन्स की कालोनी बसन्त विहार में रहती थी। जब उनसे चर्चा के दौरान मैंने यादें साझा करते हुए पूछा कि आप बसन्त विहार की पहाड़ी पर स्थित  मंदिर में देवेश जुयाल की चर्चा की। तो वो खुश होकर बोली-अरे वो तो मेरी जेठी मां के बेटे हुए उनका गीत “तीलै धारू बोला, घरवली कनि मीकू जोरा…!” व कमल नयन डबराल जी का गीत “गांव का छोरा” गीत हर बार स्टेज में गाया करती है।

उन्होंने बताया कि सरस्वती कंपनी से “नॉन-स्टॉप गढ़वाली अन्ताक्षरी” व “ज्वानी कु बुखार” कैसेट बकरोला जी के साथ की, जिसके मुख्य गीत- ब-ब बबली छोरी, कु बुन च-ऐजी मि जमुना बोनु छों व जी० एम० ओ० की गाड़ी काफी हिट रहे। मैंने लगभग उत्तराखंड की सभी बोलियों में गीत गाये।

बहरहाल सन्तोष शर्मा बडोनी अब 25 साल बाद पुनः संगीत की दुनिया में प्रवेश कर रही हैं। वह भले से जानती हैं कि तब शिरडी ऑडियो का जमाना था, अब ट्रैक रिकॉर्डिंग वह चर्खियों पर घूमने वाली नहीं होती बल्कि अब गाना सरल हो गया है क्योंकि जितनी मर्जी रीटेक लिए जा सकते हैं।  संगीत व संगीतकार का ढर्रा भी अनूठे प्रयोगों के साथ बदल गया है, ऐसे में मार्केट में उपस्थिति दर्ज करने के लिए उन्हें ऑडियो वीडियो फॉरमेट के साथ लाइव फॉर्मेट भी देखना होगा।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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