(विजय भट्ट की कलम से किस्सागोई)
सह यात्री -इंद्रेश नौटियाल
लोकजगत में लोगों के देवी देवता, राजा रानी, नायक नायिकायें लोक गीत व किस्से कहानियों के माध्यम से हर समय जिंदा रहते हैं। इन नायकों का इतिहास में भले ही कहीं जिक्र न मिलता हो और न ही पुराणों में…! लेकिन फिर भी वह लोक संस्कृति में कई माध्यमों के साथ जिंदा रहते हैं। ऐसे ही एक नाम है राजा गोपी चन्द का…! जो आज भी लोक जगत में कई विधाओं के माध्यम से जीवित ही नही तरोताजा भी है। राजा गोपी चंद धौलागढ़ राज्य से संबन्धित हैं और उनके कथा किस्से गायन शैली में राजस्थान उप्र का बृजभाषी क्षेत्र और हरियाणा में आज भी गाये जाते हैं। समाज उन किस्से कहानियों के साथ तल्लीनता से जुड़ता भी है, लेकिन यहाँ इस बात पर आश्चर्य है कि राजा गोपी चन्द का सम्बन्ध गढ़वाल से भी है।
हुआ यूं कि एक दिन सुबह-सबेरे मैं और मेरे साथ साथी इन्द्रेश नौटियाल घर से बनाली टिहरी गढ़वाल जाने के लिये निकले। बनाली जाने का इसलिये निर्णय लिया था कि वहां से एक तो जाखन नदी निकलती है और दूसरा यह कि हमारे पूर्वज टिहरी गढ़वाल विशेष रूप से चम्बा क्षेत्र से आवश्यक कार्य हेतु देहरादून तक पैदल बनाली होते हुऐ आते थे। रायपुर से मालदेवता कद्दूखाल वाले रास्ते पर बीस किलोमीटर का सफर तय करने पर चाय की दुकान पर चाय पीने के लिये रूक गये। यह चाय की दुकान नारायण गांव के श्री बालम सिंह बिष्ट की थी। चाय पीते-पीते हम बालम सिंह जी से बतियाने लगे। बात करते हुये हम उनसे यहां का स्थानीय इतिहास संस्कृति व भूगोल जानने की कोशिश कर रहे थे।
बालम सिंह बिष्ट ने यहां की नदियों के बारे में बड़ी आसानी से याद करने योग्य छन्द सुनाया जो इस प्रकार था- “सौंग चिफल्टी, बांदल बल्डी’’। ये चारों नदियों के नाम हैं जो इस इलाके में बहती हुई सौंग नदी की सहायक नदियां बनती हैं। बात करते हुये बिष्ट बतातें हैं कि यहां से पांच किलोमीटर बाद खेतू दोंक से ऊपर पूर्व की तरफ की पहाड़ी पर राजा गोपीचंद का किला था, जिसके द्वारा बनाई गई नहर को आप आज भी देख सकते हैं, अब वहां केवल कुछ पत्थर ही बचे हैं। राजा गोपीचंद का नाम व गढ़वाल में उसके किले की बात सुनकर हम आश्चर्य में पड़ गये कि राजस्थान के धौलागढ़ का राजा गोपीचंद, जो बाद में जोगी हो गया था उसका किला यहां गढ़वाल के सकलाना पट्टी में कैसे?
यह सुनकर हमने बनाली जाने का विचार त्यागा और गोपीचंद के किले वाली जगह जाने का निश्चय कर लिया। बालम सिंह हमें यह भी बताने लगे कि यहां गोपीचंद द्वारा बनायी गई नहर अभी भी है और द्वारा में उसका एक कढ़ाहा भी जमीन में गढ़ा हुआ है जिसके कंगने बहार दिखाई देते हैं। इस बात ने हमारे मन में राजा गोपीचंद का महल देखने की इच्छा और प्रबल कर दी। हमने उनसे रास्ते की जानकारी ली और आगे चल दिये। हम दो तीन किलोमीटर आगे चले आये जहां चाय आदि की कुछ दुकानें थी। वहां कुछ युवक बैठे थे। हमने उनसे गोपीचंद के किले में जाने का रास्ता पूछा तो वे हमें देखकर कहने लगे कि आप वहां नहीं जा सकते क्योंकि वहां जाना खतरे से खाली नही है क्योंकि एक तो अब वहां कोई जाता नही है, इसलिये साफ पगडंडी नहीं है और रास्ते में बड़े-बड़े डंगार हैं जिन में फिसलने का डर है। लेकिन हमारे जाने का संकल्प देख उन्होंने हमें वहां का रास्ता बताते हुये कहा कि यहां से आप दो किलोमीटर वापिस जाइये वहां सड़क के किनारे गोपीचंद का छोटा सा मंदिर है, ठीक उसी के सामने वाली पहाड़ी के ऊपर वह जगह है जहां गोपीचंद का किला होता था।
हमने अपनी बाईक वापिस मोड़ ली। दो किलोमीटर वापिस आने के बाद मुख्य सड़क के दांयीं ओर एक छोटा सा मंदिर नजर आया। यह गोपीचंद का मंदिर था। हमने अपनी बाईक वहीं पर खड़ी कर दी और हेलमेट को मंदिर के भीतर राजा गोपीचंद की सुरक्षा में रख दिया। सामने पहाड़ी देखकर हमने रास्ते का अनुमान लगाया, सड़क पर कुछ कदम चलने पर हमें उपर की ओर जाने वाला पैदल मार्ग दिखाई दे गया। हम उस रास्ते आगे बढ़ चले। अंदाजे से हम पहाड़ी चढ़ाई चढ़ते रहे। डेढ़ घंटे की चढ़ाई वाला रास्ता तय करने के बाद आखिर हम उस जगह पहुंच ही गये जहां किसी किले या गढ़ की संभावना हो सकती है। इस पहाड़ी के टाॅप पर जगह समतल थी, बड़े बड़े चट्टानी पत्थर पड़े हुये थे और तीनों तरफ ढंगार (खाई) था। केवल एक ही तरफ से यहां आया जा सकता था जिधर से हम आये थे। गढ़ ऐसी ही जगह बनाये जाते थे। एक जगह पत्थरों से एक छोटी सी चकोर दिवार की शक्ल में कुछ पत्थर रखे हुये थे जो शायद जानवर चराने वालों ने रखे होंगे। यह जगह काफी रमणीक थी। इस उंचांई से हम दूर-दूर तक देख सकते थे।
एक पाषाण शिला पर हम भी राजा की तरह बैठै सामने पत्थर की मेज बनाई और अपने खाने का टिफर खोल लिये। खाना खाया साथ में चाय पी जो हमने अपने साथ थर्मस पर रखी हुई थी। चारों तरफ चक्कर काटा और इस बात से संतुष्ट होकर कि हमने संभावित किले वाला स्थान देख लिया है वापिस नीचे सड़क पर आ गये। सड़क पर कुछ बच्चे स्कूल से वापिस घर लौट रहे थे। हमने उनसे राजा गोपीचंद की नहर के बारे में पूछा तो उन्होंने सामने की तरफ इशारा किया कि वह रही नहर। सड़क से दस पंन्द्रह फीट उपर जहां जाया नही जा सकता एक पाईपनुमा चट्टान थी जिसको वह नहर बता रहे थे। इससे यह बात तो पक्की हो गई थी कि यहां के लोक में राजा गोपीचंद रचा बसा है क्योंकि अधेड़ से लेकर बच्चे तक सभी गोपीचंद के किले व नहर की जानकारी रखते हैं।
लोक कथाओं के अनुसार राजा गोपीचंद की मां ने अपने पुत्र गोपीचंद को अमरत्व प्रदान करने की लालसा से गृहस्थ त्याग जोगी बनने के लिये प्रेरित किया। अपनी मां की इच्छानुसार राजा गोपीचंद ने राजपाठ के साथ अपनी रानियों को त्यागा और गुरू गोरखनाथ से दीक्षा लेकर नाथ परंपरा के जोगी बन समाज में अमर हो गये। टिहरी जिले के सकलाना में गोपीचंद नाथ का मंदिर इस बात की तो पुष्टि कर ही देता है कि इस क्षेत्र में भी नाथ परंपरा का प्रभुत्व रहा और राजा गोपीचंद का इस इलाके से कोई न कोई संबन्ध अवश्य रहा होगा। दरबार श्री गुरूराम राय की दीवारों के भित्ती चित्रों में भी राजा गोपीचंद मौजूद हैं। खैर हम यहां से वापिस लौट चले और द्वारागाँव वापिस चले आये। द्वारा में गोपीचंद की कढ़ाई वाली बात को कोई प्रमाण नही मिला। इस तरह से इस दिन की यात्रा राजा गोपीचंद के नाम रही।

