Wednesday, January 21, 2026
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रिंगाल से रोजगार की राह!–पारम्परिक हस्तशिल्प कला को मिली पहचान, रोजगार के बढें अवसर..।

(ग्राउंड जीरो से संजय चौहान)

हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात यात्रा और नंदा की वार्षिक लोकजात यात्रा में रिंगाल की छंतोली बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। रिंगाल की छंतोली के बिना आप नंदा देवी राजजात यात्रा की परिकल्पना नहीं कर सकते हैं। रिंगाल के विभिन्न उत्पाद आज भी लोगों को बेहद भाते हैं। रिंगाल से पहले जहां केवल पांच या छह प्रकार का सामान बनाया जाता था वहीं अब 200 से अधिक प्रकार का सामान बनाया जा रहा है।

पारम्परिक हस्तशिल्प से इतर अब रिंगाल को मार्डन लुक देकर रिंगाल के बेजोड हस्तशिल्पियों नें रिंगाल की छंतोली, ढोल दमाऊ, हुडका, लैंप शेड, लालटेन, गैस, टोकरी, फूलदान, घौंसला, पेन होल्डर, फुलारी टोकरी, चाय ट्रे, नमकीन ट्रे, डस्टबिन, फूलदान, टोपी, स्ट्रै, पूजा टोकरी, फाइल फोल्डर, लैंप, गैस, मंदिरों के डिजाइन, सर्विस टोकरी, झूमर, झाड़ू, कूड़ेदान, पैन स्टेंड, खूबसूरत ज्वैलरी, कलाई में बांधे जाने वाले आकर्षक बैंड, रिंगाल की राखी सहित विभिन्न प्रकार के उत्पादों को तैयार कर पहचान दिलाई है।

पहाड़ में खेती और पशुपालन के सिमटने से संकट में आए परंपरागत रिंगाल उद्योग को सजावटी सामान की संजीवनी मिल गई है। जहां मॉर्डन फर्नीचर्स केवल दिखावे तक सीमित है जबकि रिंगाल के उत्पादों से घरों की शोभा वास्तविक रूप से बढती है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में रिंगाल को उच्च दर्जा प्राप्त है। फूलों की टोकरी से लेकर रिंगाल की छंतोली इसका उदाहरण है। वहीं रिंगाल का सबसे बड़ा फायदा ये है वो पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद अच्छा होता है। रिंगाल के उत्पाद बेहद हल्के होते हैं। और अन्य की तुलना में आकर्षक और सस्ते भी होते हैं। इन्हें आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है।

ये है रिंगाल!

रिंगाल उत्तराखंड के जंगलों में पाया जाने वाला एक वृक्ष है। ये वृक्ष बाँस प्रजाति का है। बाँस और रिंगाल के बीच अंतर बस इतना है कि बाँस आकार में बहुत बड़ा होता है और रिंगाल थोड़ा छोटा। रिंगाल और बाँस की लकड़ियों की बनावट और पत्तियाँ लगभग एक समान ही होती हैं। इसीलिए रिंगाल को बोना बाँस (Dwarf Bamboo) भी कहा जाता है। जहाँ बाँस की लम्बाई 25-30 मीटर होती है वहीं रिंगाल 5-8 मीटर लंबा होता है। जहाँ रिंगाल 1000-7000 फ़ीट की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है क्योंकि रिंगाल को पानी और नमी की आवश्यकता ज्यादा रहती है वही बाँस सामान्य ऊँचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से पाया जाता है। रिंगाल पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के अलावा भूस्खलन को रोकने में भी सहायक होता है।

रिंगाल मेन राजेन्द्र बडवाल कहते हैं कि रिंगाल की 12 प्रजाति होती है लेकिन हमारे क्षेत्र में आठ प्रकार का रिंगाल पाया जाता है। देव रिंगाल, थाम रिंगाल, मालिंगा रिंगाल, गोलू(गड़ेलू) रिंगाल, ग्यंवासू रिंगाल, सरुड़ू रिंगाल, भट्टपुत्रु रिंगाल, नलतरू रिंगाल। लेकिन सबसे उत्तम प्रजाति का रिंगाल देव रिंगाल होता है। रिंगाल उत्तराखण्ड के लोकजीवन का अभिन्न अंग है। इसके बिना पहाड़ के लोक की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। रिंगाल से दैनिक जीवन में काम आने वाले जरुरी उपकरण तो बनते ही हैं, इनसे कई तरह के आधुनिक साजो-सामान भी बनाये जा सकते हैं।

सीमांत जनपद चमोली के पीपलकोटी (बंड क्षेत्र) की परिधि में दो दर्जन से अधिक गांवों के हस्तशिल्पियों नें बेजोड हस्तशिल्प कला से रिंगाल को स्वरोजगार का जरिया बनाया है जिससे उन्हें अपने ही घर में रोजगार मिल रहा है। पीपलकोटी के किरूली, लुदाऊं, बेडू माथर, पाखी, टंगणी गांव के हस्तशिल्पियों नें रिंगाल उद्योग को अपनी आर्थिकी का जरिया बनाया है। सरकार द्वारा भी समय समय पर रिंगाल के हस्तशिल्पियों को प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि बेहतर तकनीक की और नये नये डिजाइन की जानकारी हो सके। आवश्यकता है रिंगाल के उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने की और हस्तशिल्पियों को प्रोत्साहित करने की ताकि पहाड़ की बेजोड हस्तशिल्प कला को दुनिया में पहचान मिल सके..

अगर आपको भी रिंगाल के हाथ से बनें कोई भी डिजायन और उत्पाद पसंद हो और आप इसे मंगाना चाहते हैं तो आप सीधे सम्पर्क कीजिएगा..
रिंगाल मेन राजेंद्र बंडवाल — 87550 49411

 

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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