(मनोज इष्टवाल)
देखते-देखते पूरे तीन साल बीत गए और इन तीन सालों में हम चल पायें हैं अढाई कोस….! रिस्पना नदी के कायाकल्प पर आज से तीन साल पूर्व रिवर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर करीब 750 करोड़ रुपये की धनराशि खर्च खर्च होने की बात कही गयी थी! रिस्पना से ऋषिपर्णा उदघोष को बुलंद करने के लिए स्वामी चिदानन्द ने अपनी ओर से एक करोड़ रूपये देने की घोषणा की थी! रिस्पना नदी के उद्गम से लेकर सुसुवा नदी संगम के लगभग 30 किमी. दायरे में बर्ष 2018 में 02 लाख गड्ढे खोदे गए थे जिनमें करे 2.75 लाख वृक्षों का रोपण किया गया था! बताया जा रहा है कि 80 प्रतिशत वृक्ष तबाह हो गये! बाकी बचे 20 प्रतिशत वृक्ष अर्थात लगभग 55 हजार पेड़..! क्या सचमुच इतने पेड़ आज भी रिस्पना नदी छोर पर जीवित हैं!
हरेला पर्व पर तीन बर्ष पूर्व बड़ी शिद्दत के साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने तब रिस्पना एक्शन प्लान की तैयारी की जब रिस्पना नदी जो वर्तमान में एक गंदे नाले से भी बदत्तर है के किनारे दीप नगर की एक बेटी ने “मन की बात” कार्यक्रम के दौरान रिस्पना नदी की तरफ देश के प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का ध्यान आकृष्ट करवाया था!
ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार 26 मार्च 2017 को मन की बात कार्यक्रम में देहरादून की 11 वीं कक्षा की छात्रा गायत्री पेगवाल के एक मैसेज का जिक्र किया। गायत्री ने प्रधानमंत्री से देहरादून शहर से होकर बहने वाली वर्षों पुरानी रिस्पना नदी की दुर्दशा बयां की थी।
(राज्य निर्माण से लेकर आज तक रिस्पना नदी बढ़ते विकास के साथ और गन्दगी लिए नाले में तब्दील)
गायत्री ने जिक्र किया था कि कभी पूरे साल बहने वाली देहरादून की शान रिस्पना नदी अब कूड़ा डंपिंग जोन से ज्यादा कुछ नहीं रह गई है। रिस्पना पर कब्जे हो रहे हैं, रिस्पना में गाड़ियों का स्टैंड बना दिया गया है, रिस्पना में कूड़ा करकट और न जाने क्या-क्या फेंका जा रहा है।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस बात को बेहद गंभीरता से लेते हुए रिस्पना नदी के कायाकल्प की प्रतिबद्धता दिखाते हुए लगभग प्रण लेते हुए कहा कि वे रिस्पना नदी का पुनर्जीवन लौटाते हुए इसे पौराणिक स्वरूप की ऋषिपर्णा नदी बनाकर ही डीएम लेंगे! उन्होंने नदी के कायाकल्प के लिए पूरी सरकारी मशीनरी झोंक डाली! प्रोजेक्ट बना लगभग 750 करोड़ का! चिंतन, मंथन, बैठकों का दौर, कभी नदी के उद्गम स्थल पर नेता, अफस, मुख्यमंत्री, सचिव तो कभी सुसुवा संगम पर उसके पानी को शुद्ध करने की जद्दोजहद में धडाधड़ के कार्यक्रम! लाखों रूपये खर्च हुए लेकिन आज तीन साल बीत गए तब से लेकर अब तक! सदानीरा कहलाने वाली नदी रिस्पना आज भी गंदे नाले के रूप में मानव, सूअर, गाय-भैंस मल, मूत्र के साथ नदी छोर पर बसी अवैध बस्तियों का कूड़ा-करकट, प्लास्टिक ढोती-ढोती थक सी गयी है क्योंकि उसे पूरी उम्मीद थी कि इसकी मांग में सिन्दूर सजने वाला है! वह फिर से वही यौवना होगी जो आज से करीब 50 बर्ष पूर्व तक थी! लेकिन हाय रे किस्मत…! आस किसकी आज तक पूरी हुई! शायद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत यह भले से जानते हैं कि अब उनके कार्यकाल का जुम्मा-जुम्मा एक साल रह गया है!
ऐसा नहीं है कि रिस्पना के कायाकल्प के लिए भाजपा से पूर्व कभी अन्य सरकारों ने सोचा न हो! 2010 में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. नारायण दत्त तिवारी तब चीन की यात्रा से लौटे थे व उन्होंने घोषणा की थी कि वे रिस्पना नदी पर शानदार स्विमिंग पूल बनावेंगे यहाँ नदी की साफ़ जलधारा बहेगी लेकिन वह फाइल भी नगर निगम कार्यालय के किसी दराज की धूल फांक रही है! गंदगी से मरणासन्न हालत में पहुंच चुकी रिस्पना व बिंदाल नदी की सूरत संवारने की जो कवायद वर्ष 2010 से चल रही है, उसके अब जाकर धरातल में उतरने की उम्मीद बढ़ी है। मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) की 97वीं बोर्ड बैठक में रिवर फ्रंट डेवलपमेंट योजना के निर्माण के लिए कार्यदायी संस्था के रूप में नेशनल बिल्डिंग्स कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (एनबीसीसी) का चयन कर लिया गया है।
2018 के हरेला पर्व के दौरान रिस्पना से ऋषिपर्णा महाअभियान के लिए जिला प्रशासन ने बीते छह दिनों में 416 स्कूलों के करीब डेढ़ लाख बच्चों को पौधे बांटे हैं। 19 मई 2017 को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कैरवान गांव में गड्ढा खोदकर रिस्पना से ऋषिपर्णा महाअभियान का शुभारंभ किया था। 13 नवम्बर 2017 को नदी के मुहाने पर खड़े होकर स्वामी चिदानंद द्वारा संकल्प लिया गया था कि रिस्पना के कायाकल्प में वे पूरी भागीदारी निभायेंगे साथ ही उन्होंने रिस्पना से ऋषिपर्णा तक कायाकल्प के लिए एक करोड़ रूपये देने की घोषणा की थी! क्या वह एक करोड़ सरकार को मिल चुके होंगे? क्या वे रिस्पना के कायाकल्प पर खर्च किये जा चुके होंगे!
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी रुड़की की स्टडी रिपोर्ट में बताया गया है रिस्पना नदी क्षेत्र के 53.45 किमी कैचमेंट एरिया के इस क्षेत्र में 19 छोटे चैक डेम तैयार किये जायेंगे। जल की गुणवत्ता के लिये बेहतर उपचार की व्यवस्था के साथ ही तालाबों के निर्माण व सतही जल के प्रबन्धन पर ध्यान दिया जाना होगा। इस क्षेत्र में वाटर हार्वेस्टिंग पर ध्यान देने, नदी क्षेत्र के आस पास एसटीपी के निर्माण के साथ ही सौंग बांध से भी इसमें जल उपलब्धता की बात कही गयी है।
आइये लौटते हैं दो सदी पूर्व के ब्रिटिश इतिहास के दौर में-
सन् 1871 में देहरादून के असिस्टेण्ट सुप्रीण्टेंडेंट (मजिस्ट्रेट) रहे बंगाल सिवल सर्विस के जी.आर.सी. विलियम्स ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘‘मेम्वॉयर आफ दून’’ (1874) में पृष्ठ 6 पर प्राचीन राजपुर नहर के 1841 से 44 के बीच जीर्णोद्धार का उल्लेख करते कहा है कि इस नहर में पानी रस्पुना (रिस्पना को उस अंग्रेज अफसर ने यह नाम दिया) जलधारा के शीर्ष से मोड़ कर डाला गया था।
पृष्ठ 92 के शीर्षक संख्या 181 में राजपोर कैनाल के तहत विलियम्स ने बोर्ड कमिश्नर के सेक्रेटरी मूर (1818) का हवाला देते हुये इस नहर का निर्माण गुरुराम राय की पत्नी माता पंजाब कौर एवं राजपूत महारानी कर्णावती द्वारा किये जाने एवं बाद में गुरुराम राय दरबार द्वारा नहर का रख रखाव की जिम्मेदारी लेने का उल्लेख किया है।
1910 में तत्कालीन आईसीएस एच जी वॉलटन द्वारा इस शहर पर लिखे गए प्रथम गजेटियर में देहरादून का विवरण गंगा और जमुना नदीतंत्र के क्षेत्र में स्थित एक पठार के रूप में किया गया है जिसके पूर्वी किनारे पर रिस्पना राव नदी और पश्चिमी किनारे पर बिन्दाल नदी बहती थी। उस समय ये दोनों ही नदियां सदानीरा थीं। इसी गजेटियर के उद्धरण को पेश करते हुए 18 जून को उत्तराखण्ड उच्च न्यायलय ने रिस्पना नदी के दोनों ही किनारों पर बसी, बसावटों को खाली कराने का आदेश जारी किया था।
बर्ष 2018 में शिखर फाल (मौसी फाल) स्थित कैरवान गांव से मोथरोवाला तक करीब 30 किलोमीटर क्षेत्र में 50 से अधिक सेक्टर बनाए गए थे। जिसमें 22 जुलाई 2018 को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में बच्चे, युवा, जवान और बुजुर्गों के साथ विभिन्न संगठनों से जुड़े लोगों ने ढाई लाख पौधे रोपे थे। सभी ने इन पौधों के रखरखाव का संकल्प लिया था, लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए दो साल के भीतर रिस्पना को ऋषिपर्णा बनाने का सरकार का संकल्प अधूरा ही दिखता है, क्योंकि रिस्पना से ऋषिपर्णा अभियान के तहत कैरवान गांव और मोथरोवाला में शीशम, हरड़, बहेड़ा, बेलपत्र, संदल, महल, तेजपात, अमलतास, कनजी, कंजू, कचनार, बांस, आंवला, कटहल, टिकोमा, पिलन, अर्जुन, अमरूद, मौरेंग, आम, जामुन और नींबू आदि प्रजातियों के करीब ढाई लाख पौधों लगाए थे, लेकिन इनमें से ज्यादातर की स्थिति ठीक नही है। कैरवान गांव में करीब 40 प्रतिशत पौधे सूख गए हैं, जबकि मोथरोवाला में करीब 80 प्रतिशत पौधों ने दम तोड़ दिया है।
ज्ञात हो कि रिस्पना नदी को पुनर्जीवित करने के लिए विभिन्न स्कूल, कॉलेज, केंद्रीय संस्थानों, एनजीओ आगे आए थे जिसमें वेस्ट वेरियर संस्था, उत्तरांचल आयुर्वेदिक कालेज रायपुर, उत्तरांचल यूनिवर्सिटी, यूपीईएस, पेस्टलविड स्कूल, होम गार्ड, एसएसबी, आर्डिनेंस फैक्टरी, वन निगम, पुलिस, स्पोर्ट्स कालेज, बीएसएफ, एसडीआरएफ, सैंट जोर्ज स्कूल, आईटीबीपी, ओनएनजीसी, सिविल डिफेंस, स्कालरहोम, मैड संस्था सहित जिले के कई स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधि अभियान में शामिल हुए और सभी ने एक दिव्य स्वप्न की तरह रिस्पना नदी के ऋषिपर्णा बनने के ख्वाब आँखों पर सजाते हुए प्रदेश की राजधानी के बीचों-बीच बहती एक ऐसी नदी के कल्पना सागर में गोते लगाए थे जिसके तट पर वे छुट्टियों के दिन व्यतीत करें, जिसके जल में वे जलक्रीडा करें व काम-काज की थकान को हंसी ख़ुशी मिटायें! वे उसी नदी की कल्पना में थे जैसे मिस्र में बहने वाली नील नदी है या फिर चमोली, रूद्रप्रयाग, टिहरी पौड़ी और हरिद्वार जनपदों को अपने जल से तृप्त करने वाली माँ गंगा जैसी नीरा! लेकिन अभी भी यह दिव्य स्वप्न सिर्फ स्वप्न ही हैं क्योंकि 2017 के संकल्प दिवस से लेकर अब तक लगभग साढ़े तीन साल में न रिस्पना में गिरने वाले गंदे नाले ही बंद हुए ना उसमें बहने वाला दूषित जल और न ही उसके तटों पर हो रहा आये दिन अतिक्रमण ही रुक पाया है! चार हरेला पर्व गुजर गए लेकिन अभी तक रिस्पना के नदी तट में कहीं हरियाली नहीं दिखाई दे रही है! ऐसे में प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत क्या सचमुच अपने कार्यकाल तक इस नदी रिस्पना को ऋषिपर्णा में तब्दील करने वाले राजा भगीरथ की मानिंद भगीरथ बन पायेंगे? यही यक्ष प्रश्न है।


