(हरीश कंडवाल मनखी की कलम से)।
पलायन का दर्द उन गाँव से ज्यादा कौन जान सकता है जँहा कभी 100 परिवार और 12 से 15 जातियों के लोग एक साथ रहते थे, और एक ही गाँव मे रिश्ते तक तय हो जाते थे, लेकिन आज वही गांव भूतहा और वीरान हो चुके है। वँहा खदवार हो चुकी तिवारी डिंडीयली कभी गाँव की इज्जत और शान हुवा करती थी आज पलायन की तस्दीक और तकदीर को उजागर कर रही है।
यमकेश्वर क्षेत्र के तालघाटी में ग्वाल्डा गांव जो रणचूला ग्राम सभा का उपग्राम है, वह एक बार पलायन के कारण मानव विहीन हो चुका था। यँहा पर 8- 10 परिवार रहते थे, लगभग 2000 से 2010 के बीच सभी परिवार यँहा से गंगा भोगपुर और अन्य जगह पलायन कर गए।
ग्वाल्डा गांव की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि यँहा गाँव नीचे और पानी गाँव के ऊपर है, जबकि पहाड़ो में अक्सर पानी गाँव के नीचे की तरफ ही है। ग्वाल्डा गांव के खेत सभी पानी के गूल से जुड़े हुए हैं। यँहा पर खेती उन्नत किस्म की होती थी, लेकिन पलायन के कारण सुंदर नकाशी से युक्त तिवारी डिंडीयाली लगभग चार पांच साल तक मानव विहीन हो गई। गाँव के चारो ओर झाड़ी ही झाड़ी उग चुकी थी, गाँव जाने का रास्ता बंद हो चुका था, सब यही कहने लगे कि अब ग्वाल्डा गांव इतिहास के पन्नो में सिमट चुका है।
गाँव की याद उन सभी को आती है जिनका लगाव गाँव से रहा हो, जिन्होंने गांव के अंदर कमरे ( उबरा) में जन्म लिया हो, गाँव के मिट्टी युक्त आँगन में गोया लगाया हो, डिंडीयाली में बैठकर सपने संजोए हो, गाँव के खेती से अन्न खाया हो, उसको गाँव की याद और उसके वीरान होना अवश्य कचोटता है।
ऐसे ही ग्वाल्डा गांव के कुछ निवासी जो रोजगार के लिये विभिन्न शहरों की ओर उन्मुख हो चुके थे, लेकिन जब वह रोजगार करके सक्षम हो गए तो उनको अपने पूर्वजो की थाह यानी गांव को पुनः सवारने की प्रेरणा मिली। उन्हें अपने गाँव को भुतहा होना नागवार गुजरने लगा, मन मे पीड़ा और कसक रही कि कैसे फिर गाँव को एक बार वैसे ही उज्याड से रौनक किया जाय ।
ग्वाल्डा गांव के श्री अशोक कंडवाल, श्री सुरेंद्र ग्वाड़ी श्री भरोसा नंद कंडवाल, श्री मोहन लाल कंडवाल श्री देवेन्द्र कंडवाल, आदि युवाओं ने पुनः ठानी और गाँव मे जाकर पहले खेतो औऱ घर के आंगन में हुई झाड़ी को साफ किया, टूट चुके घरों को पुनः मरम्मत करके बनाया। वँहा फलों के बगीचे लगाए, इस साल प्याज उगाया। आज वँहा साइकिलवाड़ी के एक युवा को कन्डरह गांव के एक दो लोगो को रोजगार दिया है।
वंही श्री भरोसा नंद कंडवाल अकेले गाँव मे रहकर वँहा खेती और बागवानी का कार्य कर रहे हैं। श्री अशोक कंडवाल जी जो देहरादून में रहते हैं हर माह वँहा जाकर साफ सफाई एवं सब्जी आदि के बीज एवं अन्य उपयोगी सामग्री उपलब्ध कराते है, साथ ही श्री भरोसा नंद कंडवाल जी को सभी प्रकार से सब मिलकर सहयोग कर रहे है ।
श्री अशोक कंडवाल का कहना है कि हम भले ही शारीरिक रूप से यँहा है लेकिन मानसिक रूप से आज भी गाँव की मिट्टी से जुड़े है, अपनी पूर्वजो की धरोहर को हम अपने सामने कैसे बर्बाद होते देख सकते है, आज हम जो भी है वह गाँव की उन खेतो से उगे अन्न की वजह से है, जिनको की हाड़ मांस तोड़कर हमारे माँ बाप ने खेती उगाकर हमे खिलाया पाला पोसा। उस धरती का कर्ज कभी नही उतार सकते हैं लेकिन उस धरती को वीरान होने से बचा सकते है।
श्री अशोक कंडवाल जी ने बताया कि आज हम सब भाइयों की मेहनत का परिणाम है कि बंझर पड़े खेतो को आबाद किया और हमे इस साल तीनो परिवारों के पास कुल मिलाकर 18 क्वेंटल प्याज की उपज हुई, ऐसे ही वँहा से लहसून हल्दी अदरक आदि जो कि पूर्णत जैविक है हमको पर्याप्त मात्रा मिल जाती है।
गाँव की पुरानी पानी कि नहर टूट चुकी है, खेतों की दीवारें गिर गई है, वँहा पर ग्राम सभा के स्तर से कोई भी सुविधा उन्हें नही मिली है, जबकि गाँव के लिये पंचायत निधि से इन सबके लिये बजट उपलब्ध कराया जाता है।
एक बार पलायन की वजह से भुतहा बन चुका गाँव वँहा के रैवासियो द्वारा पुनः आबाद करना शुरू हो गया है, अब उन्हें स्थायी सड़क और नहर की मरम्मत हो जाय तो कुछ अन्य परिवार पुनः गाँव जाकर बसने की तैयारी में है। ग्वाल्डा गांव के कुछ अधेड़ युवाओं ने एक बार फिर उजड़े गाँव में प्राण फूंक दिए हैं,यह अन्य लोगो के लिए भी प्रेरणादायक का काम कर रहे है।

