Sunday, March 15, 2026
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अंतरार्ष्ट्रीय महिला दिवस पर “माँ” से बड़ा कोई शब्द नहीं सूझता।

(मनोज इष्टवाल)

माँ विगत लगभग साढ़े तीन साल पूर्व  (21 सितम्बर 2017)  ब्रह्मलीन हुई। वैसे माँ एक साल ही में माँ ने अपनी अनुपस्थिति में जता दिया कि माँ होती क्या है। लेकिन साढ़े तीन बर्ष गुजर जाने के बाद भी जब भूल जाता हूँ कि अब माँ नहीं है तो फिर माँ का डर सताने लगता है कि जाने आज घर पहुंचकर फिर माँ की कैसी नाराजगी का सामना करना पड़ता है।

बचपन क्या अल्हड़ जवानी तक भी माँ को जितना सताया उतना शायद ही आज के परिवेश की माँ बहनें सहन कर पाती होंगी लेकिन माँ तो अनन्त काल से माँ है। बच्चों के लिए हमेशा एक सी। जब तक माँ थी चिंताएं निकट तक नहीं फटकती थी। अब नहीं है तो गाँव जाकर लगता है कि किस तरह व्यवस्थित कर पाएंगे वह सब जो माँ अपने पीछे छोड़ गई है।

आज वह घर, घर तो रहा नहीं। माँ क्या गयी घर भी अकेले-अकेले अपने सूनेपन को नहीं झेल पाया और पहली ही बरसात में धड़ाम होकर हमारे पितरों के साथ हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गया। शायद जानता था कि अब पलायनवादी समाज के हमारे लोग दुबारा इस घरोंदों की देख-रेख नहीं कर पाएंगे, जिसके आंगन में रंभाती गंगू व काळी गाय, पुण्डया बोड, भैंसी व थोर, जिस आंगन की ओखली में कुटता सट्टी, कौणी, झंगरियाल व छढ़ता कोदो, चावल का पीठा, लगता तैका, सिलबट्टे में पिसती दाल, आंगन के एक छोर पर बजते ढोल दमाऊं, थाली में सजी भेली, अक्षत व कलदार, माँ-बहनों के हंसी खुशी के गूंजते सुर, हुक्का-तम्बाकू के बीच, पिताजी, ब्वाडा जी, चाचाजी व ग्रामीणों का आपसी संवाद, क़ुर्फ़ली, मसूर, भट्ट की फलियों का ठूँगना, उरख्यालि में चूड़ा-कौन्याल व आंगन के बीच में ढुङ्गले बनना। बैलों के खांकर-घण्टियों का छमणाट, इगास-बग्वाल पर गौ धीत तो पंचमी पर खेत पूजा में हल-बैल की पूजा, फग्गनव्टी का ड़ाळआ, चैती का पसारा या चैती दान, चैती की फुलदेई से लकदक देहरी के फूल, और बैशाखी के दिन मेले कौथिग के लिए तैयार होकर सजती घर की बेटी बहुवें, शंकरचौथ पर व्रत रखकर दूध फूल अर्पण करती सुहागनें, चैत मास में अपने गांव लौटी बेटियां पल्या भित्तर पकाती साझा खाना, आंगन में थिरकते माँ-बहनों के पगों में थड़िया-चौंफला बाजूबंद, गोबर माटी से लिपते-घिसते घर आंगन, जंदरी घुमाती माँ की लोरियां, सूप पर फटकती चौंळ, झंगोरा, कौणी और माँ की धोती पर आ चिपकती घेण्डूड़ी, तिमंजले पर बने झलोटे में गुंजन करती शहद देने वाली मधुमक्खी, चूल्हे के ऊपर बनी आल्मारी में रखी घी व नमक की कोसी, दही व दूध के भरे पतीले, सिलबट्टे के पास ही पर्या के कोनों में चिपकी मक्खन व दिल की खुश्की दूर करती छाँछ, तब्बे चूल्हे व अंगारों का सामंजस्य बनाती आग की भूर्र भूर्र व मल्ल खांद में चलती टिमटिमाते छोटे छोटे अग्नि कणों की बारात…और और जाने क्या क्या! सभी तो उस घरौंदे से जुड़ा हो गए थे जिसने हमारी आठ से दस पीढ़ियों का इतिहास सम्भाले रखा था। माँँ के इस लोक से उस लोक की यात्रा का गम मकान भी तो बर्दास्त नहीं कर पाया था।शायद वह भी जानता था कि अब न छज्जा के एक किनारे पर बैठे बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ाऐंगे न घर की बेटियां ही छज्जे में बैठकर पैर हिलाकर खूंटे पर बंधी गाय भैंस का नाम लेकर उन्हें लाड़ जताएंगे और न ही भोटु-कमली कुकुर गास की आस में देहरी पर जीभ निकाले पूंछ हिलाएंगे।

श्राद्ध पक्ष में माँ का यूँ चले जाना एक आघात ही हुआ । अभी भी मेरे  कान माँ की उस  धैs (आवाज) सुनने को उत्सुक रहते हैं कि जाने कब पुकार लगाएगी कि तेरा अभी भी समय नहीं हुआ घर आने का।

अपने जीवनकाल के अंतिम समय के दो चार माह मेरे साथ काटने वाली माँ जब मेरे साथ देहरादून थी, तब 10 बजते ही कहने लगती थी- तेरी ड्यूटी टैम नि ह्वा अबी। दुनिया का लोग ड्यूटी चलि ज्ञेनी । (तेरी ड्यूटी का समय नहीं हुआ अभी दुनिया के लोग ड्यूटी चले गए)!
शाम को लौटते अगर देर हो गयी तो वह छत्त में खड़ी ताकती रहती थी और जब तक घर लौट न आओ वहीं खड़ी होकर इंतजार करती। अगर 7 बजे से ज्यादा समय हो जाता तो समझ लो शामत आ गयी। वह गुस्से में खाना भी नहीं खाती और कहती- औरि नौकरी भट्टी जादा से ज्यादा 6 बजी घार पौंची जन्दन। तेरी बकीबाते नौकरी छ क्या। (और नौकरी से 6 बजे घर पहुंच जाते हैं तेरी अजब ही नौकरी है क्या)।
तब बड़ी मुश्किल से भांजियां (नेहा-निकिता) माँ को समझाती-नानी,  मामा की नौकरी ऐसी नहीं है। उनका कोई टाइम न आने का होता है न जाने का। अखबार व टीवी वालों की ऐसी ही नौकरी होती है। माँ की हमेशा यही हसरत रहती कि काश…मैं अपने नातिन-नाती बहु के साथ रहती। मेरी बेटी कनिका माँ की प्राण प्यारी थी। वह कनिका के लिए तरसती रहती लेकिन नियती के आगे किसकी चल पाई है।

माँ इंतजार कर रही होगी…. यही सोचकर कई बार भूल से घर की तरफ भागता हूँ लेकिन जैसे ही याद आता है कि माँ तो रही नहीं तब प्राण बहुत कचोटता था,बेहद दुख होता है। आज भी जब शाम को कमरे की तरफ लौटता हूँ तो लगता है माँ की आंखें मुझे ही देख रही हैं लेकिन मेरी नजरें बेताबी से माँ की देखने को तरसती हैं। छोटा भाई जीतू अक्सर कहता था कि भैजी, जब पिताजी स्वर्ग सिधारे तब इतनी समझ नहीं है लेकिन अब जब माँ चली जायेगी तब अपने को संभाल पी पाऊंगा कि नहीं, यही सोचकर अक्सर बहुत डरता हूँ। सृष्टि का नियम आखिर कौन बदल पाया। आज ब्वाडा-बोडी, चाची-चाचा, माँ-पिताजी और तो और एक भाभी और छोटे भाई सब उस लोक को प्यारे हो गए।

यदा-कदा जब सभी बहनें इकट्ठा होती हैं तो अक्सर उनकी आंखें नम रहती हैं। खुसुर-पुसुर के बीच उनकी मायके की यादें उनके जुबान पर होती हैं व दिल का गुब्बार आंखों के रास्ते बरसाती छोवे की भांति फूट रहा होता है। अब चाहे वे स्वयं दादी क्यों न बन गयी हों लेकिन बेटी तो बेटी ही होती हैं नाs..! मर्द फिर भी अपने को ढाल लेता है लेकिन बेटियों की यादों का समंदर कभी न कभी चौमास-छमासा फूट ही पड़ता है। निश्छल, निष्कपट गंगा जल की तरह। शायद इसीलिए भारत बर्ष की नदियों का माँ सा दर्जा है और माँ बहनों के नाम गंगा, जमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा इत्यादि क्योंकि यह सदावाहिनी हैं। ठीक मेरी माँ की तरह अजर-अमर।

माँ को अपने अन्तस् में ही पाकर तसल्ली कर लेता हूँ। काश…! माँ सा अनमोल कोई और भी होता है क्या?

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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