क्यों महादेव का पहला पकवान माना जाता है गेहूं की फसल पकने के बाद।
माँ के तर्क ऋग्वेद की ऋचाओं में समाहित
(मनोज इष्टवाल)
यकीन मानिए यदि हम किसी भी बिषय की बारीकियों को लेकर उस पर गहनता से शोध करें तो उसके मूल में जाकर जो निष्कर्ष निकलता है वह सचमुच आपको आश्चर्यचकित कर देता है। बस हमें थोड़ा सा ऐसे विषयों को अपने धर्मग्रन्थों, जागर, मंत्रों व सनातन परम्पराओं में ढूंढने की आवश्यकता होती है। ॐमी की उत्पत्ति कैसे हुई और उससे जुड़ी क्या दंतकथाएं हैं उन पर हम कभी जाना ही नहीं चाहते जबकि यह बड़े शोध का बिषय है।
सनातन हिन्दू परम्पराओं में ॐमी मूलतः वैदिक काल में सिर्फ भूख मिटाने का साधन न होकर आयुर्वेदिक गुणों का भंडार मानी गयी है। जो अद्पके गेहूं में है व इसकी पकती बाल के साथ ही नए संवतसर की शुरुआत मानी जाती रही है।
मूलतः सनातन हिन्दू परम्पराओं में बैसाखी का अर्थ वैशाख माह का त्यौहार है। जो चैत्र मास की अंतिम पूर्णमासी के बाद प्रारंभ होता है व यह वैशाख सौर मास का प्रथम दिन होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान का बहुत महत्व है। हरिद्वार और ऋषिकेश में बैसाखी पर्व पर भारी मेला लगता है। बैसाखी के दिन सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है। इस कारण इस दिन को मेष संक्रान्ति भी कहते है। इसी पर्व को विषुवत संक्रान्ति भी कहा जाता है। बैसाखी पारम्परिक रूप से प्रत्येक वर्ष 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। यह त्योहार हिन्दुओं, बौद्ध और सिखों के लिए महत्वपूर्ण है। वैशाख के पहले दिन पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक क्षेत्रों में बहुत से नव वर्ष के त्यौहार जैसे जुड़ शीतल, पोहेला बोशाख, बोहाग बिहू, विशु, पुथण्डु मनाये जाते हैं।
ज्ञात हो कि जैसे ही मैदानी भू-भाग में गेहूं की फसल पकती है, व गेहूं अन्न भंडार में पहुंचता है वैसे ही हिंदू नवबर्ष का शुभारंभ माना जाता है जबकि पहाड़ी भू-भागों में यह समय गेहूं के तने का रंग हरे से गेंहूआ रंग का होना शुरू हो जाता है।
वर्तमान में भले ही हमारी लोक परम्पराओं में नव बर्ष पूजन में गेहूं की बाल आज भी गांव व क्षेत्र के महादेव मंदिरों में चढ़ाई जाती है लेकिन अछूते गेहूं के पकवान का हलवा बनाने से पहले लगभग पकने को तैयार अद्पके से गेहूं की एक मुठ काटकर उसे अग्नि को समर्पित किया जाता था। पुरानी महिलाओं का मानना था कि इस से दो पक्षों को खुश किया जाता था। अग्नि को गेहूं की मुठ समर्पित करने का अर्थ था कि हे अग्नि देव आप सूर्य प्रकाश की उत्तम किरणों से हमारी बोई हुई फसल को शीघ्रता से पका दो ताकि मेरा परिवार अपनी पेट की भूख मिटाने के लिए कणक (गेहूं ) का भक्षण कर सके। कणक का शब्दार्थ ही कण से उत्पन्न हुई वस्तु है।
वहीं जब अग्नि समर्पण के बाद इसकी बालें बच जाती हैं तब इन्हें दोनों हाथों से मसलकर उसके हरित अन्न बीज देखकर मनुष्य इसे “ओम ही” रक्षा करे जपकर प्रथम दाने महादेव को चढ़ाता है व उसके बाद स्वयं नया अन्न मुंह में रखता है।
यह वैज्ञानिक सोच कितनी कारगर है, यह कह पाना सम्भव नहीं है लेकिन जैसे जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ अग्नि ने अपना परम स्थान ले लिया। हर शुभ अशुभ कार्य बिना अग्नि के संपन्न होने मुश्किल हुए। आदम युग से जब मानवयुग में मनुष्य ने कदम रखे तब से उसने नए नए अविष्कार करने शुरू हुए। अन्न भक्षण में गेहूं की कच्ची बाल को पकाकर खाने से पूर्व महादेव को चढ़ाने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है। तभी तो आज भी मंगल गान की शुरुआत “ऐजा अग्नि ऐजा, म्यारा मातुलोका, त्वे बिना अग्नि ब्रह्म भूको रै ग्ये।” इन शब्दों से होती है।
उत्तराखंड में “ॐमी” शब्द का प्रचलन
जैसे कि हम सभी जानते ही हैं कि ऋग्वेद सनातन धर्म और सम्पूर्ण विश्व का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है जो उपलब्ध है। इसमें 10 मण्डल, 1028 सूक्त और वर्तमान में 10,462 मन्त्र हैं, मन्त्र संख्या के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद है। मन्त्रों में देवताओं की स्तुति की गयी है। इसमें देवताओं का यज्ञ में आह्वान करने के लिये मन्त्र हैं। यही सर्वप्रथम वेद है। इसी ऋग्वेद में कृषि कार्य का कई बार बर्णन हुआ है व साथ -साथ अन्न उत्पन्न होने के पश्चात उसका 10 भागों में बंटवारा दर्शाया गया है। ऋग्वेद के अनुसार जो अनाज खेतों मे पैदा होता है, उसका बंटवारा 10 भागों में होता है जिसमें पहला स्थान भूमि का व अंतिम कुत्ते का बताया गया है । जैसे कृषि भूमि में अन्न उत्पन्न होने के बाद 1- जमीन से चार अंगुल भूमि का, 2- गेहूं के बाली के नीचे का पशुओं का, 3- पहली फसल की पहली बाली अग्नि की, 4- बाली से गेहूं अलग करने पर मूठ्ठी भर दाना पंछियो का, 5- गेहूं का आटा बनाने पर चुटकी भर आटा चीटियों का, 6- मुट्ठी भर गुथा आटा मछलियों का, 7- फिर उस आटे की पहली रोटी गौमाता की, 8- पहली थाली घर के बुज़ुर्ग़ो की 9- फिर हमारी थाली व आखिरी 10- आखिरी रोटी कुत्ते का माना गया है।
अन्न के साथ ऋग्वेद में लगभग 125 ऐसी औषधियों के बारे में भी बताया गया है, जो 107 स्थानों पर पाई जाती हैं। वहीँ ऋग्वेद का प्रथम श्लोक “ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥१.१.१॥” है, जिसमें अग्नि पूजा की महत्तता का बर्णन मिलता है। अब आप कहेंगे कि इस सबसे उत्तराखंड में गेंहूँ की बाल से पकाई गई ॐमी का क्या लेना देना ? तो आइये आपको समझाये देते हैं कि उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों में जब भी गेंहूँ की फसल पकती है, खेतों में काम कर रही अन्नपूर्णा हमारी माँ बहनें परिवार के हिसाब से अपने सबसे उपजाऊ खेत से कम से कम 10 मुट्ठी गेहूं के अदपके पौधे काटकर घर लाती हैं। अगर परिवार बड़ा है तो गेंहू की मुट्ठियाँ भी बढ़ जाती हैं लेकिन 10 मुट्ठी अनिवार्य तौर पर लाणी होती हैं। मेरी माँ कहा करती थी कि पहले पांच मुट्ठी पंचदेव, फिर एक मुट्ठी पितृदेव, एक मुट्ठी कुलदेव, एक मुट्ठी कुलदेवी व मुट्ठी भूमि देव भुम्याल व एक मुट्ठी ग्राम देवता के नाम पर काटनी शुभ होती है। क्योंकि इस से बनने वाली ॐमी इन देवताओं के नाम पर ही अग्नि में “होम” कर समर्पित की जाती है और जिसमें हम अग्नि का मंगलगान कर उस से अन्न बिष, जंतु बिष, भू बिष, पशु -पक्षी बीट, हल-फल बिष सहित बहुत से रोग व्याधि से छुटकारा पाते हैं। पवित्र अग्नि को समर्पित गेंहूँ की बालों को निकालकर हाथ से मसलकर इनके हरे व हलके पीले गुलाबी दानों की एक मुट्ठी सभी पंचनाम देवताओं,पितृ देवताओं, कुल देवी देवताओं, भूमि देवता, व ग्राम देवता को समर्पित करते हुए पूरे उत्तराखंड के भूपाल आदिदेव महादेव को भोग में चढ़ाते हैं तदोपरांत नया अन्न अपने परिजनों में प्रसाद के रूप में इन दानों को बांटते हैं जो बेहद स्वादिष्ट होता है। माँ कहा करती थी कि भले हि यह बात हर कोई न जानता हो लेकिन तुझे जरुर जानना है क्योंकि जिन अप्रत्यक्ष शक्तियों ने यह बीज दिया, जिन्होंने खाद दी, जिन्होंने फसल की रक्षा की, जिन्होंने फसल पकने तक इन्तजार किया सभी तो इसके भागीदार हैं। इसीलिए गेहूं को सूचा अन्न व चावल को पकने के बाद झूठा अन्न कहा जाता है। ब्राह्मण समाज हर किसी के हाथ से रोटी खा सकता है चावल नहीं।
माँ कहती थी कि गेहूं कटने के बाद उसके 10 बांठे लगते थे। जड़ भूमि को, तना सभी पशुओं को, गेहूं की बाल अग्नि को (जिसे हम ॐमी के रूप में ग्रहण करते हैं), गेंहूँ के छोटे दाने पक्षियों को, गेंहूँ से बने आटे की एक चुटकी चींटियों को, मुट्ठी भर आना जलचर जीवों को, रोट -प्रसाद देवों को, पहली रोटी गौमाता को, तदोपरांत पुआ प्रसाद दीप-धूप के साथ पंचामृत को , तत्पश्चात मनुष्य को व अंत में कुत्ते को दिया जाता था। शगुन देने आए कागा को सिर्फ रोट चढ़ता था। माँ अनपढ़ जरुर थी लेकिन अब जब हम पढ़ लिखकर वेदों से ज्ञान अर्जित करने लगे हैं तब माँ के दिए इन अकाट्य तर्कों का मिलाप जब ऋग्वेद की ऋचाओं से करते हैं तो अपने आपको धन्य समझते हैं। हिन्दू सनातन परम्पराओं में अन्न के लिए कितना सब्र रहा होगा लेकिन हम बालपन में यह सब्र कर हि नहीं पाते थे। ॐमी पकी नहीं कि घप्प मुंह में…! माँ कहती है अग्नि में होम की गई गेंहूँ की बालियों का महादेव ही नहीं बल्कि विश्व के सबसे शक्तिशाली शब्द ॐ से जोड़कर देखा ॐमी शब्द की उत्पत्ति हुई है। तब माँ के ये तर्क मेरी समझ से परे होते थे जिन्हें मैं हंसी में उड़ा देता था लेकिन अब लगता है, जन्मदायिनी मेरी माँ ज्ञान का समुंद्र थी, जिन्होंने अन्न उत्पत्ति से लेकर अन्न ग्रहण तक का विधि विधान ॐमी में हि समाहित कर दिया।
नवबर्ष बैशाखी और बिस्सू।
तमसा यमुना घाटी की अगर बात करें तो यहां हिन्दू नवबर्ष बैशाखी के दिन बिस्सू त्यौहार से शुरू होता है। उसके पीछे तर्क यह है कि इस दिन से पृथ्वी में सभी पुष्प खिल जाते हैं व इसी दिन से एक माह तक पुष्पपर्व चलता है। कहते हैं नागवंश ने पर्वतीय पुष्प बुरांस की 24 प्रजातियों व ब्रह्मकमल की 30 प्रजातियों में इसी दिन से जहर का संचार किया। जिस हालाहल बिष को पीकर महादेव हिमालय पर्वत में मदमस्त घूम रहे थे उसे उनके गले में पड़े नागों द्वारा उतारा गया। और जिस दिन उन्हें होश आया उस दिन ही इस क्षेत्र ने बिष त्यौहार मनाया जो कालांतर में अपभ्रंश होकर बिस्सू कहलाने लगा।
बहरहाल ऐसी बहुत सी दंतकथाएं, लोककथाएँ हमारे समाज व लोकसंस्कृति में कालांतर से चली आ रही हैं लेकिन यह भी सच है कि कालिया नाग पर्वत शिखर कालिंदी घाटी “यमनोत्री बन” क्षेत्र में इस दौरान जितने भी बुरांश खिलते हैं उन्हें जहरीला माना जाता है, 24 किस्म के बुराँसों में सिर्फ दो किस्म के बुरांस ही ऐसे बचते हैं जिनका बिस्सू की फुलियात के बावजूद भी जहर अर्थात बिष नहीं उतरता। ये यमनोत्री जाने वाले रास्ते पर या फिर तमसा यमुना घाटी में पाए जाते हैं। फूलों की घाटी में भी इसीलिए बैशाख माह में फूलों की ज्यादा सुंगध जहर बन जाती है।
यह भी माना जाता है कि बिस्सू पर्व की फुलियात के दिन पुष्प गोगा देवता, पांडव चौंरी व शिब मंदिरों में चढाये जाने के बाद से बुरांश के ब्रह्मकमल का जहर उतर जाता है और इसीलिए तमसा यमुना नदी घाटी की सभ्यता में बिष से उत्पन्न मेला “बिस्सू” मनाया जाता है।
“ओम ही” ….!
(फोटो साभार- अशिता डोभाल)
बहुत से बुद्धिजीवी व संस्कृतिधर्मियों का मानना है कि बिष का अपभ्रंश जैसे बिस्सू है वैसे ही महादेव के ॐ से ऊंमी की उत्पत्ति है क्योंकि इसके दाने महादेव को चढाये जाते समय लोग लोग मुंह से बुदबुदाया करते हैं -“ओम ही” रक्षा करें।
पूरे गढ़वाल मंडल में ऊँमी को ऊँमी ही बोला जाता है जिससे स्पष्ट होता है कि सब इसे महादेव द्वारा प्रदत्त अन्न मानते हैं। शायद यही कारण भी है कि चावल को पर्वतीय संस्कृति में जूठन अन्न व गेहूं को सात्विक अन्न माना गया है। इसीलिए गेहूं पकने के बाद गेहूं का प्रथम आटे से बने पकवान जिनमें रोट, प्रसाद , पिंजरी, गुलगुले इत्यादि का ही मंदिरों में भोग चढ़ता है।
बहरहाल जितना शोध में इस बिषय में कर पाया उससे यह तो स्पष्ट है कि सिर्फ़ आग में पकाकर उम्मी या ऊँमी का रस्वादन करना ही सबकुछ नहीं है बल्कि हमें उसकी तह तक जाकर उसके अविष्कार का बर्णन भी अवश्य करना चाहिए ताकि आने वाले समय में हमारी पुरातन धर्म संस्कृति, लोकसंस्कृति व देव संस्कृति में ब्याप्त शब्दों पर और गहनता से अध्ययन किया जा सके।


