Saturday, July 13, 2024
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अब कौन चढ़ायेगा बुग्यालों में वास करने वाली परियों (ऐड़ी/आंछरी/वनदेवी मातृकाओं) को सेरुआ? ऐतिहासिक मानथात की नुणाई पर भी मंडराये गर्दिशों के बादल।

अब कौन चढ़ायेगा बुग्यालों में वास करने वाली परियों (ऐड़ी/आंछरी/वनदेवी मातृकाओं) को सेरुआ? ऐतिहासिक मानथात की नुणाई पर भी मंडराये गर्दिशों के बादल।

(मनोज इष्टवाल)

लगभग 30 बर्ष पूर्व तक तमसा व यमुना से घिरे जौनसार बावर की आर्थिकी का सबसे बड़ा संसाधन भेड़ व बकरी पालन माना जाता था। और 6 माह जंगल प्रवास के बाद जब भेड़ बकरियां एक निहित तिथि को घर लौटती थी तब एक दो या तीन खत्त मिलकर बुग्याल या ऊंची पहाड़ी जो गांवों से नजदीक पड़े में एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है जिसका नाम ‘नुणाई‘ रखा गया। यह मेले तमसा यमुना घाटी व रुपिन – सुपिन घाटी में उत्तराखंड ही नहीं बल्कि हिमाचल क्षेत्र में भी आयोजित होते हैं, लेकिन उत्तराखंड के लाखमंडल क्षेत्र के मानथात में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक “नुणाई” मेले में हजारों-हजार लोगों की भीड़ इस मेले की शोभा बढ़ाया करती थी। भौतिकवाद के चरम ने जहाँ भेड़ बकरियां व चरवाहे कम कर दिए वहीं धीरे-धीरे आर्थिक समृद्धि के ये मेले भी सिमटते गये और अब ज्यादात्तर बंद हो गये, बचे-खुचे दो चार मेले भी आखिरी सांस लेते नजर आ रहे हैं। मानथात में आयोजित हुए मेले में जिस तरह भीड़ इस बर्ष उमड़ी है उससे यह आभास तो हो ही रहा है कि इस पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं!

ग्राम मोठी खत्त बौन्दुर के विजय चौहान की सोशल साइट पर पोस्ट में दर्द छलकता दिखाई दिया है। उनका कहना है कि “नुणाई” मेले से खत्त बौन्दुर के कई गाँवों ने अपने हाथ इसलिए खींच लिए हैं क्योंकि ग्रामीणो का मानना है कि अब भेड़ बकरी पालन कुछ चुनिंदा लोग कर रहे हैं ऐसे में इस त्यौहार को मनाने का क्या औचित्य? वे मायूस होकर युवाओं से अनुरोध करते दिखे कि आओ हम इस लोकपर्व को जीवत रखने में अपना योगदान दें।

लगता है कि अब जौनसार बावर जनजातीय क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा माध्यम समझे जाना वाला यह पर्व खतरे में है। पर्व इसलिए खतरे में है कि यहाँ का जनमानस अब अपनी अर्थ व्यवस्था के सबसे बड़े माध्यम भेड़ बकरी पालन को सिरे से लगभग खारिज कर चुका है। जिसके कारण न सिर्फ इस क्षेत्र के कई खत्तों की थातों में जुटने वाले “नुणाई मेला” समाप्त हो गए हैं बल्कि उससे सम्बन्धित समस्त लोक परम्पराएं भी समाप्ति की ओर हैं।  इसका सबसे बड़ा कारण इस व्यवसाय में प्रदेश सरकार के पशुपालन विभाग की उदासीनता समझा जा रहा है। जहां उत्तराखण्ड के दूरस्थ जिले उत्तराकाशी व पिथौरागढ़ न सिर्फ प्रदेश की बल्कि देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं बांटते हैं। वहीं इन दोनों जिलों की सबसे बड़ी अर्थब्यवस्था का स्रोत ही पशुपालन और मुख्यतः भेड़ बकरी पालन है। सरकारी उपेक्षा के चलते जहां इन जिलों के ग्रामीणों ने इस रोजगार से धीरे धीरे मुंह मोड़ना शुरू कर दिया वहीं आये दिन हर बर्ष अपनी भेड़ बकरियों की समृद्धि व ब्रीड बढ़ने के लिए

वनदेवीयों के बंधन में जुटने वाले भेङ बकरियों को समर्पित मेले धीरे-धीरे बन्द होने लगे हैं।

(फ़ाइल फ़ोटो-मानथात 2021)

मध्य हिमालयी भूभाग के विभिन्न थातों पर जुटने वाले “नुणाई” नामक ये मेले न सिर्फ संकुचित हो रहे हैं बल्कि कई थातों पर ये बन्द भी हो गए हैं। सबसे लंबा व चर्चित नुणाई पर लाखामण्डल के पास मानथात का माना जाता रहा है, जो कुछ साल पूर्व तक इस कगार पर आ गया था कि इसे सांकेतिक रूप से मनाया जा सके, ताकि वनदेवियाँ रुष्ट न हों व अतिवृष्टि से फसलें चौपट न हों और न ही प्राकृतिक आपदाओं से जानमाल का नुकसान न हो।

अपनी आंखों के सामने ही सिमटते देख अपने इस लोकपर्व को  कुछ युवाओं ने बर्ष 2021 में नए कलेवर देने की मुहिम छेड़ी। युवाओं ने इसे पुर्नजीवित करने के प्रयास क्या किया कि अपनी सांसे गिन रहा मानथात का लोकपर्व ‘नुणाई‘ में रौनक ही आ गई। बर्षों बाद फिर से इसमें भीड़ जुटी जिसे देखकर लोगों के चेहरे खुशी से खिल गए।

क्षेत्रीय युवा बॉबी पंवार ने “जिस त्यौहार को छोड़ने की बात बौन्दूर खत के कुछ गांव कई वर्ष पूर्व से कर रहे हैं और कुछ गांवों द्वारा इस त्यौहार को छोड़ने का निर्णय भी ले लिया है। आज उस त्यौहार में देखिए कितनी रौनक है।

अपना रीति-रिवाज संस्कृति कितनी खूबसूरत दिख रही है। हमें यदि अपनी संस्कृति को जीवित रखना है तो बौन्दूर खत के युवाओं को यह प्रण लेना होगा कि किसी भी कीमत पर हम इस त्यौहार को नहीं छोड़ेंगे बल्कि और धूमधाम से मनाएंगे जिससे हमारी संस्कृति जीवित रहें।
#चाल_नूणाया_के_मानथाते_रे_ओले_भेड़ाडिया_गजमौला
नूणाई मेला 6 अगस्त 2021, मानथात ( लाखामंडल ), चकराता देहरादून।”

वहीं क्षेत्र की समाजसेविका प्रोफेसर डॉ लीला चौहान भी इसी वीडियो को शेयर करती हुई लिखती हैं कि “पौराणिक त्यौहार नुणाई का संरक्षण करना अब नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है। इसमें हर गांव के नई पीढ़ी को भागीदार बनना होगा। मानथात नुणाई 2021।”

सचमुच अब यह जिम्मेदारी युवाओं की ही है क्योंकि इतिहास ने हमेशा उधर हो करवट बदली है जिस ओर जवानी ने रुख किया है। हाल के एक डेढ़ बर्षों में जौनसार बावर क्षेत्र की लोकपरंपराओं को चिरायु रखने के लिए क्षेत्र के सम्मानित बुद्धिजीवियों के एक मंच “लोक पंचायत” ने नई पहल जरूर की है। शायद इस मंच को आभास हो गया है कि जितनी तेजी से हमारा समाज आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हो रहा है, उससे यह तय है कि कुछ ही बर्षों बाद उनका ओबीसी या एसटी कैडर छिन सकता है। अब विभिन्न थातों-बुग्यालों में जुटने वाली  “नुणाई” पर्व को जीवंत करने के लिए लोक-पंचायत को जरूर पहल करनी होगी वरना वह दिन दूर नहीं जब जौनपुर की लोकपरंपराओं के इस त्यौहार को भी कोई बकरी स्वयंवर में तब्दील न कर दे।

इन्हें बुग्यालों का क्षेत्र कहें या भेडालों के लिए स्वर्ग…!

इसी घाटी में बसे खारसी गांव की बात करे या मानथात की,दोनों एक ही बात है क्योंकि यह खारसी गॉव जिस पहाड़ी के नीचे बसा है उसकी उच्च श्रृंखला को यहाँ के लोग कुकुर ओड़ार कहते हैं। भले ही जैसे-जैसे यहाँ शिक्षा ने कदम बढाए अब इसे टाइगर हिल कहना शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि पूर्व में भेडाल अपने कुत्तों के साथ इस चोटी पर बनी गुफा में महीनों तक जीवन यापन करते थे लेकिन इसकी शक्ल शेर जैसी है इसलिए अब लोग इसे टाइगर हिल के नाम से जानते हैं। इसके आस-पास कैंजू का टीमा, जानकुडिया धार, हसटीरा टीमा, ठीक सामने खडम्बा, डागुर का टीमा इत्यादि पर्वत श्रृंखलाएं हैं जबकि बांयी ओर मानवा तो दायीं ओर सीमान्त क्षेत्र के गॉव बनियानाखाटुवा गॉव इसकी सरहद से अपनी सीमाएं बांटते हैं। भेडालों की जीवन शैली के अलग-अलग अंदाज हैं। यहाँ के भेडाल अब बारी-बारी से एक महीने में अदला-बदली कर लेते हैं, जबकि रवाई व पर्वत क्षेत्र (उत्तरकाशी जिला) के भेडाल अभी भी छ: माह तक भेड़ बकरियों के साथ हिमालयी बुग्यालों का मीलों लंबा सफ़र तय करते हैं। इनकी जीवन शैली के अलग ही मानक होते हैं।

जौनसार क्षेत्र के भेडालों की भेड़ों की संख्या भले ही कम हो गयी हो लेकिन पर्वत क्षेत्र के भेडालों के पास आज भी हजारों की संख्या में भेड़- बकरियां रहती हैं। जिनमें सर बडियारओसला, गंगाड, डाटमीर, जखोल,कोटि,  मसक, रजाणु, कांडोई (सुतुलु की हारुल), दोणी-भित्तरी (गज्जू भेडाल) के भेडालों से जुडी कई लोकगाथाएं प्रचलित हैं। इनमें कइयों के आपसी संघर्ष से जुड़े हारुल, लामणछोड़े आज भी यथावत चलते हैं। कई बार इनके खुनी संघर्ष की गाथाएं सुनने को मिलती हैं। जिनमें सर बड़ियार के राय चन्द की लामण काफी प्रसिद्ध है। वैसे भेडाल जब अपना दर्द छोड़े या लामण गाकर उच्च हिमालयी शिखरों से गुजरता है तो उसका यह बिछोह प्रलाप दिल चीरकर ले जाने वाला होता है, और जब ये शांय को समय बीतने के लिए अपने डेरे के पास आग जलाकर गंगी गाते हैं तो उनमें बिरह पीड़ा का अलग ही अंदाज होता है जैसे – “आटा गोंदके बणाये फुलके, आज गंगी तेरे पाउणये कल झाणा पराये मुल्के…! इनकी जीवन शैली हर पर्वत श्रृंखला को पार करते ही बदलने लगती है। हर पर्वत को नमन करना इनकी दिनचर्या में शामिल है। आज भी गज्जू भेडालसलारी मलारी के प्रेम प्रसंग की स्वरलहरियां आसमान तक गुंजायमान होती हैं, व दोणी गांव स्थित उस मकान को देखने पर्यटक जाते हैं।

क्षेत्रीय भेडालों का कहना है कि ये हरे/भरे बुग्याल जितने प्यारे दिन में लगते हैं उतना ही भीवत्स रात्री पहर में तब लगते हैं। जब खाना बनाने का समय हो और बारिश बर्फ़ या तूफ़ान आ जाए, या फिर बादलों की कडकड़ाहट गूंजने लगे बघेरा निकट हो या हिंसक जानवर हमारे डेरे के आस-पास हो। ऐसे में हमारे रक्षक बन में विचरण करने वाली परियां (मात्रियाँ), सिलगुर देवता, जाख देवता इत्यादि होते हैं। जिनके सहारे हम अपना जीवन जी लेते हैं। उनके जीने के माध्यम हैं ढाबडी, खलूटी व खार्चा यानि उच्च हिमालयी शिखर में यही उन्हें शक्ति देते हैं। भेड़ की ऊँन से बनी ढाबड़ी बारिश बर्फ़ इस बचाती है क्योंकि ढाबडी ओड़कर बैठने से सिर्फ़ उसका ऊपरी हिस्सा ही भीगता है। जबकि बकरी की अंदरूनी खाल से बनी भुर्ली/खलूटी में वे अपनी दैनिक दिनचर्या का सामान व रुपैय्या पैंसा जमा करते हैं। साथ ही ताकुली भी रखते हैं ताकि भेड़ की ऊँन कात सकें.बेहद शीत वाले मौसम में या बर्फ़बारी के समय जहाँ नीचे बिछोने के रूप में बकरी के ऊन का खार्चा उनकी कमर को सेंकने का काम करता है वहीँ खुरसा (भेड़ बकरी की ऊँन से निर्मित जूता) उन्हें गर्माहट देता है।

(फ़ाइल फ़ोटो- 2016 ग्राम खारसी)

खारसी खत- बिसलाड के कई भेडाल जिनमें माया राम चौहान, केशर सिंह चौहान, शूरवीर चौहान इत्यादि सम्मिलित हैं, ने परियों के अस्तित्व को बेहद सजगता से बर्णन करते हुए कहा कि इनका अहसास हमें अक्सर हवाओं फिजाओं में होता ही रहता है। कभी इनकी हंसी गूंजती है तो कभी पायल सुनाई देती हैं। कभी इनके नृत्य की आहटें आती हैं तो कभी बेहद करीब से गुजरने की इनकी महक ! सबसे पुराने भेडाल माया राम चौहान का कहना है कि शुरूआती दौर में उन्हें डर लगता था क्योंकि इनकी अदृश्य लीलायें यूँही घाटियों पहाड़ियों में आहटों का सबब बनी रहती हैं लेकिन ये जल्दी से किसी को नुक्सान नहीं पहुंचाती। ये शिलगुर देवता को भेड़ी का देवता मानते हैं, जबकि परियों को अगासी नाम से सम्बोधित करते हैं। जाख देवता को आग के देवता के रूप में जोड़कर भी देखते हैं इसलिए अपने नियमों का शक्ति से पालन करते हुए ये चूल्हे के पास जूते नहीं ले जाने देते चाहे बर्फ़ कितनी ही अधिक क्यों न पड़ी हो। वहीँ चूल्हे पर ये कभी औजार नहीं लगाते जबकि इनकी दिनचर्या में औजार के बिना ये एक कदम भी नहीं चलते इनका मुख्य औजार डांगरा होता है।

इनकी कठोरता का आभास इस बात से भी आपको हो जाएगा कि अब भले ही भेडाल जूते पहनने लगे हों लेकिन पुराने भेडाल जूते तक नहीं पहनते थे। कांटे इनके पैरों के नीचे ही दम तोड़ देते थे लेकिन चुभ नहीं पाते थे। इनके खान-पान में ज्यादातर सब्जियों बेहद औषधिबर्द्धक जंगली सब्जियां ही शामिल हैं जिनमें च्यांव, जन्गुरिया, गोथीचारुव, लिंगुड, डांडा कुरेड, जुम्मा, झगुरिया, रागुड़ी, दाल, गुच्छी, आलू इत्यादि शामिल हैं। वहीँ ये खाने को खाना न बोलकर दावत कहते हैं। इसका भी एक बिचित्र उल्लेख मिलता है। हर भेडाल अपने अपने हिस्से से आटा या चावल देगा उसे गोंदकर उतने ही हिस्से बनेंगे जितने भेडाल होते हैं फिर लगभग हर एक के लिए दो या तीन रोटी पाव-पाव भर आटे से तैयार होती हैं। वे अपने हिस्से की रोटी कभी आपस में बांटते नहीं हैं। पेट भरने के बाद वे उसे बकरी या भेड़ को खिला देंगे लेकिन दूसरे को नहीं पूछते कि तुझे खाना है तो खा ले, और तो और अगर मेहमान आ गया तो उसे भी अपने हिस्से से कुछ नहीं देते उसके लिए अलग से बनाते हैं। ये इनके नियमों में शामिल है।

मायाराम चौहान का कहना है कि पहले चाहे कितनी ठण्ड हो भेडाल कभी चाय नहीं पीते थे और न ही भात (चावल) खाते थे। अब यह चीजें प्रचलन में आने लगी हैं वहीँ ये लोग सातु (सत्तू) पीया करते थे वो आज भी प्रचलन में है। मोर सिंह ठाकुर (भेडाल) गॉव ठाँगूठा खत-छजाड कहते हैं कि भले ही भेडाल की जीवनशैली बेहद कठिन है लेकिन रोग-ब्याधि इसके नजदीक नहीं फटकती। हाँ अपने ऐब हमेशा भेडाल को ले ढूबते हैं। मैंने कई क्षेत्रों में भेडाल विहीन भेड़-बकरियों को दिन भर कुत्तों के दिशा निर्देश पर चरते देखा है। ये कुत्ते ज्यादातर शिकारी कुत्ते हैं जिन्हें आम भाषा में भोटिया/भेडिया कुत्ता कहा जाता है। इनकी नजर इतनी तीक्ष्ण होती है कि एक मेमना भी इनकी नजर से ओझल नहीं हो पाता। इनकी चौकसी में बाघ-तेंदुवे साहस नहीं करते कि किसी बकरी या भेड़ का शिकार कर पाए। भेड़ों को चुगाकर शाम को फिर खेमे तक लाना ये इनकी मुख्य जिम्मेदारी होती है और हमेशा भेड़ बकरियां बीच में रहती हैं आर पार भेडालों के तम्बू लगे रहते हैं।

वहीं खारसी गांव के भेडाल जिस दिन गॉव की सरहद के पास आ पहुँचते हैं, उस दिन गॉव में बनेट होती है। खारसी गॉव के पढ़े लिखे युवा सुरेश चौहान बताते हैं कि पूर्व में बनेट पर आपस में भेडा (मेंडा) लड़ाने का प्रचलन होता था, और इसको देखने के लिए गॉव के गॉव जुटते थे। इसी दिन गॉव की थात पर ढाई पाथे का एक मीठा सेरुवा (रोटी के आकर का) सब अपने अपने घरों से बनाकर ले जाते थे जिसका आधा टुकडा काटकर मात्रियों यानि बनदेवियों/परियों को चढ़ाया जाता था आधा सेरुवा भेडालों के हाथ दिया जाता था जिसे वह प्रसाद के रूप में सबको बांटते थे। साथ ही बन अप्सराओं के नाम के सोने चांदी के टीके, बिंदी चूड़ी, साज श्रृंगार का सामन, हल्दी, आटा, चावल चढ़ाया जाता था। उस दिन शांय काल से पूरी रात गीत लगाए जाते थे और अगली सुबह नुणेत होती थी। इस दिन भेड़ बकरियों को नहलाया जाता है फिर उनके बाल उतारे जाते हैं। भेड़-बकरियों को नमक खिलाया जाता है और सारे पकवान भी नमकीन ही बनाए जाते हैं, और दिन भर डयान्टूडियां (मायके आई बेटियां) अपने मायके में तरह -तरह के पकवानों का रस्वादन करती हैं। अपने परिधानों व आभूषणों में पंचायती आँगन में हारुल, झैंता, रासो इत्यादि गीत नृत्यों से शमां बाँध लेती हैं। जिनका साथ गॉव के सभी लोग देते हैं।

वहीँ यहाँ एक नया प्रचलन देखने को यह मिला कि घर-घर मेहमान-नवाजी के लिए नुणेट के दिन बकरे काटे जाते हैं। मानथात बौन्दूर, खारसी व आस-पास के गॉव के भेडाल अपनी भेड़ों का चुगान सिर्फ अपने जौनसार क्षेत्र में करते हैं जबकि पर्वत, रवाई क्षेत्र के भेडाल कई 100 मील  उत्तराखंड की सीमा में भेड़ चुगान करते हैं। इस क्षेत्र की भेड़ बकरियों का चुगान क्षेत्र मुख्यत: खडम्बा, बमणाई, किणानी, डागुर, जाखा, मोल्टा इत्यादि क्षेत्र पड़ते हैं। भले ही अब नुणाई सिमटकर मानथातखारसी तक रह गयी लेकिन पहले जौनसार बावर के कई खतों में इसका पर्व मनाया जाता था।

जाड़ी के चौहान बताते हैं कि पहले जाड़ी गॉव में भी नुणाई काफी धूमधाम से मनाई जाती थी जिसमें सीला, मंगाडजाड़ी की भेड़-बकरियां इकटठा होती थी व भेड़ें लड़ाई जाती थी। इसके अलावा कनासर में त्यूना, कोटी, मंगताड़ व खत बंदूर में मानथात की नुणाई बेहद लोकप्रिय थी। नुणाई पर्व के वर्तमान स्वरुप में आये बदलाव से अब यह लगता है कि यह पर्व जल्दी ही दम तोड़कर बेदम हो जाएगा। इसकी अंतिम साँसे बची हैं जिन्हें जीवित रखने के लिए क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों को आगे आना होगा ताकि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति की धडकनों में रचा बसा यह लोकपर्व संजीवनी पा सकें, और हम जैसे संस्कृति के चितेरे अपने शब्दों से हर उस व्यक्ति तक अपनी संस्कृति का गुणगान कर सकें जिन्होंने मैकाले की शिक्षा पद्धति ग्रहण कर भारतीय लोकसंस्कृति का ह्रास किया है।

यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि एक लोकपर्व समाप्ति के कगार पर है। यहाँ प्रश्न यह है कि अब कौन चढ़ायेगा बुग्यालों में वास करने वाली परियों (ऐड़ी/आंछरी/वनदेवी मातृकाओं) को सेरुआ?

बुजुर्गों का मानना है कि अगर इनके इस लोकपर्व परियों (ऐड़ी/आंछरी/वनदेवी मातृकाओं) को सेरुवा न चढ़ाया गया तो ये रुष्ट भी हो सकती हैं और यह अगर रुष्ट हो गई तो जौनसार -बावर का यह क्षेत्र जो आपदा मुक्त क्षेत्र है आगामी समय में आपदाओं की जद में आ सकता है, इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि भेड़ बकरियां न भी हों लेकिन क्षेत्र की समृद्धि के लिए हमें नुणाई मेले को जीवित रखे रखना चाहिए ताकि हमारी आने वाली पीढियाँ परियों (ऐड़ी/आंछरी/वनदेवी मातृकाओं) को सेरुआ चढ़ाना न भूलें।

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