Thursday, January 22, 2026
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नेपाल आपदाकाल….! कपिलवस्तु से नेपाल के पहले राजा पृथ्वीनारायण के गोरखा तक का सफर। गुरु गोरखनाथ

(मनोज इष्टवाल ट्रेवलाग 8 मई 2015)

आख़िरकार हम गोरखा पहुँच ही  गए। गोरखा यानि जहाँ राजा पृथ्वी नारायण ने जन्म लिया था और 23 अंचलों के राजाओं को जीत कर नेपाल की स्थापना की थी  यहाँ की स्थिति काफी हद तक अब सुधार की ओर है। विस्तृत लेख बाद में लिखूंगा फिलहाल चंद्रौटि से गोरखा तक की संक्षिप्त यात्रा वर्णन लिख रहा हूँ।

लगभग 250-300 किमी. की इस यात्रा में हम बुटवल कुछ देर के लिए रुके। चौड़ी सड़कों के दोनों छोर बसा यह मार्केट आकर्षक है। दैनिक दिनचर्या में भूकम्प का कहीं कोई चिन्ह नजर नहीं आया।शायद यह क्षेत्र भी मधेश का हुआ। यहाँ से काठमांडो की दूरी मात्र 250 किमी. के आस-पास है। आप स्वयम् मेरे पीछे फोटो में दिख रहे साइन बोर्ड पर यह देख सकते हैं।

दाउन्ने से आगे सड़क सर्पाकार होकर पहाड़ चढ़ना शुरू कर देती है! हम लगभग 8 बजे दाउन्ने देवी मंदिर पहुंचे। सड़क मार्ग से एक किमी. दूरी पर यह मन्दिर है। टीम मन्दिर तो नहीं पहुंच पायी लेकिन मैं सड़क से लगभग 200 मीटर ऊपर लक्ष्मी नारायण मन्दिर जरूर गया। यहाँ से लौटकर नेपाल के स्वादिष्ट पकवान सेल रोटी और खस्सी का नाश्ता कर आनन्द लिया।

सच कहूं तो नेपाल में बन और पानी बेहद मात्रा में है। मैंने इतने बड़े बड़े जंगल देखे लेकिन अपने पहाड़ जैसे चीड़ वृक्ष यहाँ कहीं नहीं देखे  सप्त गंडकी (नारायणी नदी) के तट पर बसा नारायण गढ़ बहुत सुन्दर है। नारायणगढ़ में काली गण्डक, बूढी गण्डक, त्रिशूली सहित चार और नदियों का मिश्रण होकर सप्त गण्डक नदी बनती है।

मुझे आश्चर्य इस बात का है कि नेपाल सरकार ने नदी तट पर पसरे शांत तट पर अभी तक ध्यान केंद्रित क्यों नहीं किया होगा। यहाँ नदी तट पर बेहतर पार्कों का निर्माण व नदी में वोटिंग का आनन्द लेकर पर्यटन व आर्थिकी को मजबूत किया जा सकता है।

नारायण गढ़ से हमें बांये हाथ मुड़कर काठमांडो की ओर जाना पड़ता था। यह रुट ठीक वैसा ही है जैसे आप ऋषिकेश से श्रीनगर बदरीनाथ की ओर बढ़ते हैं फर्क सिर्फ इतना है कि वहा गंगा आपके दांये हाथ बहती है तो यहाँ त्रिशुली नदी आपके बांये हाथ..।
त्रिशुली के दोनों छोर छोटे छोटे गॉव हैं जहाँ सिर्फ और सिर्फ भुट्टे की खेती होती है वहीँ राष्ट्रीय राजमार्ग में छोटे छोटे बाजार जो चाय पानी के हैं। इन्हीं बाजारों में ऊनि धागे से बने सजावट के सामान आपकी आँखों के केंद्र बिंदु बनते हैं। त्रिशुली नदी घाटी का यह मार्ग नारायण गढ़ से मुंगलिंग तक लगभग 35 किमी. दूर है। यहाँ से नाक की सीध में सीधी रोड काठमांडो जाती है जबकि हम बांये मुड़कर गोरखा के लिए मुड़ जाते हैं जो त्रिशुली के दांये छोर पर है। यहाँ से गोरखा 24 किमी. दूरी पर है। रास्ते भर औषधि पादप आपका ध्यान आकर्षण करते नजर आते हैं। गोरखा दलभन्ज्यांग पहुँचते ही तबाही का मंजर दिखना शुरू हो गया। जगह जगह मकान जमीदोज थे लोग टेंट लगाए जैसे तैसे राहत का इन्तजार करते नजर आ रहे थे। हम दुःख दर्द बांटते आखिर गोरखा पहुंचे जहाँ हमारी व्यवस्था लक्ष्मी ओझा जोकि काठमांडो में सामाजिक कार्यकर्ती हैं, के मायके में उनके भाई के घर थी। यहीं हम 18 सदस्यीय दल के लिए भोजन व्यवस्था और रात्रि विश्राम की सम्पूर्ण व्यवस्था थी।

मुग्लिंग नेपाल।

सुबह कपिलवस्तु से 6:00 बजे निकलने के बाद बुटवल होते हुए अभी मुग्लिंग पहुंचे हैं.. साढ़े बारह बजे से अभी तक यहां बैठे-बैठे ट्रक का इन्तजार कर रहे हैं। यहां जितने लोग उतनी बातें सुनने को मिल रही हैं। कोई कह रहा है कि ट्रक हाईजैक कर लिया जाता है। राजनीतिक दल अपनों को फायदा पहुंचाने को कई बहाने करते हैं। दूर के गॉव तक अभी भी राहत नहीं पहुँच पायी है। त्रिशूली के बांये हाथ में बसे इस बाजार में गजब की उमस है। लगता है शाम को जोरदार बारिश होगी।

फिलहाल यहां खाना खाकर सुस्ता रहे हैं। यहाँ हिंदी जानने वाले बहुत कम लोग हैं। बाजार महंगा है। यहां से सीधा राष्ट्रीय राजमार्ग काठमांडो जाता है, जबकि हमें बायीं ओर त्रिशूली नदी पार कर गोरखा व धादिंग जाना है। ईश्वर करे सब ठीक हो।

यह लड़की जो मेरे साथ है इसके भाई दुबारा आये भूकम्प में चल बसे.. जिंदगी यूँही चलती रहती है। बस हम सबकी दुआओं की सख्त जरुरत है। ईश्वर करे जो भी राहत आये सही हाथों में पहुंचे। यहाँ बिंदु सिलवाल ने बताया कि जो राहत इंडिया से मिल रही है सभी को पता है लेकिन अभी पता लगा कि तीन ट्रक राहत का सामान काठमांडो में यहाँ के लोगों ने औने-पौने दाम में बेच दिया  ऐसे कई किस्से हैं..पिछला अपडेट बाकी है।

यह भी गजब हुआ कि कहाँ मैं हिंदी बोलने वाले को ढूंढ रहा था कि एक कपड़े की दुकान में श्रीमती कमला थापा किसी महिला के साथ जोर-जोर से हिंदी में ठहाके लगाती दिखाई दी। मुझे आश्चर्य हुआ, मैं भी दुकान की तरफ लपका। मुझे देखकर उस भद्र महिला का चेहरा खिल गया बोली-आप मनोज इष्टवाल जी हैं ना? मैं चकरा कि भला देहरादून से डेढ़ हजार किमी. दूर यह महिला मुझे कैसे जानती हैं। वह पूरी ढंग से हिंदी तो नहीं बोल पा रही थी लेकिन कितना बोल पा रही थी वह हम सबके लिए पर्याप्त था। उसने बताया कि उसके हज्बेड गोरखा राइफल्स में गढ़ी कैंट कई साल रहे हैं। मैं भी वहाँ पांच साल रही हूँ। आपको तभी से जानती हूं। व नेपाल 1 की खबरें जब भी देहरादून से प्रसारित होती हैं मैं उसे जरूर सुनती व देखती हूँ। वह सुनकर अच्छा लगता है जब टीवी वाला बोलता है- देहरादून बाटा नेपाल 1 का मनोज इष्टवाल। मैं सचमुच फूल कर कुप्पा हो गया।

आज हमें यहीं रुकना था। आज दो दिन हो गए थे रोटी नाम की कोई चीज नहीं मिली न कुछ शाकाहारी। मैं अपने लिए नहीं बल्कि पंडित बसन्त राज जी को लेकर परेशान था जिन्हें यकीनन शाकाहारी खाने की सख्त जरूरत थी। मैं तो मछली, मुर्गा, खाकर जैसे तैसे गुजारा कर ही रहा था, लेकिन कसम खाकर कहता हूं मटन की तरफ देखा भी नहीं मैंने। कसम से यार….!आप समझ सकते हैं मेरी मजबूरी।

इन्हीं भद्र महिला ने बताया कि सामने एक वैष्णव ढावा है शायद वहां रोटी मिल जाएं। पंडित बसन्तराज और मैं भागे-भागे गए लेकिन हाय रे किस्मत! होटल वाले सज्जन बोले- मैदा अभी अभी खत्म हुआ। मैं बोला -मैदा क्यों ? रोटी तो आटे की बनती हैं । वह हिंदुस्तान नहीं नेपाल है सर। यहां आटा कोई नहीं खाता। और आटा यहां मिलता भी नहीं है। मैदा ही

हम रोटी में इस्तेमाल करते हैं। बसन्त राज जी न होटल में चावल खा सकते थे न अन्य कुछ। आख़िर सब्जी और सिंवई में ही गुजारा करना पड़ा। मैं तो आखिर पूजा सुब्बा जी की आवाज सुन कर इस होटल में धमक पड़ा जहाँ खूबसूरत लड़कियां काउंटर सम्भाल रही थी। अब ये मत समझ लीजिए कि यहां मैं अद्दा-पव्वा खरीदने वाला हूँ। अरे नेपाल की हर दुकान दारू से ही सजती हैं, अब चाहे वह टेलर शॉप हो या कोई नाई की दुकान। फिलहाल यह होटल है और मैं अभी तक कन्फ्यूज हूँ कि जो मोमो मैंने इस दुकान में खाये वो चिकन के थे या मटन के। ईश्वर करे चिकन के ही हों।

हमारी टीम में देहरादून से गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट की राष्ट्रीय अध्यक्ष उमा उपाध्याय, श्रीगंगा उद्वार समिति चंद्रबनी की उपाध्यक्ष पूजा सुब्बा, पॉजिटिव वेलफेयर सोसाइटी से कमला थापा, सबकी सहेली ग्रुप से मंजू कार्की, स्वयं सेविका निर्मला काफ्ले, स्वयं सेविका सुनीता क्षेत्री, स्वयं सेवक कोमल घले व शुभम सिन्धुपाल हैं, जबकि हरिद्वार से भगवत कुञ्ज के भगवताचार्य पण्डित बसंत राज अधिकारी वहीँ नेपाल के दलदली प्रगति नगर से स्वयं सेवक तील काफ्ले, स्वयम् सेविका बिमला अधिकारी, काठमांडो से स्वयम सेविका लक्ष्मी अधिकारी, वृन्दावन से ऋषि पोखरेल के अलावा नेपाल पुलिस प्रहरी अच्युत अधिकारी व कोटद्वार गढ़वाल से चालक अमित,  ट्रक ड्राइवर प्यारे लाल इत्यादि मौजूद हैं।

क्रमशः…..(9 मई 2015 को गोरखा …जारी)।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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