जौनसार क्षेत्र की श्रीमती कविता चौहान। महानगर में रहकर भी बिखेरती हैं चमक अपने लोक समाज लोकसंस्कृति की।
(मनोज इष्टवाल)
●कविता जी कहती हैं, वह मुख्यमंत्री जी की बात का समर्थन करती हैं कि जीन्स पहनने में कोई बुराई नहीं है लेकिन फ़टी जीन्स पहनना ठीक नहीं।
●उनकी भी दो बेटियां हैं, उन्हें व बेटियों को जीन्स पहनने में कोई दिक्कत नहीं लेकिन जो जीन्स कटी फ़टी हो व उसे समाज के लोग पसन्द न करें वह कभी नहीं पहनना पसंद करेंगी। मेरी यह अपनी व्यक्तिगत राय है, अन्य क्या पसन्द करते हैं यह उनका निजी मामला है।
समाज को दिशा और दशा देने में सबसे अग्रणी रहने वाली मातृशक्ति को शायद इसीलिए कहा गया है- “या देवी सर्वभूतेषू कान्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥” अर्थात जो देवी सभी प्राणियों में तेज, दिव्यज्योति, उर्जा रूप में विद्यमान हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।
एक ओर जहां पूरे प्रदेश में फ़टी जीन्स पर एक राजनीतिक दल में शामिल महिलाओं ने विरोध में हल्ला काट रखा है वहीं दूसरी ओर अपनी लोकसंस्कृति व लोकसमाज से बेहद प्यार करने वाली जौनसार बावर की श्रीमती कविता चौहान नित अपने गेटअप में आपको सोशल साइट पर अपडेट करती दिख जाएंगी। जिसमें वह लगभग हर हफ्ते अपने जौनसारी आभूषण व वस्त्र विन्हास में फोटो डालती हैं। उनसे मेरा व्यक्तिगत परिचय तो नहीं है लेकिन इतना जरूर कोशिश करता हूँ कि एक बार सोशल साइट पर फुर्सत के पलों में तलाश लूँ कि कविता जी ने आज क्या कुछ अपडेट किया होगा। वे अपने वस्त्र विन्हास को इतने खूबसूरत तरीके से अपनी फोटो में प्रदर्शित करती हैं कि हृदय की वाह जुबान पर वाह के रूप में फुट पड़ती है।
कविता जी वर्तमान में शायद किसी महानगर में रहती हैं लेकिन उनकी साँसों में उनका जौनसार बावर रचा बसा नज़र आता है। ठीक वैसे ही जैसे स्टेज पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते कलाकारों में लोक की झलक दिखती है। कविता जी की इन फोटोज में उनके रूप के प्रति कोई भी व्यक्ति कम आकर्षित होता होगा लेकिन वस्त्राभूषण पर नजर पड़ते ही जो स्नेहिल प्रेम उनके माध्यम से उनकी लोक संस्कृति के प्रति जागता है वह सचमुच दर्शनीय ही नहीं बल्कि वंदनीय भी लगता है।
श्रीमती कविता चौहान जी को ट्वीट कर मैंने उनसे उनके विचार जानने चाहे तो वह बोली- मैं मुख्यमंत्री जी की बात का समर्थन करती हूँ कि जीन्स पहनने में कोई बुराई नहीं है लेकिन फ़टी जीन्स पहनना ठीक नहीं। उनकी भी दो बेटियां हैं, उन्हें व बेटियों को जीन्स पहनने में कोई दिक्कत नहीं, वे बड़े शौक से उनकी इच्छाओं की पूर्ति भी करती हैं, लेकिन जो जीन्स कटी फ़टी हो, वह जीन्स हो या कोई भी कपड़ा..उसे हमारे समाज में अशुभ माना जाता है। इसलिए जिसे समाज के लोग पसन्द न करें वह कभी नहीं पहनना पसंद करेंगी। मेरी यह अपनी व्यक्तिगत राय है, अन्य क्या पसन्द करते हैं यह उनका निजी मामला है।
श्रीमति कविता चौहान ने बताया कि वह मूलतः जौनसार के यमुना छोर के नजदीक बसे लकस्यार गाँव की हैं, व उनकी ससुराल खत्त बहलाड के मैसासा गांव है। उनकी बड़ी बेटी इंजीनियरिंग की छात्रा व छोटी बेटी 12वीं कक्षा की छात्रा हैं, उनके पति व्यवसायी हैं। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि मेरा लोक समाज व लोकसंस्कृति सबसे खूबसूरत है। मैंने अपनी दादी/नानी को भी बचपन में घाघरी, कुर्ती, चोली, व ढांटू के साथ देखा। माँ को भी ऐसे ही देखा और अब जब हम शहर में हैं तो मैं कई बार क्या अक्सर रिश्तेदारी में अपनी पारम्परिक भेषभूषा में ही जाती हूँ, सबने इस भेषभूषा की प्रशंसा ही की व पूरा मान सम्मान दिया। किसी ने भी मेरे क्षेत्र के वस्त्राभूषण को कभी हेय दृष्टि से नहीं देखा और ना ही उसमें उनका कभी कोई अशिक्षित गंवार दिखाई दिया। सच कहूं तो इन वस्त्रों को पहनने से मुझे मेरे लोक समाज के नाम से महानगरों में भी लोग जानते हैं। अब कोई फट्टी जीन्स पहने तो भला हम उसके समाज व संस्कृति का मूल्यांकन कैसे कर सकते हैं। वैसे मैं आपको पहले भी कह चुकी हूं कि यह सब मेरी व्यक्तिगत राय है। कोई क्या पहनें यह उसका व्यक्तित्व व व्यक्तिगत मामला हुआ। मैं तो अपने वस्त्राभूषण में ही आत्म मुग्ध रहती हूं।
वाह कविता जी, आप कितनी सरलता से कह गयी कि महानगर में मेरी पहचान मेरे लोक समाज से होती है लेकिन मैं सच कहूँ तो वह है कि आप जैसी माँ बहनों से ही हमें हमारे लोक समाज की पहचान मिलती है। जब लोक समाज जिंदा हो तो लोक की हर बात उसके पल्लू से बंधी हुई आगे बढ़ती है।
यहां मेरा आप सभी से एक प्रश्न है कि दिन भर के भ्रमण व शॉपिंग में इतने कितने महिला व पुरुष भद्रजन आपके दिलोदिमाग में बने रहते हैं जो कटी-फटी जीन्स में आपको बड़े-बड़े मॉल, रेस्त्रां व अन्य जगह दिख जाते हैं। क्या उनके प्रति भी हमारे मन में ऐसा ही स्नेहिल प्रेमाकर्षण पैदा होता है जैसा कविता जी की छवि के प्रति पैदा होता है। देवी रूप में किसी को महसूस करना सचमुच उसके लोक व उसकी संस्कृति की पहचान कराता स्वरूप होता है। अब कटी-फ़टी जीन्स की क्या संस्कृति व क्या समाज है, यह मेरे लिए शोध का बिषय है




