Saturday, May 18, 2024
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मलेथा गूल निर्माण की क़ीमत माधौ सिंग भंडारी ने न सिर्फ़ बेटे की बलि से चुकाई बल्कि अपने मौत से भी चुकाई।

एक सिंग रांद बण, एक सिंग गाय का।
एक सिंग माधौ सिंग, हौर सिंग काय का॥

मलेथा गूल निर्माण की क़ीमत माधौ सिंग भंडारी ने न सिर्फ़ बेटे की बलि से चुकाई बल्कि अपने मौत से भी चुकाई।

(मनोज इष्टवाल)

* तिब्बत पर पहला युद्ध महासेनानायक माधौ सिंग भंडारी के नेतृत्व में १६२७-२८ में दापा-तिब्बत नरेश काकूआमोर के ख़िलाफ़ लड़ा गया जिसमें काकुआमोर ने परास्त होकर आत्मसमर्पण किया व वह तिब्बत छोड़ भाग खड़ा हुआ। सेनापति लोदी रिखोला ने काकुआमोर के महल में लगे स्वर्णकलश लाकर श्रीनगर राजा महिपत शाह को भेंट किए।

* सन्धि अनुसार काकुआमोर ने हर साल सवा सेर सोना व एक चौसिंगा मेंढा राजा महिपत शाह को देना स्वीकार किया।

* इसी युद्ध में विजय उपहार सहित महासू क्षेत्र बुशेहर नरेश विजय सिंग की पुत्री राजकुमारी उदीना माधौ सिंग भंडारी के युद्ध कौशल से प्रसन्न हुई व उनका विवाह सम्पन्न हुआ।

* इसी युद्ध में सेनापति लोदी रिखोला ने अपने वीर भड भीम सिंग बर्तवाल व उदेसिंग बर्तवाल को तिब्बत की देख रेख की बागडोर सौंपी।

* इसी युद्ध के बाद शुरू हुई भात जूठा रोटी सुच्ची परम्परा।

* माधौ सिंग भंडारी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र ग़ज़ेसिंग भंडारी गढवाल नरेश पृथ्वीपति शाह के सेनापति बने।

* १६४० में महासेनानायक माधौ सिंह के नेतृत्व में सेना का एक विशाल दल माणा- चाराहोति-छपराड होते हुए दाबा तिब्बत द्वारा पहुँचा।

* सेनापति लोदी रिखोला के नेतृत्व में टकनौर-पैनखंडा होते हुए तिब्बत दापा पहुँचा।

* सह सेनापति बनवारी लाल तुन्वर, दोस्तबेग मुग़ल के नेतृत्व में गंगाघाटी- गाजनाघाटी- बूढ़ाकेदार घाटी होकर तिब्बत पहुँचा।

* बौद्ध विहार पर सेना ने क़ब्ज़ा किया । माधौ सिंग भंडारी के नेतृत्व में सतलुज नदी के आर पार छोर पर सेना ने मुनेरे चुनकर अपनी सीमाबंदी का विस्तार तिब्बत के साथ-साथ हिमाचल के महासु क्षेत्र तक किया, जबकि विजयीश्री हासिल करने के बाद लोदी रिखोला के साथ बाक़ी सेना वापस लौट गई।

* इन मीनारों (बाउंड्री लाइन) को चुनने में सेना व माधौ सिंग भंडारी को एक साल व्यतीत हुआ। इसी बाउंड्री लाइन को आज अंतर्राष्ट्रीय सीमा की मैकमोहन लाइन कहा जाता है। लेकिन भयंकर शीत व लगातार युद्ध भूमि में रहने से माधौ सिंग का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा।

* राज पुत्री रुकमा से प्रेम कर बैठने व अपनी सबसे प्रेयसी राणी उदीना के पुत्र वीर सिंग (मलेथा गूल प्रसंग) की बलि देने के बाद राणी ऊदीना के पिता महासू क्षेत्र बुशेहर के राजा विजय सिंह (बिज्जा सिंग) माधौ सिंग से नाराज़ चल रहे थे लेकिन किसी के पास साहस नहीं था कि माधौ सिंग का विरोध कर सकें। मीनार चुनने के बाद महासु- बुशेहर के रास्ते वापिसी लेना ही माधौ सिंग की बड़ी भूल रही। ससुराल में पहुँचकर जब उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ व सेना पड़ाव की गुप्त सूचना से यह पता चलने के बाद की माधौ सिंग अस्वस्थ है। राजघराने ने उनके खाने में विष मिला दिया।

* माधौ सिंग को जब इस बात की भनक लगी तब तक उन्हें बहुत देर हो चुकी थी। उन्होंने सैन्य बल के विश्वसनीय सैन्य अधिकारियों से गुप्त मंत्रणा कर कहा कि जैसे ही उनके प्राण जाएँ तुरंत उनके शरीर को तेल में तलकर पालकी में बिठाया जाय व रात्रिप्रहर ही सेना को महासु-बुशेहर से रवाना कर दिया जाय ताकि सेना का क़त्लेआम बच सके। वरना जैसे ही यह भनक बुशेहर नरेश को लगेगी उनकी सेना हम पर आक्रमण कर देगी।

* माधौ सिंह ने कहा हरिद्वार पहुँचकर उनके मृत शरीर की मुक्ति चिता में समर्पित कर अस्थि प्रवाहित कर देना।

* स्वयं राजा इस दौरान उपस्थित रहे व माँ का प्रलाप जारी रहा – “बारा ऐनि बाग्वाल माधौ सिंग, सोलह ऐनी सराद माधौ सिंग।
मेरु माधौ नि आई माधौ सिंग…!

* बहरहाल माधौ सिंग भंडारी ने मलेथा गूल निर्माण के दौरान क्या सचमुच अपनी कुलदेवी महाकाली के कहने पर अपने व उदीना पुत्र वीर सिंग की बलि दी थी या फिर यह एक हादसा था? यह शोध का विषय है, क्योंकि अगर यह हादसा होता तो मलेथा गूल संबंधी लोकगीत व सेनापति माधौ सिंग भंडारी की मौत पर प्रलाप करती माँ का गीत आज चार सौ साल के बाद भी लोक में सम्मिलित नहीं होता।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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