Saturday, May 18, 2024
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किम्मवोणा (क़ीमावाणा)…. जौनसार बावर क्षेत्र का जड़ी बूटियों से बनाई जाने वाली शराब का त्यौहार।

यह त्यौहार सचमुच अद्भुत है। मूलतः यह त्यौहार अब कुछ गांवों तक ही सिमट कर रह गया है। 2003-04 में जब मुझे इस त्यौहार की भनक लगी तो मैं दौड़ा-दौड़ा जौनसार बावर के हाजा-दसेऊ गांव जा पहुंचा। जहां किम्मवोणा (क़ीमावाणा) त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा था। सैकड़ों ग्रामीण इस रोज दर्जनों जड़ी बूटियों से निर्मित रोटी के आकार की कीम से बनी शराब का सामूहिक आनंद लेते हैं व खूब ठट्ठा-मजाक चलता है। यह देखना यकीनन मेरे लिए अद्भुत था कि किस तरह से कीम से घेंगटी, घेंगटी से पाकोईपाकोई से सूर (शराब) बनाई जाती है। यह एक रोटी से तीन हिस्सों में बदलती हुई आखिरकार एक चमकीले सफेद द्रव्य की सूर शराब के रूप में जब कांसे-पीतल की गोल थालीनुमा कटोरियों में परोसी जा रही थी व एक साथ सभी कटोरे होंठों को छू रहे थे, तब उसकी रंगत देखते ही बनती थी। 20 गते भाद्रपद मास में आयोजित इस मेले ने बाकी क्षेत्र में तो दम तोड़ दिया है लेकिन हाजादसेऊ गांव ने अपनी पुरातन परम्परा को ज्यों का त्यों संजोए रखा है।

इस लोक परम्परा से जुड़े लोक त्यौहार पर इसी क्षेत्र की बेटी डॉ लीला चौहान द्वारा यह खूबसूरत लेख लिखा गया है:-

किम्वोणा (क़ीमावाणा)…. जौनसार बावर क्षेत्र का जड़ी बूटियों से बनाई जाने वाली शराब का त्यौहार।

(डॉ लीला चौहान)

“दस्तूर उल अमल”  व “वाजिब उल अर्ज 1883 ई0”  दो ऐसे पुराने शासकीय दस्तावेज थे जिनका जौनसार बावर में भूमि सुधार और रीति-रिवाज़ के लिए प्रयोग किया जाता था। यहां के लोग अपने सेवन के लिए सूर (शराब) भी बना सकते थे यह इन्हीं दस्तावेजों का आधार था।जिसमें (लगभग दो लीटर कच्ची शराब) अपने साथ लेकर भी चल सकते थे।

इसी रीति रिवाजों को मध्यनजर रखते हुए आज भी एक्साइज़ मैनुअल ऑफ जौनसार बावर के 39 खतों (पट्टियों) में से सिर्फ एक खत व्यास नहरी (कालसी का आस पास का क्षेत्र) में लागू है। व्यास नहरी में इसलिए लागू था क्योंकि यह हमेशा से बाहरी लोगों का गढ़ रहा है यहां से चीन, तिब्बत के लिए व्यापार होता रहा।

जौनसार- बावर के अधिकतर क्षेत्र में 20 गत्ते भादों (सितंबर) में कीमवाणा (Method of Yeast preparation used for alcohol preparation) त्योहार के रूप मनाया जाता है। मानसून के भादों महीने में जब सारी वनस्पतियाँ हरी भरी होती है उस समय समस्त गांववासी जंगल से लगभग बीस पच्चीस प्रकार की जड़ी बूटियां व हरी पत्तियां (टिमरू) टहनियां, कई प्रकार जड़ें आदि लाते है। फिर इनको छोटे छोटे टुकड़ो में काटकर ओखली में कूटते, उस से निकलने वाले रस को जौ, मड़ुवा आदि के आटे के साथ गूंथा जाता है, इसकी मोटी-मोटी रोटी बनाकर अंधेरे कमरे में पराल, चीड़ की पतियाँ या भांग पत्तियों के अंदर सुखाने के लिए बंद और अंधेरे कमरे में रख दी जाती है। आठ से दस दिन के दौरान यीस्ट डेवलप हो जाता। उसको धूप में सुखाया जाता है, ताकि ख़राब न हो और इसका इस्तेमाल पूरे साल भर सकें ।

सूर बनाने की दो विधियाँ है। एक वाष्पीकरण (distillation) और बिना वाष्पीकरण जिसको गिंगठी और पाकोई कहते है।

शराब बनाने के लिए मँड़ुवा, चौलाई, जौ आदि के आटे से रोटी बनाई जाती है। इसको बड़े घड़े में पानी में डाल देते है। साथ में बनाई गई कीम (यीस्ट) मिला देते है। उपलब्धता के अनुसार शहद का छत्ता, गुड़, कद्दू, सेब, चुल्लू आदि को भी मिला दिया जाता है। कीम (Yeast work as a catalyst) जिसका मुख्य कार्य कार्बोहाइड्रट को तेज केमिकल रिएक्शन के साथ ब्रेक करके एल्कोहल एवं कार्बन डाइआक्साइड में कन्वर्ट कर देना होता, चार पाँच दिन की प्रक्रिया के बाद अगर उसका वाष्पीकरण (distillation) कर के ऐल्कहॉल को अलग करते है उसको लोकल भाषा में सुर (शराब) कहते है जिसमें एल्कोहल की मात्रा लगभग 35 से 40 प्रतिशत होती है। अगर इसी को 10-15 दिन तक बंद घड़े में रख देते है और बीच-बीच में हिलाते हैं तो इसको घेंगटी (गिंगटी) कहते हैं। यह मुख्यत Semi liquid होता है। अगर इसी को आगे तीन चार महीने के लिए घड़े में बंद कर देते उसके बाद (Sedimentation process) के तहत अधिकतर ठोस पदार्थ नीचे बैठ जाता है और क्लीन द्रव ऊपर रहता उसको अलग कर देते है जिसे की पाकोई कहते है।

घेंगटी जिसे गिंगटी भी बोला जाता है और पाकोई अक्सर शरीर के लिए लाभदायक मानी जाती थी। हालांकि इसका कोई प्रमाणिक स्रोत नहीं है। इसमें एल्कोहल की मात्रा लगभग 12- 15 प्रतिशत होती है। जो विभिन्न प्रकार की शुद्ध जड़ी बूटी से तैयार होती है। मान्यताओं के अनुसार इसके कई फ़ायदे भी बताए जाते है। क्षेत्र में चिकित्सा विज्ञान जब ना के बराबर थी तब यह निश्चित मात्रा में दवाई के रूप में भी प्रयोग की जाती थी। यह वीडियो इसी कीमवाणा का है जिसमें समस्त गांववासी मिलकर बड़े हर्ष उल्लास से इस कार्य को एक त्योहार के रूप में मना रहे है।

नोट:- शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तथा समाज के लिए एक अभिशाप है लेकिन पोस्ट लिखने का एक कारण यह है कि इसकी प्राचीन,प्राकृतिक तथा केमिकल मुक्त विधि को जान सकें। साथ ही मेडिकल साइंस में भी कई दवाइयां, इंजेक्शन एल्कोहल युक्त रहते हैं इसलिए इस विधि से निकले द्रव्य को यदि बीमारियों के उपचारों हेतु उपयोग किया जाता था तब उन जड़ी, बूटियों पर भी शोध की आवश्यकता है।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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