सल्लाम आले कुम “ढोल-सागर” में शामिल कर एक नया शोध लेकर आए केशव दास अनुरागी …
- म्यारा मियां रतना जी सल्लाम वाले कुम
तेरी वों बीवी फातिमा सल्लाम वाले कुम…
(मनोज इष्टवाल)
क्या यह सम्भव हो सकता है कि ढोल सागर के ज्ञाता स्व. केशव दास अनुरागी ने सन् 1958 से पहले अपनी अप्रकाशित पुस्तक ‘नाद नंदिनी’ की पाण्डुलिपि लिख लिया था , जिसका प्रकाशन सन् 1996 में उनके मरणोंपरान्त किया गया? अगर उन्होंने यह पुस्तक 29 बर्ष की उम्र में लिख ली थी तब उन्होंने इसका प्राक्कथन 13-08-91 में क्यों लिखा? वहीँ डॉ शिवानन्द नौटियाल ने दीपावली के दिन 14 नवम्बर 1993 प्रस्तावना व कुमार गंधर्व ने 25-08-1958 को इसका आमुख!
ऐसा दावा किया जाता है कि “नाद नंदिनी” की भूमिका कुमार गंदर्भ ने सन् 1958 में लिखी। तो क्या केशव दास अनुरागी जी 29 बर्ष की अवस्था में ही ढोल सागर की सैदवाली अर्थात ‘सल्लाम आले कुम’ का मिश्रण कर गए थे? अगर ऐसा था तब वृहद् ढोल सागर में पंडित भवानी दत्त धस्माना ग्राम-बग्याली पौड़ी गढवाल भारत प्रिंटिंग प्रेस से संवत 1983 अर्थात सन् 1926 सिर्फ सात पेज (पांडुलिपि के 16 पेज) व सात अध्याय, वहीँ पंडित ब्रह्मानन्द थपलियाल ग्राम- खैड़, पट्टी- मवालस्यूं , पौड़ी गढवाल द्वारा प्रबुद्ध साहित्यकार अबोधबन्धु बहुगुणा के अनुसार सन् 1913 व मोहनलाल बाबुलकर के अनुसार सन् 1932 में पंडित ब्रह्मानन्द थपलियाल ने पौड़ी में अपनी प्रिंटिंग प्रेस बदरीकेदारेश्वर प्रेस में छापा था, जिसका उल्लेख डॉ. शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ द्वारा वीरगाथा प्रकाशन से छापी गयी अपनी पुस्तक ढोल सागर संग्रह में किया है। यह आश्चर्य की बात है कि केशव दास अनुरागी द्वारा लिखी गयी ढोल सागर में सैदवाली अर्थात ‘सल्लाम आलेकुम’ का न जिक्र पंडित ब्रह्मा नन्द थपलियाल और ना ही पंडित भवानी दत्त धस्माना ने अपनी ढोल सागर पुस्तिका में किया है और न ही ढोल सागर के मर्मज्ञ खेगदास, ओंकारदास (ढोलसागर) व प्रेम लाल भट्ट (दमौ सागर) द्वारा अपनी पुस्तकों में सैदवाली को प्राथमिकता दी है।
क्यों केशव दास अनुरागी के अलावा अन्य विद्वानों ने इसे अपने ढोल सागर में स्थान नहीं दिया? क्यों प्रेम लाल भट्ट ने अपने दमौ-सागर में इसे अछूता रखा? आखिर ऐसा क्या हुआ होगा कि उनके स्वर्ग सिधारने के पश्चात उनकी पांडुलिपि “नाद नंदिनी” का प्रकाशन सन् 1996 में डॉ शिवानंद नौटियाल के माध्यम से विश्व् प्रकाशन, 18 मदन मोहन मालवीय मार्ग लखनऊ व अंसारी रोड दरियागंज दिल्ली से प्रकाशित गया था? आखिर ऐसा क्या हुआ कि ढोल सागर के मर्मज्ञ स्व. केशव अनुरागी की पुस्तक 38 बर्ष बाद प्रकाशित हुई ? क्या यही कारण रहा होगा कि आम बुद्धिजीवी ढोल सागर को अधूरा मानते रहे और कल्पना करते रहे कि इसका दूसरा भाग प्रकाशित हुआ ही नहीं? क्या उसके पीछे केशव दास अनुरागी द्वारा अपने ढोल सागर में प्रस्तुत की गयी “सैदवाली” अर्थात ‘सल्लाम वाले कुम’ का प्रयोग रहा होगा? जिसे अक्सर ड़ोंर व थाली में जागरी कुछ ऐसा गाते हैं :-
‘सल्लाम आले कुम’ ऐसे जादा जी ..तेरी तीन टांग घोड़ी,‘सल्लाम वाले कुम’
बरछी वाले जवान ‘सल्लाम वाले कुम’, तेरी रेशमी पगड़ी ‘सल्लाम आले कुम’
अरे नजियाबाद मंडी ‘सल्लाम आलेकुम’
मेरा व्यक्तिगत आंकलन यह कहता है कि “जब केशव अनुरागी जी ने यह पुस्तक सन् 1958 में अपने इस नए प्रयोग के साथ लिखी होगी तब पूर्व ढोल सागर के लेखकों व बुद्धिजीवियों ने सैदवाली को ढोल सागर में शामिल करने पर आपत्ति जताई होगी क्योंकि उस दौर में जाति व वर्ण व्यवस्था ही कुछ ऐसी थी कि ‘छोटी जाति’ का व्यक्ति ऐसा सहस कर कैसे सकता है! यह आमजन की भावना में शामिल रहा होगा। क्योंकि भला एक किताब के प्रकाशन में कोई व्यक्ति 38 बर्ष तक चुप कैसे बैठ सकता है? वह वह किताब प्रकाशित भी तब होती है जब वे इस लोक में नहीं रहे।
अगर आप केशव अनुरागी द्वारा लिखित “नाद-नंदिनी” को पढेंगे तो पायेंगे कि इसमें ढोल सागर में पार्वती व शिव संवाद (ईश्वरोवाच) के रूप में लिखा गया ग्रंथ है। इस ग्रंथ के प्रथम भाग में सृष्टि की उत्पत्ति का विशद वर्णन मिलता है। दूसरे भाग में ढोल का वर्णन, उसकी उत्पत्ति तथा उसे बजाने की कला का प्रभावशाली वर्णन है। अनुरागी ने अपने ताऊ जी से ढोल-दमाऊं बजाना सीखा था। अनुरागी ने गढ़वाली लोक गीतों की स्वर-लिपियां बनाईं और उनका लोक-शास्त्रीय अध्ययन किया। यह काम लोक संगीत को दस्तावेज़ी शास्त्र का दर्ज़ा देने जैसा है। उन्होंने लखनऊ में गढ़वाल संस्था के कुछ कार्यक्रमों में उन्होंने ढोल वादन पेश किया था, व आकाशवाणी कार्यक्रम में भी ढोल वादन प्रस्तुत किया था। उनके नजदीकी रहे मित्रों का तो यह तक कहना है कि उन्होंने स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस से सबंधित कुछ कार्यक्रमों के दौरान दिल्ली में भी उन्होंने ढोल-वादन की प्रस्तुतियां दी थीं, जिनका आधार ढोल सागर ही था। पान का बीड़ा मुंह में दबाये केशव अनुरागी जी से मेरी मुलाक़ात सन् 1988 में लखनऊ दूरदर्शन के कार्यक्रम अधिकारी टी.बी. सिंह ने करवाई थी। (विस्तृत लेख ढ़ोल सागर शोध प्रबंध व पत्रिकाओं के लिए संरक्षित)
ढोल सागर में सैदवाली का प्रयोग
“हिंदुस्तान” अखबार के सम्पादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी लिखते हैं कि “सैदवाली ढोल सागर का एक अनूठा प्रयोग हुआ होगा जिसके बारे में अनुरागी जी ने ‘नाद नंदिनी’ में बताया है- “जागरों में देवी-देवताओं के गीतों के अतिरिक्त हन्त्या अथवा घरभूतों के गीत (मृतात्मा की स्मृति में गाये जाने वाले गीत) सय्यदों की सैद्वानी यानी सय्यद-वाणी सम्मिलित है। सैद्वानी मुसलमानी पीर-पैगम्बर को रिझाने के लिए प्रस्तुत की जाती है इसकी भाषा में फारसी शब्दावली का अधिक प्रभाव होता है अथवा यह उर्दू मिश्रित गढ़वाली होती है। गायन की शैली भी कव्वाली जैसी होती है।” ढोल में आज भी अनुरागी जी के स्वर में गमकते हैं।
सल्लाम वाले कुम
त्यारा भैs गौड़ गाजिना, सल्लाम वाले कुम
म्यारा मियां रतना गाज़ी, सल्लाम वाले कुम
तेरी वो बीवी फातिमा, सल्लाम वाले कुम…
केशव ‘अनुरागी’ का स्मरण होते ही कानों में सम्मोहित कर देने वाला अद्भुत यह गायन गूंजने लगता है।
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी लिखते हैं – मैं उनके पीछे पड़ा रहता- ‘अनुरागी जी, अपना काम पूरा करिए, ढोल सागर पर काम होना ही चाहिए। वे गरदन हिलाते और ‘हां-हां’ कह कर टाल जाते। उनके मुंह में हमेशा पान का बीड़ा भरा रहता। अक्सर घुटकी भी लगी रहती । मैं उनके घर आने की ज़िद करता, वे टाल जाते, बहाना बनाते। एक बार मैं ज़िद करके उनके घर पहुंच गया। वे अत्यंत सादगी से रहते थे और खूब अव्यवस्थित भी। मेरी रट थी कि आप ढोल सागर पर लिखो, दिक्कत हो तो आप बोलो और मैं लिखता चलूंगा। मेरी ज़िद देख कर उन्होंने एक बक्से से निकाल कर करीब 40-50 पन्ने मुझे पकड़ा दिये। मुझे अपने घर से ज़ल्दी चलता करने के लिए ही शायद।
- गढ़वाल में इस तरह नचाये जाते हैं मुसलमानों के पश्वा
म्यारा मियां रतना जी सल्लाम वाले कुम
तेरी वों बीवी फातिमा सल्लाम वाले कुम…
अपने फेसबुक पोस्ट में एक विडिओ शेयर कर हिमांशु लिखते हैं – ‘सैद्वाली मंत्री पर उत्तराखंड के पहाड़ के एक गांव में नाचती यह महिला कोई मुश्लिम नहीं है बल्कि यह हिन्दू है। दरअसल इस पर सैयद नाच रहा है, और इसे नचाने वाला भी हिंदू ही है। मुसलमानी भूत प्रेतों कों सैद या सैय्यद कहा जाता है। इनसे छुटकारा पाने के लिए सैद्वाली मंत्र बोलें जाते है। ये मंत्र साबरी ग्रंथ में लिखें गए है, जो अक्सर दलितों के पास मिलते है। सैद्वाली में तुर्कनी के पुत्र वीर मैमंदा यानि मुहम्मद का आह्वान है। मैमंदा मुसलमान देवता है जो दास शिल्पकारों के पूज्य देवता है। इन्हें भूत, प्रेत, छ्ल, छिद्र अनिष्टकारी शक्तियों से मुक्ति दिलाने वाला देवता माना जाता है।
‘नाद नंदिनी’ का लोकार्पण
विगत दिवस दून पुस्तकालय में फिर 30 बर्ष पश्चात उनके पुत्र डॉ अनुरागी व उनके चचेरे भाई अनिल भारती व परिजनों के सौजन्य से ‘नाद नंदिनी’ का पुन: लोकार्पण कालजयी गीतकार व लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी, धाद सामाजिक संस्था के संस्थापक लोकेश नवानी, लोक संस्कृतिधर्मी व साहित्यकार पद्मश्री डॉ माधुरी बड़थ्वाल, लेखक एवं साहित्यकार डॉ योगेश धस्माना, वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा एवं राजनीतिक समीक्षक रमेश रतूड़ी द्वारा किया गया।
इस दौरान ढ़ोल सागर के ज्ञाता स्व. केशव दास अनुरागी के कृतित्व व जीवन शैली पर लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने कहा कि नाद नंदिनी को छापने का एक प्रयास हमने भी किया था। सन 1982-83 में उन्होंने व गढ़वाल सभा देहरादून के अध्यक्ष रोशन धस्माना व अन्य मित्र केशव दास अनुरागी के आवास पर गए थे, तब तक उनका स्वास्थ्य बेहद खराब था। नेगी कहते हैं कि उन्होंने केशव दास अनुरागी जी से उनके द्वारा लिखे ढ़ोल सागर को छापने के गुजारिश की थी लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया था। वे सब निराश लौट आये। इसके अलावा भी लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी उनके साथ की कई खट्टी-मीठी यादें ताजा की। नरेन्द्र सिंह नेगी बताते हैं कि 1981-82 में घर आये थे केशव अनुरागी जी। स्व. अनुरागी जी को ही मुझे आकाशवाणी से जोड़ने का श्रेय जाता है। सन 1976 में वह जब झंकार क्लब लैंसडाउन में तबला बजाते थे तब रियाज के दौरान उन्होंने अनुरागी जी को उनके कहने पर ‘धगुला झंवरा छणमणांद, रमझम कौथिग जांद…गीत सुनाया था और अगले दिन उन्होंने मुझे आकाशवाणी नजीबाबाद बुलाकर मुझे आकाशवाणी का कैजुअल आर्टिस्ट बना दिया।
(लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ स्व. केशव दास अनुरागी के जेष्ठ पुत्र डॉ. अनुरागी)
डॉ माधुरी बड़थ्वाल जोकि केशव दास अनुरागी को चाचाजी संबोधन से पुकारती हैं, भावुक होकर उनके कई किस्से साझा करती हुई उनके उन शराबी दोस्तों को कोसती हैं, जिन्होंने उन्हें इसकी लत्त लगाई। वह बेहद भावुक होकर कहती हैं कि ‘ एक दिन चाचाजी ने तब उनके पुत्र की सभी किताबें फूंक दी जब उसके इंटर के पेपर चल रहे थे, लेकिन तब भी उनके बेटे ने बहुत अच्छे नंबरों से इंटर पास कर किया और आगे चलकर डॉक्टर बने।’
वरिष्ठ पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा स्व अनुरागी को वादन कला में अपने पिता मानते हैं। वह कहते हैं ‘कुमार गंदर्व को वे अपना गुरु मानते थे। लेकिन उनका शिष्युता एकलब्य जैसा था।’
वहीं धाद सामाजिक संस्था के संस्थापक लोकेश नवानी कहते हैं कि ‘केशव अनुरागी उत्तराखंडी संगीत के पिता थे। अपनी एक शानदार कविता को स्व. अनुरागी को समर्पित करते हुए वह लिखते हैं कि ‘मैं उन लोगों में शामिल हूँ जिन्होंने केशव अनुरागी को मारा। उन्होंने उन्हें ठेले पर खूब पिलाई लेकिन घर में कभी चाय पर आमंत्रित नहीं किया।’
डॉ योगेश धस्माना उनके कृतित्व पर प्रकाश ड़ालते हुए कहते हैं कि ‘ केशव अनुरागी द्वारा ‘झाँवरी बिगरेली खुट्यूँ की भाग्यनी बाजली तेरी झांवरी… पहली बार ग्रामोफ़ोन पर यह गीत सन् 1949 में स्व लोकगायक जीत सिंह नेगी जी के साथ गाया गया।’
(लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ स्व. केशव दास अनुरागी के भतीजे कार्यक्रम प्रमुख दूरदर्शन देहरादून अनिल भारती व उनकी अर्धागनी)
ज्ञात हो कि गंधर्व ने स्व. अनुरागी की पुस्तक ‘नाद नंदिनी’ की ढाई पन्ने की भूमिका बहुत गद-गद हो कर लिखी है- “मैंने नाद-नंदिनी के कथ्य का तन्मयता से अनुशीलन किया है। इस श्लाघनीय रचना के माध्यम से लेखक ने पहाड़ की लोक-आत्मा के पावन संदेश को गढ़वाल की गिरि-कंदराओं में ही गूंजता न छोड़कर भारत के सुदूर कोनों तक भेजने का प्रयास किया है… मुझे आशा है कि नान-नंदिनी का गढ़वाल ही क्यों, इतर प्रदेशों के जिज्ञासु जन भी हृदय से स्वागत करेंगे।”
पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ शिवानंद नौटियाल ने लिखा है कि “केशव अनुरागी का शिक्षा ग्रहण का तरीका एकलव्य जैसा था। कुमार गंधर्व की कला से प्रेरणा लेकर अनुरागी ने गढ़वाली लोक संगीत कुमार गंधर्व की शैली में सीखने का प्रयास किया। जब वे कुमार गंधर्व से मिले तो कुमार गंधर्व ने गढ़वाली लोक-संगीत की उनकी विशेष जानकारी को समझा और अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। ”कुमार गंधर्व ने “नाद नंदिनी” की जैसी भूमिका लिखी है उससे स्पष्ट हो जाता है कि वे केशव अनुरागी की प्रतिभा से कितना प्रभावित थे।
मेरे ढ़ोल व ढोली समाज पर व्यापक शोध पर एक चौँकाने वाली बात जो सामने आई वही शायद ऐसी वजह रही जिसने स्व. केशव दास अनुरागी के जीवित रहते ‘नाद नंदिनी’ को नहीं छपने दिया। हो सकता है यह सिर्फ बुजुर्गों का भ्रम रहा हो लेकिन इसे नकारा नहीं जा सकता क्योंकि ज्यादात्तर का यही मानना है कि ‘नाद-नंदिनी’ में सैदवाली का प्रयोग करने पर उस दौर के कई बुद्धिजीवी सवर्ण समाज ने उनका विरोध किया और इसे ढ़ोल सागर से छेड़छाड़ बताया। लेकिन सच यह है कि डोंर थाली पर बजने वाली “सैदवाली” को ढ़ोल के वृत्त में शामिल करना स्व. अनुरागी का एक अद्भुत प्रयोग कहा जा सकता है। कई का कहना है कि ढ़ोल सागर पर रात दिन एक कर देने पर जब उन्हें उपेक्षाओं का शिकार होना पड़ा तब उन्होंने आमजन से ज्यादा मोहब्बत साकी और शराब से करनी शुरु कर दी। उनके जिद्दी स्वभाव के कारण ही उनके जिंदा रहते ढ़ोल सागर या नाद नंदिनी का प्रकाशन नहीं हो पाया जबकि इसके कई अंश छाया नट नामक पत्रिका में छपते रहे।
मैं भी स्वयं नवीन जोशी की बात का समर्थन करते हुए कहना चाहूंगा “हां, अनुरागी जी में कुंठाएं थीं और उनका कारण हमारा यह समाज है। समाज में मिलते अपमान के बदले ढोल को इस तरह बजाते रहे कि उसे पी गये, उसे घोट लिया, वे उसके तालों-स्वरों में समा गए। ढोल से उन्होंने मुहब्बत की और उसी से अपना विद्रोह भी गुंजायमान किया।
हां, बजाते-बजाते अनुरागी जी खुद ढोल के भीतर चले जाते। वहां उनका अपना राज था जहां कोई अपमान, कोई सामाजिक उपेक्षा और कटूक्तियां नहीं थी। वहां सुरों, तालों और धुनों की परम मानवीय दुनिया थी। वहां सिर्फ संगीत था जो मनुष्यों में कोई भेद करना नहीं जानता। वे बोलने में हमेशा संकोच करते थे, घुटकी लगी होने पर भी खुल कर बोल नहीं पाते थे। ढोल ही था जो उन्हें और उनके ज्ञान को सर्वाधिक मुखर करता था, गुंजा देता उन्हें ढोल।
मुझे लगता है कि ढोल और ढोल सागर को जानने समझने के लिए ये दो वार्तालाप ही बहुत हैं, फिर भी कई विद्वत्त जनों का मत है की ढोल सागर दो भागों में है! मैं उनके इस संशय को दूर कर देना चाहता हूँ एवं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ढोल सागर के दो भाग जो कहे जाते हैं वह और कुछ नहीं अपितु इसमें ढोल सागर के मर्मज्ञ ज्ञाता केशव अनुरागी जी का शोध सैदवाली/सैद्वानी है, जिसे ढोल सागर में शामिल किया गया है। साथ ही उन्होंने ढोल सागर के वर्णन को व्यापकता देते हुए इसमें ताल छंद इत्यादि का वृहद वर्णन किया है जिसकी वादन कला तो हमारे मर्मज्ञ ढोली जानते हैं लेकिन उसे शास्त्रीय हिसाब से नहीं जान पाते।
ऐसे ढोल सागर के मर्मज्ञ ज्ञाता स्व. केशव दास अनुरागी जी को प्रणाम व सल्लाम वालेकुम
(बाकी बहुत कुछ मेरी पुस्तक के लिए संग्रहित है)




