(मनोज इष्टवाल)
तू सचमुच हीरो है रे राम सिंह पंवार…! राम सिंह पंवार की जगह वो फ़िल्म वाला पान सिंह तोमर बोलूं या फिर भाग मिल्खा भाग..! तो अच्छा होगा। भाई तू खाकर क्या पैदा हुआ था। इस महामारी में जब देखा दिल्ली में अब गुजारा नहीं हो सकता तो तूने झोला उठाया व चल दिया पैदल-पैदल दिल्ली से गांव की ओर…!
यह बिहार के मजदूरों के जलूस से बिल्कुल अलग कहानी है। यह इतना पैदल चला कैसे। रास्ते में सब दुकानें बंद। कहाँ-कहाँ कैसे रातें गुजारी होंगी ईश्वर जाने। लेकिन ये शेर का बच्चा आखिर पहुंच ही गया पट्टी पालकोट के लसेर गांव।
टिहरी गढ़वाल के लसेर गांव पैदल चलकर यह निहाल तो हुआ होगा। लेकिन कहाँ इसकी मस्तियों में आपको ऐसा लग रहा है कि यह पैदल यात्रा के बाद अपने गांव के स्कूल में क्वारनटाइन है। यह अकेला शख्स है जो स्कूल में क्वारनटाइन है। कहता है वह अकेले भी अपना खूब मनोरंजन कर रहा है।
ग्राम प्रधान बबिता रावत की प्रशंसा करते नहीं थकता। राम सिंह पंवार कहता है कि उसके पास ग्राम प्रधान एक शानदार स्पीकर डेक व माइक छोड़कर गया है। रहने के लिए स्कूल में बेहतरीन प्रबंध हैं व खाने के लिये दो अंडे रोज मिल रहे हैं। मेरे ऐश हो रखे हैं।
राम सिंह जब मन करता है किसी भी कलाकार के गीत के साथ अपनी आवाज मिलाकर अभिनय करता तो कभी जमकर नृत्य कर रहा है। मैं तो हैरत में हूँ कि दिल्ली से लगभग 400 किमी पैदल यात्रा करने वाला यह शख्स आखिर यह सब कर कैसे रहा है।
बहरहाल ग्राम प्रधान ने जिस तरह की ब्यवस्थाएँ की ही वह अजब गजब की है, जिस स्कूल में राम सिंह की व्यवस्था की गई है वह स्कूल यकीनन लग नहीं रहा है कि कोई पहाड़ का सरकारी स्कूल होगा। स्वाभाविक सी बात है कि इस स्कूल की साजोसज्जा को बनाये रखने के लिए यहां के प्रधानाध्यापक/प्रधानाचार्य व अन्य स्टाफ बड़ी शिद्दत से इसकी मजोमत्त करते होंगे। ऐसी ग्राम सभा, ऐसे ग्राम प्रधान व ऐसे स्कूल व उनके स्टाफ को हैट्स ऑफ।
आइये आप भी देखिये राम सिंह पंवार की रंगत:-
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