क्या वर्तमान में भी जिंदा बची है “खुद…?”
(मनोज इष्टवाल)
शब्द बहुत छोटा है लेकिन इसने जाने कितने युगों को जिया है। चाहे वह प्रदेश में रहकर गांव की हो या फिर प्रियसी मिलन को लेकर हो। खुद हमेशा एक सी ही होती है,लेकिन खुद स्त्री लिंग या पुलिंग नहीं फिर भी यह स्त्रियों पर यानि महिलाओं पर ज्यादा लागू समझी जाती है।
वर्तमान में भौतिकी युग में खुद की परिभाषा शायद अंतिम चरण में है क्योंकि अब “खुद” किसी को लगती हो यह कहना जरा सम्भव सा नहीं दिखता। खुद को व्यापकता महिलाओं ने व गीतों ने दी है।लोक में खुद को जितना विस्तार मिला है वह कहीं नहीं है।
“खुद” का भावार्थ जानने के लिए हमें खुद को खुद में महसूस करना होगा तभी हम इसके विस्तार की बात समझ या कह पाएंगे। खुद को हम किसी की याद कहकर छोटा नहीं बना सकते क्योंकि हम “याद आ रही है, तेरी याद आ रही है। याद आने से , तेरे जाने से जान जा रही है।” जैसे विरह गीत में बांधकर नहीं रख सकते क्योंकि खुद स्वयं में बहुत बड़ा आभामण्डल लिए हुए है। अगर खुद की को हम साधारणतः परिभाषित करने की बात करें तब मेरे शब्दों में “खुद स्वयं में एक व्यापक आभामण्डल लिए ऐसा शब्द है जो किसी प्रिय व्यक्ति, वस्तु, स्थान, प्राणी व कल्पना संसार के भूतकाल को आंखों में जीवित कर उसे हृदय उदगारों में तब्दील कर स्वांसों, सांसों व यादों के बबंडर में उलझाता हुआ सुदूर होते हुए भी बंद या खुली आंखों का ऐसा सपना है जो तड़प ही पैदा नहीं करता बल्कि भावनाओं में ऐसी अभिभूति पैदा करता है जिससे हृदय की उत्कंठाएँ जीवित हो उठती हैं और अक्सर आंसू बनकर आपके दिल को हल्का करती हैं।”
खुद को गढ़वाल के संदर्भ में अगर लिया जाय तो यहां खुदेड गीतों, विरह गीतों व प्रणय गीतों में ब्यापक स्थान मिला है। भारतबर्ष के संदर्भ में या हिंदी जे सन्दर्भ में विरह पीड़ा “खुद” का एक चोला हो सकता है लेकिन खुद सा व्यापक कदापि नहीं। सम्भवतः नारी शक्ति को पीड़ा सहने की जितनी शक्ति प्रकृति प्रदत्त है वह सब “खुद” में समाहित होकर लोकगीतों में माध्यम से हर काल में उनके मुंह से फूटकर लोक समाज में फैले हैं। अब चाहे बेटी विवाह रस्म की विदाई में फूट-फूटकर रोई हो या फिर मायके व भाई बहनों की याद में। राजा भर्तृहरि के शब्दों को हम अगर महिलाओं के स्वभाव में चारित्रिक स्वरूप में ढालें तो वे एक पुरुष के मरने पर इस खुद को कुछ ऐसे परिभाषित करते हैं:-
माता रोये जनम जनम को, बैणी रोये चौमासा।
त्रिया रोये डेढ़ घड़ी को, आन करे घर बासा।।
खुद की व्यापकता का बर्णन जितना पहाड़ी परिवेश के गीतों में मिलता है उतना कहीं और होगा इसकी सम्भावनाएं कम दिखती हैं। संसार भर के पहाड़ी प्रदेशों में कठिन परिस्थियों के बीच जीने की कला में जो लोक व्याप्त है वह मैदानी भू-भागों की आम जिंदगी में नहीं दिखता। जहां तक गढ़वाल क्षेत्र में खुद की व्यापकता का समावेश है तो यहां हर प्राणी, वस्तु स्थान, व उपादान में समाहित है। महिलाएं इस खुद की जननी मानी जाती हैं। यही कारण हैं कि आज भी गढ़वाली समाज के लोकगीतों में निकले बहे सुर यहां के लोकसमाज में हैं जैसे:-
घणी कुलायूँ तुम छांटू व्हावा, मी थैन मेरा मैताकू डांडु देखणी दया।।
या-
हे कुएडी तू छांटी व्हे जा…….!
ऐसे ही शब्द भजन सिंह “सिंह” ने महिलाओं की खुद के उजागर किये हैं- “बौडी बौडी ऐग्ये ब्वे, देख पूष मैना। गौं की बेटी ब्वारी ब्वे, मैतू चली ग्येना। मैतुड़ा बुलाली ब्वे, बोई होली जौँकि, मेरी जिकुड़ी ब्वे कुएडी सी लौंकी।।
वहीं अन्य लोकगीतों में भी खुद का व्यापक बर्णन मिलता है जैसे-
घुघुती घुरौंण लगी मेरा मैताकि….! तिबारी म बैठ्यां होला बाबा जी उदास, बाटू हैरिणी होली माँ लगी होली साsस। कब मेरा मैती औजी, दिशा भेंट आला, कब मेरा भैs बैणयूँ की राजी खुशी द्याला।
…
माँ का हत्त लगदी नि होली धाणी, मन की मन मा कन रै ग्येनी गाणी।
ऐ ग्ये होली हरियाळी बार डाली डाली, तेरी लाडी व्हे ग्ये मांजी , भाड़ की मुछयाली।।
….
बारा ऐनी बग्वाली म्यारा माधौ सिंगा, सोला ऐनी श्राद माधौ सिंगा, मेरु माधु नि आयी माधौ सिंगा…..!
….
जौँको होलो भाई रीत जाणलो झुमैलो, मेरो बाबा बुढया बिरध झुमैलो।
मेरी बोई स्वर्ग की बासी झुमैलो, माँ का बिना मैत कख झुमैलो।
फूलूँ का बिना चैत जन झुमैलो, निरमैत्या ध्याणी दणमण रवेळी झुमैलो।।
………
ऐसे सैकड़ों गीत झुमैलो के रूप में प्रचलित हैं । लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने ऐसे दर्जनों गीत लिखे हैं जो वस्तु, व्यक्ति व प्राणी की खुद से सम्बंधित हैं जैसे-
वस्तु:-
हे जी सार्यूं म फूली ग्ये होलि फ्योंली-लएडी मी घोर छोड़यावा।
हे जी घर बौडू व्हे ग्ये होलो बालो बसन्त मी घोर छोड्यावा।।
व्यक्ति-
कन लड़िक बिगड़ी म्यारु ब्वारी कैरिकी, कैमा लगानैन छवी अपड़ी खैरी की……
…
मेलु घिंघोरा की दाणी खैजा, छवावा दूँल्युंकु पाणी पेजा।
…..
तेरी खुद तेरु ख्याल, तेरु समलौणया रुमाल, सारि जिंदगी भरो कमयूं ई च माल ताल मेरो ई च माल ताल।।
प्राणी-
मनु आणान सैंत्या गोर, कुकुर भी घुरौणा छन।
रयां राजी उ दगड्या भी जु मौल्यां घौ दुखाणा छन।।……
प्राणु से प्यारी मेरी तीलू बखरी…..!
ऐसे जाने कितने गीत जो लोकगीतों की श्रेणी में आये “खुद” को परिभाषित करते हैं। खुद एकमात्र ऐसा शब्द है जिसमें न लिंग भेद है न स्थान भेद । लेकिन इसे प्रायः स्त्रियों की बपौती के रूप में माना व समझा गया है। वर्तमान में अब यह महिलाओं से भी छिटककर दूर चला गया है क्योंकि अब वह समय गया जब महिलाएं ससुराल में भूखी प्यासी गरीबी में रहकर जीवन यापन करती थी। अब वह प्रीत भी गयी जब बेटियां ससुराल विदाई पर दहाड़े मारकर रोती थी और अब न वे मेले कौथिग ही रहे जहां अपनों से मिलकर वह अपनी खुद बिसराती थी। हां… खुद अब परिवर्तित जरूर हुई है क्योंकि अब खुद उन बाप दादाओं के पास पहुंच गई है , जिन्होने हाड़ तोड़ मेहनत कर पहाड़ों में खेत खलिहान आबाद किये। जिंदगी भर की कमाई लगाकर मकान बनाया और बेटे बहुओं ने मैदानी भागों में आकर सिर्फ दो या चार कमरों का मकान बनाकर गांव भुला दिया है। माँ दादी एक बार के लिए गांव याद भी कर लेगी लेकिन बहु तो बिल्कुल नहीं क्योंकि उसने अभाव नहीं देखे। उन खेतों में परिश्रम नहीं किया उन गोबर मिट्टी के मकानों में जीवन यापन नहीं किया जहां प्रेम प्यार की मीठी नीन्द्व गांव की माँ बहनों के साथ ठठ्ठा मजाक, झुमैलो, बाजूबंद इत्यादि नहीं लगाए। खुद बस नेगी जी के इस गीत की तरह रह गयी है कि- यूँ दानी आँखियूँ म छम छम पानी…

