Tuesday, March 5, 2024
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भारत की प्रथम महिला स्नातक देहरादून की चंद्रमुखी ममगाईं व उत्तराखंड की पहली महिला स्नातक महिला पौड़ी गढ़वाल के थापली गाँव की ललिता वैष्णव चंदोला।

◆ पंडित केशवानंद ममगाईं जी पहले गढ़वाली थे जिन्होंने 1878 में म्योर कॉलेज (अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय उस समय कलकत्ता से संबद्ध था) से स्नातक किया था।

◆ देहरादून की चंद्रमुखी बोस ममगाई देश की पहली स्नातक। 

◆ ललिता वैष्णव चंदोला उत्तराखंड मूल की पहली स्नातक या जै देवी घिल्डियाल?

माधुरी ममगाईं महाराजा नरेन्द्र शाह की ट्यूटर थीं।

(मनोज इष्टवाल) 

यह देवभूमि है हुजूर….। यहाँ शंकाएँ पैदा करना व्यर्थ है क्योंकि इसके हर कंकण-पत्थर के नीचे वह मिल जाता है जो अकल्पनीय है। मैने सोशल साइट फ़ेसबुक पर चंद्रमुखी ममगाई का फ़ोटो पोस्ट कर लिखा था कि “उत्तराखंड की पहली महिला स्नातक जिसने 1878  में स्नातक कर लिया था। कई मित्रों के अविश्वसनीय कमेंट आए लेकिन साहित्यविद्ध भीष्म कुकरेती जी द्वारा जब यह फ़ोटो शेयर की गयी व मुझे लिखा गया कि इस सम्बंध में लोगों की जिज्ञासा शांत कीजिए तो मुझे लगा यह मेरा दायित्व और कर्तव्य होना चाहिए कि मैं इस सब क़ा पटाक्षेप करूँ।

आपको बता दूँ कि चंद्रमुखी ममगाई सिर्फ़ उत्तराखंड की नहीं बल्कि पूरे भारत वर्ष की पहली स्नातक महिला हैं जिन्होंने 1878 में कलकत्ता विश्वविध्यालय के बेथ्यून कालेज में दाख़िला लिया लेकिन दैवयोग से उनका दाख़िला निरस्त हो गया व उन्हें यह उपाधि 1878 की जगह 1883 में यह उपाधि तब हासिल हुई जब कालेज को अपने नियम बदलने पड़े जबकि उन्होंने 1878 में स्नातक की परीक्षा पास कर ली थी। दरसल चंद्रमुखी हिंदू नहीं बल्कि ईसाई थीं। 1901 में उनका विवाह अपने सीनियर केशवानंद ममगाई जिन्होंने 1876 में स्नातक की उपाधि ले ली थी से हुई। जबकि उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के विकास खंड कल्जीखाल पट्टी कफ़ोलस्यूँ के थापली गाँव की श्रीमती ललिता वैष्णव चंदोला उत्तराखंड मूल की पहली ऐसी महिला हैं  जिन्हें1934 में स्नातक की उपाधि हासिल करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

चंद्रमुखी ममगाई का व्यक्तित्व। बनी दक्षिण एशिया में एक स्नातक शैक्षणिक प्रतिष्ठान की पहली महिला प्रमुख।

चंद्रमुखी बोस का जन्म 3 अगस्त, 1860 को बंगाली मूल क्रिश्चियन परिवार में देहरादून में हुआ था। ये मूल रूप से महानद बंगाल से सम्बन्धित थे। उनके पिताजी अमेरिकी प्रेस्बिटेरियन मिशन हाई स्कूल, देहरादून (अब CNI Mission Boys Inter College के रूप में जाना जाता है।) के हेडमास्टर थे। वह भारत की पहली और पहली दो महिला स्नातकों में से एक थीं जिन्होंने 1883 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के बेथ्यून कॉलेज से स्नातक की उपाधि धारण की थी।

1876 में वह बेथ्यून कालेज में प्रवेश करना चाहती थी, लेकिन गैर-हिंदू होने के कारण स्कूल ने स्वीकार नहीं किया। ज्ञात हो कि बैथ्यून स्कूल 7 मई, 1849 को जॉन इलियट ड्रिंकवाटर बेथ्यून द्वारा शुरू किया गया था, जो हिन्दु बालिकाओं की शिक्षा के लिए शुरू किया गया था। बेथ्यून स्कूल में एडमिशन न मिलने के कारण उन्होंने रेवरेंड अलेक्जेंडर डफ के फ्री चर्च इंस्टीट्यूशन (अब स्कॉटिश चर्च कॉलेज) में कला संकाय में भर्ती हुई। 1876 मे लिंग-भेद के विरूद्ध अलख जगाये जाने पर उन्हें कला संकाय परीक्षा के लिए बैठने की विशेष अनुमति दी गई थी। उस वर्ष परीक्षा में शामिल होने वाली एकमात्र लड़की के रूप में चंद्रमुखी को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ।

हालांकि विश्वविद्यालय को उनके परिणाम प्रकाशित करने से पहले कई बैठकें आयोजित की। कादम्बिनी गांगुली से पहले चंद्रमुखी बोस ने 1876 में अपनी प्रवेश परीक्षा पास कर दी थी, लेकिन विश्वविद्यालय ने उन्हें सफल उम्मीदवार के रूप में एडमिशन देने से मना कर दिया था। 1878 में विश्वविद्यालय के नियम बदलने के कारण उन्हें आगे की पढ़ाई करने की अनुमति मिल गई और 1882 में उन्होंने कादम्बिनी गांगुली के साथ कलकत्ता विश्वविद्यालय से कला में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1883 में विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान उनकी औपचारिक डिग्री सौंपी गई थी। इसके बाद वह कादम्बिनी गांगुली के साथ डिग्री पाठ्यक्रम के लिए बेथ्यून कॉलेज चली गई। अपनी स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद वह कलकत्ता विश्वविद्यालय से ब्रिटिश साम्राज्य में एम.ए. पास करने वाली एकमात्र और पहली महिला थीं। इसके लिए उन्हें ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने ‘कैसेल्स इलेस्ट्रेटेड शेक्सपियर’ की प्रति भेंट कर सम्मानित किया था।

1886 में उन्होंने बेथ्यून कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में करियर की शुरूआत की (यह कॉलेज उस तक बेथ्यून स्कूल का ही हिस्सा था)। कॉलेज 1888 में स्कूल से अलग हो गया था। आगे चलकर वे इसी कॉलेज की प्रिंसिपल बन गई, इस प्रकार वह दक्षिण एशिया में एक स्नातक शैक्षणिक प्रतिष्ठान की पहली महिला प्रमुख बन गई। प्रिंसिपल रहते इन्होंने बालिकाओं के लिए विज्ञान विषय प्रारम्भ करवाया। आज भी कलकत्ता विश्वविद्यालय का सांइस चंद्रमुखी ब्लॉक भवन नाम से जाना जाता है।

केशवानंद ममगाई से शादी के बाद कहलाई चंद्रमुखी ममगाई।

यह अजब ग़ज़ब संयोग कहा जा सकता है क्योंकि जिस दौर में लिंग-भेद व जातिवाद चरम पर हुआ करता था, उस दौर में भी कुछ ब्राह्मण कुल ऐसे हुए जिन्होंने बीसवीं सदी के शुरुआती दशक में अंतर्रजातीय विवाह कर नया इतिहास रच डाला इनमें 1901 में केशवानंद ममगाई द्वारा ईसाई मूल की चंद्रमुखी बोस से व मल्ला कसून अल्मोड़ा निवासी डेनियल पंत की पुत्री शीला आइरीन पंत ने  16 अप्रैल 1933 में मुज़फ़्फ़रनगर के लियाक़त अली खान से विवाह रचाया। ज्ञात होकि भारत विभाजन के बाद लियाक़त अलीखान पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने व शीला आइरीन पंत पाकिस्तान जाकर राना बेगम कहलाई।

चंद्रमुखी बोस ने 1891 में खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने सेवानिवृत्ति ले ली। 1901 में वह अस्वस्थता के कारण सेवानिवृत्ति लेकर पुनः देहरादून आ गयी। 11 अक्टूबर, 1901 को उन्होंने केशवानंद ममगाईं से शादी कर ली और शेष जीवन देहरादून में बिताया। चंद्रमुखी अपने अंतिम दिनों में बहुत कमजोर हो गई थी। उसके दो बच्चे थे। 3 फरवरी, 1944 को उनकी मृत्यु हो गई तथा उन्हें भारतीय ईसाई कब्रिस्तान चन्दननगर, देहरादून में दफनाया गया। वर्तमान में भी इनकी कब्र यहां देखी जा सकती है।

ज्ञात हो कि पंडित केशवानंद  ममगाईं का जन्म 29 अक्टूबर 1856 में देहरादून के पास डांडा गाँव में हुआ था। उनका प्रथम विवाह शांता (शंकर) से हुआ था। 21 अक्टूबर, 1899 को श्रीमती ममगाईं का देहांत हो गया था। इसके बाद 1901 में पंडित ममगाईं जी का दूसरा विवाह चन्द्रमुखी बोस से हुआ था।

पंडित केशवानंद ममगाईं जी पहले गढ़वाली थे जिन्होंने 1878 में म्योर कॉलेज (अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय उस समय कलकत्ता से संबद्ध था) से स्नातक किया था। उन्होंने उत्तर प्रदेश वन सेवा को चुना और सिरमौर, कश्मीर और टिहरी में अपनी सेवाएं दी। यूपी वन सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद, उन्होंने देहरादून फॉरेस्टर कॉलेज (1910- 1912) में एक पद भी संभाला और फिर महाराजा नरेंद्र शाह (1913-1919) की रीजेंसी काउंसिल के वित्त सदस्य बने। उनकी बेटी माधुरी ममगाईं महाराजा नरेन्द्र शाह की ट्यूटर थीं।

उत्तराखंड मूल की पहली स्नातक महिला ललिता वैष्णव चंदोला।

यकीनन कभी कभार मन बड़ा गौरान्वित व हर्षित होता है जब अपने आप को पाता हूँ कि मेरा जन्म भी उसी थाती-माटी में हुआ है जिसने हमेशा ही अपने इतिहास से गौरान्वित किया है। हमारी पट्टी कफोलस्यूँ का थापली एक मात्र ऐसा गांव है जिसने शिक्षा के क्षेत्र में बहुआय्यामी प्रतिभाओं को जन्म दिया। यह वही धरा है जिसने गढवाळी भाषा के पहले मुख पत्र निकालने वाले बिशम्बर दत्त चंदोला को जन्म दिया है व यह वही धरा है जहां 1910 में जन्मी स्व. बिशम्बर चंदोला की ललिता वैष्णव चंदोला ने उत्तराखंड मूल की पहली स्नातक महिला होने का गौरव हासिल किया।

1905 में देहरादून से प्रकाशित गढवाळी समाचार पत्र के सम्पादक बिशम्बर दत्त चंदोला ने लगभग 47 बर्ष तक यह अखबार प्रकाशित किया। उत्तराखण्ड के जन-जागरण में जिन समाचार-पत्रों का प्रमुख योगदान रहा है, उनमें ‘गढ़वाली’ (1905-1952) की प्रमुख भूमिका रही है। गढ़वाली के सम्पादक विश्वम्भरदत्त चंदोला की बड़ी पुत्री श्रीमती ललिता वैष्णव चंदोला  भी इस पत्र के प्रकाशन में योगदान दिया। 1934 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.ए. तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद वे पंजाब तथा हरियाणा राज्य सेवा में प्रवक्ता तथा प्रधानाचार्य के पद पर रहीं। 1982 में अवकाश ग्रहण करने के बाद देहरादून में उन्होंने ‘विश्वम्भरदत्त चंदोला शोध अध्ययन केन्द्र’ स्थापित किया।

ज्ञात हो कि गढ़वाल यूनियन की स्थापना 19 अगस्त 1909 ई. में देहरादूनइन की गई थी। यह गढ़वाल की इस पहली सामाजिक संस्था के नाम से जानी गई जिसमें स्वयं बिशम्बर दत्त चन्दोला, पं. गिरिजादत्त नैथाणी, चन्द्रमोहन रतूड़ी तथा तारादत्त गैरोला प्रमुख रूप से सम्बद्ध थे। इस संस्था का उद्देश्य गढ़वाल के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व  राजनीतिक पिछड़ेपन को दूर करना था। इसी उद्देश्य से गढ़वाली पत्र के प्रकाशन का निर्णय लिया गया।

यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसी संस्था के संस्थापक/अध्यक्ष रहे बिशम्बर1 दत्त चंदोला की सुपुत्री श्रीमति ललिता वैष्णव चंदोला का सानिध्य मुझे कई बार मिला। उनसे ज्यादात्तर मुलाकातें बिन्सर पब्लिकेशन में हुआ करती थी व जब भी मैं उन्हें थापली गाँव की याद दिलाता वह अक्सर स्नेह से सिर पर हाथ फेर कर कहती- हम लोगों का गाँव में क्वाठा (किलेनुमा घर) हुआ करता था, बहुत बर्ष बीत गए , अब वहां जाना नहीं होता। कभी तेरा जाना हुआ तो सौगात में उसकी फ़ोटो खींचकर ले आना। मैं जानबूझकर यह नहीं बताता था कि अब चंदोलाओं का क्वाठा नहीं रहा क्योंकि उनकी खुद उनकी आंखों में दिखती थी। थापली के अब जयादात्तर लोग यह भी नहीं जानते हैं कि ललिता वैष्णव चंदोला कौन है?

बनारस विश्वविद्यालय की याद दिलाने पर वह अक्सर कहा करती थी कि 1935 में जैदेवी घिल्डियाल पहली गढ़वाली थीं, जिन्होंने घर से बाहर निकलकर बनारस से बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इस संदर्भ में आपको बता दूं कि सन 1932 में देहरादून से पहली बार 5 महिलाएँ बी.ए. करने के लिए बनारस गईं थीं। तब समूचे गढ़वाली समाज में  यह बात एक सनसनीखेज खबर की तरह सुनाई जाती थी। 1933 में टिहरी  राज्य के खिलाफ जनता का पक्ष प्रस्तुत करने के कारण मेरे पिता बी.डी. चन्दोला को बन्दी बनाकर कारावास भेज दिया गया था। उत्तराखण्ड के किसी पत्रकार  को निरंकुशशाही का पर्दाफाश करने के जुर्म में दी गई यह पहली सजा थी। तब मैंने बनारस छोड़कर देहरादून में शिक्षण कार्य कर घर-परिवार का खर्चा चलाकर प्रेस व पत्र को भी चलाया। इसके कारण जैदेवी ने मुझसे पहले बी.ए. परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। मैंने एक वर्ष बाद 1935 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक डिग्री हासिल की। यह उनका बड़प्पन था कि वह जै देवी घिल्डियाल को पहली गढवाळी महिला मानती हैं जिन्होंने 1935 में स्नातक उपाधि हासिल की जबकि ललिता वैष्णव चंदोला ने 1934 में बीए कर लिया था लेकिन उन्हें डिग्री जै देवी घिल्डियाल के बाद प्राप्त हुई।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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