Tuesday, March 17, 2026
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उत्तराखण्डी सिनेमा को बड़ी क्षति, कोरोना ने ली दूसरे अभिनेता की जान। अशोक मल्ल के बाद अब रवि शील भी स्वर्ग सिधारे।

(मनोज इष्टवाल)

“ब्याखुनी कु घाम अछलै भि नीचा, रात घनाघोर व्हेग्ये फेर। बत्युं मा द्यू बल्ऊं चा, तेल नि रयूं चा, औन्दी कि नी औंदी सुबेर। ” इन शब्दों की पीड़ा सुननी हो तो लोकगायक नरेेंद्र सिंह नेगी द्वारा लिखित व संगीतबद्ध गीत, जिसे स्वरकोकिला अनुराधा पौडवाल ने 1987 में गाया था, आपको सुुनना पड़ेगा क्योंकि यह गढवाली सिनेमा का वह स्वर्णिम काल था जिसका जिक्र सुनने के बाद आप हतप्रभ रह जाएंगे। उतने ही हतप्रभ जितने इस गीत की स्थायी की अंतिम पंक्तियां हैं,, जो कहती हैं सुबह आती है कि नहीं आती? सचमुच कौथिग फ़िल्म के वे दो दीये इस कोरोना काल में बुझ गए हैं, जिन्होंने गढवाली सिनेमा को बुलंदियों पर ले जाने के लिए बहुत मशक्कत की। पहले कुमाऊँ मूल के अभिनेता, फिल्मकार अशोक मल्ल व दूसरे बंगाली मोशाय रवि शील।

इस फ़िल्म की मुख्य नायिका उर्मि नेगी जो वर्तमान में मुम्बई में एक प्रोडक्शन हाउस चलाती हैं व अभिनेत्री के साथ पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक हैं बहुत द्रवित हृदय से सोशल साइट में ट्वीट करके लिखती हैं- “स्तब्ध , निष्प्राण और शिथिल हूँ ये जानकर कि *कौथीग* फ़िल्म के सहनायक रवि शील कोरोना नामक महाराक्षस की वजह से ..अब हमारे मध्य नहीं रहे …आज़ सुबह ही मुंबई के seven Hills हास्पिटल में उन्होंने अंतिम साँस ली।

सिर्फ़ दो महीनो के अंतराल में *कौथीग* फ़िल्म के मेरे दोनों नायकों का यूँ असमय चले जाना एक गहरा आघात दे गया है ..।

दोस्तों ,ये रवि का हमारे उत्तराखंड के प्रति प्रेम ही था जो उन्होंने एक बंगाली होने के बावजूद भी *कौथीग* फ़िल्म का निर्माण किया था ….।

इस बात के लिए उत्तराखंडी सिनेमा तुम्हारा आभारी रहेगा रवि ,… ….
, .. *फ्योंली* फ़िल्म में भी तुमने एक मेहमान कलाकार के तौर पर काम करना स्वीकार किया था रवि , उसके लिए भी तुम्हारा आभार ..। सम्पूर्ण उत्तराखंडी फ़िल्म इंडस्ट्री की ओर से तुम्हें भावभीनी श्रधांजली .🙏💐💐💐💐 कुछ यादें…कुछ पल तुम्हारे साथ ।

आखिर उर्मि नेगी यह सब उदगार जाहिर करती भी तो क्यों नहीं। घर जवैंs के बाद यह दूसरी सफल फ़िल्म जो बताई जाती है, यह सुपर डुपर होती लेकिन उसी दौर में सिनेमा जगत में हुई 20 दिनी हड़ताल ने सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया और फ़िल्म प्रोड्यूसर जे.डी. शील जो सह अभिनेता रवि शील के पिता जी हुए को काफी नुकसान उठाना पड़ा। इस फ़िल्म के गीतों ने उस दौर में मानों तूफान खड़ा कर दिया हो। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के संगीत व गीत, सुप्रसिद्ध निर्देशक चरण सिंह चौहान का निर्देशन व पहली बार हिंदी सिनेमा जगत के तीन तीन सुप्रसिद्ध गायकों की आवाज ने नरेंद्र सिंह नेगी की कालजयी रचनाओं में धमाल जो मचा दिया था। इस फ़िल्म  को देखने के बाद यह लगने लगा था कि अब उत्तराखण्डी सिनेमा का स्वर्णिम युग आने वाला है।

सुरेश वाडेकर की आवाज में सजे गीतों में “कै गंवा की होलि स्य बांद”, सुषमा श्रेष्ठ व सुरेश वाडेकर “अपणी तौं शर्मयली आँख्यूं देखिणी द्या जरा इनै त देखा” नरेंद्र सिंह नेगी का “इनी होलि उनि होलि”  नरेंद्र सिंह नेगी व सुषमा श्रेष्ठ का “सुलपा की साज” अनुराधा पौडवाल का “व्याखुनी कु घाम” सतेंद्र करिण्डियाल का सूणा सौतु की बात, सौनै की अंधेरी रात” व सन्तोष खेतवाल व अनुपमा की आवाज में कौथिगेरु ना थौळ भौरेग्ये” गीतों में सजी यह फ़िल्म यकीनन उस दौर की सफलतम फिल्मों में गिनी जाती है।

फ़िल्म की सशक्त पटकथा विशाल नैथानी द्वारा लिखी गयी थी। इस फ़िल्म के बाद अभिनेता अशोक मल्ल व अभिनेत्री उर्मि नेगी तो सिनेमा जगत के पर्दे पर टिमटिमाते रहे लेकिन सह अभिनेता रवि शील अपने व्यवसाय में वे सह अभिनेत्री पिथौरागढ़ की निर्मला वर्ना अपने ग्रहस्थ जीवन में रम गए।

ज्ञात हो कि यह फ़िल्म उत्तराखंड में सर्वप्रथम देहरादून स्थित नटराज हाल पर रिलीज हुई थी और जब यह पौडी गढ़वाल के कोटद्वार स्थित दीप टाकीज पर लगी थी तब इस फ़िल्म ने एक अनूठा रिकॉर्ड बनाया था। गढ़वाल से सुबह 11 बजे कोटद्वार पहुंचे तीन बसों में भरकर लोगों को जब किसी भी शो की टिकट नहीं मिली तब सिनेमा हॉल मालिक ने रात के 12 से 3 बजे का एक्सट्रा शो चलाया ताकि लोगों को सिनेमा देखने को भी मिल जाय व रात कहीं होटल में न गुजारनी पड़े। इस फ़िल्म में अभिनेत्री उर्मि नेगी के शानदार अभिनय को देखते हुए भारत सरकार की सूचना एवं प्रसारण मंत्री गिरिजा ब्यास द्वारा उन्हें कलाश्री सम्मान से सम्मानित किया गया था।

दैवयोग देखिये इस फ़िल्म कौथिग के अभिनेता अशोक मल्ल विगत जुलाई में व सह अभिनेता रवि शील का आज कोरोना से देहांत हो गया। अभिनेत्री उर्मि नेगी ने फोन पर जानकारी देते हुए बताया कि अभी हाल ही के दिनों में रवि शील से मुलाकात के दौरान यह तय हुआ था कि दोनों कौथिग को फिर से जीवित करेंगे लेकिन विधि का विधान भला कौन टाल सकता है। जिस कौथिग फ़िल्म को देखने के लिए आज भी मन मचलता है, उस फिल्म का प्रिंट भी इन अभिनेताओं की तरह हमेशा की तरह मिट गया और साथ बचा रहा तो वह है नाम।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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