Monday, June 24, 2024
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मौत से ज्यादा ख़ौफ़ उसे दर्द और पैंसों की कमी का था’

मौत से ज्यादा ख़ौफ़ उसे दर्द और पैंसों की कमी का था!

(अरुण कुकसाल)

‘स्त्रियों को घर के काम से मौत आने पर ही छुटकारा मिलता है। दादी कहती थी, बाबा, घर गृहस्थी के काम को निपटाने के लिए लोग स्त्रियों को श्मशान से भी उठा लाते हैं। मसान तब ले जाएंगे पहले घर के काम तो निबटा ले।…बच्चों के लिए भी मां का महत्व तभी होता है, जब मां नाम की स्त्री उनकी ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम हो। मां की पदवी का महिमा मंडन करने वाले लोगों को मेरी बात बहुत अखरेगी, पर सच तो सच होता है।’
(पृष्ठ- 118-119)

हमारे समाज की महिलाओं का यह एक जीवनीय कटु सच है। जिसे, संपूर्ण समाज अन्तःमन से स्वीकार तो करता है, पर व्यवहारिक जीवन में उसे अपनाने में संकोच करता है।

हिमालयी जन-सरोकारों की चर्चित लेखक और सोशियल एक्टिविस्ट गीता गैरोला की नवीनतम कृति ‘गूंजे अनहद नाद’ है। संभावना प्रकाशन, हापुड़ से विगत वर्ष- 2022 में प्रकाशित इस किताब में विगत वर्षों में कैंसर की बीमारी से जूझते हुए अपने अनुभवों को उन्होंने पाठकों के साथ साझा किया है।

किताब में, गीता गैरोला के संस्मरणात्मक उदाहरण उसके अपने अनुभवों का सच है। पर, बात वह हम सबकी और सारे जग की कह जाती है। विशेषकर, सामाजिक जीवन में स्त्रियों के तमाम संघर्ष, जिन्हें जानते सब हैं, परन्तु, उन्हें मानना अभी बाकी है।

इसके लिए, देश-समाज की संस्कृति और सभ्यता के सार्वजनिक चेहरे को और मानवीय होने का इंतजार करना होगा-

‘हम स्त्रियों के वो कौन से संघर्ष हैं, जिनके लिए हर स्त्री लड़की पैदा होने पर रोती है? क्या उन्हें अपनी ज़िन्दगी का दोहराव याद आता होगा?’ (पृष्ठ- 185)

बिडम्बना यह भी है कि, स्त्रियां अपने प्रति सामाजिक भेदभाव को अपनी जीवनीय नियति मान लेती हैं। सार्वजनिक जीवन में स्वयं स्त्रियां इन विसंगतियों से अनजान हैं या अनजान दिखने के लिए विवश हैं। जबकि, असलियत यह भी है कि उनके मन-मस्तिष्क का एक कोना इससे छुटकारा पाने के लिए, उन्हें हर समय बैचेन किए रहता है-

‘कितनी बड़ी विडंबना है, मैं ख़ूबसूरत हूं पर मेरे ख़ूबसूरत होने पर ख़ुद मेरा कोई आधार नहीं है। मेरा सुंदर होना किसी और की अमानत समझा जाता है।…स्त्रियों की दुनिया में हम ये सवाल कब करेंगी? हमारी खूबसूरती हमारे लिए कब होगी? तुम खुद के लिए क्यों नहीं हो? खुद के लिए कब जियोगी? सारी दुनिया को जानने का दावा करती हो तो खुद को कब जानोगी?’ (पृष्ठ- 100)

यह किताब मानव मन में निहित उस असल ‘मैं’ को सामने लाती है, जिसे वह अपने सार्वजनिक जीवन में दिखाने में अक्सर संकोच करता है। क्योंकि, सामान्यतया व्यक्ति अपना सामाजिक व्यवहार अपने जीवन की जरूरतों, इच्छाओं और महत्वाकाक्षाओं को संतुष्ट करने के अनकूल ही विकसित करता है-

‘जीवन मेरे लिए आसान कभी नहीं रहा।…जो मिला एक उम्र गुज़र जाने के बाद मिला।…आज अचानक ये कैंसर कहां से आकर मुझसे चिपक गया? इसने ज़िन्दगी के ऐसे पलों पर हमला किया जो नितान्त मेरे अपने थे, जिनका मुझे शिद्दत से इन्तजार था। जिन्हें मुझे अपने लिए जीना था। अपने पास रखी छोटी सी जमा पूंजी को खु़द अपने लिए खर्च करना था, किसी बीमारी के इलाज में ख़र्च नहीं करना था।’ (पृष्ठ- 56)

सार्वजनिक जीवन में जांबाज दिखने वाली गीता गैरोला से इतर उसके मन-मस्तिष्क के सबसे नाजुक कोने में सिमटी असल गीता से हमारा परिचय इस किताब के जरिए होता है। उस भोली-भाली गीता को जीवन के दोहरे मानदंडों की समझ नहीं है। तभी तो, अन्तर्मन की इस गीता के दुःख-दर्द ज्यादा गहरे हैं। जबकि, जांबाज और दुनियादार दिखने वाली गीता को अपनी बनी-बनाई पब्लिक ईमेज के ढ़हने की व्याकुलता अधिक है।

ऐसे ही, जैसे आजकल की दुल्हनें, इसलिए भी नहीं रो पाती कि कहीं उनका ब्यूटीपालरी मेकअप खराब न हो जाए-

‘मन करता ज़ोर से चिल्ला कर कहूं-नहीं बनना मुझे कर्मठ, मैं बहादुर महिला नहीं हूं। मुझे आराम और केयर की सख्त ज़रूरत है। कोई मुझे खाना बना कर दे दो।… मुझे अच्छी गृहस्थी चलाने वाली महिला नहीं बनना। मुक्त करो मुझे। मैं इस वक़्त किसी की बीबी, किसी की मां नहीं हूं। केवल कैंसर की मरीज हूं। इतना सब होने के बावजूद मेरा बहादुर दिखने का ढोंग, कर्मठ बने रहने का दिखावा करना, बरकरार था। अपनी जिस छवि को बनाने में मुझे वर्षों लगे थे उसे टूटते देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। ख़ुद के लिए बनाई यही छवि तो मेरे जीवन की पूंजी थी। पूंजी खो जाने का भय दिल को कंपाता रहता।’ (पृष्ठ- 130)

जीवन के विकटतम दिनों में अपने दिल की इस कंपकपाहट में गीता गैरोला ने सारी स्त्रियों के मन-मस्तिष्क की व्यथा-कथा को समेटा है। वाकई, यह दोहरा व्यक्तित्व हम सबमें विद्यमान है। जीवन के कठिन समय में इनके आपसी अन्तःविरोध की छटपटाहट मन-मस्तिष्क को बेहद बैचेन करती है।

अनेकों जरूरतमंद लोगों और मित्रों का सहारा बनने वाली गीता गैरोला को बीमारी के दौरान का एकाकीपन कचोटता है। रिश्तों का सूनापन और ठेंगापन उसकी विपत्ति को और विकट बना देता है। जीवन के कष्टों के बीच जब उसे अपने पराये दिखते हैं, तो दर्द ज्यादा ही छलकता है।

प्रायः ऐसा क्यों होता है कि, पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों के लिए हर हाल में खर्च होती महिला के हिस्से आखिर में जीवनीय एकाकीपन ही आता है-

‘… ये सिर्फ़ मेरे रिश्ते थे, जिनका मेरे मायके या ससुराल से कोई लेना-देना नहीं था।…बीमारी के दर्दीले, अकेले परेशान हाल दिनों में जब मुझे ऐसे रिश्तों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, जिन दिनों में पल-पल उन्हें अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही अपने साथ, अपने नजदीक महसूस करना चाहती थी, जब मैं ज़िन्दगी से धीरे-धीरे दूर जा रही थी तब वो रिश्ते जिन्हें अपने बेटे, बहनों, बच्चों, नातेदारों से ज़्यादा महत्त्व दिया वही मेरे पास नहीं थे।’ (पृष्ठ- 43)

गीता गैरोला ने जीवन में हासिल हुए इसी एकाकीपन के शोर को अनहद नाद की गूंज में तब्दील किया है।

तभी तो, उसने जीवन के दर्द को मस्ती की दवा मान कर कैंसर पर फतह हासिल की है।

और, अब जिन्दादिल गीता गैरोला ने ये कहने का साहस किया कि आने वाले समय में मृत्यु के बाद मेरी देह को ‘स्वास्थ्य शिक्षा’ के लिए जौली ग्राण्ट अस्पताल को दान कर दिया जाय।

हमने गम्भीर बीमारी से उभरे कई लोगों की सच्ची कहानियां पढ़ी, सुनी और देखी भी हैं। लेकिन, अक्सर अपने को बचा ले जाने तक की ही सोच रहने के कारण, वे बीमारी के दौरान की अव्यवस्थाओं के प्रति चुप्पी ओढ़े रहे।

गीता गैरोला का मामला ऐसा कदापि नहीं रहा। क्योंकि, घनघोर बीमारी के दौरान भी अपने अंदर अपना बचपना सदैव जीवंत रखे वह मानती रही कि एक बच्चा ही खुद से लेकर दुनिया तक लड़ सकता है। तभी तो, उसने खुला ऐलान किया कि ‘ऐ मौत! तू अपनी औकात में रह। गीता की जिन्दगी में अभी तेरा कोई काम नहीं।’

इसी आत्मविश्वास के बल पर उसकी जांबाजी उसकी बीमारी पर हर समय हाबी रही है। उसने अपने शरीर में कैंसर को दोयम दर्जे का मानते हुए उसे अनचाहा मेहमान माना जिसे जाना ही था-

‘मैं आक्सीजन मास्क के अंदर से मुस्कराई-‘इतना भी काम चलता रहे बहुत है, डाक्टर सहाब, सांसें बिना रुकावट के चलती रहें। मेरे लिए बीस परसेंट धड़कने वाला दिल भी काफी है। अब तक मैं इस दिल से ज़रूरत से ज़्यादा काम ले चुकी हूं। बेचारा थक गया होगा। अब जितना भी बचा है, उतनी गनीमत है।’ जितनी देर वो मेरा चेकअप करते रहे, मेरी जुबान की तुर्शी से डाक्टर के साथ नर्स भी मुस्कराने के लिए मजबूर हो गई’।
(पृष्ठ- 176)

ऐसा लगता है कि जैसे गीता गैरोला बीमार हो ही नहीं और एक शोधार्थी अथवा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उसे कैंसर पर यह अध्ययन कार्य करने का दायित्व दिया गया है। अस्पताल में बतौर बीमार भर्ती गीता बीमारों को दिलासा देते हुए सामाजिक आन्दोलनों की रूपरेखा बनाती नज़र आती है। जो भी समस्या उसे दिखी, उसके निपटने के उपाय उसके मन-मस्तिष्क में खट्ट से आ जाते हैं। वह बीमारों के प्रति ही सजग नहीं है, वरन स्वास्थ्यकर्मियों की समस्याओं पर भी चिन्तन-मनन करती है। इसके लिए समय-समय पर संबंधितों को खूब लताड़ भी लगाती है।

उसकी बीमारी हर समय उसे धमकाती कि मुझसे डर, पर जश्न की तरह जीने की आदी गब्दू सी लड़की ‘परे हट’ कहकर कैंसर को ही अपनी सीमा में रहने की उल्टी घमकी दे देती-

‘मेरा मन हुआ उन सब लोगों को झिंझोड़ कर कहूं, अभी तो ज़िन्दा हो, सांसें ले रहे हो। मृत्यु का ऐसा भी क्या डर जो जीने की उमंग ही छोड़ दी? जितने दिन इस दुनिया में हो उतने दिन जीवन को जश्न की तरह जिया जा सकता है। अस्पताल शान्त होने चाहिए, पर वहां मुर्दों जैसी शान्ति नहीं, जीवंत शान्ति होनी चाहिए।’(पृष्ठ- 64)

बीमारी के दौरान और बाद में भी गीता के व्यक्तित्व का ताप और तेवर में कोई कमी और बदलाव नहीं आया। उसके जीने के तौर-तरीके भी वैसे के वैसे रहे-

‘कैंसर से अगर बाल झड़ रहे हैं तो क्या? मेरे अनुभव, मेरा दिमाग, मेरा कृतित्व जिसने मुझे इंसान बनाया, इन्सानियत सिखाई, इन्सानियत पर अमल करना सिखाया, वही रहेगी।’ (पृष्ठ- 103)

हां, ये जरूर हुआ कि उसकी सामाजिक समझ और परिपक्व हुई है। मतलबी रिश्तों के छिटकने से उसका व्यक्तित्व और निखरा है। जिससे गब्दू सी लड़की गीता के जीवंत जीने का फलक और व्यापक हुआ है। वह मजबूरी में नहीं और मजबूती से जीवन के आनंद में है-

‘अचानक मुझे एक शगल सूझने लगा।… उनकी नींद में खलल डालते हुए मैंने जोर से कहा ‘मैं देख रही हूं तुम दोनों मुझे हर बात पर टोकते हो, डांट देतें हो, अब जरा सावधान हो जाओ! मैंने सुना है कीमो की दवाई में सांप का जहर मिला होता है। तुम लोग अब मुझसे जरा बचकर रहना। गुस्से में किसी को नोच लिया तो तुम लोगों की खैर नहीं। कोबरा का जहर पी रही हूं, विषकन्या बन जाऊंगी।’ मेरी बात सुनते ही तीनों ज़ोर से हंस पड़े थे। ऊंघते कमरों के बीमारों वाले उदास सफ़ेद बिस्तर, एक किनारे पड़े स्टूल, कैनुला की सिरिंज, दवाई का स्टेन्ड और खिड़की से आती मिसमिसी धूप ज़ोर से खिलखिलाने लगी थी।’ (पृष्ठ- 70)

असल में, गीता गैरोला का दर्द उसकी बीमारी से ज्यादा जिम्मेदार व्यवस्थाओं के लचरपन, शिथिलता, असंवेदनशील और गैर जिम्मेदारी से है। जिसके कारण, अस्पतालों में कातर निगाहें लिए मरीजों की लम्बी कतारें, दवाइयों की बदबू, गंदगी के ढ़ेर और सबसे ज्यादा परेशानी यह कि इन सबसे अन्जान बन रहे स्वास्थ्यकर्मी को देखना, सामान्य दृश्य है। आम बीमार किससे जो लड़े, बीमारी से या उसको ठीक करने का जिम्मा लिए लोगों और उससे जुड़े सिस्टम से। बीमार को अपने परिजनों की हताशा, निराशा, डर, उकताहट चिडचिड़ापन और बेरूखी से भी तो जूझना होता है। ऐसे वातावरण में वह सलाह भी देती है-

‘…ओ दुनिया के अस्पताल बनाने वालों! हम मरीज मरने को तैयार हैं तो क्या हुआ ? मरते हुए लोगों के लिए भी एक ऐसी अलग रंग-बिरंगी दुनिया बसाओ जो उन्हें इस दुनिया से जाते हुए उल्लास के साथ विदा कर सके। जैसे जीने के लिए उत्सव के विकल्प होते हैं, ठीक वैसे ही मरने वालों के लिए भी उत्सव के विकल्प क्यों नहीं हो सकते?’ (पृष्ठ- 178)

अस्पतालों में बीमार पुरुषों से अधिक संख्या में स्त्रियां की संख्या उसे बैचेन करती है। उस पर भी अधिकतर स्त्रियां प्रजनन संबंधी बीमारी से ग्रस्त हैं। इसके लिए प्रथम दृष्टया उसका पुरुष साथी जिम्मेदार नहीं है क्या? इस बीमारी से निजात पाने के लिए उस बीमार स्त्री के साथ वह पुरुष मुस्तैदी से क्यों नहीं खड़ा रहता है?-

‘…पूरा परिवार बिक गया इसकी बीमारी में। अब आगे जो होगा देखा जाएगा।’ मैने गौर से पहले उसके पति की तरफ फिर महिला की तरफ देखा। पति की इतनी सारी बातें सुनने के बाद भी उसके चेहरे पर विरक्ति छाई हुई थी। महिला की जगह उसका पति बीमार होता, तब… तेज़ी से एक ख्याल दिमाग़ में आया, ऐसी स्थिति आने पर क्या मेरे लिए भी यही कहा जायेगा? आगे इलाज करवाने पर होने वाले पैसों का ख़र्च दिल को कंपकंपाने लगा।’ (पृष्ठ- 83)

विडम्बना है कि, हमारे देश-समाज में एक सामान्य व्यक्ति की घबराहट अचानक उसके जीवन में आई बीमारी की अपेक्षा उसके लिए खर्चे के इंतजाम की रहती है। बीमारी सुनते ही सबसे पहले अपने पास जमा पैसा ही याद आता है।

गीता गैरोला ने भी वह समय देखा जब बीमारी के दौरान ही एक तरफ जीविका चलाने वाली नौकरी जा रही थी तो दूसरी तरफ उसकी जिन्दगी भी अलविदा कहने के मूड में थी।

ऐसे समय में, मौत से ज्यादा ख़ौफ़ उसे दर्द और पैंसों की कमी का था-

‘मैं अस्पताल में पड़ी यही तय नहीं कर पा रही थी कि अभी जीने के लिए कितना वक़्त बाक़ी हैं किसी तरह की योजना या वायदों से दिमाग़ एकदम खाली था। चिंता सिर्फ यही थी इस बार अस्पताल का बिल कैसे दिया जाएगा?’ (पृष्ठ- 172)

यह किताब बताती है कि पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते जो दिख रहे हैं, वास्तव में वो उसी तरह के होते भी होगें, इसमें संशय है। एक आदमी के जीवन का दायरा कितना व्यापक और प्रभावी क्यों न हो हमारे समाज में संकट के समय चन्द परिजन और मित्रगण ही आस-पास असल ढाढस बड़ाते दिखते हैं।

इसलिए, वक्त आने पर रिश्तों में आई वीरानगी से हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यह तो सामाजिक व्यवहार का एक सामान्य रूप है-

‘…नर्स ने जो कहा उसने मेरे सामने हमारे परिवारों और समाज के सबसे विद्रुप चेहरे को उघाड़ कर रख दिया। बोली-‘आंटी जी! हम क्या कर सकते हैं?…ये अंकल जी जब मर जाएंगे इनके घरवाले अब तभी आएंगें। मैं हतप्रभ थी। स्वार्थ की पराकाष्ठा देखकर मैंने चुपचाप अपनी आंखें बंद कर ली। वो कातर कराहें रात के अंधेरे में धीमी होकर डूबती चली गई। चिड़ियों की चहचहाहट शुरू हो गई थी आसमान में भोर की तारा निकल गया, उस कमरे से आने वाली आवाज़ें शान्त हो गई थीं। इधर धरती पर एक जिन्दगी का तारा डूब गया था। बूढ़ा शरीर थक कर हमेशा के लिए चुपचाप सो गया था।’ (पृष्ठ- 150)

लेकिन, हमारा समाज उन अन्जान रिश्तों से भी भरा हुआ है, जिसमें औरों के काम आना ही जीवन का आनंद है-

‘…आज मैं तुम्हारे रोजे के दम पर भी जी रही हूं, जब मैने किसी भगवान, किसी खु़दा, किसी ईशू को देखा ही नहीं उस पर विश्वास करने का मेरा मन नहीं होता, हां मैने इंसान को देखा है, उसकी इंसानियत को देखा है। इसी से मेरी आस्था केवल इंसान और इंसानियत पर है। अगर ईश्वर का अस्तित्व कहीं होगा तो वो आटो वाले भाई के जैसा ही होता होगा।’ (पृष्ठ- 40)

वास्तव में, यह किताब गीता गैरोला की आप-बीती ही नहीं वरन हमारे वर्तमान समाज और उसकी व्यवस्थाओं के मिज़ाज का बेहतरीन लेखा-जोखा है। इसमें हम अपने-अपने हिस्से की जीवनीय चुनौतियों को देख-समझ सकते हैं।

‘गूंजे अनहद नाद’ किताब में गीता गैरोला की इस बात से सहमति सभी को है कि ‘रोग होता व्यक्ति को है, पर इसके पैदा होने और उभरने के राजनैतिक और सामाजिक कारण हैं।’

जिस राजनैतिक व्यवस्था से हमारा वर्तमान समाज संचालित और नियंत्रित हो रहा है, उसमें बाजारवाद के ही पनपने की संभावना है। जहां नगद भुगतान पर ही इलाज संभव है। ऐसे में, आम आदमी को इस राजनैतिक व्यवस्था में रोजगार और स्वास्थ्य के संकट से निजात पाना मुश्किल है।

ऐसे मुश्किल समय में हमारी तरह की ही गीता गैरोला भी है, जो आने वाली सामाजिक बेहतरी के लिए दृड-संकल्पित होकर अग्रणी भूमिका में है।

‘गूंजे अनहद नाद’ में सुमन केशरी ने अपनी कविता में यही तो कहा है-
………
वह स्त्री न तोे देवी है
न देवदूती
यह कोई और नहीं
देहरादून की गीता गैरोला है
एक इंसान-अपनी तरह की
बिल्कुल अपनी सी…।

भुळि, गीता गैरोला को पुनः शुभ-जन्मदिन की शुभाशीष

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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