(पार्थसारथि थपलियाल)
सनातन संस्कृति में मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कालबोध, प्रकृतिबोध और आत्मबोध का समन्वित उत्सव है। यह वह संधिकाल है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण होता है। उत्तरायण का आशय केवल खगोलीय परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन में प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता की ओर अग्रसर होना है। इसी कारण शास्त्रों में उत्तरायण (6 माह की अवधि,) को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को रात्रि कहा गया है। मकर संक्रांति इस परिवर्तन का सांस्कृतिक घोष है।
उत्तरायण और आत्मशुद्धि का संदेश
भगवद्गीता में उत्तरायण का विशेष आध्यात्मिक महत्त्व बताया गया है। यह काल सत्त्वगुण की वृद्धि का प्रतीक है, जब साधना, तप और संयम का फल शीघ्र प्राप्त होता है। इसी भावभूमि पर मकर संक्रांति से माघ सौर मास का आरंभ होता है, जिसे शास्त्रों में अत्यंत पुण्यदायक माना गया है।
माघ मास में गंगा, यमुना, अथवा किसी भी पवित्र नदी में स्नान को माघस्नान कहा गया है। यह केवल देह की शुद्धि नहीं, बल्कि मन और संस्कारों के परिष्कार का माध्यम है। “माघे स्नात्वा नरो यस्तु स सर्वपापैः प्रमुच्यते”, यह धारणा भारतीय जनमानस में गहराई से रची-बसी है। इसी काल में प्रयागराज, हरिद्वार, ऋषिकेश जैसे पावन तीर्थों पर कल्पवास की परंपरा है, जहाँ गृहस्थ भी एक मास तक संयम, सेवा, जप, दान और सादगी का जीवन जीते हैं। कल्पवास यह सिखाता है कि भौतिक जीवन में रहते हुए भी आध्यात्मिक अनुशासन संभव है।
मकर संक्रांति का सबसे विशिष्ट पक्ष है तिल से बने व्यंजन-तिलगुड़, तिल के लड्डू, रेवड़ी, तिल पापड़ी, चिक्की आदि। सनातन संस्कृति में तिल को पवित्र, उष्ण और पोषक माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है-“तिलाः पवित्रा इति स्मृताः”। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सर्दियों में हमारी त्वचा शुष्क हो जाती है। तिल हमारे शरीर की शुष्कता को दूर करता है।
आयुर्वेदिक दृष्टि से शीत ऋतु में शरीर की अग्नि प्रबल होती है, परंतु बाह्य ठंड के कारण वात दोष बढ़ता है। ऐसे में तैलीय और उष्ण भोजन शरीर को ऊष्मा प्रदान करता है, जोड़ों को राहत देता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। तिल में प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन और स्वस्थ वसा होती है, जो इस ऋतु के लिए आदर्श है। इसीलिए तिल-गुड़ का सेवन केवल परंपरा नहीं, बल्कि ऋतु-भोजन का वैज्ञानिक उदाहरण है।
इस दिन को देश के विभिन्न अंचलों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। पंजाब में संक्रांति से पूर्व लोहड़ी मनाई जाती है। दक्षिण भारत का प्रमुख त्यौहार पोंगल भी इसी दिन मनाया जाता है। असम में इसी समय माघ बिहू या भोगाली बिहू कहते हैं। इसे फसल कटाई के बाद उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
सामाजिक समरसता का पर्व
मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ बांटते हुए कहा जाता है। यह पर्व दान, सेवा और समानता की भावना को पुष्ट करता है। साथ ही यह पर्व सामाजिक समरसता भी स्थापित करता है। इस दिन गुजरात में पारम्परिक रूप से पतंगबाजी की जाती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में जयपुर, अहमदाबाद और कई अन्य स्थानों पर अंतरराष्ट्रीय पतंग प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। समय बदला है। न बदली है तो सनातन दानपुण्य की परंपरा।
सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामय
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दुःख भागभवेत्।।

