Sunday, March 3, 2024
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प्रबुद्ध इतिहाकारकार डॉ शिब प्रसाद डबराल “चारण” सरुड़ा-सकाली स्थित पुस्तकालय पर विधमान है 229 बर्ष पुरानी तिबारी।

प्रबुद्ध इतिहाकारकार डॉ शिब प्रसाद डबराल “चारण” सरुड़ा-सकाली स्थित पुस्तकालय पर विधमान है 229 बर्ष पुरानी तिबारी।

(मनोज इष्टवाल)
जिस व्यक्तित्व के आगे प्रबुद्ध इतिहाकार लिखना भी बौना सा शब्द लगे, जिस आचार्य मनुषी को प्रख्यात साहित्यकार, सम्पादक, पुरातत्ववेत्ता, इतिहासकार, ज्योतिर्विद, भाषाविद जैसे शब्द सम्मानों का अलंकरण मिला हो, फिर उनसे वह विधा क्यों दूर रखी जाए जिसे तंत्र शास्त्र/विज्ञान कहते हैं और जो उसके प्रकांड विद्वान थे। ऐसे विद्वान डॉ शिब प्रसाद डबराल “चारण” अपने सरुड़ा-सकाली गांव स्थित जिस आवास में 23000 से अधिक पुस्तकें, शोधपत्र, पांडुलिपि, काष्ठ लिपि, पाषाण लिपि और जाने क्या-क्या संग्रह किया था, उस पुस्तकालय/आवास की तिबारी निर्मित हुए 239 बर्ष बीत चुके हैं व वर्तमान तक उसका काफी हद तक रखरखाव भी है।

(डॉ डबराल व उनका पुस्तकालय आवास सरुड़ा-सकाली)
डॉ शिव प्रसाद डबराल “चारण” द्वारा इसी आवासीय पुस्तकालय में 1951 से लेकर अपनी मृत्यु पर्यंत (48 बर्ष) तक उत्तराखंड पर शोध कर “उत्तराखंड के इतिहास ” पर 25 पुस्तकें (भाग-1 से भाग -25 लिखी) इसके अलावा दर्जनों नाटक व साहित्यिक पुस्तकें भी लिखी। इस कर्मयोगी ने इतिहास, भूगोल, पुरातत्व, धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं पर सर्वाधिक शोधग्रंथ लिखने वाले रचनाकार कहलाये जाते हैं। जिन्होंने कठोर व सरस साहित्य के साथ तंत्र-मंत्र विधा, हस्तरेखा व ज्योतिषविद्या का भरपूर ज्ञानार्जन किया। उनके अध्ययन व श्रम साधना के कारण भले ही इनका तन बेहद दुर्बल राह गया था लेकिन 87 बर्ष की आयु में स्वर्ग सिधारते समय तक इनके मस्तिष्क का ओज ज्यों का त्यों बना रहा।

डॉ शिब प्रसाद डबराल “चारण” ने अपनी पुस्तक “प्राग्-ऐतिहासिक उत्तराखंड” में सँख्या -09, 10, 11 में सरुडा सकाली गांव में अपनी बसासत के साथ उस तिबारी का भी उल्लेख किया है जो 1793 में सरुड़ा गांव के प्रतिष्ठित व्यक्ति गीताराम मिश्र द्वारा बनवाई गई थी। इन्हीं के पुत्र धनीराम मिश्र द्वारा दुग्गडा ढाकर मंडी व शहर बसाया गया था। डॉ चारण लिखते हैं- “नवंबर 48 से ही मैं ऐता गांव में श्री नैन सिंह वकील के मकान में रहने लगा था। 1951 की जन्माष्टमी तक हम वहीं रहे।” (पैरा- 02, पृष्ठ09)

वे पैरा 01 की पंक्ति 03 में लिखते हैं- “दुगड्डा, सरोडा और पड़ोसी गांव के कुछ स्वामी मिश्र अपनी भूमि बेचकर कोटद्वार-भावर जा बसे थे, जहां उनकी बहुत सी भूमि थी। एक बड़े से मकान की खोली के स्तम्भ अत्यंत कलापूर्ण एवं शास्त्रीय विधि से चित्रित थे। उस मकान की तथा खोली के काष्ठस्तम्भों की बर्षा आदि से दुर्दशा हो रही थी। मैने उस कलापूर्ण खोली के मकान को , जो वहां लगी शिला के अनुसार उस समय लगभग 151 बर्ष पुराना था तथा उसके साथ तीन चकों को खरीदने और वहां फलदार वृक्षों का बगीचा लगाने का निश्चय किया।” (पैरा01/03 पृ.09 प्राग्-ऐतिहासिक उत्तराखंड)

(डॉ डबराल का 239 पुराना तिबारी आवास/पुस्तकालय)

मुझे आज भी वह दिन याद है जब 16 जून 1986 की भरी दोपहरी में मैं सरुड़ा-सकाली ठिठकते कदमों के साथ इन तिबारीनुमा आवास में पहुंचा था। तब न उम्र परिपक्व थी और न शैक्षिक ज्ञान ही …! दुगड्डा स्थित मस्जिद का झूला पुल पार कर गांव की चढ़ाई चढ़ते हुए जब मैं आगे बढ़ रहा था, तभी मुझे कोटद्वार के “ठहरो” अखबार के सम्पादक कामरेड कुंवर सिंह नेगी के शब्द याद आ गए। उन्होंने कहा था इस बात का ध्यान रखना इष्टवाल जी, हम जैसे पत्रकार उन जैसे विद्वान के पेट के कीड़े हैं। वहां उस ज्ञान के भंडार से कुछ ला सको तो समझो जिंदगी भर का आशीर्वाद मिल गया। बस यह बात याद क्या आई कदमों की तेजी खत्म हो गयी। सच कहूँ तो कदम उखड़ से गये। सोचने लगा दिन दोपहरी किसी मनुषी के घर जाना ठीक रहेगा क्या। खैर जैसे तैसे पता करते वहां तक पहुंचा। जिस किसी से भी उनके घर का पता पूछता वे बताते तो सही लेकिन उनके लोक व्यवहार में आदर भाव कम नजर आ रहा था, उससे मन में और संशय पैदा होने लगा। खैर रास्ते से इस तिबारी वाले मकान के आंगन में उतरने के लिए दो या तीन सीढियां थी। मुझे बाहर एक छोटे से कद काठी की उम्रदराज महिला दिखाई दी। उन्हें पूछा कि डॉ डबराल जी कहाँ होंगे। उन्होंने हाथ से इशारा किया और मैं खोली के रास्ते तिबारी में जा पहुंचा। मुझे कुछ सूझा नहीं ,जाने क्या हुआ मैं जैसे भगवान के द्वार पर नतमस्तक होते हैं वैसे ही उनके पैरों में नतमस्तक हो गया। उन्होंने दोनों हाथों से मेरी बांहें पकड़कर मुझे उठाया व सद्पुरुष की भांति मेरी मुखमुद्रा पढ़ने के बाद तनिक मुस्कराए। बोले- बैठो, फिर दुर्लभ सी आवाज में बोले- हे भैs, पाणी… अच्छा तू रैणी दे, मी लांदु। लेकिन उनके उठने के उपक्रम से पहले ही वह वृद्धा पानी ले आई थीं। बाद में पता चला कि वह उनकी अर्धांगनी हैं। मुझे उनके वस्त्र देखकर अचम्भा भी हुआ कि भला इतने बड़े साहित्यकार की पत्नी ऐसे कपड़े कैसे पहन सकती हैं। खैर मेरी सोच बहते बरसाती गदेरे की थी जिसकी मुलाकात सागर से हुई थी।

वर्तमान मैमा जीर्ण-शीर्ण अवस्था में डॉ चारण का आवासीय परिसर

डॉ चारण ने जिस आत्मीयतता के साथ मेरा सत्कार किया उसकी मैने कल्पना भी नहीं की थी। मेरी अंगुली कैमरे के ट्रिगर पर नाच रही थी और जब वह तिबारी के काष्ठ खम्बों की तरफ मुड़ी तब डॉ शिब प्रसाद डबराल “चारण” एक फिलॉस्फर, इतिहासविद या दर्शनशास्त्री की तरह गम्भीर चितवन से मुझे तिबारी पर अंकित एक एक पुष्प, गणेश मूर्ति व अन्य कई काष्ठ आकार के सम्बंध में बताने लगे। क्यों नाग आकर बनाये जाते हैं? खोली पर गणेश क्यो थरपे जाते हैं? क्यों विभिन्न लता-पुष्प, पशु-पक्षी इत्यादि चित्रित किये जाते हैं। मैं उन्हें सुनता तो रहा लेकिन उस समय उम्र का तकाजा ही ऐसा था कि यह मेरे इंटरेस्ट का बिषय नहीं था। काश. .मैने इस काष्ठ शिल्प की सम्पूर्ण जानकारी उनसे तभी प्राप्त कर ली होती तो मैं आज काष्ठशिल्प विशेषज्ञ कहलाता।

डॉ चारण के शब्दों में ” जिस परिवार से मैंने सरोडा में भूमि खरीदी थी, उसमें समाजसेवी,विद्याप्रेमी, विद्यालयों के संस्थापक तथा गढ़वाल में नई जागृति लाने वाले पंडित धनीराम मिश्र, उनके पुत्र पत्रकार एवं कवि कृपाराम मिश्र और हरिराम मिश्र “चंचल” एवं विद्याप्रेमी कवि जगतराम मिश्र सरोडा गांव के उसी मकान में रह चुके थे, जिसे मैंने खरीदा था।”(पैरा02/07 पृष्ठ11प्राग्-ऐतिहासिक उत्तराखंड)

(उत्तराखंड के गढ़वाल-कुमाऊं की बाखली तिबारी, निमदारियों पर लगातार लेख लिखने वाले प्रबुद्ध साहित्यकार भीष्म कुकरेती जी द्वारा मेरे लेख “खड़कु रौत की रिंग्वड्या तिबारी” वाले लेख पर एक कमेंट कर जिज्ञासा प्रकट की गई थी कि काष्ठ शिल्प व तिबारी का काल हमारे गढ़वाल में 1890 के बाद शुरू हुआ ! तब मैंने उनसे दूरभाष पर बात कर उन्हें बताया था कि तिबारी का काल तो हमारे यहां द्वापर काल से है। फिर भी उन्हें बिश्वास नहीं हुआ तब मैंने उन्हें बताया कि डॉ शिब प्रसाद डबराल “चारण” की तिबारी स्वयं 200 साल से अधिक पुरानी है। उन्होंने कहा उनका कोई ऑथेंटिक लेख किसी पुस्तक में हो तो मैं विश्वास कर लूंगा। अतः यह लेख मैं भीष्म कुकरेती जी को सादर इस भाव से समर्पित करता हूँ कि वे अदगद में न रहें।)

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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