Thursday, February 22, 2024
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गढवाल के पौराणिक ढाकर मार्ग के “साल्ट रूट” पर जिलाधिकारी आशीष की चहलकदमी।

गढवाल के पौराणिक ढाकर मार्ग के “साल्ट रूट” पर जिलाधिकारी आशीष की चहलकदमी।

• वन-पर्यावरण, प्रकृति-वन्य जीव व साहसिक पर्यटन की नई शुरुआत।

• छोटी बिलायत के ‘साल्ट रूट’ में विचरण करने वाला पहला जिलाधिकारी।

• कमाल-जमाल बनाम कल्लु कलाल और जल्लु जलाल।

• डाकू सुल्ताना भांतू और ताल घाटी का बन्नू कलाल।

• छोटी बिलायत की ब्रिटिश कालीन गंगा बस सर्विस व उदय सिंह तडियाल का गीत।

• छोटी बिलायत की तीन पटवारी चौकियां।

• ब्रिटिश काल में वन्यजीवों का शिकार करने के लिए फारेस्ट डिपार्टमेंट देता था 02 रुपये से 10 रुपये।

(मनोज इष्टवाल)

जब सम्पूर्ण शिवालिक श्रेणियों से उतुंग हिमालय पार तिब्बत तक क्या गरीब, क्या अमीर सब मोटानाज खाते थे तब गढ़वाल का एक क्षेत्र जिसे गंगा सलाण कहते हैं, जहाँ के लोग दूण घाटी की बासमती के डकार लेकर शाम को नचनिया का नाच देखने ताल घाटी में “बन्नू कलाल” की भट्टी पर जा पहुँचते थे। इस क्षेत्र की समृद्धि इतनी थी कि शेष गढ़वाल के लोग इसे “छोटी विलायत” के नाम से जानते थे। लेकिन वक्त की करवट के साथ ही 1909 में कोटद्वार-दुगड्डा-लैंसडाउन छकड़ा सड़क निर्माण होते ही चौकीघाटा – लालढांग ढाकर बाजार के दुर्दिन शुरू होने प्रारंभ हो गए और स्वतंत्र भारत तक पहुँचते पहुँचते इस क्षेत्र के बाटे-घाटे सम्पूर्ण गढवाल के लिए भूले-बिसरे गीत से बन गए लेकिन रस्सी का बल भला कैसे घट सकता था। उत्तर प्रदेश राज्य निर्माण के पश्चात उपेक्षाओं के दंश ने इस क्षेत्र के लोगों को लालढांग हरिद्वार के निकट सरकने को मजबूर कर दिया क्योंकि यह क्षेत्र तब सडक मार्ग से दूर छिटक गया था। अगर कहें कि सबसे पहले पलायन गढवाल से किसी क्षेत्र से हुआ है तो वह क्षेत्र भी यही है जिसे छोटी बिलायत के नाम से जाना जाता है।

छोटी बिलायत…अर्थात डांडामंडल क्षेत्र या फिर यूँ कहें पौड़ी जिले का उत्तर प्रदेश से सीमा बांटता लालढांग से गंगाभोग तक अर्थात रवांसन विंध्यवासिनी नदी क्षेत्र जो उतुंग रणचूला शिखर तक फैला हुआ क्षेत्र है। इस क्षेत्र में लालढांग व कंडरह ताल मंडी के खंडहर आज भी अपने उत्थान और पतन की साक्षी बन गवाही देते दिखाई देते हैं।

विगत 08 जून 2023 को जिलाधिकारी आशीष चौहान द्वारा अपने दल-बल अर्थात सरकारी मशीनरी के साथ इस क्षेत्र में वाइल्ड टूरिस्ट/साहसिक पर्यटन की संभावनाओं को तलाश करने का बीड़ा उठाया और इस क्षेत्र के अमोला-ताछला गाँव से लेकर लालढांग तक ब्रिटिश काल तक जीवंत ढाकर मार्ग जिसे अंग्रेज साल्ट रूट कहते थे, पर ट्रैकिंग करने निकल पड़े।

इस साहसिक ट्रैकिंग के बारे में अमोला गाँववासी आशीष अमोला जानकारी देते हुए बताते हैं कि जिलाधिकारी के निर्देशन में 26 सदस्यीय टीम लगभग 3:00 बजे अपराह्न अमोला गाँव से रवाना हुई और ठीक 8:00 बजे शांयकाल हम लालढांग फारेस्ट बंगले में जा पहुंचे। उन्होंने कहा कि दल के सदस्य इस बात को देखकर आश्चर्यचकित थे कि 22 किमी. की दूरी तय करके भी डीएम साहब ने रास्ते भर कहीं पानी तक नहीं पिया।

बर्ष 1995 में मेरे द्वारा इसी रवासन नदी के तटवर्ती क्षेत्र के सिल्ली तोक में नदी छोर पर बसे वन गूर्जरों पर दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले “आँखों देखी” समाचार बुलेटिन के लिए खबर बनाई थी। तब वन विभाग से परमिशन लेकर मैंने लालढांग – फेडुआ – सीला – पंचुर – धारकोट तक सन 1965 में चलने वाली गंगा बस सर्विस की सड़क के फूट प्रिंट भी अपने कैमरे में कैद किये थे। यही नहीं वन विभाग की पेट्रोलिंग टीम के साथ मुझे समाधि चौक-मैदान-हलूंण-रौलाण तक भ्रमण का मौका मिला। यकीनन वह पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर कहा जा सकता था क्योंकि तब लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का रुतवा ही अलग था। वर्तमान में वैश्विक मंच पर आर्थिकी व व्यवसायिक पत्रकारिता के दौर ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की काफी हद तक परिभाषा बदल कर रख दी है।

आशीष अमोली बताते हैं कि यह बहुत सुखद था कि हमने अमोला से जब लालढांग के “साल्ट रूट” की यात्रा प्रारम्भ की, तब शायद जिलाधिकारी आशीष चौहान साहब जानते थे कि हम देरी से निकल रहे हैं, इसलिए उन्होंने रास्ते के विश्राम पड़ाव चंद मिनटों में ही समेट लिए क्योंकि उनके दिमाग में यह अवश्य चल रहा होगा कि हमारी टीम किसी भी सूरत में अँधेरा घिरने से पहले जंगल को पार कर सुरक्षित क्षेत्र में दाखिल हो जाय यही। कारण भी रहा कि यह 22 किमी. की दूरी जिसे ट्रैकर्स कम से कम 07 घंटे में ख़त्म करना चाहेंगे, हमने मात्र पांच घंटे में हि पूरी कर दी। आशीष जब इस यात्रा रूट के स्पॉट इंगित कर रहे थे तब मुझे अपनी 28 बर्ष पुरानी यादें ताजा हो आई व ऐसा लग रहा था मानों मैं उनके साथ-साथ चल रहा हूँ।

3:00 बजे अपराह्न अमोला गाँव से निकले 26 सदस्यीय दल अमोला से 2:00 किमी दूरी पर अवस्थित ताछला, फिर 07 किमी. दूरी पर अवस्थित मैदान पहुंचे, जहाँ हल्का सा विश्राम कर वे लोग लगभग 12 किमी. दूरी पर अवस्थित रवासन पहुंचे। वहां से लगभग 15 किमी. दूरी पर स्थित केष्ट गाँव के दऊगदनरवासन नदी के संगम के बाद रौलाण तोक पहुंचे, जहाँ मात्र 10 मिनट विश्राम करने के पश्चात् यह दल आमडाली- कटेल तोक भौंरी-चौकी (सिल्ली), – समाधि स्थल (सागुन प्लाट) होकर ठीक 8:00 बजे लालढांग अवस्थित फारेस्ट गेस्ट हाउस पहुंचा। इस दौरान जिलाधिकारी आशीष चौहान प्राकृतिक नजारों का आनंद लेने के साथ-साथ इस क्षेत्र के विकास की सम्भावनाओं को तलाशने की जुगत में लगे दिखे। उन्होंने कहा कि रवासन नदी से होकर जाने वाले 22 किलोमीटर के इस पैदल रास्ते पर वन्य जीवों से खुद को बचते-बचाते लालढांग पंहुचना चुनौतीपूर्ण है, यथा किसी उपब्लधि से कम नहीं है।

लालढांग पंहुचने पर जिलाधिकारी ने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि इस पैदल मार्ग को मुख्यत: “साल्ट रुट” के नाम से जाना जाता है, स्थानीय लोगों का कहा था कि वे इस रास्ते से नमक व गुड खरीदने के लिए लालढांग जाते थे। जिलाधिकारी ने कहा कि बिना वन्य जीव संघर्ष के रवासन नदी होते हुए लालढांग पंहुचना वन्य जीवों व मनुष्य के बीच तालमेल व क्षेत्रीय लोगों की जागरुकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि वन्य जीव और मानुष एक ही परिवेश में रह सकते है बशर्ते एक-दूसरे से नियमित दूरी हो। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के पांच दर्जन से अधिक गांवों के उपयोग में आने वाले इस पैदल मार्ग का इतिहास बहुत पुराना है जिसका उपयोग क्षेत्र के लोग दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली चीजों को गांवों तक पंहुचाने के लिए किया करते हैं। उन्होंने कहा कि राजाजी नेशनल पार्क के किनारें बहने वाली रवासन नदी का यह मार्ग क्षेत्र के लोगों द्वारा शर्टकट के रुप में उपयोग में लाया जाता है लेकिन मार्ग पर चलते समय स्वयं को जंगली जीवों से बचाने के लिए सतर्कता अति आवश्यक है। जिलाधिकारी ने कहा कि लोगों की मुश्किलों को जानने का सबसे कारगर तरीका स्वयं को उनके स्थान पर रखते हुए मुल्यांकन करने से होता है। इससे पता चलता है कि क्षेत्र के लोगों का कितना मेहनती व संघर्षशीलशील व्यक्तित्व है। इस दौरान जिलाधिकारी ने राजाजी नेशनल पार्क में वन गुज्जरों से मुलाकात करते हुए उनकी समस्याओं को सुना तथा उनकी समस्याओं के हर सम्भव समाधान का भरोसा दिया।

राजाजी नेशनल पार्क के इस पैदल मार्ग पर इस 26 सदस्यीय दल ने जंगली हाथी, बार्किंग डियर, स्पॉटेड डियर, बारहसिंघा, जंगली सुअर देखे व शेरबाघ के फूट प्रिंट भी देखे जो ज्यादात्तर के लिए कोताही का बिषय बने रहे। जैसे- रौलाण तोक में हाथी दल, भौंरी से ऊपर जंगली सूअर, आमवाली में चीतल-बारासिंगा दिखे व मार्ग भर टाइगर, शेर, हाथी के फूट प्रिंट्स ज्यादा रोमांच पैदा करते रहे।

जिलाधिकारी आशीष चौहान के नेतृत्व में यह दल “साल्ट रूट” के अमोला – ताछला – मैदान –रवासन – दोऊगदन – रौलाण तोक – आमवाली – कटेल तोक – भौंरी चौकी – समाधि स्थल होते हुए फारेस्ट गेस्ट हाउस लालढांग पहुंचा। वैसे इसके वैकल्पिक मार्ग इसके साथ-साथ आगे बढ़ते हैं जिनमें ताछला के बाद खलाशण, रवासन के बाद मोरणी, दोऊसोत के बाद कांडे गदेरादेयाणा इत्यादि प्रमुख हैं। इसके अलावा भी आप भीम चुल्ली, सतेड, बडेलसोत, ऊळपातसोत इत्यादि की जानकारी भी रख सकते हैं।

बहरहाल अगर यह क्षेत्र साहसिक पर्यटन से जोड़कर देखा जाय तो यह मैदानी भू-भाग से पर्वतीय क्षेत्र में कम दूरी का सबसे वैकल्पिक व ऐतिहासिक स्थलों में एक कहा जा सकता है जिसके आँचल में नदी घाटी पहाड़ कंदराएं व वन व वन्य प्राणियों के साथ लोक समाज का जनजीवन भी शामिल है। 1864 में उदयपुर से अलग हुए विधान सभा क्षेत्र यमकेश्वर का उदयपुर बिचला व उदयपुर तल्ला क्षेत्र में पड़ने वाले इस “साल्ट रूट” को अगर पर्यटन से जोड़कर देखा जाता है तो यहाँ के दर्जनों गाँव इसका लाभ ले सकते हैं जिनमें निकटवर्ती गाँव देवराणा, कांडे, काटल, हरसोली, कंडहर, तिमलाणी, सीता, फेडुआ, धारकोट, ताछला, अमोला, बनास, ग्वाड, जौरासी, हलदुण, मोरणी, केष्ट, खलेका, सिमलणा, भरतपुर इत्यादि प्रमुख हैं। वहीँ तालघाटी के बड़काटळ, भोगपुर, उमरथाम, हाथीथाम, भण्डारीखाल, कण्डरह, साईकिलवाड़ी ग्वाल्डा, कडाईखाल, ताल बहेड़ी, सहजादा, ख्वाड़ागदन, खैराणा, तालघेरू, तल्ला कोटा, मल्ला कोटा, खैराणा, भौरजगाॅव, कुण्ड, ताल बाॅदणी, घोरगड्डी प्रमुख हैं, जिनमें से बड़काटळ, भोगपुर, हाथीथाम, भण्डारीखाल का भूमि बदलाव किया गया और इन्हें गंगाभोगपुर तल्ला और मल्ला में विस्थापित कर दिया गया। वर्तमान में कुण्ड और भौरज गाँवताल बहेडी पलायन से मानवविहीन हो गये हैं।

26 सदस्यीय इस दल में जिलाधिकारी पौड़ी आशीष चौहान, एसडीएम यमकेश्वर आकाश जोशी, एसडीएम श्रीनगर अजयवीर सिंह, बीडीओ यमकेश्वर दृष्टि आनंद, एडीआईओ सूचना सुनील तोमर, रेंज ऑफिसर वन विभाग गेंदा लाल, ग्राम विकास अधिकारी प्रियंका चौहान, ग्राम पंचायत मंत्री पंकज रावत, आशीष अमोली (ग्राम- अमोला) पार्क क्षेत्र बिशेषज्ञ व चीला पार्क कमर्चारी इत्यादि सम्मिलित थे।

ऐतिहासिक दृष्टि में छोटी बिलायत का ढाकर मार्ग (“साल्ट रूट”) यूँ तो यह ढाकर मार्ग का अस्तित्व वैदिक काल से है लेकिन कुनिंद काल में गंगाद्वार से कार्तिकेयपुर, बद्रिकाश्रम, माणा होकर कैलाश मानसरोवर जाने वाले तीर्थ मार्ग के रूप में यह चिन्हित है। अब चाहे वह महाकवि कालिदास का मेघदूत हो या फिर पाणिनि का “उत्तरपथ” व कौटिल्य के “स्थलपथ” में वाणिज्य-पथ…संदर्भित ढाकर रूट का इसमें वर्णन सुनने व पढने को मिल जाता है। गढराज वंश के प्रारम्भ से पूर्व से प्रचलित यह मार्ग मुख्यतः राजधानी श्रीनगर तक पहुँचने का रजबट्टा (राज-मार्ग) माना जाता रहा है। इस मार्ग से ही विभिन्न चट्टियों को पार कर यात्री हर युग में बद्रीनाथ-केदारनाथ दर्शन को गए, जिसके संदर्भ आपको बहुत से धर्मग्रंथों में पढने को मिल जायेंगे। बेशक तब ऋषिकेश का जन्म नहीं हुआ था लेकिन मायापुर हरिद्वार से स्वर्गाश्रम-गंगाभोगपुर तक मार्ग व लालढांग से रवासन नदी घाटी से विंध्यवासिनी नदी घाटी होते हुए गंगा भोगपुर – घटुगाड़ – गरुड़चट्टी – फूलचट्टी – मोहन चट्टी -महादेव चट्टी – बन्दरचट्टी – ब्यासचट्टी होते हुए हम 84 चट्टियां लांघते हुए बद्रिकाश्रम पहुँचते थे। इन चट्टियों की बिशेषता यह है कि इन सब में लगभग 10 किमी. से 12 किमी. की परस्पर दूरी है।

वन-पर्यावरण, प्रकृति-वन्य जीव व साहसिक पर्यटन की नई शुरुआत।

यकीन मानिए यह नई शुरुआत अब पौड़ी जिले के धर्म-पर्यटन, साहसिक पर्यटन व वन्य पर्यावरण, वन्य जीव-जंतु सहित प्रकृति के ऐसे कई स्वरूपों से आपको रूबरू करवाने में सार्थक होगी। यह शोधार्थियों के लिए यह “साल्ट रूट” छोटी बिलायत के कई रहस्य व रोमांच व ऐतिहासिक स्वरूपों को तस्तरी में परोसकर आने वाली पीढ़ी के लिए एक नई उत्सुकता पैदा करेगा।

छोटी बिलायत के ‘साल्ट रूट’ में विचरण करने वाला पहला जिलाधिकारी।

1788 में भूटान श्रेणी के शिखरों की ऊँचाई निश्चित करने के पश्चात   रेनबेन ब्रो हरिद्वार पहुँचा था। वह चण्डीघाट के सामने लछमन झूला-नीलकंठ-लालढाँग के निकट से जाने वाले (डाँडा का मंडल) पर्वत श्रेणी में वहाँ तक चढ़ गया था, जहां से अलमोड़ा की पहाड़ियाँ तथा दूरस्थ हिमाल (नंदा देवी और चौखंभा) दिखाई देते हैं। उसने इन शिखरों की ऊँचाई का अनुमान लगाने का भी प्रयत्न किया था। (पिलीमोर- हिस्टोरिकल रिकॉर्ड्स ऑफ़ सर्वे ऑफ़ इंडिया जि. २ पृष्ठ ९० तथा 1795) में वारेन हेस्टिंग्ज़ की गढ़वाल या नेपाल के रास्ते तिब्बत व्यापार के लिए भी इसी “साल्ट रूट” को प्राथमिकता देने की बात सामने आती है। इसी उद्देश्य से नेपाल भेजे गए मौलवी अब्दुल क़ादिर ने नेपाल व भूटान मार्ग से बेहतर कि (१) ज़िला कूच बिहार में बक्सा दुआर के सीमांत पर (२) बिहार के चम्पारण सरकार (ज़िला) में, (3) नवाब-वज़ीर के राज्य में बुटवल के पास , (4) नवाब-वजीर के राज्य की दक्षिणी सीमा के पास (काशीपुर) में , (५) नवाब- वज़ीर के राज्य की पश्चिमी  सीमा के उस छोर पर जो श्रीनगर राज्य सीमा से मिलता है (लालढाँग, हरिद्वार, कनखल)।,  इन सभी में गढ़वाल राज्य की सीमा लालढाँग मार्ग से तिब्बत के व्यापार का सबसे मुफ़ीद रास्ता है। (चौधरी- इंडो – नेपालीज़ रिलेशन्स पृष्ठ – ८९ व डॉ शिवप्रसाद डबराल “चारण” गोरख्यानी- २  पृष्ठ ७४-७५)

मुझे लगता है कि रेनबेन ब्रो दोऊस्रोत अर्थात् दोऊगदेरे से चढ़ता हुआ महाबगढ़ की चोटी पर चढ़ा होगा या फिर ट्विन वैली के शीर्ष शिखर पर क्योंकि यहाँ से अल्मोडा या कुमाऊँ ही नहीं बल्कि नेपाल की उत्तुंग शिखरों के पीछे हिमालय का विशाल आलम दिखाई देता है।

1796 में अंग्रेज अफसर रिसर्चर कैप्टेन हार्डविक व 1860 में इंग्लिश ट्रेवलर फोरस्टर भी इसी “साल्ट रूट” से छोटी बिलायत होते हुए पहले देवप्रयाग तक गंगा की उलट दिशा में और फिर अलकनंदा की उलट दिशा में श्रीनगर पहुंचे थे। इसका जिक्र जीआरसी विलियम की पुस्तक “मेमॉयर ऑफ़ देहरादून के पृष्ठ संख्या 100-106 के अलावा एशियाटिक रिसर्चस VI, 322 cf, 333 gq व फोरस्टर Vol. I., page 199 से मिल जाएगा। कैप्टेन हार्डविक लिखते हैं कि “The direct road through the Doon, too, was more difficult then the more circuitous route via Kotdwara fore, gives no direct information about the condition of the valley, but he bears strong testimony to the nakedness of the land in the vicinity of Sreenugur (Shrinagar) itself.

हम सभी जानते हैं कि कालांतर में मुगलों के आक्रमण में इसी मार्ग ने कई युद्ध झेले हैं लेकिन वे कभी श्रीनगर पहुँचने में सफल नहीं हो पाए और हर बार उनके लहू से यहाँ की माटी लाल होती गई। हो न हो पहाड़ के इस पायदान को तभी लालढांग कहा गया हो। क्योंकि ब्रिटिशकाल से पूर्व मैदानी क्षेत्र से गढ़वाल में प्रवेश के लिए बद्री-केदार यात्रा-मार्ग उदैपुर (उदयपुर, वर्तमान में यमकेश्वर विधान सभा क्षेत्र) से होकर ही जाता था जिसके दो रूट चौकीघाटा (कण्वाश्रम) व लालढांग ही थे व इस सम्पूर्ण क्षेत्र पर महाबगढ़ के गढ़पति भंधो असवाल का कब्ज़ा था, जो इन चौकियों से टैक्स वसूली भी करता था व गढ़राज्य पर विपत्ति आने पर उसकी सेना ही रूहेला व मुगल सेनाओं का सामना करती थी।

गुलाम भारत में जन्मे इस क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि यह पहला अवसर है जब आजाद भारत का कोई जिलाधिकारी पैदल चलकर इस क्षेत्र में दाखिल हुआ हो, यह घटना इतिहास में दर्ज करने लायक है। हो सकता है कि जिलाधिकारी आशीष चौहान से पहले कई बड़े अफसर इस मार्ग से बद्रीनाथ यात्रा पर गए हों लेकिन वे पैदल गए होते तो अवश्य क्षेत्रवासियों के साथ वह लोक व लोकगीतों में दर्ज होते। क्षेत्रीय भाजपा नेता व  गढ़वाल सांसद प्रतिनिधि चंडी प्रसाद कुकरेती का कहना है कि जिलाधिकारी आशीष चौहान के इस दौरे से क्षेत्रीय लोगों में एक आस जगी है क्योंकि इस “साल्ट रूट” पर सन 1965 में वन विभाग से परमिशन लेकर मैंने लालढांग-फेडुआ-सीला-पंचुर-धारकोट तक चलने वाली गंगा बस सर्विस भी तब राजा जी नेशनल पार्क में एंट्री पर टैक्स चुकाया करती थी व इस क्षेत्र के लोग बड़ी आसानी से हरिद्वार देहरादून जैसे महानगरों में दैनिक दिनचर्या के काम निबटाकर शाम को घर पहुँच जाया करते थे। जिलाधिकारी अगर अपनी संस्तुति में भारत सरकार के वन मंत्रालय को पत्र लिखकर दें कि यह रूट छोटे वाहनों के लिए फिर से प्रारम्भ कर दिया जाय तो सम्पूर्ण यमकेश्वर विधान सभा की लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या को राजधानी व हरिद्वार पहुँचने के लिए सैकड़ों किमी. की यात्रा बच जायेगी व हम तथा साहसिक पर्यटन के चितेरे इस खूबसूरत मार्ग को अंगीकार करते हुए वन्य जीवों व वन्य प्रकृति के साथ मैत्रीपूर्ण मूक संवाद करते हुए अपनी दिनचर्या को और सुगम बना सकते हैं। क्षेत्रीय जनता से प्राप्त होने वाला वन्य-क्षेत्र टोल-टैक्स देश के राजस्व में वृद्धि ही करेगा। जिलाधिकारी आशीष चौहान की कार्यप्रणाली की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि काश…सम्पूर्ण उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों को ऐसे ही कर्मठ व कर्मशील अधिकारी मिल जाएँ तो यह माटी धन्य हो जाय।

कमाल-जमाल बनाम कल्लु कलाल और जल्लु जलाल।

यह प्रकरण सचमुच अद्भुत है क्योंकि यहाँ लोगों के मन में कई संदेह हैं! अक्सर लोगों के मन में यह बात है कि कमाल व जमाल नाम अगर सोचा जाय तो किसी मुस्लिम के नामों से प्रचलित हैं। इसे पुख्ता करने के लिए अचानक स्वतंत्र भारत के दौर में यहाँ समाधि चौक नामक स्थान में जहाँ काली मंदिर है व हर साल यहाँ शिबरात्रि के दूसरे दिन मेला लगता है। एक मजार बना दी गई। पार्क क्षेत्र में मजार निर्माण बड़ा आसान काम था।

जनश्रुति के आधार पर लोगों का कहना है कि उस काल में यहाँ कोई मुस्लिम वन अधिकारी नियुक्त रहा जिसने सिर्फ यहीं नहीं बल्कि राजा जी नेशनल पार्क के विभिन्न क्षेत्रों में मजारें बनाई हैं। खैर यह प्रसंग दूसरा है क्योंकि यहाँ कमाल व जमाल को लेकर कई जनधारणायें हैं। कुछ मत हैं कि ये सिद्ध पुरुष थे व यह उन्ही की समाधि है। कुछ का मानना है कि कमाल मूलतः कल्लु कलाल था जिसके पूर्वज राजस्थान के रजवाड़ों में नौकरी किया करते थे व औरंगजेब काल में अपने विश्वासपात्र नौकरों के साथ राजाओं ने अपनी रानियाँ, दासियाँ व पुत्रियाँ सुरक्षित स्थानों पर भेज दी थी। तब ये बोक्सा व थारु जनजाति के लोग छुपते छिपाते तराई भावर के जंगलों में आ बसे। औरंगजेब के क्रूर शासन में न राजस्थान के राजा ही बचे न रजवाड़े…! बहुत बर्षों इन्तजार के बाद भी जब कोई शुद्ध लेने वाला न रहा तो इन रानियों उनके बच्चों व दास दासियों ने इन्ही थारु-बोक्सा जाति के लोगों के साथ विवाह सम्बन्ध कायम कर दिए। आज भी प्रचलन में है कि राजघराने की ब्याहता अपने पति को खाने की थाली परोसते समय अपने पैर के अंगूठे से उसको स्पर्श करेगी ताकि सनद रहे कि वह आज भी राजपूताना घरों की बेटियाँ हैं या उनका लहू हैं।

लोगों का मानना है कि कल्लु कलाल भी बोक्सा जनजाति का था व वह कोटद्वार भावर कलालघाटी का था। जबकि जल्लु जलाल अर्थात जमाल थारु था व वह ज्वालापुर हरिद्वार का था। ये दोनों सुल्ताना भांतु गैंग में सुल्ताना के राईट हैण्ड कहलाते थे। ये भी अमीरों का लूटा माल गरीबों में बांटते थे व उनकी नजर में ये किसी देवता से कम नहीं थे। इन्हीं के मुखबिरों के आधार पर नजीबाबाद से लेकर हरिद्वार क्षेत्र तक की समस्त डकैतियां पड़ती थी। दरअसल सुल्ताना भांतु व उसके सैकड़ों डकैत अपने आप को महाराणा प्रताप के वंशज मानते थे व इन्हें आम जन डकैत कम व स्वतन्त्रता के लिए ब्रिटिश सरकार की नाक में दम करने वाला ज्यादा मानते थे।

जमाल और कमाल नाम भी डाकू सुल्ताना जैसे ही मुस्लिम नाम लगते हैं, व सच तो यह भी है कि डाकू सुल्ताना पर बनी फिल्मों की पटकथा में भी उसका किरदार मुस्लिम सा ही दिखाई देता है जबकि सुल्ताना ‘भांतु’ जाति वंशज था जो राजस्थान में महाराणा प्रताप के यहाँ हथियार बनाने वाली वफादार कौम कहलाती थी व विशुद्ध रूप से हिन्दू जाति के हैं। लोगों का मानना है कि ब्रिटिश काल में डाकू सुल्ताना ने इसी ताल घाटी से ब्रिटिश खजाना लूट लिया था और यह लूट एक बार नहीं दो बार हुई।

कहते हैं इस क्षेत्र के एक व्यक्ति ने इनाम के लालच में यह खबर ब्रिटिश सरकार के पुलिस टीम को लीक कर दी कि लूट के बाद डकैत वर्तमान के समाधि स्थल पर आराम फरमा रहे हैं। पुलिस टीम ने घेराबंदी की। डाकू सुल्ताना व साथियों को घिरता देख कल्लुजल्लु ने मोर्चा संभाला, व सुल्ताना को यहाँ से निकालने में सफल रहे। दोनों ही इसी स्थान पर ढेर कर दिए गए व उनकी लाशों को पेड़ पर टांगा गया, बाद में डाकू सुल्ताना ने उनका क्रियाकर्म करने के पास उनकी वफादारी में यहीं समाधि स्थल बना दिया। कुछ का मानना है कि ये दोनों उस व्यक्ति की पत्नी उठा लाये थे जिसने पुलिस को खबर की थी, सुल्ताना ने इन्हें स्वयं गोली मारी। कुछ का कहना है कि जमालकमाल यहीं मुस्लिम सेना से संघर्ष करते हुए मारे गए। कुछ इसे महाबगढ़ के गढ़पति भंधों असवाल की समाधि बताते हैं तो कुछ इसे काली मंदिर के किसी सिद्ध पुरुष की समाधि…! सच जो भी हो लेकिन यह तय है कि जमालकमाल बोक्सा व थारु थे न कि मुस्लिम…!

कहा तो यह भी जाता है कि 300 हथियारबंद सिपाहियों व 50 हथियारबंद घुडसवारों के साथ अंग्रेज अफसर फ्रेडी यंग ने इसी स्थान पर 14 दिसम्बर 1923 को घेराबंदी कर तब सुल्ताना डाकू व उसके साथी पीताम्बर, नरसिंग, बलदेवभूरे के साथ गिरफ्तार किया था जब वह रवासन नदी में जमाल-कमाल की चिता को आग देने के बाद नहा रहे थे। जितने मुंह उतनी बातें लेकिन एक सच यह साफ़ है कि फ्रेडी यंग ने नजीबाबाद के पास इसी जंगल से डाकू सुलताना को गिरफ्तार किया था।

डाकू सुल्ताना भांतू और ताल घाटी का बन्नू कलाल।

सचमुच 1920-21 की यह ब्रिटिश खजाने की सबसे बड़ी लूट कही जा सकती थी। तालघाटी क्षेत्र ताल बांदनी जाने के रास्ते मे आज भी आम का बगीचा मौजूद है, उस जगह पर बन्नू कलाल नाम का व्यक्ति अंग्रेजो के लिये कच्ची शराब बनाता था, उसकी शराब की भट्टी थी, साथ ही यहीं पर अंग्रेजों का गुप्त खजाना भी था। क्योंकि सम्पूर्ण डांडा मंडल क्षेत्र अर्थात चंडी परगने को तो अंग्रेज अफसर हेयरसे ने 1811 में ही राजा सुदर्शन शाह क़े दुर्दिनों में मात्र 3005 रूपयों में खरीद लिया था। सुल्ताना डाकू को मुखबिरों से खबर मिली कि यहाँ शराब पीने के लिए नहीं बल्कि अंग्रेजों के गुप्त खजाने की रेख-देख के लिए पुलिस रहती है व सम्पूर्ण टैक्स वसूली का लाखों रुपया यहीं तहखाने में छिपाकर रखा गया है तब अपने गिरोह के साथ डाकू सुल्ताना ने यहाँ डकैती डाली व पूरा गुप्त खजाना उड़ा ले गया साथ ही उन्होंने बन्नू कलाल को भी जमकर लूटा। जब यह बात आग की तरह फैली तब ब्रिटिश सरकार ने इसे बेहद गंभीरता से लिया व अपने सबसे शातिर, बहादुर व चालाक अफसर फ्रेडी यंग को डाकू सुल्ताना को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी सौंपीतालघाटी क्षेत्र ताल बांदनी जाने के रास्ते मे आज भी आम का बगीचा मौजूद है, उस जगह पर बन्नू कलाल नाम का व्यक्ति अंग्रेजो के लिये कच्ची शराब बनाता था उसकी शराब की भट्टी थी, साथ ही वँहा पर अंग्रेजो का गुप्त खजाना भी था। सुल्ताना डाकू अपने गिरोह के साथ लगभग 19वी शताब्दी में तालघाटी के उक्त शराब की भट्टी में आया और वँहा से धन लूटकर ले गया। उक्त जगह पर यह भट्टी आजादी के कुछ वर्षों तक उस स्थान पर रही जिसे डांडामण्डल क्षेत्र के आजादी के क्रान्तिकारियों ने तोड़ दी। जानकारी मुताबिक 1942 की भारत छोड़ो आन्दोलन कि चिंगारी का असर तालघाटी में भी पड़ा, डांडामण्डल क्षेत्र किमसार के कुशाल मणी कंडवाल, बेंगरा रामजीवाला के  माधो सिंह रावतनारायण भट्ट, किमसार के ही कुशाल सिंह बिष्ट आदि ने रात में जाकर उक्त भट्टी को तहस नहस कर दिया और वँहा शराब बनाने वाले बर्तन भडू को उठाकर ले आये, उसके बाद इन लोगो को ब्रिटिश गढ़वाल के कमिश्नर ने बागी घोषित कर इन्हें पकड़ने का हुकुम दे दिया गया। कहा जाता है कि ये लोग किमसार औऱ रामजीवाला के मध्य थूपुलडंग में बनी गुफा में छूपकर निवास करते और वंही बैठकर योजना बनाते थे। आज भी स्व0 माधो सिंह रावत के पुस्तैनी घर मे शराब बनाने वाले लूटे गए भडू उपलब्ध है। बन्नू कलाल को सुल्ताना ने दो बार लूटा, बन्नू कलाल को लूटने की वजह यह बताई जाती है कि उसने डांडामंडल के लोगों को शराब की व नचनिये की लत लगा दी थी।

(सन्दर्भ:- Himalayan Discover artical उत्थान के बाद वीरान हो गई तालघाटी, कभी गुलजार होती थी कंडहर ताल मंडी 18 जुलाई 2020), Himalayan Discover artical ताल घाटी और सुल्ताना डाकू…! 06 जुलाई 2020), Refrences Dinesh Kandwal/Harish Kandwal)

छोटी बिलायत की गंगा बस सर्विस व उदय सिंह तडियाल का गीत।

कुछ लोग युग पुरुष बनने के लिए ही जन्म लेते हैं। ऐसे ही युगपुरुष तब ठेकेदार उदय सिंह तडियाल बन बैठे जब पूरे डांडामंडल अर्थात छोटी बिलायत क्षेत्र में उनके नाम पर गीत बनने लगे व वह आंगनों में माँ बहनों के थडिया-चौंफला बाजूबंद में शामिल हो गए। इस क्षेत्र में सड़क मार्ग की समस्या को देखते हुए इस व्यक्ति ने अपनी बर्षों की कमाई से अपनी बेटी गंगा के नाम पर “गंगा बस सर्विस” कम्पनी खोली व अपने निजी प्रयासों से ही अपनी कमाई की पाई-पाई लगाकर 1951 में इस क्षेत्र में कच्चे मोटर मार्ग का निर्माण करवाया और इस पर लालढांग – फेडुआ – सीला – पंचुर – धारकोट – ताल कंडहर तक गंगा बस सर्विस का लगभग 15 बर्ष संचालन किया। लेकिन गंदी राजनीति के शिकार होने के कारण यह बस सर्विस बंद हो गई व इसके बाद इसमें गाड़ियों के संचालन की अनुमति नहीं मिली या यूँ कहें उदयसिंह तडियाल के स्वर्ग सिधारने के साथ ही यहाँ भी बंदिशें लग गई। 1983 में राजा जी रिजर्व टाइगर पार्क बन जाने के बाद अब सम्भावनाएं और धूमिल हो गई।

छोटी बिलायत की तीन पटवारी चौकियां।

इस ‘साल्ट रूट’ अर्थात छोटी बिलायत के तल्ला, मल्ला व बिचला उदयपुर के ढांसी, खेड़ारणचूला में ब्रिटिश कालीन पटवारी चौकी निहित की गई थी। ये तीनों ही इस क्षेत्र के थोकदार असवालों के गाँव थे, जिसमें ढांसी के बिष्ट हुए जो

अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने इन्हें संवेदनशील घोषित करते हुए ही यहाँ पटवारी चौकियों का निर्माण करवाया। तल्ला व बिचला बदलपुर जहाँ इसी साल्ट रूट से जुड़ा हुआ क्षेत्र हुआ वहीँ मल्ला बदलपुर चौकी घाटा कण्वाश्रम से गढवाल में प्रवेश करने वाला वह यात्रा रूट था जो कमिश्नरी पौड़ी की पर्वत श्रृंखलाओं को लांघते हुआ सुदूर तिब्बत तक पहुँचता था।

ब्रिटिश काल में वन्यजीवों का शिकार करने के लिए फारेस्ट डिपार्टमेंट देता था 02 रुपये से 10 रुपये।

शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं की इस मैदान को स्पर्श करती पहाड़ियों की तलहटी के इस वन्य क्षेत्र जो वर्तमान में राजा जी नेशनल पार्क के रूप में चिहिन्त है, में वन्य जीवों के रूप में टाइगर्स (बाघ/ शेर धारीदार), स्लोअथ बेयर (झाबुर/आलसी भालू), लेपर्ड (गुलदार), ह्येनस (लक्कड़बघा), जेरो (महा/सांभर), स्पॉटेड डिअर (चीतल), फोर होर्न्स डियर (चौसिंगा), ट्वेल्व होर्न्स डिअर (बारासिंगा), घुरल, बार्किंग डिअर (काखड), पिग्स (सुअर), पोर्कपाइन (साही/सेई/सोलू), मंकी (बंदर), लंगूर, वाइल्ड कैट (जंगली बिल्ली), लायंस (शेर), वूल्व्स (भेडिये), सेरु, ब्लैक बियर (काला भालू), वाइल्ड डॉग्स (जंगली कुत्ते), हॉगडियर (परहा), Pythons (अजगर), स्नैक्स मैनी केटेगरी (विभिन्न प्रजाति के सांप), लोमड़ी इत्यादि बहुतायत मात्रा में पाए जाते हैं, जिन्हें मारने के लिए ब्रिटिश सरकार ने टाइगर रूपये 10/-, लेपर्ड रूपये 5/-, अजगर रूपये 5/- कब-लेपर्ड रूपये 2.8/- की धनराशी रखी हुई थी।

(संदर्भ:– जर्नल एशियाटिक सोसायटी Vol. 1., page 194, मेमॉयर ऑफ़ देहरादून page 17-22, Paleontological Memoirs page 789,Vol. I., बॉटनी ऑफ़ हिमालय माउंटेन्स Vol. I. page xxvii)

निष्कर्ष।

जिलाधिकारी आशीष चौहान की नेतृत्व क्षमता का इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन्होंने स्वयं वह पहल की जिसे कोई भी आईएएस वातानुकूलित कमरे में बैठकर अपनी टीम को दिशा निर्देश देकर पूरा करवा सकते थे लेकिन ग्राउंड जीरो को अपनी खुली आँखों से निहारकर उसका इतिहास भूगोल खंगालने का प्रयास कोई बिरला अफसर ही कर सकता है। शायद उनकी इस साकारात्मक ऊर्जा से ही वह अब तक जिस भी जिले में रहे लोगों के बीच उनकी नजरों में अपना कद बढाते चले गए। उम्मीदों को पंख उनके कार्यकाल में ही लगेंगे इसकी कम सम्भावना है क्योंकि एक आईएएस मात्र दो साल ही एक जनपद में अपनी सेवाएँ देता है और अगर वह किसी बेहतरीन प्रयास में किसी राजनेता की नजर चढ़ गया तो दो साल से पहले ही उन्हें उस जिले से रुक्सत कर दिया जाता है। फिर भी गाहे-बगाहे ही सही लेकिन जिलाधिकारी आशीष चौहान पहले ऐसे जिलाधिकारी बने जो ऐतिहसिक ढाकर मार्ग (साल्टरूट) पर पांच घंटे की अवधि में 22किमी. पैदल चले।

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