● शौर्य चक्र विजेता शहीद रघुवीर की पत्नी और बच्चे खा रहे दर-दर की ठोकरें।
● नेता मरें तो उनके परिजनों को मिल जाती है सीट, जवान शहीद तो परिवार को मिलते हैं धक्के।
(गुणानंद जखमोला की कलम से)।
देहरादून के नवादा स्थित कर्नल राॅक्स स्कूल में दोपहर को पहुंचा तो प्रिंसीपल रूम में एक जींस पहने और लाल टी शर्ट पहने आर्यन अपनी मां से कुछ जिद कर रहा था। आर्यन साढ़े तीन साल का है। उसे जिद करते देख प्रिंसीपल इरा कुकरेती उसको एक खिलौना कार देती है तो वह उसके साथ खेलने लगता है। आर्यन एक वीर पुत्र है। उसने वीर अभिमन्यु के तर्ज पर गर्भ में ही सुन लिया होगा कि उसके पिता रघुवीर सिंह ने देश रक्षा में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में जान दे दी। आर्यन ने जब धरती पर आंखें खोली तो उसके सिर से पिता का साया उठ चुका था। उसकी मां रेखा उसे जरूर सुनाती होगी कि पिता ने किस तरह से दुश्मनों पर गोलियों की बौछार की और यह भी कि जब उस वीर सपूत की छाती में वो कायर गोलियां घुस रही होेंगी और रघुवीर के प्राण पखेरू उड़ने को होंगे तो निश्चित ही उसकी आंखों में सात साल का मासूम देवेश और गर्भ में पल रहे बच्चे की तस्वीर उभरी होगी। तो क्या रघुवीर ने ने यह सोचा होगा कि जिस देश की रक्षा के लिए वो अपने प्राण न्यौछावर कर रहा है वहां उसकी पत्नी और बच्चों का भविष्य सुरक्षित होगा? यदि उसे संशय होता तो क्यों अपनी जान इस देश के लिए देता?
मूल रूप से चमोली जिले के मैखोली गांव निवासी 31 वर्षीय लांस नायक रघुवीर सिंह जम्मू कश्मीर में आरआर में तैनात था। 12 फरवरी 2017 में कुलगांव जिले के एक गांव में सुबह आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में वो शहीद हो गया। लांसनायक रघुवीर सिंह ने एक आंतकवादी को मार गिराया और अपनी टीम के सामने ढाल बनकर खड़ा हो गया ताकि दुश्मन उसके साथियों पर हमला न करें। इस वीर सपूत रघुबीर के अदम्य साहस, कर्तव्यपरायणता और अनुकरणीय पराक्रम के लिए कृतज्ञ राष्ट्र ने उसे मरणोपरांत शौर्य चक्र तो दे दिया, लेकिन उसके परिवार को आज भी इंसाफ नहीं मिला।
तत्कालीन सीएम हरीश रावत ने उनकी पत्नी रेखा सिंह को सरकारी नौकरी और हरसंभव मदद देने की बात कही। रेखा एमए, बीएड हैै। सत्ता बदली तो त्रिवेंद्र चचा से वो तीन बार मिली। हर बार कहा गया कि बिटिया तुम इतनी देर से क्यों मिली? एक सप्ताह में तुम्हें जाॅब मिल जाएगी। देखते ही देखते चार साल बीत गये लेकिन वो एक सप्ताह नहीं आया। वो डीएम से लेकर सीएम तक धक्के खा रही हैॅ लेकिन सुनवाई नहीं हो रही। चमोली की डीएम स्वाति भदौरिया कहती हैं कि समूह ग में पद ले आओ तो नौकरी मिल जाएगी। पूर्व सीएम त्रिवेंद्र चचा से मिली तो कहा कि अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी के पास चली जाओ। राधा रतूड़ी ने कहा कि जल्द कुछ करती हूं। लेकिन आज तक कुछ नहीं किया। मैंने आज दोपहर को रेखा के सामने ही अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी से बात की तो उन्होंने कहा कि अब सैनिक कल्याण विभाग फेंगाई के पास है। उनसे संपर्क करें।
मैं पूछता हूं कि सल्ट में विधायक सुरेंद्र जीना का निधन हो गया तो उसके भाई महेश जीना के लिए पूरी सरकार सल्ट में बिछी हुइ्र्र है। एक ऐसे आदमी के लिए जिसने कभी कोई सामाजिक कार्य नहीं किया। जिसका प्रदेश से भी कोई लेना-देना नहीं था। दिल्ली में व्यवसाय कर रहा था। भाजपा सरकार ने उसे जनता के सिर पर बिठाने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। सल्ट एक उदाहरण मात्र है। ऐसा ही विधायक मगन लाल शाह, कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत, झबरेड़ा के विधायक सुरेंद्र राकेश समेत कई नेताओं के परिजनों के साथ किया गया है। जब नेताओं के लिए उनके परिवार और वंशवाद के लिए सीट तैयार है तो फौजी की शहादत के बाद उसके परिवार के लिए एक अदद सी नौकरी वाली सीट तैयार क्यों नहीं है? क्या नेताओं का ही परिवार होता है फौजी का नहीं? लानत है ऐसे नेताओं, ऐसे अफसरों और ऐसी सरकार पर।

