Wednesday, February 25, 2026
Homeलोक कला-संस्कृतिलोकगायक जीत सिंह नेगी के 94वें जन्मदिन पर प्रदेश भर के संस्कृतिकर्मी...

लोकगायक जीत सिंह नेगी के 94वें जन्मदिन पर प्रदेश भर के संस्कृतिकर्मी उमड़े!

देहरादून 2 फरवरी 2019 (हि. डिस्कवर)।

देवभूमि आर्ट्स क्लब के तत्वाधान प्रदेश के संस्कृतिकर्मियों, रंगकर्मियों व फ़िल्म स्टेज कलाकारों द्वारा प्रेस क्लब में सुप्रसिद्ध लोकगायक जीत सिंह नेगी का 94वां जन्मदिन बड़ी धूमधाम से मनाया गया।देवभूमि आर्ट्स क्लब के राजेन्द्र चौहान द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, हास्य कलाकार व वर्तमान में राज्य मंत्री दर्जा प्राप्त सँस्कृति विभाग के उपाध्यक्ष घनानन्द सहित कई सुप्रसिद्ध कला संस्कृति प्रेमियों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की। इस दौरान कई सँस्कृतिकर्मियों द्वारा अपने उदगारों में लोकगायक जीत सिंह नेगी से जुड़ी यादों को साझा किया गया। कार्यक्रम का संचालन कर रहे संगीतकार राजेन्द्र चौहान ने कहा कि जीत सिंह नेगी उत्तराखण्ड के पहले ऐसे लोककलाकार हैं जो सर्वप्रथम गीतकार व गायक कलाकार कहलाये। उन्हीने सन 1949 में अपने गीतों का ग्रामोफोन बाजार में उतारा। सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने जीत सिंह नेगी से जुड़ी अपनी यादें ताजा करते हुए कहा है कि जब हम में से कई जन्में भी नहीं थे तब जीत सिंह नेगी के गीत ग्रामोफोन के माध्यम से हम तक पहुंच गए थे। उन्होंने कहा तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि एकल गायन में कोई गीत गाया भी जा सकता है ।

उन्होंने कहा कि उन्होंने टी सीरीज कंपनी से लोकगायक जीत सिंह नेगी के गीतों पर एक कैसेट निकाला जो उस समय सुपरहिट हुआ। वहीं हास्य अभिनेता व राज्य मंत्री (दर्जा प्राप्त) घनानंद ने कहा कि वे तब बच्चे हुआ करते थे वे लैंसडौन में पढ़ा करते थे। तब वे लोग कर्नल के बंगले के पीछे ग्रामोफोन पर उनके गीत सुनने जाया करते थे। उस दौर में इस बात का भी डर रहता था कि कहीं कोई हमें पकड़कर हमारा रामतेल बनाने न ले जाय। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि राजेन्द्र चौहान जैसे व्यक्ति की वह खुलकर प्रशंसा करते हैं क्योंकि वे अपने से सीनियर कलाकारों को ऐसा मंच दे रहे हैं। इस दौरान गढ़वाल सभा के अध्यक्ष रोशन धस्माना व फ़िल्म अभिनेता बलराज नेगी व गीतकार गायक दरवान नैथवाल ने जीत सिंह नेगी द्वारा रचित नाटकों जिनमें जीतू बगडवाल व माधौ सिंग भंडारी पर चर्चा करते हुए अपने अपने अनुभव बांटते हुए कहा कि वे इन नाटकों में विभिन्न किरदार निभाते ताये हैं। इस दौरान फ़िल्म अभिनेता कांता प्रसाद ने भी अपनी बात रखी।लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी व लोकगायिका कल्पना चौहान ने अपने अपने अंदाज में लोकगायक जीत सिंह नेगी के गीतों को गायक उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं प्रेषित की।

लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने दुबई से जुड़े एक संस्मरण की चर्चा करते हुए कहा कि वो जब दुबई गए थे तो वहां के प्रवासियों में जो भी बुजुर्ग थे उन्होंने मुझसे कहा- नेगी जी, आपके गीत के कैसेट्स तो हम मंगाकर सुन ही लेते हैं लेकिन जीत सिंह नेगी जी के गीत बेहद दुर्लभ हो गए हैं! अगर वे हमें कहीं से प्राप्त हो जाते तो हमें ख़ुशी होती! आकर मैंने यह चर्चा जीत सिंह नेगी जी से की और उनसे अनुरोध किया कि मैं आपके गीत गाकर उन लोगों तक आपकी आवाज बनना चाहता हूँ जो आज भी आपकी आवाज सुनने को बेताब हैं! जीत सिंह नेगी जी इस बात को सुनकर काफी खुश हुए और उन्होंने मुझे अपनी रचनाओं की एक पुस्तक भेंट की! जिसकी मैंने टी-सीरीज कैसेट कम्पनी से बेहद जोर डालकर “तू होली वीरा” नामक एक ऑडियो बाजार में उतारी व पूरी कोशिश की कि उसका संगीत भी ठेठ उसी दौर का हो जिस दौर में उनके ये गीत आये थे! मेरी यह भी कोशिश रही कि मैं जब भी गायुं तो वह आवाज नरेंद्र सिंह नेगी की नहीं बल्कि जीत सिंह नेगी की बने! फिर टी-सीरीज से लड़-झगड़कर मैं उनके गीतों के पारिश्रमिक का चेक जब उन्हें देने गया तो उनकी आँखों में आंसू आ गये! उन्होंने कहा कि ऐसा कभी नहीं हुआ मेरे साथ कि कोई मेरे गीतों को इस तरह पारिश्रमिक लाकर दे! उन्होंने दो पंक्तियाँ लोकगायक जीत सिंह नेगी के गीत ” घास काटिकी प्यारी छैला हे, रुमुक पौड़ी ग्ये घार ऐ जादि!” सुनाकर उन्होंने अपनी यादें ताज़ी की ! उन्होंने राजेन्द्र चौहान की दिल से प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने ऐसे कई प्रयास मूर्धन्य कलाकारों के लिए करने शुरू कर दिए हैं जो बेहद प्रशंसनीय हैं!

वहीँ सुप्रसिद्ध लोकगायिका कल्पना चौहान ने इस दौरान लोकगायक जीत सिंह नेगी का गीत “दरजी दीदा मैकू भी अंगडी सिलै दे..अंगडी पर चमकदार मगज लगै दे! कल्पना ने कहा यह गीत उन्होंने रेखा धस्माना उनियाल के उत्कंठ से सुना था! ज्ञात हो कि अस्वस्थता के कारण लोकगायक जीत सिंह नेगी का कार्यक्रम में पहुंचना सम्भव नहीं था! उनकी जगह उनके पुत्र आये थे जिन्होंने उनके पुष्प गुच्छ शाल वगैरह स्वीकार किये! व कार्यक्रम के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की!

वरिष्ठ पत्रकार वेद विलास उनियाल ने संस्कृति विभाग उत्तराखंड सरकार की अकर्मण्य कार्यशैली पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए सोशल साईट पर लिखा कि अगर उत्तराखंड और भारत देश जीत सिंह नेगीजी के गीत और गायन से परिचित नहीं है तो सबसे बडा दोषी उत्तराखंड का संस्कृति विभाग है। जो राज्य अपने इतने बडे लोक गायक कलाकार जिसकी प्रसिद्धी दिग दिगंत होनी चाहिए थी, उसे नहीं जाना पाया तो दोषी कौन । हर साल करोडो बांटने वाला संस्कृति कला विभाग।

उत्तराखंड की स्थापना के मूल कारणों को ठुकरा कर 18 साल तक इस विभाग के लोगों ने संजीदा वास्तविक जमीन से जुडे लोक कलाकारों मौलिक कलाकारों की घोर उपेक्षा की। अनाप शनाप पैसा बांटा गया । सच तो ये है कि उत्तराखंड की मूल कला संस्कृति पर कुछ खास काम ही नहीं हुआ। जो कुछ सामने दिखता रहा है !


वह सजीदा कुछ कलाकारो संस्कृतिकर्मियों के अपने निजी प्रयासों से। वरना संस्कृति एक दो दिन के फिल्मी आयोजन की तरह हो गई है। उत्तराखंड की जिस कला संस्कृति पंरपरा को बचाने की बात होती तो जीत सिंहजी आज हमारे बीच किसी स्टार की तरह होते। तब कबोतरी देवी . वचनी देही , बेगम अख्तर या तीजन बाई का सा सम्मान पा रही होतीं। तब दुनिया पन्नालाल घोष और रविशंकर को ही नहीं कई लोक साजों और परंपरागत लोकगीतों के जानकार चंद्र सिंह राही के हुडके को भी जान रही होती। यह देश मोहन उप्रेती और बृज लाल शाह के संस्कृति लोकमंच के योगदान से परिचित होता। तब पहाडी बच्चे जान पाते कि इंद्र मणि बडोनी ने केवल उत्तराखंड राज्य की अलग नहीं जगाई थी वह एक जाने माने रंगकर्मी भी थे।

तब जगदीश ढौंडियाल को सुन कर जमाना झूम रहा होता। क्या वो किसी हेमंत कुमार से कम थे। अपनो को सम्मान कैसे दिया जाता है कैसे उनकी पूछ होती है बिहार में शारदा सिन्हा और पंजाब में गुरदास मान से देख लें। जिस उत्तराखंड को देव भूमि कहकर बडी बडी बातें होती है वहां कला और कलाकार किस तरह उपेक्षित होते रहे यह आज का नहीं पिछले अठारह साल का दौर है। पता नहीं कहां कहां के कवि गीतकार आकर पेरोडी नुमा घटिया कविता की तीन पंक्तियां सुना कर पैसा बटोर कर ले जाते हैं । कवि गीतकार घटिया कविता सुनाकर इतना पैसा ले गए हैं कि आप चौंक जाए। संस्कृति, कौन सी संस्कृति ।

पता नहीं कौन क्या कर गया। कौन कहां तिरपाल लगा कर तीन पांच कर गया। कौन क्या कर गया। किसके बैंक खाते में पैसा चला गया। लेकिन जो असल बडे कलाकार थे, जिनके पास गूढ कला थी , जिनकी कला उत्तराखंड का संवाद दुनिया से करती, उन्हें घोर उपेक्षित किया गया। शायद ये कला संस्कृति विभाग को खुश करना नहीं जानते थे। बताइए क्या किया है संस्कृति विभाग ने जीत सिंह नेगीजी के लिए। क्या किया जगदीश ढौंडियाल के लिए। क्या वचनी देही न्यूली गाने वाली आशा नेगी के के लिए। ( श्रीनगर के डोभाल बंधु नहीं होते तो वचनी देही की कला तक लोग नही जा पाते ) क्या किया गया इनकी अद्भुत कला को को देश दुनिया तक लाने के लिए। क्या किया नए उभरते कलाकारों के लिए। क्या किया छोटे छोटे समूह के नृत्य करने और समूह में गीत गाने वालों के लिए। बेचारे एक महीने की प्रेक्टिस तीन दिन का कार्यक्रम । और जेब में ढाई सौ रुपए। खाने के लिए डबल रोटी और ठंडे हाफ प्लेट भात-छोले, दो अधपकी चाय । ऊपर से अहसान कि तुम्हें सरकारी कार्यक्रम दिलाया। नहीं आओगे तो पचास और हैं मंच पर आऩे के लिए। कोई स्पष्ट नीति बनी इस उभरते कलाकारों के लिए।

जीत सिंह जी आज बेचारे पच्चानवे साल के हैं , देख नहीं पाते हैं। अब तो सुन भी कम पाते हैं। संस्कृति के नाम पर करोडों बांट देने वाले संस्कृति विभाग ने पंद्रह पैसे भी जीत सिंहजी को कभी मदद के लिए शायद नहीं दिए. ।उत्तराखंड जीत सिंह नेगी, जगदीश ढौंडियाल वचनी देही जैसे नामों को नहीं जान पाया। किसका दोष । लोग सोहन दास के ढोल को भी नहीं जान पाते, इलाकों के श्रेष्ठ गवैये , हुनर बाजों को नहीं जान पाते, अगर इस राज्य में प्रो डी आर पुरोहित , प्रीतम भर्तवाण और पश्चिम मुल्क का विलियम सेक्स जैसे चिंता करने वाले नहीं होते। अब उत्तराखंड के लोग चौंक रहे हैं कि ढोल बजाने वाले ही नहीं , ढोल बजाने वाली भी इस राज्य में हैं। नरेंद्र सिंह नेगी , गोपाल बाबू गोस्वामी, प्रीतम सिंह भर्तवाण बसंती विष्ट, रेखा धस्माना उनियाल की प्रसिद्धी अपने दम खम से हैं। संस्कृति विभाग की कृपा से नहीं।

इस राज्य के बनने के बाद कई लोगों की पौ बारह हुई। किसके लिए ये संस्कृति विभाग। जीत सिंहजी को उनके जन्मदिन पर शुभकामना देते है। ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखे । नई पीढी को उनका परिचय कराता रहे।लेकिन दोष संस्कृति विभाग का भी इतना नहीं। सबसे बडा दोष उत्तराखंड क्रांति दल और उनके नेताओं का है, जो लाल बत्ती के लिए झूठे पत्तल चाटते रह गए। एक आंदोलन को खत्म किया , मिट्टी में मिलाया हालात के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार उक्रांद के नेता है !आइए जीत सिंहजी का एक पुराना गीत दर्जी दिदा मैकु अंगडी सिले दे गीत सुनते हैं।

इस दौरान उत्तराखंड फिल्म एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनील नेगी, वरिष्ठ रंगकर्मी व साहित्यकार मदन डुकलान, कवि व गीतकार मधुसुदन सुन्द्रियाल, संजय कुमोला, विनोद चौहान, वरिष्ठ पत्रकार व आन्दोलनकारी लक्ष्मी प्रसाद थपलियाल, श्रीमती ऊषा नेगी, गायिका संगीता ढोंडियाल, गायिका पूनम सती, जौनसारी गायक सन्नी दयाल, वरिष्ठ रंगकर्मी मणि भारती, अभिनेत्री गीता उनियाल, गायक रोहित चौहान, गोविन्द नेगी, अब्बू रावत, शैलेन्द्र पटवाल सहित कई लोककलाकार व संस्कृति व् रंगकर्मी मौजूद थे!

Himalayan Discover
Himalayan Discoverhttps://himalayandiscover.com
35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
RELATED ARTICLES