Sunday, March 22, 2026
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कण्वाश्रम का राजदरबार..! वैदिक काल का या फिर महाभारत काल के मोरध्वज का।

कण्वाश्रम का राजदरबार..! वैदिक काल का या फिर महाभारत काल के मोरध्वज का।

(मनोज इष्टवाल 10/11/2020)

घसियारी मन्दिर के बाद चढाई ज्यादा कठिन न होने के कारण हमारी साँसों की धौकनी को कुछ आराम मिलना शुरू हुआ। यहीं हमसे नरेश की मुलाकात हुई जो यहां से लगभग डेढ़ किमी. ऊपर उरख्यालि नामक स्थान में वन गूजरों के कैम्प में रहता है। वह दूध बांटकर वापस अपने डेरे में लौट रहा था। नरेश की किस्सागोई पर बाद में चर्चा करेंगे। फिलहाल हमारी 15 सदस्यीय टीम का एकमात्र लक्ष्य “वैदिक कालीन मालन घाटी सभ्यता की शोध यात्रा” के दौरान ऐसे प्रमाण जुटाना पहला लक्ष्य था जो साक्ष्यों के आधार पर तय कर सके कि हमारे कदम जहां पड़ रहे हैं वह क्षेत्र ऋषि कण्व, विश्वामित्र, कश्यप इत्यादि की तपोस्थली होने के साथ-साथ वैदिक कालीन राजा दुष्यंत-शकुंतला से लेकर उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट भरत की कर्म व जन्मस्थली है।

अब हम घोर हाथी कॉरिडोर क्षेत्र से गुजर रहे थे, यह तय था कि एक दिवस पूर्व हाथियों का विशाल झुंड उस क्षेत्र से गुजरा होगा क्योंकि यहां बांस की पत्तियां चट की हुई थी व उनकी लीद पूरे रास्ते भर गिरी हुई थी । कहते हैं हाथी का गोबर न लीपने के काम आता है न ओपले बनाने के काम। खैर सब दिग्भर्मित हो रहे थे कि इतनी विशाल काया के हाथी ऐसे पहाड़ पर कैसे चढ़ जाया करते हैं। कुछ सहपाठी पीछे छूट गए थे जिन्हें अधिवक्ता अमित सजवाण द्वारा दी गयी सीटियों के माध्यम से उनके नजदीक दूर होने का अनुमान लगाया जा रहा था। हम सब विश्राम के लिए एक लंबे से पत्थर के पास बैठ कर उनका इंतजार करते रहे। लगा यह पत्थर सिर्फ हमारा ही बिश्राम स्थल नहीं है बल्कि घसियारियों का बिश्राम स्थल भी है, क्योंकि उन्होंने इस पत्थर को अपनी दरांतियों से घिसकर इसे पल्यन्थर (औजार तेज करने का माध्यम) बना रखा था।

हमें सबसे ज्यादा जो चीज परेशान किये हुए थी वह यहां की बनस्पति व घास के साथ जन्में कई किस्म के कुमर थे, जिन्हें हम ऐसे कांटे कह सकते हैं जो कपडों व जूतों पर चिपककर अंदर बदन में चुभन पैदा कर रहे थे। आगे लगभग पौने तीन किमी. चलकर हमारे गाइड एक स्थान पर रुक कर बोले- इसे ही राजदरबार कहते हैं। हमारी टीम बहुत खुश हुई। इसे हमने राजदरबार समिट नाम दिया व ठेठ भेडालों की भांति कुछ पत्थर इकट्ठा कर उसे यादगार के रूप में अपनी यादों में शामिल किया। बहुत चीजें तलाशते रहे कि कुछ वैदिक सभ्यता के अंश हाथ लग जाएं लेकिन हम 5000 बर्ष पूर्व को वर्तमान में ढूंढ रहे थे तब लोग गुफाओं में निवास करते थे। मैं सोच में पड़ गया कि गुफायें भला राजदरबार कैसे कही जा सकती हैं। इसके गर्भ में जरूर कुछ ऐसा प्रामाणिक इतिहास छुपा है जो हमें नजर नहीं आ रहा है। इसी उधेड़बुन में था कि नरेश बोल पड़ा- आओ हमारे डेरे में..! वहां चाय पीते हैं।

चाय की बात हो तो भला मैं कैसे अपने को रोक सकता था। मैंने टीम मेम्बर्स से विचार विमर्श किया और पाया कि थके होने के बाद भी वे सब उरख्यालि देखना चाहते हैं।

उरख्यालि या राजदरबार…?

यह स्थान वर्तमान में बने कण्वाश्रम से ठीक पौने तीन किमी. की दूरी पर जीएमवीएन बंगले के पश्चिमोत्तर दिशा में पड़ता है। यह क्षेत्र नितांत जंगल के बीच शिखर चोटी पर बसे लगभग 150 मीटर चौड़े व 300 मीटर ढलवा लम्बाई के मैदान में बसा है। इसे चंद्रमोहन पुंगखेत बताते हैं। जो पुण्य खेत का अपभ्रंश कहा जा सकता है। यहां से उत्तर दिशा में लगभग 500 मीटर दूरी पर प्राकृतिक जल स्रोत है और उसी से कुछ पहले दो एक पौराणिक खंडहर । जिन्हें हम इमारत तो नहीं कह सकते लेकिन ये साक्ष्य जरूर हैं कि यहां कभी मानव आबादी रही होगी।

यहां वन गुर्जर सर्दियों में अक्सर अपना डेरा बनाते हैं व सैकड़ों भैंस आकर इस स्थान पर चुगान करती हैं। वह गूजरों के सरदार मोहम्मद उस्मान बताते हैं कि घनघोर जंगल के क्षेत्र में कई खूंखार जानवर रहते हैं लेकिन कभी वे यहां उरख्यालि राज दरबार क्षेत्र में नहीं घुसते। उनके पुरखे बताते हैं कि यहां किसी राजा या ऋषि ने केरबंदी कर रखी है जिससे जंगली जानवर यहां कदम नहीं रख पाते। इस स्थान में समय बिताना सचमुच बेहद सुकून देता है व यहां कोई रोग या बीमारी हमें कभी नहीं लगती।

मोहम्मद उस्मान का यह तर्क बेहद तर्कसंगत भी लगता है क्योंकि यहां आकर हमें बिल्कुल भी महसूस नहीं हुआ कि हमारे बदन में कहीं थकान है।

अमित सजवाण व चंद्रमोहन के अलावा मनोज नेगी व विनोद रावत विभिन्न दिशाओं में स्थित गांव व शिखरों के बारे में आपसी चर्चा में मगन दिखाई देते हैं। कोई पूरब दिशा में स्थित शून्य शिखर दिखाता है तो कोई उत्तर पूर्व में स्थित मथाणा गांव, कोई उत्तर रिक्चा डांडा, महाब गढ तो कोई उत्तर पूरब में स्थित बिस्तर काटल व मालन मा माल्याकार ! मैं सब शांता सुखाय भाव से उस चर्चा को सुन भी रहा था और उन दर्शनीय स्थलों को देख भी रहा था। चर्चा का अंतिम पड़ाव गाइड चंद्रमोहन की जुबान से निकला जो बता रहे थे कि हमारे ठीक पीछे केष्ठ गांव है जो यहां से लगभग 7 किमी दूरी पर है।

महिला टीम सदस्यों में सरोज कुकरेती शांत भाव से यह सब सुन रही थी वहीं प्रणिता कंडवाल अपने छोटे से केंचुवे (क्वाचा) बैग से रेडीमेड लस्सी व पेय ड्रिंक पैकेट निकाल कर सर्व कर रही थी। संजय थपलियाल, कोटनाला, अग्रवाल, निषाद व गोदियाल इत्यादि की टीम हंसी मजाक में तल्लीन थी तो यश सजवाण, युद्धवीर नेगी व प्रशांत कुकरेती अपने कैमरे मोबाइल की क्लिक में बिजी..! कभी कभार कोटनाला का कैमरा भी क्लिक क्लिक बोल देता था। सच कहें अब तक शारीरिक थकान उतर चुकी थी क्योंकि अब मस्तिष्क में तेजी से सारे परिदृश्य समाने लगे थे।

हम ऐन उरख्यालि के बिशालकाय पत्थर में बैठे थे जहां ओखलियाँ बनी थी साथ ही कुछ छोटे-छोटे कप्स भी। जिन्हें समझने के लिए उन्हें पढ़ना आवश्यक था।

ऐसी ओखलियाँ या कप्स बहुत पुरातन मानी गयी हैं । पहाड़ों में घनघोर जंगलों, ऊंची पहाड़ी गुफाओं व कठोर चट्टानों में इन ओखलियों का अस्तिव अक्सर परी लोक की गाथाओं से जोड़कर देखा जाता है। इसके मौजूदा प्रमाण मैंने स्वयं खैट पर्वत, जौनसार के आगासिया परियों के डांडे, पर्वत क्षेत्र के देवक़्यार बुग्याल क्षेत्र, सरताल सहित तमाम परीलोक की गाथाओं में देख चुका हूं। यहां की ओखलियाँ भी लगभग वैसी ही हैं व लोगों का मानना भी है कि यहां कुछ बर्ष पूर्व तक ही उन्हें धान इत्यादि की भुस्सी इत्यादि दिखाई देती थी व अक्सर धान उन्हें यहीं बड़ वृक्ष की वृक्ष लताओं के मध्य दिखाई देता था।

यहां मेरा तर्क है कि ये कप्स (ओखलियाँ) सम्भवतः ऋषि मुनियों की जड़ी बूटी कूटने के लिये तैयार की गई होंगी। मेरे इस मत का अमित सजवाण भी समर्थन करते नजर आए क्योंकि उनके हिसाब से ऐसा इसलिए सम्भव है कि यहां जड़ी बूटियों का अपार खजाना है जिसका चरक संहिता व आयुर्वेद में व्यापक प्रचार प्रसार भी मिलता है। फिर मन में संशय उभरता है कि इन्हें किस धातु के माध्यम से गोदकर बनाया गया होगा। मुझे लगता है कि पुरातत्व विभाग को इस क्षेत्र में तम्बू गाड़कर सघन शोध करना चाहिए व इन बिशाल शिलाओं पर बने इन साक्ष्यों की बर्ष प्रमाणिकता के लिए इनकी कार्बन डेंटिंग करनी चाहिए ताकि इनका काल प्रमाण निकल सके। बहरहाल यह इस बात की प्रमाणिकता थी कि इसे यूँहीं राजदरबार नहीं कहा जाता। यहां वर्तमान में झाड़ इतनी उग आए है कि कुछ भी ढूंढ पाना सम्भव नहीं इसलिये वन गूजरों की राय पर हम सबने अमल किया कि जब 10-15 दिन बाद उनकी भैंसे यह पूरा मैदान रौंद देंगी तब हम लोगों को कुछ ढूंढ पाना मुश्किल न होगा। लगता है अब उन खंडहरों की तलाश के लिए हमारे दल के दो सदस्य मनोज नेगी व विनोद रावत को यहां दुबारा भेजा जाएगा जो सम्भवतः भावर क्षेत्र के ही हैं व इन जंगलों से बखूबी परिचित भी हैं।

कण्वाश्रम की खोज व कण्वाश्रम।

कण्वाश्रम कण्व ऋषि का वही आश्रम है जहां हस्तिनापुर के राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला के प्रणय के पश्चात “भरत” का जन्म हुआ था, कालान्तर में इसी गढ़वाली खस नारी शकुन्तला पुत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा। शकुन्तला ऋषि विश्वामित्र व अप्सरा मेनका की पुत्री थी

इस क्षेत्र की प्राचीनता के संबन्ध में अन्य पौराणिक प्रसंगों का भी उल्लेख है। पाण्डवों के पूर्वज शकुन्तला और भरत तत्कालीन कुलिन्द जनपद के निवासी थे। तथा यहां के कुलिन्दराज राजा सुबाहु से पाण्डवों की विशेष मैत्री थी । कण्वाश्रम के कुछ ऊपर कांण्डई गांव के पास आज भी एक प्राचीन गुफा विद्यमान है जिसमें ३०-४० व्यक्ति एक साथ निवास कर सकते हैं। ईड़ा गांव के पास शून्य शिखर पर आज भी संन्यासियों का आश्रम है । चौकीघाट से कुछ दूरी पर किमसेरा (कण्वसेरा) की चोटी पर भग्नावशेष किसी आश्रम या गढ़ का संकेत देते हैं ।

मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम का वर्णन तमाम पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। ‘स्कंद पुराण’ के 57वें अध्याय में उल्लेख है कि मालिनी नदी के तट पर जो कण्वाश्रम नंदगिरि तक विस्तृत है, वहां संपूर्ण लोकों में विख्यात महातेजस्वी कण्व ऋषि का आश्रम है।

महर्षि कण्व की तपस्थली, मेनका-विश्वामित्र, शकुंतला व राजा दुष्यंत की प्रणय स्थली व उनके तेजस्वी पुत्र भरत की जन्म स्थली रहा है। महाभारत के संभव पर्व-72 में भी इसका उल्लेख है।

प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू 1955 में रूस यात्रा पर गए थे। उस दौरान उनके स्वागत में रूसी कलाकारों ने महाकवि कालिदास रचित “अभिज्ञान शाकुंतलम” की नृत्य नाटिका प्रस्तुत की। एक रूसी व्यक्ति ने पं. नेहरू से कण्वाश्रम के बारे में जानना चाहा, लेकिन पंडित नेहरू को इस बारे में जानकारी न थी। वापस लौटते ही पं. नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद को कण्वाश्रम की खोज का दायित्व सौंपा।1956 में प्रधानमंत्री पं. नेहरू और उप्र के मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के निर्देश पर तत्कालीन वन मंत्री जगमोहन सिंह नेगी कोटद्वार पहुंचे और चौकिघाट कण्वाश्रम में चक्रवर्ती सम्राट भरत का स्मारक  बनाया, जो आज भी मौजूद है। अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौर से और उत्तराखंड अलग राज्य बनने के बाद से आज तक भाजपा और कांग्रेस सरकारों की ओर से कई बड़ी घोषणाएं की गई। लेकिन कण्वाश्रम को आज तक कोई खास पहचान नहीं मिली।

गढ़वाल विवि के प्राचीन इतिहास, संस्कृति व पुरातत्व विभाग की टीम ने भी तीन मूर्तियों व दो स्तंभों को अपने संग्रहालय में रखा है। ये मूर्तियां व स्तंभ दसवीं व 12वीं शताब्दी के हैं। इस कालखंड में उत्तराखंड में कत्यूरी वंश का एकछत्र राज था।

कण्वाश्रम यानी कण्व का आश्रम। इसका सम्बन्ध ऋषि कण्व से है। जिनका समय आज से लगभग 5900 वर्ष पूर्व माना जाता है, इस इतिहास की पृष्ठभूमि का समझने हेतु द्वापर युग के इतिहास में जाना होगा। भगवान कृष्ण की मृत्यु के दिन से युधिष्ठिर संवत अथवा कलिसंवत का आरम्भ होता है। उसी दिन से कलियुग का प्रारम्भ व द्वापर युग का अन्त माना जाता है। युधिष्ठिर से 18 पीढी पूर्व महाराजा दुष्यन्त हुए उनके समय में महर्षि कण्व हुए जो कि आज से 5900 वर्ष लगभग पूर्व की अवधि है, उस वक्त कण्वाश्रम में एक गुरूकुल पद्धति का विश्वविद्यालय था।

राजा मोरध्वज का किला!

भावर क्षेत्र के कई ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यह राजदरबार पांडवकालीन राजा मोरध्वज का किला था जो महान कृष्ण भक्त था लेकिन यह कैसे सम्भव हो सकता है क्योंकि वर्तमान में मोरध्वज का किला तो उत्तर प्रदेश जनपद के मथुरापुर गांव में अवस्थित है जो इस स्थान से लगभग 32 किमी. दूर मालन नदी के दांये-बाएं छोर में अवस्थित है।

बिजनौर के शहर नजीबाबाद के पास मथुरापुर मोर गांव पड़ता है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र अहिक्षेत्र के नाम से जाना जाता था। उस समय यह उत्तर पांचाल की राजधानी हुआ करती थी। अहिक्षेत्र का वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग व जीम कोर्बेट ने भी अपनी पुस्तक में किया है। इस पुस्तक में बौद्व धर्म का वर्णन भी किया गया है। यह क्षेत्र गंगा एवं रामगंगा के बीच मे आता है। प्राचीन काल में शिवालिक की पहाड़ी इस क्षेत्र को तीन ओर से घेरे हुए थीजिससे आक्रमणकारी नहीं आ पाते थे। इस दृष्टि से यहां राजधानी बनाई गई थी। इस गांव में महाभारत के समय का मोरध्वज का किला है। यह किला महाभारत के उस समय की याद दिलाता है जब योगीराज श्री कृष्ण महाभारत का युद्ध समाप्त होने पर अपने भक्त मोरध्वज की परीक्षा लेना चाहते हैं जिसमें कृष्ण ने अर्जुन के साथ शर्त लगायी थी कि तुम से भी बड़ा मेरा एक भक्त है और वह है मोरध्वज उन्होंने राजा मोरध्वज के पास ऋषिवेश में पहुंचकर कहा कि महाराज मेरा शेर भूखा है और यह नरभक्षी है। राजा ने कहा कि ठीक है मै अपने मांस से इसकी भूख को शान्त कर देता हूं तो उन्होंने कहा कि नहीं यह तो किसी बच्चे का मांस खाता है तो राजा मोरध्वज ने अपने बच्चे का मांस खिलाना उचित समझा। तब कृष्ण ने कहा कि आप दोनों पति-पत्नि अपने पुत्र का सिर काटकर मांस खिलाओं अगर इस बीच तुम्हारा एक भी आंसू निकला तो यह नहीं खायेगा। इस प्रकार राजा और रानी ने अपने पुत्र का सिर काटकर शेर के आगे डाल दिया। तब कृष्ण ने राजा मोरध्वज को आर्शीवाद दिया तथा उनका पुत्र पुर्नजीवित हो गया। इस प्रकार राजा ने अपने भक्त की परीक्षा ली। उस दानी, तपस्वी भक्त राजा मोरध्वज का किला आज भी इस गांव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है।हाल ही में इस किले के पास ग्रामीणों के द्वारा की गई खुदाई में बहुत सारी समकालीन मूर्तियां निकली। जिसमें राजा मोरध्वज को मोर के ऊपर बैठा दिखाया गया है।

कण्वाश्रम व मालन नदी घाटी पर डॉ. पुष्कर मोहन नैथानी के तर्क न्याय संगत।

डॉ. पुष्करमोहन नैथानी ऐसी शख्सियत का नाम है जिन्होंने 1972 में “अभिज्ञान शाकुंतलम” का हिन्दी अनुवाद कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि मालन जहां माल्य रूप में बहती है वहीं कण्वाश्रम, विश्वामित्र आश्रम, कश्यप ऋषि आश्रम हैं व यहीं विश्वामित्र-मेनका प्रेम प्रसंग, दुष्यंत-शकुंतला प्रेम प्रसंग के बाद वैदिक काल की मालन नदी तट पर कश्यप ऋषि आश्रम में भरत का जन्म हुआ। जो जन्म लेने के बाद अपनी माँ शकुंतला के साथ कण्वाश्रम में पला बड़ा हुआ।

यहां उनका तर्क है कि वर्तमान कण्वाश्रम से लगभग साढ़े तीन मील दूर विस्तर काटल गुफा में विश्वामित्र जब तपरत थे तब मेनका ने यहीं उनकी तपस्या भंग की थी जो कि मालन घाटी क्षेत्र में है। क्योंकि इसी क्षेत्र में मालन नदी के दाँयीं ओर किमसेरा नामक स्थान पर कण्वा ऋषि आश्रम है। वहीं मैडा (मेनका का निवास स्थल जिसे वर्तमान में चुन्ना मयडा गांव से जाना जाता है ) हैं। वहीं शास्त्र संगत तथ्यों के आधार पर अगर इतिहास को कुरेदा जाय तो उसके पांच प्रमुख कारक जरूर ढूंढने चाहिए जिनमें सत्य, तथ्य, पथ्य, पच्य व कथ्य शामिल होते हों।

डॉ. नैथानी के तर्क हैं कि हेमकूट अर्थात हेम=सोना, कूट=किला/महल/क्षेत्र, होता है। वहीं महाबगढ  का अगर संधि विच्छेद किया जाय तब यह महाब=स्वर्ण, गढ=किला या महल कहलाया। यहां शास्त्र संगत सभी बातें उपलब्ध हैं अब चाहे वह स्वर्ग से लौटते समय राजा दुष्यंत के रथ के पहियों का हेमकूट पर्वत शिखर पर वहां की वृक्ष लताओं से टकराने का प्रसंग हो या फिर पांच शुक शावकों द्वारा नवजात जन्मी शकुंतला के मांस पिंड की रक्षा करने वाले स्थान सेंतुला धार का वर्णन हो वह सब इसी क्षेत्र में विद्धमान है। फिर इसमें कहाँ यह कहने सुनने को रह जाता है कि वैदिक कालीन नदी घाटी मालन वही क्षेत्र है जहां चक्रवर्ती सम्राट भरत का जन्म हुआ था जो महाभारत काल के सोलह चक्रवर्ती सम्राटों में सबसे श्रेष्ठ सम्राटों में एक हुए।

डॉ. पुष्कर मोहन नैथानी ने ऐसे की अन्य तर्क भी प्रस्तुत किये जो लाजवाब थे लेकिन एक तर्क पर मेरी सुई अटक कर रह गयी कि ऋषि विश्वामित्र पूर्व में खस राजा थे। अगर यह सच है तब मैं उन्हें बिस्तर काटल की जगह राजदरबार नामक स्थान से जोड़ना पसन्द करूँगा क्योंकि यह स्थान भी बिस्तर काटल के सामांतर ही विस्तर काटल से दक्षिण दिशा में मात्र दो ढाई किमी. दूरी पर अवस्थित है, और यहां ग्रामीण मतानुसार ऐड़ी, आंछरियों, परियों अप्सराओं का निवास स्थल है।

मेरे व्यक्तिगत शोध में सत्य, तथ्य, पथ्य, पच्य व कथ्य।

शास्त्रों के अनुसार देवराज इन्द्र के स्वर्ग में 11 अप्सराएं प्रमुख सेविका थीं। ये 11 अप्सराएं हैं- कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा। इन सभी अप्सराओं की प्रधान अप्सरा रम्भा थी।
अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008 तक बताई गई है। कुछ नाम और- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता, बुदबुदा, चन्द्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा, हर्षा, इन्द्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा, लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मिश्रास्थला, मृगाक्षी, नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा, रक्षिता, ऋतुशला, साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका, सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता, उमलोचा आदि प्रमुख हैं। ऐसे में मेनका स्वयं स्वर्ग से अवतरित होकर यहां अकेली नहीं आई थी बल्कि उनके साथ उनकी दास-दासियाँ ऐड़ी आँछरियाँ भी रही होंगी। जो स्वर्ग व पृथ्वी की गिरी कन्दराओं में निवास करती हैं। राजदरबार के वर्तमान प्रमाण यह साबित करते भी हैं कि यहां किसी काल में अप्सराएं विचरण अवश्य करती रही होंगी, क्योंकि यहां की ओखलियाँ उसका प्रमाण देती नजर आती हैं। ये ओखलियाँ ग्रामीण ओखलियों से बिल्कुल भिन्न हैं।
बहरहाल राजदरबार ऋषि विश्वामित्र -मेनका का था या फिर राजा मोरध्वज का ..! इस सब पर अभी भी व्यापक शोध आवश्यक है। क्योंकि यहां मिली मूर्तियां गाहे-बगाहे कत्यूरी काल की मानी गयी हैं। सिर्फ यहीं नहीं जहां जहां भी कण्वाश्रम माना गया वहां मिली मूर्तियां उसी काल की बताई गई हैं। आज भी पाषाण शिलाओं पर पूरा काम हुआ है या नहीं यह कहना सम्भव नहीं है क्योंकि भारत बर्ष की की इस धरा में लाखों बर्ष पुराने जीवाश्म मिले हैं जो यहां की मानव सभ्यता की गवाही देते नजर आते हैं।
ए एस आई कब अपनी खुदाई का कार्य करता है व कब प्रमाणिकता जुटाता है यह कह पाना भी उतना ही कठिन है जितनी कठिन हमारी यह शोध यात्रा। राजदरबार से रुक्सत होने से पूर्व हम जीएमवीएन की रीजनल मैनेजर सरोज कुकरेती द्वारा बनवाये गए आलू गुटके व प्रणिता कंडवाल के पिटारे से निकले गुलाब जामुन खाना नहीं भूले।
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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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