Sunday, July 21, 2024
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बुढियात…! खत्त पंचगाई व कांडोई भरम में सिमटकर रह गई संस्कृति अचानक समाल्टा गांव में हुई उजागर।

(मनोज इष्टवाल)

बर्ष 2008-09 ग्राम सलगा…! अभी होलियात की सुबह के होले (भैले) जलाकर हल्की सी झपकी ही ली थी कि एक रसभरी सामूहिक आवाज का गायन व ढाक व मूंदे की आवाज कानों में  गूंजने लगी। ढाक अर्थात छोटी ढोलकी व मूँदा अर्थात शिब डमरु या हुड़का…! मैं उठा तो देखा शीला नेगी की भतीजी चाय व च्यूड़ा लिए खड़ी थी। बोली- अंकल जी नमस्ते। चाय पीजिये आंगन में प्रोग्राम शुरू हो गया है। हमारे यहां के हरिजन आस्का गा रहे हैं। मैं मुस्कराया व बोला- बच्चे ये जो आवाजें बजाने की आ रही हैं, यह ढोल की तो नहीं हैं। वह बोली- अरे अंकल जी, यह ढाक बज रहा है। जल्दी चाय पिओ कैमरा उठाओ वरना वे लोग कुछ देर में गांव के घर घर जाएंगे।

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“ढाकिया ढाक बजाइले भाणों मेरे भाई घुण्डिया रासो लाणों” यह गीत मैंने पहली बार 2001-02 में ठाणा गांव की दिवाली में वहां की महिलाओं के युगल सुर में नृत्य करते हुए सुना था। वह घुण्डिया रासो नृत्य कर रही थी। यकीनन वह बेजोड़ नृत्य आज भी मेरी आंखों में रचा बसा है। अब नई पौध के लोग न घुण्डिया रासो ही सही से कर पाते हैं न रासो व झैँताss…! मैं यह मौका नहीं चूकना चाहता था। तेजी से खड़ा हुआ कैमरा सम्भाला व आंगन में जा पहुंचा। उस दौर में यहां के हरिजन समाज के उन कलावंतों की दयनीय स्थिति से अंदाजा लगाया जा सकता था कि ये लोग कैसे जीवन यापन करते होंगे। हुड़के व छोटी ढोलकी पर बेहद मधुर कंठ से ये लोग जो जा रहे थे वह मेरे पल्ले नहीं पड़ा लेकिन मैं खुश था कि मैं उस दुर्लभ कला को संग्रहित कर रहा हूँ जो शायद आज तक उन्हें जौनसार बावर के किसी गांव में नहीं दिखी। अब तक कई ग्रामीण भी आंगन में पहुंच गए थे। मैने एक ग्रामीण से पूछा- इनका ढाक कहाँ है? वह हंस पड़े व बोले- अरे वो देखो ढाक ही तो बजा रहे हैं। मैं निराश सा हो गया क्योंकि नाम से तो मुझे लगा जाने कितना बड़ा वाद्य यंत्र होगा। लेकिन ये तो ढाक के तीन पात सा साबित हुआ। छोटी छोटी ढोलकी जो धुंवे से काली पड़ी हुई थी उन पर पतली सी आगे से गोल मुड़ी हुई लकड़ी (लांकुड़) व अंगुली की घुर्र से उभरने वाले शबद अहा…हृदय को आनन्दित कर रहे थे।

बूढ़ियात क्या है?

जौनसार में भी अन्य जाति वर्ण व्यवस्था की तरह जाति वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण, राजपूत व शिल्पकार शामिल हैं। लेकिन इन सब के मध्य एक नाम कॉमन है और वह है पंडत..! पंडत का मतलब है जो तंत्र मंत्र क्रिया का पारंगत हो जो जोयशा या बागोई का ज्ञान रखता हो। वह किसी भी जाति वर्ण व्यवस्था के अधीन क्यों न हो उसे यहां पंडत ही कहकर ज्यादा संबोधन मिलता है।

हरिजन वर्ग यहां सबसे पिछड़े वर्ग में आता है। ये लोग वर्तमान में पढ़ लिखकर अब मुख्य समाज के साथ कदमताल करने लगे हैं, ठेठ वैसे ही जैसे अन्य क्षेत्रों के शिल्पकार जाति के गरीब तबके के लोग! लेकिन राज्य निर्माण से पहले इस वर्ग के लोग उपेक्षाओं और अभावों के भारी दलदल में जयादात्तर गरीबी में ही दिन गुजर करने वाले थे। बुढियात… मनाने का जिम्मा भी इन्हीं लोगों के कांधे पर है। बुढियात दिखने सुनने में जितनी खूबसूरत होती है, उतनी इन लोगों को लिए भी रही हो जरूरी नहीं है क्योंकि इन्हें जब रोजी रोटी के लिए अपनी दिशा-ध्याणीयों के गांव की ओर जाना होता था तब इन्हें उस गांव की खोडीs (मुख्य द्वार/प्रवेश द्वार) में गांव के ही अपने बिरादरी के लोगों से व गांव के प्रबुद्ध लोगों से साक्षात्कार करना पड़ता था। जो सरल कार्य नहीं होता था। अगर ये लोग उनके माकूल जबाब अपनी गायन शैली व मूंडा ढाक के साथ नहीं दे पाते थे तब इन्हें गांव में प्रवेश नहीं करने दिया जाता था। ऐसे में इस समाज के लिए अपने लिए रोजी रोटी जुटा पाना बड़ा कठिन कार्य होता था क्योंकि इस समाज के लोगों के पास मूलतः जीविकोपार्जन के लिए खेत वगैरह भी नगण्य के बराबर होते थे। जी तोड़ मेहनत के बाद साल भर की रोजी रोटी का जुगाड़ करना भी एक महाभारत से कम नहीं है।

होता यह था कि जैसे ही इन लोगों को पता चलता था कि दीवाली देश के अन्य भू-भागों में शुरू हो गयी है तो ये लोग अपना ढाक व मूंदा उठाकर एक गांव से दूसरे गांव, दूसरे से तीसरे गांव जा पहुंचते थे। यह क्रम पूरे एक माह चलता था जब तक जौनसार में एक माह बाद बूढ़ी दिवाली समाप्त नहीं हो जाती। इसीलिए बूढ़ी दिवाली के कारण इसे बुढियात कहा गया। ये लोग जिस गांव जाते प्रसतिस्पर्द्धा के बाद गांव में अपने गीत गायन से अपने लिए घर घर जाकर अन्न व धन्न मांगा करते। बदले में जिस से जो बन पाता वह इन्हें चूड़ा-मूड़ा व अन्य वस्तुवें देकर अपने घर से विदा करते। ये लोग महासू का गुणगान कर उन्हें आशीर्वाद देते। इसे महासू की आस्का नाम से जाना जाता है।

ऐसा भी नहीं कि ये लोग सिर्फ महासू देवता की आस्का ही गाते थे। ये अपनी हृदय स्पर्शी धुन में  मनोरंजन के लिए अन्य गीत भी गाते हैं लेकिन इनके गीत व गायन शैली अन्य गीत गायन शैली से बिल्कुल अलग होती है। यह एक माह की बुढियात अब सिमटकर हफ्ते भर की ही रह गयी है।पहले यह सम्पूर्ण जौनसार बावर के गाँव गाँव होती थी अब सिमटकर सिर्फ पंजगाई व खत्त कांडोई-भरम तक सीमित रह गयी है। जौनसार बावर के लोक संस्कृतिकर्मी नंद लाल भारती बताते हैं कि बुढियात के ये गायक घर गांव में पैदा हुए नये बच्चों की कुशलता के लिए भी महासू देवता की अरदास अर्थात आस्का गाकर उस घर या गांव की खुशी के लिए मंगलकामना करते हैं। उन्होने कहा कि उन्हें खुशी इस बात की है कि चालदा महाराज के मंदिर व चार चौंतरुँ में से एक समाल्टा गांव में बर्षों बाद बुढियात लोकगायन की धूम रही जिसे बहुत से लोगों ने सोशल प्लेट फॉर्म पर शेयर किया।

बहरहाल मैंने भी इस लुप्त होती कला के संरक्षण हेतु यह लेख लिखा है ताकि लोकसँस्कृति के अग्रिम हस्ताक्षर जौनसार बावर का जन मानस इसका संज्ञान ले व इसके पुनर्त्थान के बिषय में भागीरथ प्रयास करें।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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