Sunday, March 15, 2026
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भराडसर ताल..! जहाँ बिष्णु भगवान ने राक्षस के डर से बामन अवतार में किया वास!

 भराडसर ताल..! जहाँ बिष्णु भगवान ने राक्षस के डर से बामन अवतार में किया वास!

 (मनोज इष्टवाल)

बरबस मन अटखेलियाँ खेलता जब अतीत की उड़ान भरकर अपने पंख फैलाकर स्वर्ण गरुड़ की भांति रत्नजड़ित हिमशिखरों के आल्हाहित आच्छादित आकाश को छूने को बेताब होता है तब मन यकीनन उन कपोल-कल्पनाओं से निकलकर यथार्थ के उन पलों को तलाशने लगता है जो आपने हिमालय के साथ हिम कांठियों में उसके अद्भुत सौन्दर्य के साथ गुजारे हों! एक ऐसी यात्रा विगत बर्ष अगस्त अंतिम सप्ताह यानि 25 अगस्त से 30 अगस्त 2016 में भराडसर ताल की रही. जिसने रुपिन और सुपिन के मध्य अपना स्वर्गलोक सा साम्राज्य उन उतुंग श्रृंखलाओं में फैलाया हुआ है जहाँ पहुँचने के लिए आपको बेहद दुरूह पहाड़ियों, पर्वतों, जंगलों, घाटियों,खाइयों व वादियों को लांघकर पहुंचना होता है! पर्वत क्षेत्र की इस रवाई घाटी के साथ यूँ तो कई मिथक जुड़े हैं जिनमें नैटवाड का पोखु देवता, देवरा का कर्ण मन्दिर, हनोल का महासू मंदिर और पर्वत में दर्योधन के नाम से प्रसिद्ध रहे मंदिर जो यथार्थ में सोमेश्वर देवता के मंदिर हैं।

उत्तरकाशी जनपद में बहती है टौंस नदी….! जिसे तमसा भी कहा जाता है!  टौंस नाम की इस नदी के बारे में मान्यता है कि पौराणिक काल में एक राक्षस का वध किए जाने पर उसका रक्त इस नदी में गिर गया था, जिससे यह दूषित हो गई। यही वजह है कि इस नदी को तमसा भी कहा जाता है। उत्तरकाशी जनपद में दो नदियां रूपीन और सुपीन देवक्यारा के भराडसर नामक स्थान से निकलती हुई अलग- अलग दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। रूपीन फते पट्टी के १४ गांवों से होते हुए गुजरती है, जबकि सुपिन पंचगाई, अडोर व भडासू पट्टियों के २८ गांवों से जाती है, लेकिन इन गांवों के लोग न तो इन नदियों का पानी पीते हैं और ना ही इन नदियों के जल से सिंचाई की जाती है। नैटवाड में इन दोनों नदियों का संगम होता है और यहीं से इसे टौंस नाम से पुकारी जाती है और यहीं से यह नदी दूषित भी मानी जाती है।

लोकमान्यताओं के अनुसार रूपीन, सुपीन व टौंस नदियों का पानी पीना तो दूर छूने तक के लिए प्रतिबंधित किया गया है। वजह, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में  दरथ हनोल के समीप किरमिरी नामक राक्षस एक ताल में रहता था। उसके आतंक से स्थानीय जन बहुत परेशान थे। लोगों के आह्वान पर कश्मीर से महासू देवता व उनके गण सिडकुडिया महासू यहां पहुंचे और किरमिरी को युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध के बाद महासू देव ने आराकोट के समीप सनेल नामक स्थान पर किरमिरी का वध कर दिया। उसका सिर नैटवाड के समीप स्थित स्थानीय न्याय के देवता शिव के गण पोखू महाराज के मंदिर के समीप गिरा, जबकि धड नदी के किनारे। इससे पूरी टौंस नदी का पानी में राक्षस का रक्त मिल गया। तभी से नदी को अपवित्र व तामसी गुण युक्त माना गया है।

(जखोल गाँव के निवासियों के बीच)

दूसरी मान्यता के मुताबिक द्वापरयुग में नैटवाड के समीप देवरा गांव में कौरवों व पांडवों के बीच हुए युद्घ के दौरान कौरवों ने भीम के पुत्र घटोत्कच का सिर काटकर इस नदी में फेंक दिया था। इसके चलते भी इस नदी को अछूत माना गया है। राक्षसों का रक्त मिलने के कारण इसमें तम गुण की अधिकता मानी जाती है, इसीलिए इसे तमसा नाम से भी पुकारा जाता है। मान्यता है कि इस नदी का पानी शरीर में कई विकार उत्पन्न कर देता है!

वहीँ तीसरी मान्यता है कि त्रिशंकु ऋषि अपने तप के बल पर जब स्वर्ग जा रहे थे तब उनकी पत्नी की पुकार से उनका तप टूट गया और वे आसमान में ही उल्टे लटक गए. ऐसे में उनकी आँखों से पश्चाताप के आंसू निकल पड़े जिनसे रुपिन और सुपिन दो नदियों का जन्म हुआ. कहा जाता है इस परिताज्य जल का लगातार सेवन करने से कोढ उत्पन्न हो जाता है.

जखोल से सोमेश्वर की देवडोली इस साल 12 बर्ष बाद देवक्यार ताल/ बुग्याल पहुंची जो यकीनन भराडसर जैसी ही खूबसूरती लिए हुए है. यह यात्रा जखोल, डोका जंगल, रहकाकोटी, क्याराक, टाटका के पांच पड़ावों से होकर गुजरती है वहीँ भराडसर के लिए आप दो रास्ते चुन सकते हैं जिनमें पहला रास्ता नैटबाड़ से लगभग 17 किलोमीटर भीतरी गांव तक सड़क मार्ग से व तत्पश्चात पैदल मार्ग से, तथा दूसरा सड़क मार्ग से सांकरी-जखोल से लेक्चा और फिर कासला पहुँचते हैं. यहाँ से आप पैदल रास्ता नापना शुरू करते हैं. दिल मजबूत करके जय कपिल मुनि, जय श्रिंग ऋषि, जय बामण भगवान, जय सिदुवा-बिदुवा, जय गंगू रमोलाजय सोमेश्वर देवता के नारे लगाकर हम बांयी तरफ  सुराल बुग्याल के लिए चढ़ाई नापना शुरू करते हैं यहाँ से दांयी ओर सड़क नीचे लिवाड़ी नदी की ओर बढती है जहाँ अभी पुल निर्माण होना बाकी है. पुल निर्माण होते ही सड़क अंतिम गाँव लिवाड़ी तक पहुँच जायेगी जहाँ से यात्रा पड़ाव में कुछ बदलाव आ सकता है!

(देवबासा कैम्पिंग साईट)

हम चूंकि पैदल निकले थे इसलिए जखोल से पहले दिन सुराल बुग्याल के पास कैम्पिंग करना उचित समझा. अगले दिन सुबह हमारी मंजिल देववासा बुग्याल था जहाँ अक्सर भराडसर पहुँचने वाले धार्मिक पर्यटक, साहसिक पर्यटन व खोजी दस्ते अपना अंतिम कैंप करते हैं!  सुराल बुगाल से आप लिकड़ी होते हुए देववासा पहुँच सकते हैं. वहीँ यदि आप सड़क मार्ग से नहीं आते तब पैदल मार्ग से आप बैंचा पहुँचते हैं जहाँ से दांयी तरफ बांयी फिताड़ी गाँव को रास्ता निकलता है. वहीँ नदी किनारे-किनारे रास्ता लिवाड़ी के लिए निकलता है. या यूँ कहें कासला, बैंचा पहुंचकर आप कन्फ्यूज हो जाते हैं तो सही रहेगा!

जखोल ली निर्विरोध चुनी गयी क्षेत्र पंचायत सदस्य मीना देवी रावत जोकि समाजसेवी गंगा सिंह रावत की श्रीमती हैं घर से विदा देते वक्त बोलती हैं कि- “ सर, वह सिदुवा-विदुवा की पवित्र भूमि है इसलिए जहाँ तक हो सके इन दिनों बेहद सात्विक तरीके से आप सब धार्मिक मान्यताओं का पालन करें. भगवान बामन देव व गंगू रमोला आपकी रक्षा करेंगे नहीं तो वहां की मात्रियाँ बड़ी खतरनाक हैं”! उनके शब्द सुनकर यकीनन बदन के रोंवें खड़े हो गये थे. वे बताती हैं कि यहाँ मान्यता है कि एक राक्षस से भयातुर होकर बिष्णु भगवान् ने बामन अवतार में यहीं छुपकर अपनी प्राण रक्षा की!” 

(भराडसर ताल)

बहरहाल हम पैदल मार्ग बांयी तरफ रूपिण नदी के तट पर उत्तराखंड और हिमाचल सीमाओं पर बसे उत्तराखंड के अंतिम गाँव भीतरी, मसरी, डोडरा-क्वार गांवों की घाटियां अपने महमोहक बिहंगम स्वरूप से मंत्रमुग्ध कर देती हैं जबकि  ऊपरी छोर चाईशिल, चान्शल बुग्याल का विहंग्म दृश्य हिमालय के लोक लुभावने स्वरूप का अंतर्मन में जिज्ञासा पैदा करने का माध्यम लगता है। इन बुग्यालों में आपको भेडालों की कई टोलियाँ दिखाई देगी तो कहीं दूर उड़ते धुन्वें के साथ इन भेड़ पालकों के लामण व छोड़े मन मोह लेते हैं!

(रुपिन-सुपिन वैली)

भरत सिंह और मक्खन सिंह मेरा बराबर ख्याल रखे हुए थे. हम अब नो ट्री जोन पहुँचने लगे थे. पसीने से तर-बतर मैं सिर्फ अपने कैमरे  के अलावा अपनी कैप व चश्मे ही बदल रहा था जबकि साथ चल रही टीम तम्बू बंबू सब लादे ऐसे चल रहे थे, मानों उनके पास मुझसे कम सामान हो. मक्खन सिंह अंगुली से बताते रहे कि राला ये है और फिताड़ी वो पार..! खैर हम शांय   4 बजे के आस-पास सुराल बुग्याल पहुंचे. जहाँ थकान से चूर-चूर और पसीने से तर्र कपडे बदन पर चुभ रहे थे. यहाँ टेंट लगाने में स्थानीय भेडालों ने भी मदद की व बकरी के दूध की बनी ताजा चाय का हमने आनन्द लिया!

सुराल बुग्याल की वह रात आज भी भुलाए नहीं भूलती जाने क्यों मुझे ही ऐसा अहसास होता है कि रात को कोई जानवर टेंट में घुसने की हिम्मत कर रहा है.मैं सांस रोके कई देर तक अँधेरे में यूँहीं आँखें खोले रहा लेकिन कब नींद के आगोश में समा गया पता  ही नहीं चला.

अगली सुबह नींद देर से खुली जबकि हमें जल्दी ही देववासा के लिए निकलना था. मैंने सबसे यही बोला कि देववासा तक की यात्रा में कोई कोताही नहीं होनी चाहिए. हमें अब पर्वत राज हिमालय की आज्ञाओं के अनुसार ही आगे की यात्रा जारी रखनी है. सब मेरे कहे अनुसार ही चले और हम लगभग 12 बजे दोपहर के आस-पास देववासा पहुंचे, देवबासा से लगभग १४ किमी. और अभी भराडसर के लिए चलना पड़ता है जिसे यहाँ के स्थानीय ९ मील मानते हैं. कईयों का मत था कि आज ही भराडसर पहुँच सकते हैं लेकिन फिर मैंने उन्हें उन्हीं के पुरखों की सुनाई हुई बातें याद दिलाई तब सब मन मसोसकर शांत रह गए! मैं यकीनन पूरा बिश्राम करना चाहता था.

अगली सुबह धूपबत्ती जलाकर इन युवाओं ने अपने कुल देवता गंगू रमोला व उनके पुत्र  सिदुवा-विदुवा व ऐडी-आंछरी, बणद्यो-परियों-मातृकाओं  का स्मरण कर अपनी यात्रा के सुफल की कामना की. यकीन मानिए इनकी मन्नत पूरी भी हुई और आसमान में छंटते हुए बादल जाने कहाँ चले गए. कई किमी. पैदल चलने के  बणाग होते हुए चलते-चलते जब हम भराडसर की रेतीली सी जमीन को छूने को हुए तब हम में से एक ने स्थानीय भाषा में कहा कि अब न जोर से आवाज करना न चिल्लाकर आवाज लगाना वरना सेकण्ड भी नहीं लगेंगे ओलावृष्टि शुरू हो जायेगी! भराडसर ताल की अनुपम छटा को कैद करने के लिए मेरी अंगुलियाँ जाने कैमरे के ट्रेगर पर कितनी बार नाची होगी मैं खुद नहीं जानता! मैं बेहद खुश था कि ऐसे दुर्लभ फोटो आज प्रकृति ने मुझे दिए हैं जो अतुलनीय हैं. शायद घमंड भी कर रहा था और अपनी जुबान से अपनी पीठ खुद थपथपा रहा था. जखोल की सारी टीम ने मीलों फैले भराडसर ताल के किनारे स्थित अपने कुल देवता सिदुवा की पूजा की व भेंट स्वरूप अपने साथ लाये चांदी के सिक्के जैसे ही ताल में डाले मैं हतप्रभ रह गया. ताल से सतरंगी लहरें आवाज करती हुई उन्हें अपने साथ दूर तक ले गयी. सबने पंचस्नान कर भराडसर ताल की परिक्रमा शुरू कर दी लेकिन मैं था कि मेरा सम्मोहन ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा था.

(भराडसर ताल)

गंगा सिंह रावत जी ने बताया कि यहाँ अपनी मन्नतें लेकर जब गाँव वाले इस ताल में भेड़ डालते हैं तो तालाब में भेड़ नीचे की जगह ऊपर की ओर बहने लगती है. जिसकी भेड़ नीचे की ओर बहती है तो समझ लेना चाहिए कि उसका कुछ न कुछ अनिष्ट हुआ है या भेंट रखते समय उसका दिल साफ़ नहीं था. यहाँ रात्री पहर में कोई नहीं रुकता क्योंकि लोक मान्यता है कि यहाँ तरह तरह की आवाजें रात भर आपको डराती रहती हैं. कई ने यहाँ गाय के बछडे के रम्भाने की आवाजें सुनी हैं. हमने लगभग 2 घंटे व्यतीत करने के बाद वापसी करनी बेहतर समझी! ज्ञात हो कि इस ताल से लगभग 500 मीटर दूरी से हिमाचल में सतलुज नदी निकलती है जिसे वहां के लोग भी रुपिन सुपिन की तरह परिताज्य नदी मानते हैं और उसका पानी नहीं पीते! यकीनन हिमालयी यात्राओं में यह यात्रा मुझे इसलिए बेहद कचोटती है कि इस यात्रा के दुर्लभ फोटो का 32 जीबी कार्ड मुझसे खो गया और मेरी यात्रा डायरी के अमूल्य क्षण भी उसी के साथ समाप्त हो गए.

हाल ही  में पलायन एक चिंतन की टीम द्वारा भी इस क्षेत्र की यात्रा की गयी जिस से प्रेरित होकर मैंने यह यात्रा वृत्त संस्मरण जो याद रहा वह लिखने की पूरी कोशिश की है. इस क्षेत्र के बड़े भूभाग को कुबेर का खजाना भी समझा जाता है कि भराडसर क्षेत्र में अकूत धन संपदा का भंडार है. लगभग 48 किमी. की यह यात्रा बेहद थकान तो देती जरुर है लेकिन सचमुच यह यात्रा नई यात्रा कि जिजीविषा को जन्म देती है क्योंकि यहाँ की यात्रा के बाद सभी हिमालयी भू-भागों की यात्राएं बेहद आसान सी लगने लगती हैं!

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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