Sunday, March 22, 2026
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आखिर ऐसे में कैसे बचेगी हमारी लोक भाषाएं ? ‘

आखिर ऐसे में कैसे बचेगी हमारी लोक भाषाएं ? ‘

(डॉ योगेश धस्माना)

लोक भाषाओं को बचाने के लिए जिस तरह का समाज पहल कर रहा है , उत्तराखंड में वह निसंदेह प्रशंसनीय है,  लेकिन लोक भाषाओं को बचाने के लिए जो पहल इस समय की गई है , वह मुझे नहीं लगता कि बहुत अधिक कारगर हो सकेगी। जब तक हम लोक भाषाओं को अपने स्वाभिमान के साथ नहीं जोड़ पाएंगे , और साथ में सरकारी स्तर पर जब तक इसे रोजगार की भाषा नहीं बनाया जा सकेगा , तब तक हमारी यह प्रयास पूरे नहीं हो सकते हैं। जहां तक वर्तमान संदर्भ में फेसबुक और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के सहारे जो वेबीनार आयोजित किए जा रहे हैं , वह बौद्धिक प्रलाप से अधिक नहीं है। सार्थकता तभी संभव हो पाएगी जब हमारे सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों के साथ-साथ सरकार के प्रयास भी गंभीरता से हो।

उत्तर प्रदेश में रहते हुए जिस तरह से भाषा संस्थान ने लोक भाषाओं के उन्नयन के लिए काम किया , ठीक इसके विपरीत उत्तराखंड में 20 वर्षों के बाद हमारे जननायक हो द्वारा इस दिशा में एक भी ठोस प्रयास नहीं किया गया। केवल राजनीतिक दृष्टि के सहारे राजनीतिक दलों को भाषाविद्ध बनाया जाना नितांत गलत है। साथ ही मैं यह भी कहना चाहता हूं कि जब तक हमें इसे लोक सेवा आयोग और अधिनस्थ चयन सेवा आयोग की परीक्षाओं में हम लोक भाषा के महत्व को और उसके प्रश्न पत्र को शामिल नहीं करते तब तक हमारे प्रयास अधूरे ही रहेंगे।

राज्य बनने के 20 वर्षों के बाद भी विधानसभा के अंदर हम पारंपरिक परिधान पहनकर और अपनी गढ़वाली कुमाऊनी और जौनसारी बोली के सहारे बोलने की हिम्मत आज दिन तक नहीं जुटा सके हैं। देवस्थली ग्रुप के माध्यम से जो युवा इस दिशा में प्रयास किए हैं कर रहे हैं उनको जरूर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए , ताकि हम अपनी लोक गाथाओं का संरक्षण लोक कलाकारों के जरिए कर सकें। इससे हमारी भाषा संस्कृति और इतिहास भी जीवित रह सकेगा।

 

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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