(मनोज इष्टवाल)
ये सचमुच आश्चर्यजनक सूचना है। सूचना विभाग में बतौर संयुक्त निदेशक कार्यरत जौनसार बावर के के एस चौहान जी ने जब मुझे 22 अक्टूबर 2021 को समाल्टा गांव आने के लिए दूरभाष के माध्यम से आमंत्रित किया तब मुझे लगा कि यह निमंत्रण 76 साल बाद खत्त मोहना से खत्त समाल्टा आ रहे चालदा देवता के आगमन का है। फिर ध्यान आया कि चालदा महासू तो नवम्बर माह में अपने नवनिर्मित्त समाल्टा गांव के मंदिर में विराजमान होंगे लेकिन जब उन्होंने बताया कि इस बार इतिहास दर्ज होने वाला क्योंकि पूरे जौनसार बावर क्षेत्र से लगभग 70 सयाणा समाल्टा में इकट्ठा हो रहे हैं।
यह सचमुच अनूठा समागम होगा। इस कार्य के लिए जौनसार बावर के प्रबुद्धों की लोकपंचायत के लिए साधुवाद…! क्योंकि शायद ही उन्हें यह जानकारी हो कि ठीक 200 साल पहले अर्थात 1821 में अक्टूबर माह के अंतिम सप्ताह में कैप्टन एफ यंग द्वारा 35 खत्तों में सयानाचारी लागू कर सयानाओं की नियुक्ति की और माह नवंबर 1821 से माह अक्टूबर 1824 तक तीसरा भू बंदोबस्त जौनसार बावर में लागू करवाया। तब पहली बार इतनी खत्तों के स्याणा व चार चौंतरुओं ने शिरकत की थी या फिर 1846 में तब 800 ग्रामीणों के बीच ये लोग उपस्थित थे जब कृपाराम की बहाली मिस्टर रॉस द्वारा की गई थी।
विगत 2016 में जौनसार बावर क्षेत्र के कुछ बुद्धिजीवियों ने पुनः एक ऐसा संगठन तैयार किया जो न रजिस्टर्ड करवाया गया और न उसमें कोई पदाधिकारी ही है। लगभग 1500 सदस्यों के इस समूह ने इस संगठन का नामकरण करते हुए इसे नाम दिया “लोक पंचायत”।
इसी लोकपंचायत ने अपने 6वें बर्ष में प्रवेश करते हुए जहां लोकसमाज के ताने बाने बुने वहीं लोक संस्कृति व सामाजिक समरसता के लिए कई विलक्षण कार्य भी किये। यह “लोकपंचायत” राजनैतिक व राजनीति से इतर एक ऐसा मंच है जिसमें राजनेताओं को छोड़कर किसान, विद्यार्थी, शोधार्थी, सामाजिक कार्यकर्ता, हर तबके का स्त्री पुरुष, ठेठ ग्रामीण व बुद्धिजीवीवर्ग शामिल हैं।
चूंकि खत्त समाल्टा ब्रिटिश काल से ही चर्चाओं में रही है और 1945 के बाद यहां चालदा महाराज अपने प्रवास के लिए आ रहे हैं ऐसे में इस खुशी को दोहरी खुशी में तब्दील करने के लिए “लोकपंचायत” द्वारा एक ऐसा मंच तैयार किया गया जो ऐतिहासिक हो गया क्योंकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब 1846 के बाद यानि 175 साल बाद जौनसार बावर की सभी खत्तों से 69 स्याणा एक मंच पर आगामी 22 अक्टूबर 2021 को बैठे दिखाई देंगे। यह देखना सचमुच अद्भुत रहेगा।
1846 के बाद स्वतंत्र भारत के इतिहास में जौनसार-बावर क्षेत्र के लगभग 69 सयाणों जिनमें 39 खत्त सयाणा और 30 उप-सयाणा शामिल हैं, की महापंचायत कहें या फिर लोक पंचायत या लोक अदालत, जौनसार क्षेत्र की खत्त समाल्टा के समाल्टा गाँव में आयोजित हो रही है! ब्रिटिश काल में आज से पूरे 200 बर्ष पूर्व कैप्टन यंग द्वारा समाल्टा के ज्वाला सिंह को चार चौंतरा में एक चौंतरा शामिल किया गया था। अर्थात अब जब अपने गाँव में पूरे 175 बर्ष बाद ज्वाला सिंह फिर से गहमागहमी देखेंगे तो उनकी आत्मा कितनी प्रसन्न होगी।
जौनसार बावर जनजाति क्षेत्र के आदिकाल से अब तक कितने नामकरण हुए हैं। आदिपुराण, अथर्ववेद, भीष्मपर्व, रामायण, महाभारत पाणिनी, बृहत्सन्हिता, जैन आदिपुराण जैसे कई पौराणिक ग्रंथों में इस क्षेत्र के नामों का जो उल्लेख मिलता है उनमें सर्वप्रथम काल पर्वत क्षेत्र, कालकूट, कालशैल, यामुनपर्वत, यामुन-अज्जन, कालिंद, कुलिंद, हेमवत-पथ, ख़तलिका, चतरशिला और वर्तमान में जौनसार बावर क्षेत्र है।
जौनसार बावर की ब्रिटिश काल में पहले 35 खत्ते थी जिन्हें 9वें भूमि बंदोबस्त के बाद 10वें भूमि बंदोबस्त में बर्ष 1883-84 में मिस्टर एच. जी. रॉस ने बंदोबस्त संसोधन के तहत 38 खत्तों में विभाजित किया। जिनमें खत्त भरम, सेली, बहलाड, फरताड़, बमताड़, लखवाड़, बणगांव, कोरु, मोहना, उद्पाल्टा, धनाऊ, दुआर, बिसलाड़, मसऊ, बिरमऊ, सेली-गौथान, तपलाड़, अठगांव-चंदन, अठगांव-उपरली, सिलगांव, रँगाऊ, बिसाइल, दसऊ, बौंदर, कलेऊ, बाण, समाल्टा, कोटी, बरसुआ, छड़ताड़ी, लखऊ, मलोटा, पंजगांव, देवघर, बावर, सिलगांव पुन्याढ़, बाणाधार प्रमुख है, जो दो पट्टियों जौनसार व बावर के अधीन पड़ते हैं। 1961-62 में इस व्यवस्था में हल्का सा अमेंडमेंट कर इन्हें 39 खत्तों में बांट दिया गया।
चौंतरा और सयाणा–
जौनसार बावर की जनजातीय ब्यवस्था को छेड़े बिना ही वहां की जनता के सहयोग से टिहरी राजशाही ने मालगुजारी वसूल करने के लिए यहाँ चौंतरा, सदर सयाना इत्यादि की नियुक्ति की. यह नियुक्ति सन 1819 में कप्तान यंग ने पूरे क्षेत्र का जिम्मा 4 चौंतरूओं पर सौंप दी। इनमें ग्राम मुन्धान खत्त कोरु से राम दास, ग्राम नगऊ खत्त सेली से कुल्लू, ग्राम उद्पाल्टा खत्त उद्पाल्टा से देवी सिंह और ग्राम समाल्टा खत्त समाल्टा से ज्वाला सिंह शामिल हैं. जिन्हें जौनसार बावर क्षेत्र के 39 राजस्व खत्तों की जिम्मेदारी सौंपी गयी जिनमें 417 ग्राम पड़ते हैं। हर ग्राम सभा में एक खत्त सयाना नियुक्त किया गया जिसे सदर सयाना के नाम से जाना जाता था वहीँ हर गॉव में एक सयाना हुआ करता था जो परंपरा आज भी है. भले ही वर्तमान में पंचायती राज ब्यवस्था कायम हो गयी हो. जौनसार बावर में यहाँ की पुराणी पंचायत ब्यवस्था “खुमडी” वर्तमान में भी प्रचलित है। उत्तर प्रदेश के पंचायती राज अधिनियम १९९४ के अनुसार ग्राम सभाओं तथा पंचायत राज की ब्यवस्था जौनसार बावर क्षेत्र में भी की गयी इस क्षेत्र में पूर्व से प्रचलित “खुमडी” अभी भी ग्राम वासियों के बुलाये जाने पर सक्रिया रूप से काम करती है. ब्रिटिश शासन के समय फिर वह समय भी आया जब पूरे देश की राजशाही समाप्त हुई और रजवाड़े नाम मात्र के रह गए ऐसे में टिहरी की बागडोर भी अंग्रेजी हुकूमत के पास आई।
चार चौंतरा की बर्खास्तगी।
1818 में जौनसार बावर का दीवान बाकिर अली को बनाया गया जो 1830 तक रहे व उनके कार्यकाल के दौरान सब कार्य बेहद अच्छे ढंग से सम्पादित हुआ। 1830 में उन्हें देहरादून का तहसीलदार नियुक्त किया गया। इसके बाद कप्तान यंग जो अब तक प्रमोशन लेकर मेजर यंग हो गए थे उन्होंने हाई कमान से कालसी में दीवान पद समाप्त करने की सिफारिश की और सिफारिश मंजूर भी हो गयी। इसी दौरान बूढ़े हो चुके ट्रेजरार (जमानती) लाला दीनदयाल की मृत्यु हो गयी। उनके बेटे कृपा राम ने उनका पदभार संभाला लेकिन उनके व चार चौंतरु के बीच सामंजस्य नहीं बैठ पाया। धीरे-धीरे तनाव बढा और 35 खत्तों के स्याणाओं द्वारा भी कृपाराम के व्यवहार को लेकर कालसी आकर मेजर एफ यंग के पास शिकायत दर्ज की। इस मामले को मेजर यंग ने 1844 में मिस्टर विंसीटार्ट के समक्ष रखा और उन्होंने कृपा राम को अमल जामिन के पद से बेदखल कर दिया लेकिन बर्ष 1846 में कर्नल यंग की जगह पदभार ग्रहण करने आये मिस्टर ए रॉस ने उन्हें यह पद वापस दे दिया। इस पर चौंतरुओं ने भारी विरोध दर्ज किया और कृपा राम के प्रतिद्वंद्वी को जमानती नियुक्त कर दिया। उनके इस कृत्य के लिए अधीक्षक द्वारा उन्हें उनके कार्यो से अवमुक्त कर दिया गया।
इस घटना के विरोध में चार चौंतरु आगरा जाकर लेफ्टिनेंट गवर्नर से मिले लेकिन कोई खास परिणाम नहीं निकले बल्कि उन पर आरोप लगे कि उन्होंने आगरा जाने के बहाने काश्तकारों से खूब वसूली की। यह बात सामने आने पर मार्च 1848 में मिस्टर रॉस ने चारों चौंतरु बर्खास्त कर दिए।
इसी दौरान 1849 में दीनदयाल के पुत्र के खिलाफ असंतोष की आवाज़ उठने लगी जिसके फलस्वरूप पूरे जौनसार बावर क्षेत्र से लगभग 800 लोगों को कालसी बुलाकर तत्कालीन अंग्रेज अफसर रौस ने मुन्धान के चौंतरु को बगावत के जुर्म में उनके पद से हटाकर लखवाड़ के शेर सिंह को चौंतरु नियुक्त कर दिया जिसका काफी समय तक विरोध भी होता रहा और क्षेत्र के कई दल अपनी फ़रियाद लेकर जगह जगह गए लेकिन सयाना शेर सिंह की नियुक्ति यथावत रखी गयी।
इस सब प्रकरण के बाद चारों चौंतरुओं ने सरकारी कामकाजों में रुचि लेना बंद कर दिया, व स्थानीय अधिकारियों से भी उनकी व्यवहारिकता में बदलाव आ गया था। इस सब को मध्य नजर रखते हुए मिस्टर रॉस ने आख़िरकार सभी चौंतरुओं को उनके पद से हटाने का आदेश जारी किया। खत्त कोरु के स्याणा/चौंतरु रामदास व खत्त सेली के स्याणा/ चौंतरु मोतीराम राम को उनकी अतीत की सेवाओं को देखते हुए आजीवन 100 रुपये पेंशन स्वीकृति के आदेश दिये।
ब्रिटिश काल में जौनसार-बावर में स्याणा/सयाणा व्यवस्था।
ब्रिटिश काल व उससे सम्भवतः पूर्व गोरखाकाल में भी स्थानीय दीवानी कानून में स्याणा/सयाणा या सयाना की नियुक्ति एक बिशेष व्यवस्था के तहत की गई। जो खत्त या महल का प्रमुख सयाना है। सयाना का काम भूमिधरों को संतुष्ट रखना, रिवाजों के मुताबिक वसूली करना, प्रत्येक की क्षमता के अनुरूप उसके द्वारा देय-राशि का निर्धारण, सभी झगड़ों का निपटारा, नए काश्तकारों का कल्याण सुनिश्चित करना तथा सरकारी आदेशों का पालन करना है। अगर कोई कोई काश्तकार देय-राशि का भुगतान नहीं करता तो सयाना उसके खिलाफ मुकदमा कर सकता है, और यदि काश्तकार भाग जाता है तो सयाना उसकी वस्तुओं को जब्त कर उनसे वसूली गयी कीमत से भुगतान प्राप्त करता है, तथा तब भी अगर शेष राशि प्राप्त नहीं होती तो शेष काश्तकारों में फांट या राजस्व-देय का नए सिरे से दायित्व वितरण करता है और उसे पहली अप्रैल को जमा करता है, ताकि कृषि-कार्य शुरू होने से पहले उसकी जांच हो सके।
सयाना की मृत्यु।
सयाना की मृत्यु के पश्चात उसका बड़ा बेटा उसका स्थान लेगा और अगर वह अवयस्क है, या मानसिक अथवा नैतिक रूप से अक्षम हुआ तब भी सयाना का पद उसी के पास रहेगा तथा उसका भाई उसके सहायक के रूप में सयाना का कार्य करेगा। अगर सयाना की इच्छा हो तो वह अपने जीवन काल में अपने सबसे छोटे बेटे को सयाना नियुक्त कर सकता है, ऐसे में उसके अन्य भाइयों का इस पद पर कोई दावा नहीं बनता है। फिर भी सयाना अपने भाइयों को “बिंसौता” या स्याणा पद के वेतन से या शुल्क से एक हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार दे सकता था।
संपत्ति के बंटवारे के साथ सयानाचारी नहीं बांटी जा सकती है। बड़े बेटे का ही सयानाचारी पर एकाधिकार है बशर्ते स्याणा अपने जीते जी अपने छोटे बेटे को दायित्व नहीं सौंपता। अगर बड़ा बेटा स्याणा के रहते मर गया तब उसके बेटे को अर्थात स्याणा के पोते को सयानाचारी मिलेगी।
प्रमुख स्याणा।
हर खत्त में यूँ तो कई स्याणा हैं लेकिन जिस स्याणा को पूरी खत्त अपना स्याणा मानती है वह प्रमुख स्याणा कहलाता है। और उसके गांव को खून्द गांव कहते हैं।
सदर स्याणा।
वर्तमान में न्याय व्यवस्था में कई तब्दीलियां हुई हैं इसलिए यह पद किसी के पास अब है भी या नहीं कह पाना मुश्किल है। ब्रिटिश काल में यह पद महासू देवता के वजीर के पास होता था जो बास्तिल गांव बावर में रहता था। 1826 में महासू देवता के वजीर रूप सिंह हुए जिन्हें सर्वमान्य सदर स्याणा भी माना गया।
चकरौता।
गोरखा व ब्रिटिश काल में हर गांव में एक अधिकारी नियुक्त होता था जिसे चकरौता कहा जाता था। इस अधिकारी को स्याणा अपने वेतन से एक या दो रुपये देता है, इसलिए यह अधिकारी स्याणा के अधीन कार्य करता है, इसे अधिकार है कि यह मुकदमें का फैसला हो जाने पर भूमिधरों से अपने लिए कुछ भुगतान करवा सकता है।
कोदियाणा।
मूलतः इस शब्द की उत्पत्ति अरबी फारसी या उर्दू से मानी जाती है, लेकिन गढ़वाली भाषा में अगर इसका भावार्थ निकाला जाए तो तब इसे हम चापलूसी करना या रिश्वत देना कह सकते हैं।
ब्रिटिश काल में चूंकि जौनसार बावर क्षेत्र में “दस्तूर-ऐ-उल्लूम” कानून लागू था तब यह कहा जाना सही रहेगा कि इस शब्द की उत्पत्ति निकालिश उर्दू से हुई है। इस शब्द का जिक्र यहां इसलिए भी किया जा सकता है कि जब सयाना किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाता था तब दबी जुबान से क्षेत्र वासी इस शब्द का प्रयोग करते थे वे कहा करते थे कि उसने पक्का सयाना को “कोदये” दिया होगा। यानि केस अपने पक्ष में करने के लिए घूस दी होगीम
बहरहाल 175 बर्ष के इतिहास में एक बार अर्थात 1942 में तब ब्रिटिश शासन द्वारा समस्त जौनसार बावर क्षेत्र के सयानाओं को चकराता डाक बंगले में बुलवाया था जब शहीद केसरी चंद को लाल किले में फांसी दी गयी थी, लेकिन उस में सभी सयाना उपस्थित हुए या नहीं, इसका जिक्र किसी भी पुस्तक में पढ़ने को नहीं मिलता।
शुक्रिया “लोकपंचायत” इतिहास की पुनरावृत्ति के लिए। उम्मीद है 22 अक्टूबर 2021 का यह दिन जौनसार बावर के इतिहास में दर्ज होगा व उत्तराखंड के जनरल नॉलेज की किताबों में एक और प्रश्न शामिल होगा कि जौनसार बावर में स्वतंत्र भारत के इतिहास में सभी खत्तों के खत्त सयानाओं की “लोकपंचायत” पहली बार कब और कहां आयोजित हुई। जिसका सीधा सा जबाब होगा- 22अक्टूबर 2021, खत्त -समाल्टा, गांव-समाल्टा।
(सन्दर्भ :- जीआरसी वाल्टन मेमॉयर ऑफ देहरादून, एच. जी. वाल्टन/प्रकाश थपलियाल देहरादून का गजेटियर, ई.टी. एटकिंसन/थपलियाल हिमालयन गजेटियर (ग्रन्थ- तीन ● भाग-एक)।, MSS. Records of the Doon and Saharunpore., Mr. J. B. Fraser’s Himalayan mountain, Thornton’s Gazetteer, )

