रवांई घाटी का एक ऐसा गांव, जहां कोई शराब छूता भी नहीं। जिसने शराब पी वही पागल या कुष्ठरोगी हो गया।
(मनोज इष्टवाल 04/12/2021)
वर्तमान के भौतिकतावादी युग में क्या आप यकीन कर सकते हैं कि कोई गांव ऐसा भी हो सकता है, जहां के लोग शराब पीना तो दूर उसे छूते भी नहीं हैं। यकीन नहीं होगा लेकिन यह सत्य है कि उत्तरकाशी जनपद के मुगरसंती पट्टी का दारसों गांव का कोई भी निवासी शराब नहीं पीता। इसके पीछे एक बहुत बड़ा कारण डर भी बताया जा रहा है।
यों तो इस पट्टी में एक दूसरा गांव तिंया भी है जहां के लोग शराब नहीं पीते लेकिन उसमें एक समुदाय बिशेष के लोग कभी कभार शराब पी लेते हैं ऐसा क्षेत्र के लोगों का मानना है। लेकिन लगभग 100 परिवारों के दारसों गांव का एक भी परिवार शराब को नहीं छूता।
इस गांव में थपलियाल, नौटियाल, उनियाल पंडित व राजपूतों में दो परिवार रमोला व शिल्पकारों में बाजगी रहते हैं लेकिन मजाल क्या है कि किसी भी वर्ग का व्यक्ति कभी शराब पी ले।
इसके कारणों की पड़ताल करने में जानकारी प्राप्त हुई तो पता चला कि यहां ध्यायेश्वर नाग की यह बंदिश है। कुछ लोग ध्यायेश्वर नाग को धईश्वर नाग भी कहते हैं। इस गांव में ध्यायेश्वर नाग का पौराणिक मंदिर है जिसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा की गई है, ऐसा यहां के लोगों का मानना है।
ध्यायेश्वर नाग के पश्वा पंडित रामप्रकाश थपलियाल व पंडित रामस्वरूप थपलियाल बताते हैं कि यह मंदिर कितना पुराना है, इसकी जानकारी शायद ही किसी को हो क्योंकि यह करीब कई सौ बर्ष पूर्व से भी अधिक समय की बात है, जब इस गांव की बसासत भी नहीं हुई थी, तब कफनौल गांव से एक गाय नित नियम अनुसार यहाँ आती और जहां मंदिर है वहां उगे झाड़ के बीच घुस जाती। गाय कफनौल राजा बाड़िया कफोला की थी इसलिये यह पड़ताल हुई कि आखिर इस गाय का दूध निकालता कौन है, क्योंकि जब यह गौशाला से निकलती है तब तो इसका थन दूध से भरा रहता है और जब लौटती है तो इसके थन में लेशमात्र भी दूध नहीं रहता। आखिर राजा के गुप्तचरों ने गाय का गोपनीय तरीके से पीछा करना शुरू किया तो वे हतप्रभ रह गए क्योंकि गाय कफनौल से मीलों दूर दारसों आकर दारसों के झाड़ी भरे इस स्थान में घुस गई और करीब आधा घण्टे बाद पुनः लौटी और अपने मंतब्य को चल दी।
राजा बाड़िया कफोला को खबर पहुंचाई गई। राजाज्ञा हुई कि वहां की झाड़ियां काटी जाएं। जब झाड़ियां काटी गई तब यहां आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित हिमालयी क्षेत्रों की शैली वाला एक मंदिर यहां प्रकट हुआ जिसमें आप रूपी शिबलिंग था व वहीं गौमाता का ताजा दूध बिखरा पड़ा था। पूरे क्षेत्र में यह खबर आग की तरह फैल गयी। राजा व लोगों ने विधि-विधान से पूजा की व गणत पुछवाई।
रात्रि काल राजा के स्वप्न में पहले नाग रूप में व फिर मनुष्य रूप में ध्यायेश्वर नाग ने दर्शन दिए व राजा को आदेश दिया कि सेम-मुखेम क्षेत्र के पंडितों को यहां बसाकर मेरे नाम की पूजा हो।
मान्यता है कि जब यहां लोगों को बसाया गया तब इस गांव में ध्यायेश्वर देवता की शिबरूप की पूजा हुई लेकिन जब यहीं खेतों से ध्यायेश्वर नाग की अष्टधातु की मूर्ति निकली व उसका पश्वा अवतरित हुए तब से इस स्थान पर ध्यायेश्वर नाग की पूजा शुरू होने लगी।
क्यों नहीं पीते दारसों गांव के लोग शराब?
ध्यायेश्वर नाग के पुजारी पंडित राम स्वरुप थपलियाल व पंडित चंडी प्रसाद नौटियाल बताते हैं कि ध्यायेश्वर नाग व बौखनाग की अष्ट धातु की मूर्ति खेत में हल चलाते हुए निकली हैं। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि बौखनाग देवता उनके किसी पूर्वज के साथ जौनसार क्षेत्र से गांव लौटते समय उनके घिल्टे में आये।
यहां के लोग शराब पीना तो दूर छूते तक नहीं हैं। इस मत पर सब एकजुट होकर कहते हैं कि यह ध्यायेश्वर नाग की केर व क्रोध के कारण सम्भव है। मंदिर के पुजारी पंडित थपलियाल, नरेश नौटियाल, भगवती थपलियाल सहित अन्य सभी ग्रामीणों ने एक सुर में कहा कि उन्होंने इसके कई प्रत्यक्ष प्रमाण देखें हैं। गांव से बाहर शहर नौकरी करने गए व्यक्ति हों या फिर टैक्सी, गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर…! जिन्होंने भी अपने मित्रों के बहकावे में आकर शराब पी, वे कुछ समय बाद या तो पागल हो गए या फिर उन पर कोढ़ उपज गया। यही डर भी है कि यहां का किसी भी समाज का व्यक्ति चाहे वह पंडित हो, राजपूत हो या शिल्पकार प्रदेश में रहकर भी शराब नहीं पीता।
गांव वाले बताते हैं कि उन्हें साल में एक बार जरूर ध्यायेश्वर नाग व बौखनाग की सेम मुखेम की यात्रा पर जाना होता है। यहां के पंडित भी सेम मुखेम से आये हैं व जो दो परिवार रमोला हैं वे भी सेम के राजा गंगू रमोला के वंशज हैं व वहीं से आकर यहां बसे हैं।
बहरहाल यह देवता का डर हो या फिर यहां के लोगों का आत्मबल लेकिन यकीन मानिए इस गांव में आप भी पहुंचेंगे तो आपका भी मन किसी नशे का नहीं होगा। यही कारण भी है कि यह गांव पलायन की अंधी मार से दूर सरसब्ज है व यहां हर घर गाय भैंस हैं व हर घर दूध, दही, मक्खन की भरपूरता है।
बहरहाल इस क्षेत्र के सात गांव क्रमशः दारसों, कफनौल, गैर, ठोलिंका, हिमरौल, सिमलसारी, गन्ना ध्यायेश्वर नाग के अनुनय भक्त हैं जबकि पूरा क्षेत्र उन्हें नित नियम से स्मरण करता है।



