(मनोज इष्टवाल)
रामी गढ़ (Rami Garh), प्राचीन गढ़वाल (उत्तराखंड) के प्रसिद्ध 52 गढ़ों (किलों) में से एक है। जिसे 52 गढ़ को हस्तगत करने वाले पहले गढ़वाल के राजा अजयपाल का अंतिम गढ़ कहा जाता है। यह ऐतिहासिक स्थल वर्तमान शिमला, हिमाचल प्रदेश के समीप स्थित था और रावत जाति/समुदाय के अधीन था। यह गढ़ तीन बार गढ़राज वंश के अधीन हुआ और स्वतंत्र भारत में यह हिमाचल राज्य का हिस्सा बना। यह गढ़ आज भी हाटकोटि मंदिर पार सामने के एक टिब्बे में दिखता है। ज़ो राजा अजय पाल के राजकाल के बाद राजा फतेसाह फिर सन् १६२४ -१६४० तक राजा महिपत साह व फिर राजा प्रदीपसाह के काल में १९७३ से १७७७ तक गढ़वाल के अधिकार में रहा। गढ़वाल के ५२ गढ़ में एक महत्वपूर्ण गढ़ यह भी माना जाता रहा है।
हिमाचल के हाटकोटि पार रायीं गढ़ (रामी गढ़)ही नहीं बल्कि राजा महिपतिसाह के काल में बुशेहर उनके महान सेनानायक माधौ सिंह भंडारी व लोदी रिखोला ने दापा तिब्बत व सतलज तट पर छोटा चिनी बिशैर (रामपुर) के राजा उदय सिंह से युद्ध में उनका राज्य तक छीन लिया था। लेकिन एक संधि में राजा बिशैर द्वारा अपनी पुत्री का विवाह सेनानायक माधौ सिंह भंडारी के साथ कर बहुमूल्य मुद्रा व भेंट राजा महिपतिसाह को भेजकर बदले में अपना राज्य वापस पाया। जैसुएट अन्द्रादे के अनुसार सन् 1624 ई० दापा गढ़ व वहाँ के बौद्ध विहार पर गढ़वाली सेना का अधिकार हुआ था व थोलिंङ्ग के निकट बहती सतलज तक गढ़वाल राज्य की सीमा निर्धारित की गई।
लेकिन कालांतर में लासा की लामा सेना की सहायता से दापा दुर्ग पर तिब्बतियों ने अधिकार कर लिया। जिसमें रडूवा (नागपुर-मंडल) के भीमसेन बर्त्वाल बंधु मारे गए थे।
दुबारा राजा महिपति साह ने सेनानायक माधौ सिंह भंडारी को द्वापा अभियान पर भेजा। पुन: दापा हस्तगत हुआ। एक संधि में माधौ सिंह भंडारी ने गढ़वाल सीमा को व्यवस्थित करने हेतु चबूतरे बनाये जिन्हें आज मैकमोहन लाइन कहा जाता है। लौटते हुए वह सेना के साथ बुशैर रामपुर अपनी ससुराल होकर लौट रहे थे, जहाँ रंजिशन राजा विजय सिंह या बिज्जासिंह ने उन्हें खाने में जहर दिया। जब तक माधौ सिंह भंडारी इसे समझ सके। तब तक एक विशाल सेना के साथ बुशैर सेना ने गढ़वाली सेना के कैंप पर आक्रमण कर दिया। अपनी मौत को निकट देख माधौ सिंह भंडारी ने सेना को आदेश दिया कि वह उनके शव को तेल की कड़ाही में तल कर पालकी में बिठाकर धीरे – धीरे पीछे हटे व उनका अंतिम संस्कार गंगा तट हरिद्वार में करवाए।
महाराणी करणावती के वि०सं० १६६७ कार्तिक (१६४०ई ) के हाट-ताम्रपत्र लेख में माधौ सिंह भंडारी को साक्षी के रूप में शामिल किया है। यह ताम्रपत्र कभी हाटकोटि मंदिर में हुआ करता था ज़ो अब नहीं है।
ज्ञात हो कि सन् १७१० में कुमाऊँ पर आक्रमण कर राजा फतेपतिसाह ने बैजनाथ तक का क्षेत्र विजित कर लिया। बधाण सीमान्त के पदाधिकारी को सम्बोधित फतेपतिसाह के एक ताम्रपत्रलेख के अनुसार, जिसका उल्लेख एटकिन्सन (१८८४, पृ० ५७३) ने भी किया है। विजयोपरान्त उसने १७१० ई० में पट्टी कत्यूर का गड़सार गाँव श्रीबदरीनाथ मन्दिर को दान दिया था। आज तक यह गाँव श्रीबदरीनाथ को समर्पित है। इससे प्रकट होता है कि कुमाऊँ के इस भाग पर उसका अधिकार दीर्घकाल तक बना रहा।
१६६५ ई० के आस-पास सिरमौर राज्य पर आक्रमण कर उसने वैराटगढ़ तथा कालसीगढ़ छीन लिये। पाँवटा तथा जौनसार क्षेत्र उसके अधिकार में आ गये। सिरमौर नरेश रुद्रप्रकाश को पराजित करने तथा करद बनाने का उल्लेख पूर्व लेखकों ने किया है।
‘महाराजाधिराज’ विरुदधारी प्रदीपसाह के दानपत्र वि०सं० १७७३ माघ १८ (१ फरबरी १७१७ ई०) से लेकर सं० १८,२६ (१७७२ ई०) तक के मिल चुके हैं। उसकी दो ताम्र-मुद्राएँ (तिमासी) भी राज्य संग्रहालय लखनऊ में उपलब्ध हैं। संवत् १७७७ की तिथियुक्त ये तिमासियाँ २.४ ग्राम भार की हैं। उसके समकालीन कुमाऊँ राजा कल्याणचन्द (तृ०) तथा तत्पुत्र दीपचन्द थे।
विजयाभियान : मेधाकर के अनुसार, महाराजा प्रदीपसाह के प्रताप से भीत दाबा गढ़पति का वंशज मयूराधिपति प्रणिपात होकर करदाता बन गया, तथा वेसवाराधिपति (बिशेर राज) रुद्रसिंह ने उसके बल को देखते हुए बहुशः उपायन भेंटकर प्रदीपसाह की अधीनता स्वीकार की (रामायणप्रदीप, १.१२-१३) । कवि देवराज के अनुसार भी, “उसने रायींगढ़ (बिशेर में), जौरिया तथा धौलवन में वीरतापूर्वक युद्ध किये व रामपुर, हाटकोटि हस्तगत कर चंद व बुशैर राजाओं से सन्धिपत्र में बहुमूल्य भेंट स्वीकार कर रामीगढ़ को गढ़वाल राज्य का अंतिम गढ़ स्थापित किया।
संदर्भ :
मध्य हिमालय का इतिहास (डॉ यशवंत सिंह कटोच पृष्ठ १७०-२०३)
देवराज, गढ़वाल राज्ञा वंशावली :, श्लोक १२३
हेस्टिंग्ज एंड द रोहिला वार, लंदन, १८९२ पृष्ठ ५
गढ़वाल का नवीन इतिहास खंड २ (डबराल सं० २०४४, पृष्ठ १२३
एटकिंसन, ए०थॉ०, हि०डि०, खंड २, पृष्ठ ४४७, ५७४ हेमिल्टन, गजेटियर, II, पृ० ६३६; एटकिन्सन, हि०डि०, खण्ड २, पृ० ५७३; रतूड़ी, वि०, ग०रा०३०, पृ० ५०; रतूड़ी, ह०, ग०३०, द्वि० संस्क०, पृ० २१६; फतेप्रकाश, प्रस्तावना, पृ० २०


