Sunday, May 10, 2026
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उत्तराखंड का जगतग्राम ..! जहाँ दो-दो बार हुए अश्वमेध यज्ञ

जगतग्राम के अभिलेखों से मिली जानकारी – शीलवर्मन् वार्षगण्यगोत्र में उत्पन्न हुआ था?

उसके छटे पूर्व पुरुष का नाम पोण था?

 उसने चार अश्वमेध किए थे, जिनमें से कम से कम एक जगतपुर ( जगतग्राम ) में हुआ था?

उन दिनों उसके शासित प्रदेश का नाम या उसकी राजधानी का नाम युगशैल था?

(मनोज इष्टवाल)

क्या कुषाणकाल के उत्कर्ष यानि 2000 बर्ष पूर्व या फिर कुषाणकाल के अंतिम समय अर्थात लगभग 1650 बर्ष पूर्व उत्तराखंड के यमुना तट पर स्थित युगशैल नामक एक विशाल राज्य था?  या इस राज्य के राजा शीलवर्मन ने सिर्फ यमुना तट पर अश्वमेध यज्ञ किये? ऐसे कई प्रश्न आज भी हम सब के लिए उत्सुकता के हो सकते हैं क्योंकि अभी भी हम 2000 बर्ष पूर्व के ऐसे शहर को ढूंढने में नाकाम हैं जिसका नाम युगशैल रहा हो।

आरकोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया भले ही उत्तराखंड के जिला देहरादून के विकास नगर क्षेत्र के बाड़वाला जगतग्राम में युगशैल नगर की महत्तता ढूंढने की हर सम्भव कोशिश कर रही है और उसकी गरुड़ासन्न यज्ञ वेदिकाओं में राजा शीलवर्मन् द्वारा किये गए अश्वमेध यज्ञ के अवशेषों के माध्यम से उस नगर का पुरातत्विक महत्व तलाशने में लगी हो, जिस पर कई इतिहासकार अपने अपने तर्क व रिसर्च पेपर्स चस्पा कर चुके हैं। लेकिन आज भी प्रश्न जहाँ का तहाँ खड़ा है कि क्या यमुना नदी तब वर्तमान जगतग्राम के तट तक बहती रही होगी व उसमें ही युगशैल नगर समा गया होगा?  क्या बाड़वाला नाम ही बाढ़ की उपज है। यानि यमुना नदी का जल स्तर तब बाढ़ के रूप में बाड़वाला तक रहा होगा?

ऐसे तमाम सवालों के जबाब ढूंढने के लिए भी शोध आवश्यक है क्योंकि कालसी स्थिति शिलालेख भी यमुना नदी तट से लगभग बाढ़वाला की सामांतर दूरी पर अवस्थित है, जिसका अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि सम्राट अशोक का शिलालेख भी उसी दौर के एक सम्भ्रान्त नगर का द्योतक रहा होगा।

बहरहाल जगतग्राम की अश्वमेध यज्ञ की गरुड़ासन्न वेदिकाओं को देखकर तो यह लगता है कि यहाँ एक बार नहीं बल्कि दो बार अश्वमेध यज्ञ हुए हैं। ऐसे में हमें इतिहासकार में समाहित उन इतिहासकारों के शोध पर भी बिशेष नजर दौड़ाने की आवश्यकता है। उत्तराखंड के इतिहास के युगपुरुष कहे जाने वाले मूर्धन्य इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल चारण जगत ग्राम के बारे में अपनी पुस्तक उत्तराखंड का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक इतिहास, भाग -3 में कुछ इस तरह विवरण प्रस्तुत करते हैं :-

इष्टकालेख —
राजा शीलवर्मन् ने कालसी में अशोक द्वारा स्थापित शिला के ठीक सामने, यमुना के बांयें तट जगतग्राम नामक स्थान पर एक या अधिक अश्वमेध किए थे। यज्ञ के लिए उसने जगतग्राम में गरुड़ाकार वेदिका बनाई थी। जिसकी ईटों पर निम्न दो अभिलेख मिले हैं:-(अ) सिद्धम् । युगेश्वरस्याश्वमेधे युगेशेलमहीपते (:)§ इष्टका वार्षगण्यस्य नृपतेश्शीलवर्मण (:) §

(आ) नृपतेर्षिगण्यस्य पोण-षष्ठस्य धीमत (:) § चतुर्थस्याश्वमेधस्य चित्यो (s) § यं शीलवर्मण (:) §

भावार्थ :– सिद्ध को नमस्कार। यह वृषगण या वार्षगण्यगोत्र में उत्पन्न, युगशैल मही या दो पर्वतों से घिरी हुई धरती के नरेश, युगेश्वर या युगनगरी के राजा शीलवर्मन के अश्वमेध की ईंट है।
यह वार्षगण्यगोत्र वाले, पोण नामक व्यक्ति या नरेश की छटी पीढ़ी में उत्पन्न, श्रीमान शीलवर्मन के चतुर्थ अश्वमेध का चैत्य है। § ईटों पर यहां ऐसे चिन्ह का अं’कन है, जो प्रायः कुशाणकालीन अभिलेखों में मिलता है।

वार्षगण्यगोत्र – वर्तमान समय में इस गोत्र के वंशज उत्तराखण्ड में नहीं मिलते । महाभारत के अनुसार वार्षगण्य एक प्राचीन ऋषि थे, जिनसे गन्धर्वराज विश्वावसु ने जीवात्मा परमात्मा-तत्व का विवेचन सुना था ।

महर्षि वार्षगण्य सांख्य के प्राचीन आचार्य माने जाते हैं। वे गुप्तकाल से बहुत पहले हुए थे । उन्हें प्रसिद्ध आचार्य वसुबन्धु का गुरु बतलाया जाता है। सांख्य, योग तथा वेदान्त के अनेक मान्य ग्रन्थकारों ने उनका बड़े आदर के साथ उल्लेख किया है। उनका जीवनकाल दूसरी शती ईसवी में हो सकता है। उनकी छट्टी पीढ़ी में उत्पन्न शीलवर्मन् का समय तीसरी शती ईस्वी में माना जा सकता है ।

शीलवर्मन् के इष्टकालेख की तिथि लिपि के आधार पर तीसरी शती ईसवी ठहराई गई है। इसी शताब्दी के अन्तिम वर्षों के आस-पास यमुनाघाटी में सेनवर्मन् ने यदुवंश के राज्य की स्थापना की, जिसके १२ नरेशों के नाम लाखामण्डल में प्राप्त राजकुमारी ईश्वरा के शिलालेख से मिलते हैं। यदि इष्टकालेख में वार्षगण्यस्य के स्थान पर वृष्णिगणस्य पाठ होता तो शीलवर्मन और सेनवर्मन को एक ही व्यक्ति माना जा सकता था। किन्तु रामचन्द्रन् ने तथा डी० सी० सरकार ने वार्षगण्यस्य पाठ हो सही माना है। इसलिए, तथा लाखामण्डल में प्राप्त एक दूसरी प्रशस्ति का ध्यान रखते हुए दोनों को विभिन्न व्यक्ति मानना चाहिए ।

कैसे पहुँचे :-

सड़क मार्ग से देहरादून -हरबर्टपुर -विकास नगर -जीवन गढ़ -बाड़वाला -जगतग्राम दूरी लगभग 52 किमी. (निजी वाहन से डेढ़ से पौने दो घंटे]

संदर्भ :- डी० सी० सरकार- सलेक्ट इन्सक्रिप्शन, जि० १, पृष्ठ ९९, डॉ शिवप्रसाद डबराल ‘चारण’-उत्तराखंड का राजनैतिक तथा सांस्कृतिक इतिहास, भाग -3 (युगशैल का अश्वमेधकर्त्ता) पृष्ठ २९२-९३, शान्तिपर्व, ३५८/५६, वासुदेव उपाध्याय- गुप्तसाम्राज्य का इतिहास, खंड १, पृष्ठ ११५-१६, एलन – कै० क्वाईन्स आब एनशिएंट इंडिया जि०९ पृष्ठ १४१

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