Sunday, March 15, 2026
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“फूलदेई: 42 वर्ग किमी की झील में दफन मेरी देहरी और वो गुमशुदा मेले”

(शीशपाल गुसाईं)

आज जब पहाड़ की ठंडी बयार ने चैत्र संक्रांति का संदेश दिया होगा, तो पुरानी टिहरी की भगीरथी, भिलंगना, कोटेश्वर की उन घाटियों के हर विस्थापित के दिल में एक कसक उठी होगी। आज फूलदेई है। पहाड़ का वो पर्व जो हमारी देहरियों को फूलों से और हमारे दिलों को उम्मीदों से भर देता था। लेकिन आज, जब मैं अपनी बंद आँखों से उन स्मृतियों को टटोलता हूँ, तो मुझे फूलों की खुशबू से पहले उस विशाल झील का खामोश पानी दिखाई देता है।

बचपन की वो पगडंडियाँ और फूलों का ‘दहेज’

वो दिन भी क्या दिन थे, जब हम छोटे-छोटे बच्चे सूरज की पहली किरण से पहले ही जग जाया करते थे। नंगे पाँव ओस से भीगी घास पर दौड़ते हुए, हम फ्योंली के उन पीले फूलों को ऐसे चुनते थे जैसे कोई खजाना मिल गया हो। बुरांश की लाली और पय्यां की कोमलता से हमारी रिंगाल की टोकरियाँ (कंडई) सज जाती थीं।

गाँव के हर घर की ‘देहरी’ (जिसे हम बड़े प्यार से ‘दहेज’ भी कहते थे) पर जब हम फूल चढ़ाते थे, तो पूरा गाँव “फूल देई, छम्मा देई” के सुरों से गूँज उठता था। वह केवल एक रस्म नहीं थी, वह हमारे अस्तित्व का उत्सव था।
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महाझील: जहाँ 150 गाँवों का उल्लास ठहर गया

आज जिसे दुनिया ‘टिहरी झील’ कहती है और उसकी सुंदरता के कसीदे पढ़ती है, मेरे लिए वह 42 वर्ग किलोमीटर का एक विशाल आँसू है। इस झील ने केवल पानी नहीं भरा, उसने हमारे 150 गाँवों का इतिहास निगल लिया।
■ करोड़ों पौधों की समाधि: वो फ्योंली के पौधे, वो बुरांश के पेड़ और वो आड़ू-खुबानी के बगीचे, जो कभी फूलदेई पर मुस्कुराते थे, आज उस गहरी झील के तल में कहीं सड़ चुके होंगे। करोड़ों पेड़ों की वो हरियाली आज एक मटमैले सन्नाटे में बदल गई है।

■ वो देहरियाँ कहाँ गईं? आज भी सोचता हूँ, क्या उस झील के नीचे आज भी मेरी वो पैतृक देहरी सुरक्षित होगी? क्या मछलियाँ उन डूबी हुई चौखटों पर फूल चढ़ाती होंगी?
छाम का मेला और वो उजड़ी हुई बैसाखी

फूलदेई की शुरुआत आज से होती थी और यह सिलसिला रुकता नहीं था। 30- 31 दिनों तक चलने वाला यह उत्सव एक गते वैशाख (बैसाखी) को अपनी पराकाष्ठा पर होता था। छाम का मेला, जहाँ हजारों की आबादी उमड़ती थी। ढोल-दमाऊं की वो थाप जो पहाड़ की धमनियों में खून बनकर दौड़ती थी।

छाम के बाद अगले दिन नगुण का मेला और फिर पांच दिन बाद देवीसौड़ का उल्लास… ये मेले हमारी फसलों की खुशहाली के गवाह थे। जब काश्तकार सुनहरी गेहूँ की बालियाँ काटता था, तो उसका चेहरा उन मेलों की चकाचौंध से ज्यादा चमकता था। आज न वो फसलें रहीं, न वो मेले। बांध ने सब कुछ एक झटके में ‘विस्थापन’ की भेंट चढ़ा दिया।

एक मीठा दर्द और अधूरी उम्मीद

आज देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार , दिल्ली, या अन्य शहरों में बैठकर हम फूलदेई मना तो लेते हैं, पर वो बात कहाँ? यहाँ कंक्रीट की देहरी है, पहाड़ की वो मिट्टी वाली चौखट नहीं। यहाँ गमले के फूल हैं, वो पय्यां और बुरांश के जंगलों वाली आज़ाद खुशबू नहीं।

लेकिन, अभी भी एक उम्मीद बाकी है। भले ही करीब 150 गाँव डूब गए हों, भले ही करोड़ों पौधे अब जलसमाधि ले चुके हों, लेकिन जो पहाड़ अभी बचे हैं, वहां आज भी वसंत खिला है। वहां आज भी बच्चे अपनी टोकरियाँ लेकर निकलते होंगे।

यह लेख उन तमाम पूर्वजों और विस्थापितों के नाम है, जिनका घर आज उस झील के नीचे है। यह उन करोड़ों पेड़ों के नाम है जिन्होंने टिहरी को सुंदर बनाया था। फूलदेई हमें याद दिलाती रहेगी कि हम चाहें जहाँ भी रहें, हमारी जड़ें आज भी उस 42 किमी की झील के भीतर कहीं अपनी देहरी तलाश रही हैं।
“देणी द्वार, भरी भकार… यो देली सौं बार नमस्कार।”
(हमारी डूबी हुई देहरियों को आज भी हमारा शत-शत नमन।)

 

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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