(मनोज इष्टवाल)
तमसा-यमुना से घिरे जौनसार बावर क्षेत्र की जब भी बात आती है, तभी रगों में रवानगी ताजी हो जाती है। जहां की थाती-माटी में लोक सुरों की गूंज हो ! जहां के आँगनों के पत्थर भी अलौकिक नृत्य की धुन , ढोल की थाप में मंत्र मुग्ध हो झूमने गाने लगते हों। जहां की हवाओं की ताजगी में प्रेमालाप के सुर गूँजते हों । जहां प्रेम की हृदय वेदना आपका दिल चीर ले… ऐसी मौजों की रवानगी में भला नेगी जी के कंठ से निकले शब्द वेदना के तार न छेड़ें ऐसा कैसे हो सकता है।
सुमिकल प्रोडक्शन के बैनर तले गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी और प्रतीक्षा बमराड़ा की आत्मा को छू लेने वाली आवाज़ों में सजा यह गीत सचमुच अंतर्मन की गहराइयों में उतरता हुआ अंतर्रात्मा को भाव विह्वल कर देता है। वाह…. सुभाष पांडे क्या रिदम दी है आपने । एक एक शब्द पानी की साफ सुथरी बूंदों की तरह मानों धड़कते दिल की धड़कनों में पेट्रोल सा काम कर प्रेमी हृदय को आग भी झोंककर दहकते अंगार में तब्दील कर रहा हो। जिसकी सुलगती आग अतीत के एक एक पल, एक एक हर्फ़ जो लिहाफ से ढ़के हुए थे, उनके परदे खोल रहा हो। ऐसे शानदार संगीत ने कानों में मानों मिश्री का घोल उड़ेल दिया हो। संगीत पक्ष में ये दो नाम मैंने पहली बार सुने -पवन गुसाईं & राकेश भट्ट । लेकिन सच में आप कमाल कर दिए ।
बरसों बाद जौनसारी गीतों की शृंखला मे ऐसे गूढ और गहरे शब्दों का जादू बिखरते देखा है। शाबाश श्यामू (श्याम सिंह चौहान) …. क्या लिखते हो यार ! शब्दों में इतना डूब गया कि आँखें सजल हो गई। आज भले ही श्याम सिंह चौहान गीतकार के रूप में जौनसार बावर में एक बहुत बड़ा नाम है। लेकिन मेरे लिए वही अबोध श्यामू है जो इतना भावुक है कि कब रो दे, पता ही नहीं चलता। मुझे वह दृश्य याद आ गया जब मैं तुम्हें पहली बार दिल्ली रिकॉर्डिंग के लिए ले गया था। शायद तब तुम नवीं कक्षा में पढ़ते थे। श्याम सिंह चौहान मूलत: उस दौर में इष्टवाल सीरीज के पार्टनर अनंत राम नेगी जी की खोज रहे थे, जिन्होंने भरोसा जताकर एक छोटे से लड़के को आगे बढ़ाने के लिए मुझे कहा था। श्याम सिंह चौहान जी ने तब इष्टवाल सीरीज के लिए बेहतरीन गीत लिखे थे। श्याम सिंह चौहान के साथ एक अच्छी बात यह थी कि वह गीत लिखते समय उसकी कम्पोजिशन में भी महारथी थे। एक दिन श्यामू ने मुझे कहा था – सर , क्या कभी आप नेगी जी से मुझे मिलाओगे । मैं उनकी चरण धुली माथे पर लगाना चाहता हूँ। मैंने तब श्याम सिंह चौहान को बोला – श्यामू … एक दिन ऐसा आएगा जब आप नेगी जी को गीत लिखोगे। श्यामू तब बोले थे- सर, कहाँ भगवान और कहाँ श्यामू…! तब उसकी आँखों से टप -टप आँसू निकले थे। आज मेरी आँखों से निकल रहे हैं। क्षमा….। मैं श्याम सिंह चौहान जी नहीं बोल सकता क्योंकि हमारी आत्मीयता यह बोलकर खत्म हो जाएगी। आप के गुरु सुप्रसिद्ध लोकगायक सीता राम चौहान जी को मेरा साधुवाद , क्योंकि उन्होंने आपको स्वाती बूंद सावन से मोती बना दिया है। आपका आभार के एस चौहान जी… आपने श्याम सिंह चौहान की हृदयी मुराद ही पूरी नहीं की अपितु जौनसारी लोक समाज को एक ऐसा गीत दे दिया है जो कालजयी रचना , संगीत, निर्देशन, अभिनय के रूप में जिंदगी भर जीवित रहेगा ।
पुराणी प्रीत … सच में प्रेमी दिलों के हृदय को तार -तार कर गई। इसे जितनी बार सुनों उतनी बार नया लगता है और बस हृदय की गहराईयों में उतरता चला जाता है। सबसे खूबसूरत बात इस गीत में यह है कि इसे जौनसार बावर का समाज ही नहीं सुन रहा है बल्कि इसके श्रोता गढ़वाल में भी बहुत हैं। यह इस गीत का जादू ही है कि इसके बारे में जौनसार बावर के युवाओं के बीच जो भी चर्चा हो .. समीक्षकों के मध्य खूब चर्चा है। काश… मेरी तरह हर पहाड़वासी गीत के बोलों को समझ पाता ।
पुराणी प्रीत हमारी एला भी जीऊँदी जागिये….2 एक ऐसी क्लिकिंग पंक्ति है कि आप उसी में खो जाते हैं। जब इस गीत को लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी जी के साथ प्रतीक्षा बमराड़ा से गवाने की बात के एस चौहान जी ने मेरे सामने रखी, तब मैं डर रहा था कि कहीं गीत का फ़ील खत्म न हो जाए लेकिन प्रतीक्षा इतना सुंदर गया गई कि मैं हतप्रभ रह गया । जब वह गाती हैं- ‘मईसा मईसा हेरूँती हाऊँ झूरा-झुराकी, आस जीयणो की मेरे सारी उमरा की।” , तब लगता है मानों किसी ने कलेजा निकालकर हाथ में रख दिया हो।
वाह … अभिनेता अभिनव व अभिनेत्री स्वेता महरा ! स्वेता जाने क्यों इससे पूर्व मेरे लिए सिर्फ एक स्टेज कलाकार से बढ़ कर और कुछ नहीं थीं। मित्रों के बीच अक्सर में चिढ़कर बोल दिया करता था कि क्यों बेवजह उन्हें हाइप दे रहे हो। सिर्फ स्टेज पर परफ़ॉर्म कर लेना ही सब कुछ नहीं होता । परदे पर काम करके दिखाओ तो बात बने। अब शर्मिंदा हूँ, हो सकता है स्वेता महरा इससे पूर्व भी अभिनय कर चुकी हों । मैं ये भी नहीं जानता कि उन्होंने जौनसारी संस्कृति में ढलने उसे समझने के लिए कितना समय लिया है, लेकिन ये कहूँगा कि इस गीत को फिल्माने के लिए स्वेता महरा से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता। अभिनय वह नहीं होता जो बनावटीपन के साथ चेहरे पर झलके। अभिनय वह होता है जो हर शब्द को जीये। स्वेता महरा लेशमात्र भी कहीं किसी शब्द के साथ झूझती नजर नहीं आई। कमाल के अभिनय एक्स्प्रेशन में ढ़ली स्वेता एक मोम की गुड़िया सी लगती नजर आई। बहुत कमी ढूँढने के बावजूद भी निर्देशक अनुज जोशी जी की एक भी कमी पकड़ नहीं पाया । बस खिसयानी बिल्ली के तौर पर यही कहूँगा कि एक जगह बालों की सफेदी में अंतर नजर आया । वह भी बहुत देर तक आँखें गढ़ाने पर…। अभिनव चौहान ने यकीनन अपने अभिनय को हृदय से जीना सीख लिया है। अब वह सब उनकी भाव भंगिमा में दिखने को मिल जाता है जो शब्द होते हैं। गजब का अभिनय कर गए आप। हाँ….. मुझे लगता है कि शुरुआत में डॉक्टर के साथ बोले गए डायलॉग में हल्का सा फ्लेक्चुएशन और आ जाता तो गीत के साथ वह भी अमर हो जाता।
अनुज भाई ….. सच कहूँ आपका मुरीद हो गया हूँ । इस गीत में वह सब दिखने को मुझे मिला जो फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े डायरेक्टर ही कर पाते हैं। आपने इस संस्कृति के हर ताने-बाने को गीत का हिस्सा बना दिया जो यहाँ की दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है।
विगत एक हफ्ते में इस गीत को अभी तक 1,24,388 लोग देख व सुन चुके हैं। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के गीत धीरे-धीरे उठते हुए ऊँचाइयाँ छू जाते हैं। गढ़वाली गीतों में भी लोग जब उन्हें दो तीन बार नहीं सुनते तब तक उसकी गूढ़ता नहीं समझ पाते लेकिन जब गीत जुबान पर चढ़ जाता है तो अमर हो जाता है। लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी इससे पूर्व जौनसार बावर क्षेत्र के सुप्रसिद्ध लोक कलाकार नन्द लाल भारती जी का गीत भी गया चुके हैं। वह भी कालजयी रचना बनी। यह गीत एक नजीर बनेगा ऐसा मेरा मानना है ।
