Thursday, January 15, 2026
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लुकुंदर गढ़…गढ़ चाणक्य ने राजवंश के आपातकाल में यहीं छुपाया था राजकुंवर प्रदीप साह को

लुकुंदर गढ़… जहाँ पुरिया नैथानी ने राजमाता कनकदेवी व राजकुंवर प्रदीप शाह क़ो कटौच/कठैतगर्दी से छुपाकर रखा
(मनोज इष्टवाल)
इतिहास के गर्भ में क्या -क्या दफ़न है, कहा नहीं जा सकता क्योंकि अब किंवदंतियों में ही गढ़वाल राजवंश का ज़्यादात्तर इतिहास जीवित है। रही सही कसर 1797 व 1802 के प्रलयकारी भूकंप, फिर 1803 से लेकर 1815 तक गोरखा काल और फिर गढ़पतियों की आपसी रंजिशों की कहानियों में उलझे ब्रिटिश साम्राज्य में छीने गए ब्रिटिश गढ़वाल में पौड़ी के निकटवर्ती थोकदारों के ताम्र-पत्र, अस्त्र-शस्त्र ने पूरे इतिहास ही नहीं बल्कि भूगोल क़ो भी बदल कर रख दिया। फिर भी अगर कुछ नहीं बदला तो वह है गढ़वाल साम्राज्य की निगहेबान उन चोटियों का अस्तित्व जो सुरक्षा की दृष्टि से गढ़,
झंडीधार व गढ़ियों के रूप में जानी जाती रही। ऐसी ही एक दुर्ग रुपी गढ़ “गढ़कोट गढ़ ” में स्थित मनिहारी (मन्यारी) रावतों का रक्षा दुर्ग झंडीधार है, जो कालांतर में लूथी व रुद्री घंडियाली भड़ का लुकुंदर गढ़ व रुद्रीगढ़ी के रूप में जाना जाता है। यहीं स्थित है नागदेव मंदिर व चिनवाड़ी की परियों जिन्हें स्थानीय भाषा में आँछरी कहा जाता है का आँछरी डांडा या आँछरी धार…। आइये जानते हैं क्या है घनघोर जंगल में तब्दील लुकुंदर गढ़ का इतिहास…?
पृथ्वीपतिसाह की 1668 में मृत्यु हो गई। उस समय फतेपति की आयु केवल 12 वर्ष की थी। अस्तु कुछ वर्षों तक राजमाताओं ने बामदेव, वागीश ओझा, श्रीनिवास, भीमसेण, ठाकुर भगतसिह, सोनसिंह नेगी आदि राज्याधिकारियों के परामर्श से अपने पुत्र के संरक्षक के रूप में शासन किया। गढ़वाल का ऐतिहासिक वृत्तान्त के अनुसार फतेपति की माता सिरमौर के बदनसाही की पुत्री थी। कुछ दिन तक शासन करने के पश्चात् उसकी मृत्यु हो गई तब फतेपति की सौतेली माता बर्त्वाली जी, राजा की संरक्षिका बनी। उसने नए कारबारियों को नियुक्त किया। सिरमौर में 1616 से 1656 ई० तक कर्मप्रकाश, मानधाताप्रकाश और सौभाग्यप्रकाश नामक राजा हुए। इनमें से किसी का भी नाम बदनसाही से मिलता-जुलता नहीं है। अस्तु राणी यदि सिरमौर की थी, तो राजा की पुत्री नहीं थी। रतूड़ी के अनुसार राजमाता कांगड़ा के राजा की बेटी थी। और उसका विश्वासपात्र हरकसिंह कटोच था, जो कांगड़ा के राजपरिवार में उत्पन्न हुआ था, एवं मेदिनीसाह के समय सेना में उच्च पद था। रतूड़ी के अनुसार हरक सिंह के पाँच पुत्रों भगतसिंह, आलमसिंह, महीपति सिंह, दयालसिंह और कलमसिंह ने राणी के शासन में सत्ता अपने हाथ में लेकर प्रजा पर अत्याचार किए थे। फलस्वरूप जनआक्रोश भड़क उठा और वे पाँचों मारे गए । ऐतिहासिक वृत्तान्त के अनुसार अत्याचारी अधिकारी भगोत सिंह, रासिंह, उदोसिंह, सबलसिंह तथा सुजनसिंह थे। पाँचों सादर सिंह कथैत के पुत्र थे। किन्तु रेपर के लेख से विदित होता है कि मारे गए पंचभैया कठैत राजा उपेन्द्रसाह के सम्बन्धी थे, जबकि घटना प्रदीपसाह के राज्यारंभ में हुई थी, जैसा आगे लिखा जायेगा।
संदर्भ:
डॉ शिबप्रसाद डबराल ‘चारण’ (गढ़वाल पर ब्रिटिश शासन खंड 1, पृष्ठ 25), {गढ़वाल का नवीन इतिहास -2 पृष्ठ 100}
टिहरी राज्य अभिलेखागार रजिस्टर सं. 4, पृष्ठ 9-10

लुकुंदर गढ़ को इतिहास के दृष्टिगत साबित करने के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की ऐसी सभी कड़ियाँ जोड़नी भी आवश्यक होंगी ताकि किंवद्न्तियों पर आधारित लुकुंदर गढ़ सम्बन्धी इतिहास जीवित किया जा सके। यही मुख्य कारण भी है कि मैं उस हर कड़ी को जोड़ने का प्रयास कर रहा हूँ जो वर्तमान में लुकुंदर गढ़ में बचे सिर्फ गारे-मिट्टी को साबित करवा सके कि यहीं लुकुंदर गढ़ हुआ करता था और यही वह झंडीधार श्रेणी है जो मैदानी क्षेत्र के आक्रमणों की खबर श्रीनगर राजधानी पहुंचाने का मुख्य केंद्र बिन्दु था।

प्रदीप शाह (राजमाता कनकदेई) पिता उपेंद्र शाह की मृत्यु 1716 में मात्र 22 बर्ष की उम्र में हो जाने के पश्चात् इनके छोटे भाई दलीप शाह ने सन 1717 में राजकाज सम्भाला। लेकिन राजनीति में षड्यंत्र के शिकार होने कारण सिर्फ 06 माह के राज में ही उनकी मौत हो गई। फतेशाह ही ऐसे राजा हुए जो पिता की मृत्यु के पश्चात 15 बर्ष की उम्र में सिंहासन में विराजमान हुए व राजमाता ने इस दौरान राजकाज देखा, लेकिन यह उनका दुर्भाग्य रहा कि वे अपने भाइयों की बातों में आकर ऐसे फैसले लेती रही, जिस से प्रजा में असंतोष फ़ैल गया और विद्रोह की चिंगारी फूटने लगी। उनके पांच भाई कठैत जोकि कांगड़ा से साथ आये थे, ने प्रजा पर स्युंदी-सुप्प कर, हौळ कर , चुल्लू कर, सौणि-सेर क़र इत्यादि लादना शुरू कर दिया। प्रजा में व्यापक असंतोष फैला और राज दरवारियों ने मिलकर इनके पांच भाई भगवत कठैत, आलम कठैत, महिपत कठैत, दयाल कठैत व कलम कठैत (भगोतसिंग, रामसिंग, उधोत सिंग, सब्बल सिंग, सुजान सिंग) को बंदी बना लिया व श्रीनगर से 10 मील दूर ले जाकर उनकी हत्या कर दी। प्रजा में भारी रोष देखकर प्रधान सेनापति पुरिया नैथाणी ने राजधर्म निभाया व बालक फतेशाह व रानी को रातों-रात हाथी में बैठाकर रानीगढ़ सुरक्षित स्थान पहुंचाकर उनकी प्राण रक्षा की, व तब तक सेनापति शंकर डोभाल व स्वयं मिलकर राजकाज देखा जब तक प्रजा में सुख शांति नहीं फैली।

संदर्भ :-
हिमालयन गजेटियर (वोल्युम III, भाग II) वर्ष 1882 में ई.टी. एटकिंसन।
वर्ष 1910 में (ब्रिटिश गढ़वाल, ए गजेटियर वोल्युम XXXVI) एच.जी. वाल्टन।
यही वह दौर था जब पाँच भाई कटौच/कठैतों ने सेनापति गजे  सिंह भण्डारी की धोखे से निर्मम हत्या करने के पश्चात सैन्य सलाहकार शंकर डोभाल पर राजद्रोह लगवाकर उनकी खाल उतरा दी  थी ताकि उसे देख कोई सिर उठाने का साहस न कर सके। पाँच भाई कटौच/कठैत की निर्ममता में सेनापति व राजकीय सिपहसलार पुर्या नैथानी राजमाता कनकदेई (कनक देवी) व पाँच बर्षीय राजकुंवर को रातों-रात हाथी में बिठाकर पौड़ी अदवाणी शिखर चोटी पर ले आए। तब से यह शिखर चोटी रानी गढ़ के नाम से जानी जाती है। उस दौर में पुरिया नैथाणी के साथ उनके अंगरक्षक लूथी और रुद्री घंडियाली के अलावा सौणा मनिहारी (मन्यारी) जिसे बाद में गड़कोट की जमीन रानी कनकदेई ने वफादारी स्वरूप रौत में दी, तभी से मन्यारी रावत कहलाने लगे वहीं रुद्री लूथी  घंडियालों को भी रौत में घंडियाल की जमीन व घंडियाल देवता में अपनी कुलदेवी राज राजेश्वरी की स्थापना कर दान स्वरूप प्रदान की। यह आश्चर्य की बात है कि मुख्य सेनापति बनाए गए गढ़ चाणक्य पुरिया (पुर्या) नैथानी को नैथाना की झँगोरा बूतने वाली जमीन के अलावा इस क्षेत्र में कुछ नहीं दिया गया भले ही माल की भावर, कोटद्वार व मालन घाटी के शून्य शिखर से लेकर मालिनी नदी की हजारों एकड़ जमीन उन्हें दान स्वरूप दी गई, जिसके ताम्र पत्र आज भी भावर क्षेत्र के नैथानी बंधुओं के पास सुरक्षित है। यह जमीन का हिस्सा मालन नदी के आर पार कंवाश्रम से किशनपुरी, जसोधरपुर -किशनपुरीकोटद्वार शहर में मालवीय उदहयन क्षेत्र में अवस्थित है।  पँवाड़ों , लोकगाथाओं में कच नाम और आते हैं जिनमें भीम सिंग बर्त्वाल, मदनु  भंडारी, सौणा रौत, भगतु कफ़ोला (बिष्ट) , डंगवाल, भागु क नौनु सांगु सौन्ठियाल, फगुण्या नेगी (मन्यारस्यूं जखनोली), चैतराम थपलियाल (कफोलस्यूं थापली) इत्यादि पुरिया नैथानी के अयार (जासूस) माने जाते थे। ये नाम कितने सही हैं, इस पर और अधिक शोध की आवश्यकता हो सकती है।

एटकिंसन ने लिखा है- फतेहसाह की मृत्यु के पश्चात्, उसके पुत्र दिलीपसाह ने, जिसका 1717 ई० का ताम्रपत्र मिला है, थोड़े ही मास तक शासन किया। उसके पश्चात् उसके भ्राता उपेन्द्रसाह ने प्रदीपसाह से पूर्व नौ मास तक शासन किया। फतेसाह के देवप्रयाग ताम्रपत्त्र के अनुसार उपेन्द्रसाह ज्येष्ठ था। अस्तु फतेहसाह की मृत्यु के पश्चात् उसने नौ मास तक शासन किया होगा। और उसके पश्चात् दिलीपसाह ने दिसम्बर 1716  और जनवरी 1717  में लगभग दो मास तक शासन करके प्राणत्याग किया होगा। फलतः 1  फरवरी 1717  को दिलीप के पुत्ल प्रदीप को सिंहासन मिला। घटना से केवल २६ वर्ष पश्चात् पैदा हुए, विद्वान्, इतिहासलेखक, श्रीनगरवासी मौलाराम ने लिखा है-

फतेहसाह के पश्चात् उपेन्द्रसाह को राज्य मिला। वह नौ-दस मास तक राज्य करके स्वर्गवासी हो गया । उसका कोई टीका (राजकुमार) नहीं हुआ। जो पुत्र पैदा हुए वे सब मर गए। उपेन्द्रसाह के छोटे आता का नाम दुलीप (दिलीप) था। वह भी मर गया तब उसका पुत्र प्रदीप सिंहासन पर बैठा। 1808  में श्रीनगर पहुँचने वाले रेपर ने लिखा था-उपेन्द्रसाह की मृत्यु के पश्चात् उसके भ्राता दुर्लभसाही (दिलीपसाह) के पुत्र प्रतापसाही (प्रदीपसाह) को सिंहासन मिला था। दिलीपसाह का 1717  का अभिलेख मिल जाने से सिद्ध है कि प्रदीपसाह से ने 1717 से लेकर 1772 तक राज किया। 

1 – गढ़राजवंशकाव्य, पृ० 61-62 । 2-एसियाटिक रिसचेंज, जि० 11, पृ० 508 ।

प्रदीप शाह काल (1717 -1772) माना जाता है कि गढ़ चाणक्य पुरिया नैथानी के कुशल शासन तंत्र के कारण, किसी भी पँवारवंशी शाह राजा ने इतने साल राज नहीं किया जितना प्रदीप शाह ने किया है । उसके काल को इतिहासकार दो भागों में बांटते हैं जिनमें पहला राणीराज और दूसरा प्रदीप शाह राज।

राणीराज (राजमाता कनक देवी या कनक देई) 

गढ़कवि व राज चित्रकार  मौलाराम के अनुसार प्रदीपसाह को पाँच वर्ष की आयु में सिंहासन प्राप्त हुआ था। उसके राज्यकाल के आरम्भिक 10-12 वर्ष तक उसकी माँ राजमाता कनकदेवी/कनकदेई  शासन करती रही। उसके शासनकाल ‘राणीराज’ में राज्याधिकारियों में पहले से चली आती दलबन्दी अत्यन्त उग्र हो गई। मुगल दरबार में जिस प्रकार मुगल (ईरानी-तूरानी) और हिन्दुस्तानी (पठान रोहिले) नामक दलों में तीव्र प्रतिस्पर्धा थी, उसी प्रकार की दलबन्दी गढ़वाल के राज्याधिकारियों में भी थी। फतेसाह के राज्यकाल से राजपूतदल और खशियादल की पृथकता का आभास मिलने लगता है। मेदिनीसाह की दो राणियों में से एक सिरमोर की (रतूड़ी के अनुसार काँगड़ा की) तथा दूसरी गढ़वाल की बर्खाली थी। पृथ्वीपतिसाह की मृत्यु के पश्चात् पहले सिरमोरिया राजमाता ने तथा उसकी मृत्यु के पश्चात् बर्खाली राजमाता ने फतेसाह के संरक्षक के रूप में शासन किया था। तब तक गढ़वाल मूल की तथा बाह्य-मूल की राणियों में कोई अन्तर नहीं था। फतेसाह के समय से हिमाचली राजाओं के साथ गढ़नरेशों के सम्बन्ध बढ़ने लगे । फतेसाह की 22 राणियों में से गढ़वाल-मूल की केवल 4  (दो झिकवाणी तथा दो बर्खाली) एवं हिमाचल-मूल की 18  राणियाँ थीं।

हिमाचल मूल की राणियों के सगे-सम्बन्धियों को, गढ़राज्य में, उच्च पदों पर, विशेषकर सेना में नियुक्ति मिलने लगी । इनका तथा अन्यत्त से आकर गढ़राज्य में नियुक्ति पाने वाले राजपूतों का दल ‘राजपूतदल’ कहलाता था। स्थानीय राजपूत-ब्राह्मण अधिकारियों को ‘खशियादल’ की संज्ञा दी गई थी। अपनी उद्दण्ड खश प्रजा को आतंकित करने के लिए उन दिनों गढ़राज्य और कुमाऊं के राजा वाह्यागत राजपूत आयुधजीवियों को उत्सुकतापूर्वक अपनी सेना में बड़ी संख्या में भरती करते थे। तथा उनके परिवारों को बसने के लिये भूमि प्रदान करते थे।

मौलाराम ने लिखा है प्रदीपसाह को पाँच वर्ष की आयु में सिहासन मिला। सभी राजकार्य राजमाता चलाने लगी। गढ़राज्य में राणी-राज हो गया। नए मन्त्री और कर्मचारी नियुक्त किये गये। गोती (राजपरिवार के व्यक्ति), ब्राह्मण और मन्त्री मारे गए। गढ़राज्य में घोर कलियुग फैल गया। खथियों ने बहुत-से राजपूतों का, पहले से चले आते सभी मन्त्रियों का संहार कर दिया । अनुभवहीन राजा के अनुभवहीन मन्त्री ! गढ़ के सारे कार्य अष्ट-नष्ट हो गए। राजा बालक, मन्त्री आपस में लड़ने-भिड़ने वाले, फिर न्याय कौन करता ? जिस प्रकार अंकुणहीन हस्ती आपस में जूझते हैं, उसी प्रकार नियन्त्रणहीन राजकर्मचारी परस्पर भिड़ने लगे ! अनुभवहीन राजकर्मचारियों को राज्य की मलाई-बुराई की कोई चिता न रही। अनुभवी विद्वान, परखे हुए राजकर्मचारियों को कोई पूछता भी न था। सर्वत्र अज्ञान का धुंध फैल गया। राख और बूरा एक भाव बिकने लगे ! पण्डित, बुद्धिमान, सुयोग्य व्यक्ति उपेक्षित हो गए। जो पामर, क्षुद्र कुलोत्पन्न व्यक्ति थे उन्हें विश्वासपात्त मन्त्री और राजकर्मचारी बनाया गया। जब तक (शंकर) डोभाल मन्त्री रहे, गढ़ के सारे राजकार्य उत्तम ढंग से होते रहे। (शंकर) डोभाल ने शंकरमठ का निर्माण किया। तीर्थयात्रियों के लिये सदावंत आरम्भ किए। किन्तु जब शंकर डोभाल की हत्या करके। खंडूड़ी (सारंग) को दफ्तरी बनाया गया तो उसने पहिले दी गईं जागीरें भी छीन लीं, कहीं मठ नहीं बनवाया, तथा कहीं वगवान नहीं लगाया । पुराने मठादि को भी (उनकी भूमि छीनकर) ध्वस्त कर दिया।’

  1.  गढ़राजवंश काव्य, पृ० 62 
  2.  एटकिनसन-हि० डि० जि०2 , पृ० 540 
  3. पांडे-कुमाऊं का इतिहास, पृ०316 
  4. टिहरी राज्य अ० रजिस्टर  सं० 4  पृ० 10811
  5. टिहरी राज्य अभिलेखागार रजिस्टर सं०4  पृ० 6-10  ।
  6. गढ़वाल के इतिहास की नई सामग्री पृ० 656 ।

दलबंदी –

कुमाऊं की ही तरह जहां विभिन्न सभसद दलों मध्य दलबंदी थी गढ़वाल में भी मेदनीशाह काल से ही राजपूत दल (बाहर से ए राजपूत ) और खस दलों (आदि काल के सैनिक ) में भयंकर दलबंदी चलने लग गयी थी जिसने आगे जाकर गढ़वाल व कुमाऊं को दासता के गर्त में धकेला। आज भारत में भी भारत को छोड़ स्वार्थ दलबंदी का युग दीख ही रहा है।
कटोचगर्दी – राणी के शासन में मेदनीशाह के समय हिमाचल से आये कटोचों की संतानों ने शासन अपने हाथ में ले रखा था और कई अत्त्याचार किये अन्य दल वालों की जघन्य हत्त्या करवाई। इन्हे बाद में हत्त्या कर मार डाला गया था।

कठैत गर्दी –

कटोचों  के उत्पाटन के बाद कठैत शासन में दखलंदाजी करने लगे। कठैतों के अत्त्याचार काल को कठैतगर्दी कहा जाता है। इस काल में कई नए कर लगे और कई करों में बृद्धि हुयी। यात्रियों हेतु मंत्री शंकर डोभाल ने सदाव्रत खोले किन्तु बाद में मंत्री खंडूड़ी ने सदाव्रत बंद करवा दिए।

फतेसाह के राज्यकाल से हिमाचली तथा डोटियाली राणियों की संख्या और प्रभुता बढ़ने लगी और पीछे तो गढ़नरेश उच्च गढ़वाली राजपूतों की पुत्रियों के डोले स्वीकार करके उन्हें केवल ‘खवासन’ का ही पद देने लगे, जिससे उनका पुत्त्र ज्येष्ठ होने पर भी ‘कम असल’ कहलावे और सिंहासन प्राप्त न कर सके। हिमाचल से आई राणियों के कृपापात्त्र, उनके मैकै से आकर गढ़राज्य में सेना में, या अन्य उच्च पदों पर कार्य करने वाले राज्याधिकारी प्रायः षड्यन्त्रों में भाग लेते थे।

कठैतों का बध-

प्रदीपसाह के राज्यारम्भ में पाँच भाई कठैतों का, जिन्होंने सत्ता हथिया ली थी, बध किया गया। इस सम्बन्ध में, रतूड़ी के ‘गढ़वाल का इतिहास’ में, ‘टिहरीराज्य-अभिलेखागार रजिस्टर’ सं० 4  में तथा भक्तदर्शन के ‘गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां’ में विभिन्न अनुश्रुतियां मिलती है। रेपर ने 1808 में सुना था कि मारे गए पंचभैया उपेन्द्रसाह के सम्बन्धी थे । उपेन्द्रसाह की मृत्यु होने पर उसके भतीजे प्रताबसाही को, जो दुर्लभसाही का पुत्र था राजा बनाया गया था। पंचभैयों द्वारा उपद्रव करने पर वे मारे गये थे। और उस धार पर, जो तब से ‘पंचभैयाखाल’ कहलाती है, पांचों के मुंड काट कर चबूतरा बनाया गया था। राणी कनकदेवी ने प्रतापसाही को पुनः सिंहासन पर बिठाया। और उसकी संरक्षिका बन गई। रेपर के अनुसार उक्त चबूतरा विद्रोह का तथा एक नारी द्वारा कठोर बदलालेने का प्रतीक है। रेपर के इस उल्लेख को ज्ञात तथ्यों के साथ मिलाने से घटनाक्रम पर निम्न प्रकाश पड़ता है।

 उपेन्द्रसाह की राणी का, जिसे रतूड़ी की सूची में कटरायणजी या कडूड (केहलूर ? कुटलेड़) के राजा की बेटी कहा गया है, टीका की पत्नी होने के कारण फतेसाह के राज्यकाल से ही प्रभुत्व रहा होगा। उपेन्द्रसाह के शासनकाल में वह महाराणी थी । संभवतः उपेन्द्रसाह के शासन में, राणी के मायके के सम्बन्धी पाँच भाई कठैतों में सबसे बड़े भगोतसिंह  को रनिवास का ड्योढ़ी अफसर जैसे किसी पद पर नियुक्त किया गया था। उपेन्द्रसाह का कोई पुल न होने से, जब राणी के देवर के पुत्र प्रदीपसाह को राजा बनाया गया तो राणी की तथा कठैतों आदि की इच्छा थी कि राणी का प्रभुत्व पूर्ववत बना रहे। जिससे उनकी भी स्वार्थसिद्धि होती रहे। वजीर गजेसिह भंडारी, शंकर डोभाल और पुरिया नैथानी जैसे बरिष्ठ राज्याधिकारी इसके विरुद्ध थे। वे चाहते थे कि प्रदीपसाह की माता, जिसका नाम टिहरी राज्य अ० रजिस्टर के अनुसार कनकदेवी  था, बालक राजा की संरक्षिका रहे। इस पर कठैतों और गजेसिंह भंडारी आदि पुराने प्रतिष्ठित मन्त्रियों के मध्य संघर्ष चला। उक्त रजिस्टर में लिखा है- सादरसिंह कठैत के पाँच पुत्र, जिनके नाम भगोतसिंह, रामसिंह , उदोसिंह, सबल सिंह तथा सुजनसिंह थे, प्रमुख कारबारी बन गए। शंकर डोभाल को देवावी (लिखवार) बनाया गया। अन्य कारवारी मोर भंडारी, गजेसिंह कंडारी, भौसिह और काला भंडारी थे । तब भगोतसिह कठैत का भाग्य जागा। वह दिन में भी और रात्रि में भी दरबार (राजप्रासाद) के अन्दर रहता था। शंकर डोभाल और गजेसिह भंडारी ने वजीर से कहा-यद्यपि भगोतसिंह विश्वासपात्र है, फिर भी उसे रात्रि में दरबार में प्रवेश नहीं करना चाहिए। क्योंकि राजा बालक-मात्र है और उसकी संरक्षिका नारी है। (इससे क्रूद्ध होकर) भगोतसिंह के दल ने गजेसिह भण्डारी को, (गंगातट पर बने) परगल के नए घाट पर मार डाला। शंकर डोभाल प्राण बचाने हेतु भागा, किन्तु पकड़ लिया गया। उसे हाथी से कुचलवाकर मरवाया गया और उसकी खाल उतराई गई। मगोतसिह कठैत के दल ने अबोध राजा की हत्या के लिये दो कठैतों को नियुक्त कर लिया था। राजमाता कनकदेवी से षड्यन्त्र की सूचना पाकर पुरिया नैथाणी ने बालक राजा की रक्षा का समुचित प्रबन्ध किया। उसने बधाण और लोभा के सहस्रों राजभक्तों को लाकर कठैतों और उनके सहयोगियों को घेर लिया। पराजित होकर वे श्रीनगर से भट्टीसेरा और भागे । और पंचभैयाखाल की चढ़ाई पर मार डाले गए। जिस स्थान पर वे मारे गए वहाँ ६ फीट लम्बा, 6 फीट चौड़ा और 23  फीट ऊंचा मांडा (चबूतरा) बनाया गया। उसके ऊपर पांचों भाइयों के स्मारक पाँच शिवलिंग रखे गए। तब से वह खाल ‘पंचभैयाखाल’ तथा चबूतरा ‘पंचभैयों का मांडा’ कहलाता है। 1808  ई० में रेपर ने इसे देखा था, जिसका उल्लेख पहले हो चुका है। राजमाता कनकदेवी पुनः अपने पुत्र प्रदीपसाह के नाम पर शासन करने लगी। रतूड़ी ने इस घटना को फतेसाह के राज्यारम्भ की माना है और उपद्रवी पंचभैया कटोचों को हरकसिह कटोच के पुत्र भगवतसिंह, आलमसिंह, महीपतिसिंह, दयालसिंह तथा कलमसिंह बताया है। तथा आगे चलकर उनकी स्मारक चौरी को कठैतों की चौरी’ कहा है। अन्यत्र  रतूड़ी ने कठैत और कटोच को एक उपजाति का माना है। इससे स्पष्ट है कि पंचभैया कठैतों को ही पंचभैया कटोच कहा गया है। और यह विप्लव एवं हत्याकांड केवल एक ही बार प्रदीपसाह के राज्यारम्भ में हुआ था।

  1. टिहरी राज्य अ० रजिस्टर  सं० 4  पृ० 10811
  2. टिहरी राज्य अभिलेखागार रजिस्टर सं०4  पृ० 6-10  ।
  3. गढ़वाल के इतिहास की नई सामग्री पृ० 656 ।
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