Friday, January 16, 2026
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सल्लाम वाले कुम “ढोल-सागर” में शामिल कर एक नया शोध लेकर आए केशव दास अनुरागी

(मनोज इष्टवाल)
क्या यह सम्भव हो सकता है कि ढोल सागर के ज्ञाता स्व. केशव दास अनुरागी ने सन् 1958 से पहले अपनी अप्रकाशित पुस्तक ‘नाद नंदिनी’ की पाण्डुलिपि लिख लिया था , जिसका प्रकाशन सन् 1996 में उनके मरणोंपरान्त किया गया? अगर उन्होंने यह पुस्तक 29 बर्ष की उम्र में लिख ली थी तब उन्होंने इसका प्राक्कथन 13-08-91 में क्यों लिखा? वहीँ डॉ शिवानन्द नौटियाल ने दीपावली के दिन 14 नवम्बर 1993 प्रस्तावना व कुमार गंधर्व ने 25-08-1958 को इसका आमुख!
ऐसा दावा किया जाता है कि “नाद नंदिनी” की भूमिका कुमार गंदर्भ ने सन् 1958  में लिखी। तो क्या केशव दास अनुरागी जी 29 बर्ष की अवस्था में ही ढोल सागर की में सैदवाली अर्थात ‘सल्लाम वाले कुम’ का मिश्रण कर गए थे? अगर ऐसा था तब वृहद् ढोल सागर में पंडित भवानी दत्त धस्माना ग्राम-बग्याली पौड़ी गढवाल भारत प्रिंटिंग प्रेस से संवत 1983 अर्थात सन् 1926 सिर्फ सात पेज (पांडुलिपि के 16 पेज) व सात अध्याय, वहीँ पंडित ब्रह्मा नन्द थपलियाल ग्राम- खैड़, पट्टी- मवालस्यूं , पौड़ी गढवाल द्वारा प्रबुद्ध साहित्यकार अबोधबन्धु बहुगुणा के अनुसार सन् 1913 व मोहनलाल बाबुलकर के अनुसार सन् 1932 में पंडित ब्रह्मानन्द थपलियाल ने पौड़ी में अपनी प्रिंटिंग प्रेस बदरीकेदारेश्वर प्रेस में छापा था, जिसका उल्लेख डॉ. शिव प्रसाद डबराल चारण द्वारा वीरगाथा प्रकाशन से छापी गयी अपनी पुस्तक ढोल सागर संग्रह में किया है। यह आश्चर्य की बात है कि केशव दास अनुरागी द्वारा लिखी गयी ढोल सागर में सैदवाली अर्थात ‘सल्लाम वाले कुम’ का न जिक्र पंडित ब्रह्मा नन्द थपलियाल और ना ही पंडित भवानी दत्त धस्माना ने अपनी ढोल सागर पुस्तिका में किया है और न ही ढोल सागर के मर्मज्ञ खेगदास, ओंकारदास (ढोलसागर) व प्रेम लाल भट्ट (दमौ सागर) द्वारा अपनी पुस्तकों में सैदवाली को प्राथमिकता दी है।
क्यों केशव दास अनुरागी  के अलावा अन्य विद्वानों ने इसे अपने ढोल सागर में क्यों स्थान नहीं दिया? क्यों प्रेम लाल भट्ट ने अपने दमौ-सागर में इसे अछूता रखा? क्यों “नाद-नंदिनी” आज भी उपलब्ध नहीं है और क्यों उनके बुद्धिजीवी पुत्र इत्यादि उनके लिखे ढोल सागर को आगे नहीं रखते? ऐसा क्या हुआ कि उनके स्वर्ग सिधारने के पश्चात उनकी पांडुलिपि “नाद नंदिनी” का प्रकाशन सन् 1996 में डॉ शिवानंद नौटियाल के माध्यम से विश्व् प्रकाशन, 18 मदन मोहन मालवीय मार्ग लखनऊ व अंसारी रोड दरियागंज दिल्ली से प्रकाशित गया था। लेकिन अचम्भे की बात यह रही कि यह दोनों जगह ही ढूंढने पर उपलब्ध नहीं हो पाई। आखिर ऐसा क्या हुआ कि ढोल सागर के मर्मज्ञ स्व. केशव अनुरागी की पुस्तक 38 बर्ष बाद प्रकाशित हुई ? क्या यही कारण रहा होगा कि आम बुद्धिजीवी ढोल सागर को अधूरा मानते रहे और कल्पना करते रहे कि इसका दूसरा भाग प्रकाशित हुआ ही नहीं? क्या उसके पीछे केशव अनुरागी द्वारा अपने ढोल सागर में प्रस्तुत की गयी “सैदवाली” अर्थात ‘सल्लाम वाले कुम’ का प्रयोग रहा होगा? जिसे अक्सर ड़ोंर व थाली में जागरी कुछ ऐसा गाते हैं :- ‘सल्लाम वाले कुम’ ऐसे जादा जी ..तेरी तीन टांग घोड़ी,‘सल्लाम वाले कुम’
     बरछी वाले जवान ‘सल्लाम वाले कुम’, तेरी रेशमी पगड़ी ‘सल्लाम वाले कुम’
     अरे नजियाबाद मंडी ‘सल्लाम वाले कुम’………………………………….
मेरा व्यक्तिगत आंकलन यह कहता है कि “जब केशव अनुरागी जी ने यह पुस्तक सन् 1958 में अपने इस नए प्रयोग के साथ लिखी होगी तब पूर्व ढोल सागर के लेखकों व बुद्धिजीवियों ने सैदवाली  को ढोल सागर में शामिल करने पर आपत्ति जताई होगी क्योंकि उस दौर में जाति व वर्ण व्यवस्था ही कुछ ऐसी थी कि ‘छोटी जाति’ का व्यक्ति ऐसा सहस कर कैसे सकता है! यह आमजन की भावना में शामिल रहा होगा। क्योंकि भला एक किताब के प्रकाशन में कोई व्यक्ति 38 बर्ष तक चुप कैसे बैठ सकता है? वह वह किताब प्रकाशित भी तब होती है जब वे इस लोक में नहीं रहे।
अगर आप केशव अनुरागी द्वारा लिखित “नाद-नंदिनी” को पढेंगे तो पायेंगे कि इसमें  ढोल सागर में पार्वती व शिव संवाद (ईश्वरोवाच) के रूप में लिखा गया ग्रंथ है।  इस ग्रंथ के प्रथम भाग में सृष्टि की उत्पत्ति का विशद वर्णन मिलता है।  दूसरे भाग में ढोल का वर्णन, उसकी उत्पत्ति तथा उसे बजाने की कला का प्रभावशाली वर्णन है। अनुरागी ने अपने ताऊ जी से ढोल-दमाऊं बजाना सीखा था। अनुरागी ने गढ़वाली लोक गीतों की स्वर-लिपियां बनाईं और उनका लोक-शास्त्रीय अध्ययन किया। यह काम लोक संगीत को दस्तावेज़ी शास्त्र का दर्ज़ा देने जैसा है। उन्होंने लखनऊ में गढ़वाल संस्था के कुछ कार्यक्रमों में उन्होंने ढोल वादन पेश किया था, व आकाशवाणी कार्यक्रम में भी ढोल वादन प्रस्तुत किया था। उनके नजदीकी रहे मित्रों का तो यह तक कहना है कि उन्होंने स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस से सबंधित कुछ कार्यक्रमों के दौरान दिल्ली में भी उन्होंने ढोल-वादन की प्रस्तुतियां दी थीं, जिनका आधार ढोल सागर ही था। पान का बीड़ा मुंह में दबाये केशव अनुरागी जी से मेरी मुलाक़ात सन् 1990 में लखनऊ दूरदर्शन के कार्यक्रम अधिकारी टी.बी. सिंह ने करवाई थी। तब मैं अपना प्रोजेक्ट “शकुंतला नृत्य नाटिका” लेकर उनके पास गया था। जब केशव अनुरागी जी को पता चला कि मैं गढ़वाली हूँ तब उन्होंने बहुत सहृदयता से मुझसे पूछा था, भुल्लु..तू कैs गौं कु छई? मैंने तब उन्हें अपना परिचय दिया था। लेकिन जवानी का जोश और अहम् जो मुझ में कूट-कूटकर भरा था, तब अनुरागी जी कुछ अस्वस्थ भी थे। सोचा – दूरदर्शन है कोई न कोई यहाँ मिलता ही रहता है। टी. बी. सिंह ने मुझे बाद में जानकारी दी कि ये हमारे ही विभाग आकाशवाणी से सेवानिवृत्त हैं और जब भी लखनऊ इनका आना होता है हमसे मिलने जरुर आते हैं। इसकी चर्चा मैंने जब दुर्गापुरी कोटद्वार पहुंचकर बद्रीश पोखरियाल जी से की, तब उन्होंने मुझे खूब डांटा था। बद्रीश पोखरियाल जी ने कहा तुमने एक महान हस्ती को नजरअंदाज कर दिया, अरे उन्हें ही बोल देते तो वह तुम्हारा काम चुटकियों में करवा देते। पता है केशव अनुरागी कौन हैं? फिर रुक कर बोले – मेरे हिसाब से ढोल व ढोल सागर का उन जैसा ज्ञाता शायद ही अब कोई हो। खैर संदर्भवश यह इत्तेफाक लिख रहा हूँ। उसके तीन बर्ष बाद 21 मार्च 1993 को अनुरागी जी के स्वर्ग सिधारने की खबर भी मुझे बद्रीश पोखरियाल व मूर्धन्य कवि व साहित्यकार कन्हैय्यालाल डंडरियाल जी के माध्यम से ही प्राप्त हुई। आश्चर्य की बात यह है कि उनकी पांडुलिपि “नाद-नंदिनी” का प्रस्तावना उनके स्वर्ग सिधारने के आठ माह बाद तत्कालीन समय में  उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे डॉ शिवानन्द नौटियाल लिखा व प्रकाशन 1996 में किया गया।
ढोल सागर में सैदवाली का प्रयोग 
“हिंदुस्तान” अखबार के सम्पादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी लिखते हैं कि “सैदवाली ढोल सागर का एक अनूठा प्रयोग हुआ होगा जिसके बारे में अनुरागी जी ने ‘नाद नंदिनी’ में बताया है- “जागरों में देवी-देवताओं के गीतों के अतिरिक्त हन्त्या अथवा घरभूतों के गीत (मृतात्मा की स्मृति में गाये जाने वाले गीत) सय्यदों की सैद्वानी यानी सय्यद-वाणी सम्मिलित है। सैद्वानी मुसलमानी पीर-पैगम्बर को रिझाने के लिए प्रस्तुत की जाती है इसकी भाषा में फारसी शब्दावली का अधिक प्रभाव होता है अथवा यह उर्दू मिश्रित गढ़वाली होती है। गायन की शैली भी कव्वाली जैसी होती है।”
 ढोल में आज भी अनुरागी जी के स्वर में गमकते हैं।
सल्लाम वाले कुम
त्यारा वे गौड़ गाजिना, सल्लाम वाले कुम
म्यारा मियां रतना गाज़ी, सल्लाम वाले कुम
तेरी वो बीवी फातिमा, सल्लाम वाले कुम…
केशव ‘अनुरागी’ का स्मरण होते ही कानों में सम्मोहित कर देने वाला अद्भुत यह गायन गूंजने लगता है।
1980 के आसपास कभी अनुरागी जी से भेंट हुई थी। वहीं आकाशवाणी, लखनऊ में जो अपना साहित्यिक-सांस्कृतिक स्कूल और अड्डा था। अनुरागी जी संगीत विभाग के कार्यक्रम अधिकारी बन कर आये थे। संगीत उनकी रग-रग में था, उनके हंसने और रोने में था। वे इतना डूब कर गाते कि उनकी आंखों से अश्रुधार बहने लगती थी। धीरे-धीरे जाना कि गायन तो उनकी अद्वितीय प्रतिभा का अंश भर था। ‘ढोल सागर’ की उनकी समझ उल्लेखनीय थी। इस शास्त्र को जितना उन्होंने समझा उतना शायद और किसी ने नहीं।
डा. शिवानन्द नौटियाल के शब्दों में “ढोल सागर ईश्वर-पार्वती-सम्वाद के रूप में लिखा गया ग्रंथ है। इस ग्रंथ के प्रथम भाग में सृष्टि की उत्पत्ति का विशद वर्णन मिलता है। दूसरे भाग में ढोल का वर्णन, उसकी उत्पत्ति तथा उसे बजाने की कला का प्रभावशाली वर्णन है। ”अनुरागी जी उस पर अपनी खास समझ के आधार पर बड़ा काम करना चाहते थे। उसकी व्याख्या, उसका विश्लेषण उसके आधार पर उन्होंने तालों का सृजन किया था. इस बारे में कुछ लेख भी लिखे थे। बाकी वे सोचते ही रहे। वास्तव में, वे भावनाओं की लहरों पर बहते रहने वाले अत्यंत सरल इंसान थे, अनुशासनबद्ध संगीतकार या लेखक नहीं। तो भी एक काम उन्होंने ऐतिहासिक किया। उन्होंने कई गढ़वाली लोक गीतों की स्वर-लिपियां बनाईं और उनका लोक-शास्त्रीय अध्ययन किया। यह काम लोक संगीत को दस्तावेज़ी शास्त्र का दर्ज़ा देने जैसा है।”
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी लिखते हैं –  मैं उनके पीछे पड़ा रहता- ‘अनुरागी जी, अपना काम पूरा करिए, ढोल सागर पर काम होना ही चाहिए। वे गरदन हिलाते और ‘हां-हां’ कह कर टाल जाते। उनके मुंह में हमेशा पान का बीड़ा भरा रहता। अक्सर घुटकी भी लगी रहती । मैं उनके घर आने की ज़िद करता, वे टाल जाते, बहाना बनाते। एक बार मैं ज़िद करके उनके घर पहुंच गया। वे अत्यंत सादगी से रहते थे और खूब अव्यवस्थित भी। मेरी रट थी कि आप ढोल सागर पर लिखो, दिक्कत हो तो आप बोलो और मैं लिखता चलूंगा। मेरी ज़िद देख कर उन्होंने एक बक्से से निकाल कर करीब 40-50 पन्ने मुझे पकड़ा दिये। मुझे अपने घर से ज़ल्दी चलता करने के लिए ही शायद।
टाइप किये हुए वे पन्ने पढ़ कर मैं चकित रह गया। संगीत में मेरी कोई गति नहीं लेकिन इतना तो समझ ही गया कि यह ऐतिहासिक महत्व का काम है। उन पन्नों में गढ़वाली लोक गीतों की स्वर-लिपियां थीं, उनकी संरचना पर विद्वतापूर्ण टिप्पणियां, शास्त्रीय धुनों पर लोक धुनों का प्रभाव, आदि-आदि. फिर पता चला वे अंश उनकी अप्रकाशित पुस्तक ‘नाद नंदिनी’ की पाण्डुलिपि का हिस्सा थे।
बाद में उनके पास पुस्तक की पूरी पाण्डुलिपि भी मिल गयी। मैंने उसे छपवाने की कोशिश की लेकिन निराशा हाथ लगी। उस काम के कद्रदां ही न मिले या हम ही नहीं ढूंढ पाये। काफी समय बाद अनुरागी जी के मित्र, लेखक और विधायक शिवानंद नौटियाल के प्रयास से उत्तर प्रदेश संगीत-नाटक अकादमी ने उस पुस्तक के प्रकाशन हेतु पांच हज़ार रु. की सहायता दी। उन्हीं के प्रयास से ‘विश्व प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली ने 1996 में “नाद नंदिनी” का प्रकाशन किया। उसकी भूमिका कुमार गंधर्व ने सन 1958 में लिख दी थी। इसका अर्थ हुआ कि अनुरागी जी ने “नाद नंदिनी” की पांडुलिपि 1958 के पहले तैयार कर ली थी। तब उनकी उम्र कुल 28-29 साल की रही होगी। इससे अनुरागी जी की विलक्षण प्रतिभा का पता चलता है।
सन् 1991 में अनुरागी जी ने इस पाण्डुलिपि में अपना “प्राक्कथन” जोड़ा, जिसमें वे लिखते हैं- “लोक संगीत की स्वर-माधुरी जितनी अद्भुत है, उसकी ताल पद्धति उतनी ही विचित्र है । अत: पुस्तक के तृतीय अध्याय में मैंने गढ़वाली लोक-संगीत की ताल-पद्धति की विवेचना की है, साथ ही गढ़वाली लोक संगीत में उपयोग में आने वाली विशिष्ट प्राकृत तालों को समुचित बोल-बांटों में प्रस्तुत किया है। इसी खंड में गढ़वाली लोक-वाद्यों के स्वरूप का विवरण भी प्रस्तुत किया है।”
कुमार गंधर्व ने इस पुस्तक की ढाई पन्ने की भूमिका बहुत गद-गद हो कर लिखी है- “मैंने नाद-नंदिनी के कथ्य का तन्मयता से अनुशीलन किया है। इस श्लाघनीय रचना के माध्यम से लेखक ने पहाड़ की लोक-आत्मा के पावन संदेश को गढ़वाल की गिरि-कंदराओं में ही गूंजता न छोड़कर भारत के सुदूर कोनों तक भेजने का प्रयास किया है… मुझे आशा है कि नान-नंदिनी का गढ़वाल ही क्यों, इतर प्रदेशों के जिज्ञासु जन भी हृदय से स्वागत करेंगे।”
अब भी प्रश्न मुंह उठाये खड़ा है कि क्या बाद में भी  “नाद-नंदिनी” की कितनी प्रतियां छपी होंगी?  और… कहां धूल फांक रही होंगी? फिर प्रश्न यह भी उठता है कि क्या केशव अनुरागी कुंठाग्रस्त थे ? इसका सीधा सा जबाब वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी देते हैं, वह लिखते हैं  कि “हां, अनुरागी जी में कुंठाएं थीं और उनका कारण हमारा यह समाज है। उनका जन्म 13 जनवरी, 1929 को पौड़ी गढ़वाल के ग्राम कुल्हाड़ में एक गरीब दलित परिवार में हुआ था। औजी या बाजगी परिवार में, जिन्हें ढोल बजाने के लिए तो मंदिरों से लेकर घरों तक बुलाया जाता था लेकिन उनके हिस्से में अनाज के कुछ दाने और अपमान व धिक्कार ही आते थे। गांव में प्राथमिक शिक्षा के साथ ही उन्होंने अपने ताऊ जी से ढोल-दमाऊं बजाना सीखा। संगीत सीखने की उनकी प्रतिभा गजब की थी। आगे की पढ़ाई के लिए वे लैंसडाउन और देहरादून गये लेकिन समाज में मिलते अपमान के बदले ढोल को इस तरह बजाते रहे कि उसे पी गये, उसे घोट लिया, वे उसके तालों-स्वरों में समा गए। ढोल से उन्होंने मुहब्बत की और उसी से अपना विद्रोह भी गुंजायमान किया।
हां, बजाते-बजाते अनुरागी जी खुद ढोल के भीतर चले जाते। वहां उनका अपना राज था जहां कोई अपमान, कोई सामाजिक उपेक्षा और कटूक्तियां नहीं थी। वहां सुरों, तालों और धुनों की परम मानवीय दुनिया थी। वहां सिर्फ संगीत था जो मनुष्यों में कोई भेद करना नहीं जानता। वे बोलने में हमेशा संकोच करते थे, घुटकी लगी होने पर भी खुल कर बोल नहीं पाते थे। ढोल ही था जो उन्हें और उनके ज्ञान को सर्वाधिक मुखर करता था, गुंजा देता उन्हें ढोल।
और, जब वे गाते तो गज़ब होती थी उनकी तान, आरोह-अवरोह. क्या गला था उनका! जब वे सुनाते- ‘रिद्धि को सुमिरूं, सिद्धि को सुमिरों, सुमिरों शारदा माई…’ तो हवा थम जाती और उसमें अनुरागी जी के स्वरों की विविध लहरियां उठने-गिरने लगतीं। बायां हाथ कान में लगा कर वे दाहिने हाथ को दूर कहीं अंतरिक्ष की तरफ खींचते और चढ़ती तान के साथ खुली हथेली से चक्का-सा चलाते, गोया निर्वात में पेण्टिंग बना रहे हों। मंद्र सप्तक से स्वर उठा कर जाने कब वे तार सप्तक जा पहुंचते और वहां कुछ देर विचरण करने के बाद कब वापस मंद्र तक आ जाते, पता ही नहीं चलता था। तब वे अपने ढोल के भीतर होते थे और बाकी दुनिया बाहर।
वे हमारे कुमार गंधर्व थे। वे देवास (मध्य प्रदेश) के उस महान गायक से कभी अनौपचारिक-सी दीक्षा भी ले आये थे. शिवानंद नौटियाल ने लिखा है कि “केशव अनुरागी का शिक्षा ग्रहण का तरीका एकलव्य जैसा था। कुमार गंधर्व की कला से प्रेरणा लेकर अनुरागी ने गढ़वाली लोक संगीत कुमार गंधर्व की शैली में सीखने का प्रयास किया। जब वे कुमार गंधर्व से मिले तो कुमार गंधर्व ने गढ़वाली लोक-संगीत की उनकी विशेष जानकारी को समझा और अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया। ”कुमार गंधर्व ने “नाद नंदिनी” की जैसी भूमिका लिखी है उससे स्पष्ट हो जाता है कि वे केशव अनुरागी की प्रतिभा से कितना प्रभावित थे।
जोशी आगे लिखते हैं – “सल्लाम” गाने का उनका तरीका अनोखा ही था। दरअसल, यह लोक गायकी की सैदवाली शैली है जिसके बारे में अनुरागी जी ने ‘नाद नंदिनी’ में बताया है- “जागरों में देवी-देवताओं के गीतों के अतिरिक्त हन्त्या अथवा घरभूतों के गीत (मृतात्मा की स्मृति में गाये जाने वाले गीत) सय्यदों की सैद्वानी यानी सय्यद-वाणी सम्मिलित है। सैद्वानी मुसलमानी पीर-पैगम्बर को रिझाने के लिए प्रस्तुत की जाती है। इसकी भाषा में फारसी शब्दावली का अधिक प्रभाव होता है अथवा यह उर्दू मिश्रित गढ़वाली होती है। गायन की शैली भी कव्वाली जैसी होती है।”
सचमुच इसे अब चाहे जोशी जी के आधार पर सैद्वानी कहें या हमारे गढ़वाली परिवेश के हिसाब से सैदवाली…! यह ढोल सागर में एक अनूठा प्रयोग केशव दास अनुरागी जी ही लेकर आये। इसे एक तरह से ढोल सागर के लिए नया शोध भी कहा जा सकता है क्योंकि मुझे नहीं लगता कि तब जब की संरचना महादेव व पार्वती जी के माध्यम से हुई थी उस दौर में ही अन्धकार से ओंकार उत्पन्न हुआ था, तभी श्रृष्टि की संरचना हुई थी। उस दौर में मुस्लिम पीर पैगम्बर का जन्म हुआ होगा उस पर मेरी शंका है क्योंकि इस धर्म जाति व वर्ण को अभी बमुश्किल पांच हजार साल भी नहीं हुए हैं जबकि ढोल का जन्म सतयुग का माना जाता है। ढोल सागर में इसका वर्णन कुछ इस तरह मिलता है:-
आपु पुत्रं भावे ढोलं, ब्रह्म पुत्रं च डोरिका ।
पौन पुत्रं भवे नादम्, भीम पुत्रं गजबलम् ।।
बिष्णु पुत्रं भवे पूड़म्, नाग पुत्रं कुंडलिका।
कुरुम-पुत्रं कंदोटिया, गुणी पुत्रं च कस्णिका।।
यहीं पार्वती जी महादेव जी के जबाब से संतुष्ट होती नहीं दिखाई देती हैं, वह महादेव जी से प्रश्न करती हैं कि:-
कोवा सुतश्चैवैव को जननिजन को! 
को अस्य पत्नी किं गोत्रस्य ढोल: ?
महादेव जी इसका उत्तर देते हैं :-
शंकर सुतश्चैव, गिरिजा च जननी,
भव-शक्ति पत्नी, अग्नि गोत्रस्य ढोल:।।

मुझे लगता है कि ढोल और ढोल सागर को जानने समझने के लियए ये दो वार्तालाप ही बहुत हैं, फिर भी कई विद्वत्त जनों का मत है की ढोल सागर दो भागों में है! मैं उनके इस संशय को दूर कर देना चाहता हूँ एवं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ढोल सागर के दो भाग जो कहे जाते हैं वह और कुछ नहीं अपितु इसमें ढोल सागर के मर्मज्ञ ज्ञाता केशव अनुरागी जी का शोध सैदवाली/सैद्वानी है जिसे ढोल सागर में शामिल किया गया है। साथ ही उन्होंने ढोल सागर के वर्णन को व्यापकता देते हुए इसमें ताल छंद इत्यादि का वृहद वर्णन किया है जिसकी वादन कला तो हमारे मर्मज्ञ ढोली जानते हैं लेकिन उसे शास्त्रीय हिसाब से नहीं जान पाते।

ऐसे ढोल सागर के मर्मज्ञ ज्ञाता स्व. केशव दास अनुरागी जी को बारम्बबार प्रणाम व  सल्लाम वाले कुम
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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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