(मनोज इष्टवाल)
पहाड़ जितने खूबसूरत दिन में दिखते हैं, उतने ही डरावने स्याह रात में दिखते हैं लेकिन उस स्याह रात में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद के कुमडार में ढलती सांझ की वह सांझवली आज भी कानों में मिश्री के घोल के समान उतर आती है। सिलबटे में नमक पीसती एक वृद्धा अपनी ही धुन में गाये जा रही थी…“आज पनी ज्यों-ज्यों, भोल पनी ज्यों-ज्यों पोरखिन न्हें जोंला..स्टेशन सम..। मैंने पलटकर पत्रकार मित्र योगेश की तरफ देखा तो वो बोले – अरे इष्टवाल जी, वह कबूतरी देवी है, अपनी बेटी के घर आई हैं। जाति की मिरासी हैं लेकिन लोकगायिकी के नाम से पूरे देश में सुप्रसिद्ध..! अरे… यार इसी साल इन्हें प्रदेश सरकार ने लोक गायिका के रूप में “लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड” से सम्मानित किया है। मेरे कदम ठिठके.. मन हुआ कि मिलता हुआ जाऊँ लेकिन योगेश ने जैसे ही भाव समझे, बोले- कल ऑफिस में बुला लूंगा तब तस्सली से मिल लेना। अभी वो जरुरी है जिस काम के लिए हम आये हैं।
फिर वो कल कभी नहीं आया। यह घटना 2016 या 2017 की होगी, मुझे ढंग से याद नहीं है। लेकिन पिथौरागढ़ से देहरादून तक वापसी के सफऱ में कानो में यही शब्द रुणाट कर रहे थे- “आज पनी ज्यों-ज्यों, भोल पनी ज्यों-ज्यों पोरखिन न्हें जोंला..। कहते हैं इतिहास अपना अतीत दोहराता है। विगत दिन पत्रकार मित्र मोहन भुलानी ने अपने ऑफिस में कहा – अध्यक्ष जी आपको एक शानदार गीत सुनवाता हूँ और अपने सिस्टम के स्पीकर में जब शब्द गूँजे तो मैं भावविभोर होकर कह उठा – अरे वाह कबूतरी देवी..! वो मुस्कराये और बोले पूरा सुनो। आँखें बंद कर गीत सुनने लगा, गीत सुनने के बाद खटका लगा तो बोला – मोहन की संगीत में मिरासी सामाज के तोड़े नहीं दिख रहे हैं जो ठेठ लोक में ले जाता है लेकिन यह मरकसी आवाज लाजवाब है। शब्दों की कंपन व गुंजन में थोड़ा सा युवापन झलक रहा है। कमाल हैं कबूतरी देवी भी..।
मोहन जी मुस्कराये व बोले- कबूतरी देवी नहीं हेमंती देवी..! मैं भौंचक हुआ। सोचा हेमंती कौन पैदा हो गई जो हू-ब-हू लोक गायिका कबूतरी देवी की लय ताल के साथ गा रही हैं। हाँ.. अब महसूस होने लगा कि कबूतरी देवी की ताल व गायन में छाल है, यहाँ गायन में भार व ताल में बदलाव नजर आ रहा है। फिर एकदम याद आया.. अरे हेमंती देवी यानि कबूतरी देवी के साथ अक्सर हारमोनियम पर संगत देने वाली उनकी बेटी..। जिससे मेरी तब फोन पर बात हुई थी जब उन्हें गैस गोदाम से गैस कनेक्शन देने में आना-कानी की जा रही थी। तो क्या कबूतरी देवी की बिटिया हेमंती देवी भी स्वर साधिका हैं?
हेमंती देवी
लोक कलाकार हेमंती देवी, जो कबूतरी देवी की बेटी हैं, व जिनका जन्म पिथौरागढ़ जनपद के क्वीतड़ गाँव में हुआ व अब ससुराल के रूप में वह पिथौरागढ़ के कुमडार में रहती हैं, ने कुमाऊंनी लोक संगीत में अपनी मधुर आवाज से खास पहचान बनाई। उनके सबसे पॉपुलर गीतों में से एक है “बेड़ू पाको बारमासा“। यह गीत उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का एक पारंपरिक लोकगीत है, जिसे हेमंती देवी ने अपनी सुरीली आवाज में गाकर और भी प्रसिद्ध कर दिया। इस गीत में प्रकृति, प्रेम और जीवन के रंगों का खूबसूरत चित्रण है, जो इसे श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय बनाता है। जिसे हेमंती देवी ने कई मंचों में भी गया है।
“आज पनी ज्यों-ज्यों, भोल पनी ज्यों-ज्यों पोरखिन न्हें जोंला..!” गीत लोक की ऐसी ताकत बन गया कि उसने न सिर्फ़ कुमाऊनि समाज अपितु काली व महाकाली नदी पार पश्चिमी नेपाल के अच्छाम, बाजूरा, बाग़लूंग, बैतड़ी, डोटी, हुमला, जाजरकोट, कालीकोट, कंचनपुर, पर्वत, मुगु, प्यूठान, रुकुम, रोल्पा, ढोलपा, सल्यानव सेती तक इसके लोक की गूँज सुनाई देती है। वहीं रामगंगा से लेकर टोंस नदी तक गढ़वाल क्षेत्र में भी यह गीत ठीक उसी तरह प्रचलित है जैसे बेडू पाको बारामासा…।
हेमंती देवी के सुर व कंठ में वह सब अमृत घोल समाहित है जो लोक में अवतरित तत्वों में सम्मिलित होता है। लोक गायिका कबूतरी देवी ने जहाँ अपनी पहचान बनाने के लिए जिंदगी खफा दी। जाने इसकी गायिकी ने उन्हें कितने फाके दिए और जब नाम दिया तो तब बहुत देर हो चुकी थी। यह कहानी सिर्फ़ कबूतरी देवी की ही नहीं है। ऐसी कहानी हर बाजगी, मिरासी, बद्दी, ध्याड़ समाज में कतिपय मिल जाती हैं जिन्होंने लोक समाज के ताने-बाने बुनकर जो लोकगीत दिए उनके जीते जी उन्हें बदले में दो जून की रोटी भी मुश्किल से मिली लेकिन उनके गीत लोक समाज में अमर हो गए। कबूतरी देवी जैसे चंद बिरले ही होंगे जिनके लोकगीत के साथ उनके नाम जुड़े होंगे वरना ज्यादातर गुमनामी के अँधेरे में गायब हो गए।
धन्यवाद डिगारी आपने हेमंती देवी के गायन को सम्मान दिया।
2023 में पिथौरागढ़ के युवा गायक कैलाश कुमार ने इस गीत के स्टोरी कंसेप्ट पर कुमाऊँ के मशहूर संगीतकार गोविन्द डिगारी से चर्चा की। शायद चर्चा इस बात पर ज्यादा हुई होगी कि लोकगायिका स्व. कबूतरी देवी की बेटी हेमंती देवी को कैसे प्रमोट किया जाय। अवश्य गोविन्द डिगारी ने हेमंती देवी को सुनने के बाद उन्हें वैदेही रिकॉर्डिंग स्टूडियो हल्द्वानी आने का आमंत्रण दिया होगा और तब जाकर यह खनकती आवाज हम सबके मध्य पहुंची होगी। लीजिये आप भी सुनिए:-
https://youtu.be/-U7aX0-WtEc?feature=shared
यह हैरत की बात है कि इतनी सुंदर आवाज दुबारा से इतने अच्छे प्लेटफार्म पर पुन: नहीं सुनाई दी। शायद इसका सबसे बड़ा कारण हेमंती देवी के पास रचनाधर्मिता के अभाव के कारण हो सकता है। मेरा मानना है हेमंती देवी को मिरासियों के लोक संसार के वे लोक गीत उठाकर गाने चाहिए जिन पर किसी का अधिकार नहीं होता। यही तो लोक की ताकत होती है कि वह जब वर्तमान के पास पहुँचते हैं तो इतिहास रच देते हैं। धन्यवाद गोविन्द डिगारी, कैलाश कुमार, ओहो रेडिओ व चांदनी इंटरप्राइजेज.. जो आप एक गीत के साथ हेमंती देवी के बहाने स्व कबूतरी देवी को जिंदा कर गए।
कौन है कबूतरी देवी
कुमाउनी लोक गायिका कबूतरी देवी ने आकाशवाणी में गीत गाना 25 मई, 1979 को शुरू किया। इस दिन उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ से अपना पहला गीत रिकॉर्ड किया था, जब उन्होंने आकाशवाणी की स्वर परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद 70 और 80 के दशक में उनकी आवाज आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों, जैसे नजीबाबाद और लखनऊ, से प्रसारित होने लगी, जिसने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई।
कबूतरी देवी का पहला गीत “कैकु रंग लग्यु मेरु रुमाल” था। यह गीत उन्होंने 25 मई, 1979 को आकाशवाणी लखनऊ में रिकॉर्ड किया था, जब वे आकाशवाणी की स्वर परीक्षा में उत्तीर्ण हुई थीं। इस गीत ने उनकी कुमाउनी लोक संगीत में पहचान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कबूतरी देवी का गीत “आज पनि जौं-जौं, भौं पनि जौं-जौं” उनके करियर में एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय गीत रहा है, जिसे उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में गाया था। हालांकि इस गीत की सटीक रिकॉर्डिंग तिथि के बारे में स्पष्ट ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन यह माना जाता है कि उन्होंने इसे 1970 के दशक के अंत या 1980 के दशक की शुरुआत में गाया था। यह गीत आकाशवाणी के माध्यम से प्रसारित हुआ था, जब वे नियमित रूप से नजीबाबाद और लखनऊ केंद्रों के लिए गीत रिकॉर्ड कर रही थीं।
कबूतरी देवी ने 25 मई, 1979 को आकाशवाणी लखनऊ से अपना पहला गीत “कैकु रंग लग्यु मेरु रुमाल” रिकॉर्ड किया था। इसके बाद के वर्षों में “आज पनि जौं-जौं” जैसे गीतों ने उनकी ख्याति को और बढ़ाया। इस गीत का प्रसारण संभवतः 1980 के दशक की शुरुआत में हुआ, जब उनकी आवाज उत्तराखंड के लोक संगीत प्रेमियों के बीच घर-घर में गूंजने लगी थी। यह गीत आज भी कुमाउनी लोक संगीत के शौकीनों के बीच बेहद लोकप्रिय है।
कबूतरी देवी ने औपचारिक रूप से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा नहीं ली थी। उनकी संगीतमयी प्रतिभा सहज और प्राकृतिक थी, जो मुख्य रूप से कुमाऊं की लोक परंपराओं से प्रेरित थी। वे अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित लोक गीतों को सुनकर और गाकर बड़ी हुईं। उनकी गायन शैली पारंपरिक कुमाउनी लोक संगीत पर आधारित थी, जिसमें शास्त्रीय संगीत की औपचारिक तकनीकों के बजाय स्थानीय धुनों और लयों का समावेश था। उनकी आवाज और प्रस्तुति की सादगी ही उनकी खासियत थी, जिसने उन्हें लोकप्रिय बनाया।
आकाशवाणी अल्मोड़ा की शुरुआत 15 अगस्त 1971 को हुई थी। इस दिन अल्मोड़ा में आकाशवाणी केंद्र का उद्घाटन किया गया, जो उत्तराखंड के इस क्षेत्र में रेडियो प्रसारण की शुरुआत का प्रतीक था। लेकिन यह आश्चर्य जनक है कि हमारे पास यह डाटा उपलब्ध नहीं है कि कबूतरी देवी ने आकाशवाणी अल्मोड़ा से कितने गीत गाये या कोई गीत गाया भी कि नहीं!
कबूतरी देवी ने अपने जीवनकाल में लगभग 100 से अधिक गीत गाए, जिनमें से अधिकांश आकाशवाणी के लिए रिकॉर्ड किए गए थे। ये गीत मुख्य रूप से कुमाऊंनी लोकगीत थे, जो उत्तराखंड की संस्कृति, प्रकृति और सामाजिक जीवन को दर्शाते थे। हालांकि, उनके गीतों की सटीक संख्या के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन विभिन्न स्रोतों के अनुसार यह अनुमान लगाया जाता है कि उन्होंने 100 से ज्यादा गीतों को अपनी आवाज दी।
बहरहाल हेमंती देवी जिस राह पर आगे बढ़ रही हैं उसमें उन्हें प्रेरित करते रहना हमारे समाज का दायित्व बनता है, ताकि हेमंती के बहाने हमारे लोक समाज का रचा बसा संसार जीवित रह सके।