Tuesday, February 24, 2026
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भाषाएँ हिंदी इंग्लिश नेपाली बोलियां -१० प्रकार

भाषाएँ
हिंदी इंग्लिश नेपाली
बोलियां -१० प्रकार

गढ़वाल – 1- श्रीनगरी (लोकभाषा में दर्ज )2- नागपुरिया 3- दसौल्या 4- राठी 5-बधाणी 6- लोहब्या 7- सलाणी (कठमाली) 8- गंगपरिया 9- कुमय्या, जौनसारी, रवांळटी, जौनपुरी, भोटिया, बंगाणी, बावरी

कुमाऊँ – 1- असकोटी 2- सिराली 3- सौरयाली 4- कुमाई (कुमय्या) 5-  दनपुरिया 6-खसपर्जिया 7-चौगर्खया 8-पछाई 9- रौ चौभैंसी, जोहरी, मुनस्यारी, अल्मोडिया, बाउरी, रजबारी, भूटिया, नेपाली 

 

घास- पूरे विश्व में 225 वंशों  1225 प्रजाति
उत्तराखंड – 185, 25 प्रजाति की घास दारसों नर्सरी

इतिहास
भानुप्रतापों भूपाल….

सेम मुखेम
कुसुम्बा कोलिन /कैंदु कोली व श्रीकृष्ण गाथा
कौंळ गढ़
जमुना स्नान (मकरैणि ) चांदन्यूं का पाणी
रूप की खजानी अर बिगरौ की निशानी,
आगि सी अगेली, दीवा जसि जोत
वींकी लटी छई , नौ हत्त नौ बेत
भैंसों के साथ- कीचड
बकरियों के साथ- पिस्सू,
कुठार- लकड़ियां चुभेंगी
सूतरी पलंग
१- कुत्ता भौंका- दुनिया तुम्हे दुत्कारती रहे
२-क्यालों का किल्वाण – एक बार ब्याह कर नष्ट
३- अरबी – तू हमेशा खाड़ रहना
हल्दी का हल्द वाड़ा – तू सुमंगली रहे

जीतू-बगडवाल व स्याळी भरणा- खैट की आँछरी।

फिल्म निर्माण
112 बर्ष
गीत प्रचलन- सदियों से
हलजोत, फसल बुवाई, कटाई, विवाह संस्कार, जन्म संस्कार, त्यौहार मेले कौथिग मौसम परिवर्तन, स्वांग, बंयास , थौळ
२०१३ की फिल्म पॉलिसी के निर्माण से लेकर वर्तमान तक ८०० से अधिक फिल्में बनी हैं ! २०१९ में फिर फिल्म निर्माण पालिसी पर संसोधन हुआ है!

जनजातीय अध्ययन
रूपिन सुप्पिन यमुना वैली (पर्वत, रवाई, जौनसार बावर व जौनपुर व काली व गोरी नदी घाटी (जोहर-दारमा वैली)
१- पर्वत क्षेत्र में सोमेशर अर्थात दर्योधन कर्ण, एड़ी आँचरी,
२-रवाई में रघुनाथ, माँ रेणुका, माधौ सिंह भंडारी, सेम नागरजा, मौँण, साठी-पांशाई, एड़ी-आंचरी,
३- चार भाई महासू, वैराठ -सामूशाही, परियां,
४- महासू, नाग इत्यादि
दारमा-जौहार व चौंदास- गोरिल, नाग एड़ी आंछरी

लोक कथाएं
भानु भौंपेलु, लोधी रिखोला, माधौं सिंह भंडारी, रामी बौराणी, भंधों असवाल, कत्यूरी

लोक साहित्य

लोक साहित्य दिनों दिन पिछड़ रहा है। .हम ग्रामीण परिवेश में व्याप्त अपने लोक समाज में प्रचलित आणा पखाणा , सदेई, बाजूबंद व लोक में प्रचलित भट्ट बूझते समय ठंड की रातों व मसूर, मटर कलो ठूंगते हुए या डुंगला खाते हुए चाँदनीं रातों में अपने वरिष्ठों के मुखों से कहानियाँ सुनना तो भूल ही गए उस लोक को खुद लोकसाहित्य में संजोना भूल गए और गाली देते हैं कि हमारे पुरखों ने कुछ नहीं संजोया फिर हम क्या संजो रहे हैं !

सांस्कृतिक

स्कूली शिक्षा में शामिल हों लोकगीत व नृत्य, बेडा परम्पराएं, ढोल सागर, जागर नौरत्ता मंडाण , हंत्या
जौनसार बावर की अनमोल संस्कृति पर लगता ग्रहण

फोटोग्राफी
हिमालयी पर्वत शिखर बुग्याल
लेखन
गढ़वाली व कुमाउनी बोलियों में लेखन की गंभीरता काम हुई है! गीतों के ऊपर धर्मसंकट। .गीतकारों के पास रचनाओं का अभाव
पत्रकारिता

डळ घास- गींठी, भ्यूंलू, तुसरु, छँछरी, असींन, सांधण, पुलऊ, फरसेई,धौडु, रवीणा, बैरूडु, बुदलू, ख़ैणा, बेडु, तिमला, पय्याँ, कुर्री, खडीक, मालु, ग्वीराळ, बांस, बेडु, कंदला,बाँझ, धौलु,टिमरिया व पत्तघास-ऊळऊ, तछील, मुसलू, धिवड़ा, मर्च्या, कुम्रिया, लिंजडु, बबलू, रैम्वडू, अल्मोडु, पराळ, खगसा, चुपल्या, नलौ, चिलौ, लव-कुुुश, नेपियर, बबलू,गुच्छी,कांस, नलिका, जैई, गुईना, जंगली क्वादु, मसाण, चित्रा, गोड़िया, राई, कंडली,कुमरिया, दोलनी, गिन्नी, अंगोरा, औंस, सीता,ब्रूम इत्यादि दर्जनों घास की प्रजातियां याद आ गयी।
boliya
गढ़वाल की लोक बोली जिसे गढ़ राजवंश की लोकभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ वह श्रीनगरी बोली कहलाई, जो श्रीनगर, देवलगढ़ व पौड़ी क्षेत्र में बोली जाती है इसे सबसे मीठी व मधुर उपबोली माना जाता रहा है। इसके बाद दूसरी नागपुरिया बोली गढ़वाल में प्रचलित है जो चमोली जनपद के नागपुर में बोली जाती है। तीसरी दसौल्य या दसौली बोली हुई जो नागपुर से लगी चमोली गढ़वाल की ही एक पट्टी है। चौथी राठी बोली हुई जिसका क्षेत्र दूधातोली, बिनसर और थैलिसैण है। पांचवें नम्बर पर बधाणी बोली है जो पिंडर व नंदाकिनी के आस-पास बधाण पट्टी कहलाती है। छटे नम्बर पर लोह्ब्या बोली आती है जो राठ से संलग्न बिनसर व गैरसैण में बोली जाती है। सातवें नम्बर पर सलाणी बोली आती है जो मैदान व पहाड़ का मिलान करती हुई बोली जाती है इसे बावर क्षेत्र में कठमाली भी कहा जाता है। आठवें नम्बर पर गंगपरिया बोली आती है जो टिहरी गढ़वाल में उपबोली के नाम से प्रचलित है एवं अंतिम बोली मांझ कुमैय्या कहलाती है इस बोली में गढ़वाल व कुमाऊ दोनों क्षेत्र की बोलियाँ शामिल हैं।
इसके अलावा जौनसारी, रवांळटी, जौनपुरी, भोटिया, बंगाणी, बावरी इत्यादि लगभग दर्जन भर और बोलियाँ हैं जो हर क्षेत्र में अपनी बोली बदल देती हैं जिन्हें बोली में शामिल नहीं किया गया।

वहीँ कुमाऊ में अस्कोटी बोली पिथौरागढ़ के सीरा क्षेत्र के आस-पास बोली जाती है। इस पर सीराली, नेपाली और जोहरी बोलियों का अधिक प्रभाव है। दूसरे नम्बर पर सीराली बोली आती है जो पिथौरागढ़ के अस्कोट के पश्चिम और गंगोली के पूर्व के क्षेत्र में बोली जाती है। तीसरी बोली सोर्याली कहलाती है जो पिथौरागढ़ जनपद के पूर्व में काली नदी, दक्षिण में सरयू, पश्चिम में पूर्वी रामगंगा और उत्तर में सीरा क्षेत्र में बोली जाती है। इसे पूर्वी कुमाऊं की सबसे प्रचलित बोली भी कहा जाता है। चौथे नम्बर पर कुमैया बोली आती है जो काली कुमाऊ क्षेत्र की मानी जाती है जिसे कुमैय्या या कुमाई भी कहा जाता है यह बोली पश्चिम क्षेत्र में देवीधुरा, उत्तर क्षेत्र में पनार व सरयू पूर्व में काली नदी आर पार, दक्षिण में टनकपुर लोहाघाट व चम्पावत तक बोली जाती है। यह मध्ययुगीन काल या कुमाऊं के चंद राजवंश की राजभाषा का दर्जा प्राप्त मानी जाती है। पांचवे नम्बर पर गंगोली बोली गंगोलीहाट के आस-पास पश्चिम में दानपुर, दक्षिण में सरयू, उत्तर में रामगंगा, पूर्व में सोर घाटी तक फैली है। छटे नम्बर पर हम दनपुरिया बोली रख सकते हैं जो बागेश्वर ज़िले के दानपुर परगने की बोली कहलाती है। इसके उत्तर में जोहारी, पश्चिम में गढ़वाली, पूर्व में सोर्याली तथा दक्षिण में खसपर्जिया बोली के क्षेत्र पड़ते हैं। सातवें नम्बर पर खसपर्जिया जिस पर कुमाऊ के खस जाती का प्रभुत्व रहा है यह बारामंडल परगने की खसिया बोली भी कही जाती है। आठवें नम्बर पर हम चोगर्खिया बोली शामिल कर सकते हैं जो काली कुमाऊ के उत्तर पश्चिम से लेकर पश्चिम में बारामंडल परगने व उत्तर में गंगोली क्षेत्र तक बोली जाती है। नवीं बोली के रूप में पछाई आती है जो पाली पछाऊँ, फल्दाकोट, द्वाराहाट, मासी, चौखुटिया इत्यादि की प्रमुख बोली रही है इस पर गढ़वाली बोली का ज्यादा प्रभाव रहा है। अगर यह कहा जाय कि गढ़ कुमाऊं सीमावर्ती क्षेत्र में यह बोली दोनों तरफ बोली व समझी जा सकती है तो कोई दोराय नहीं है। अंतिम बोली के रूप में रौ आती है इसे रौ-चौभेंसी भी कहा जाता है जो पूर्वी नैनीताल के रौ और चौभेंसी क्षेत्र में बोली जाती है।
इसके अलावा मैदानी व पहाड़ी क्षेत्र में अल्मोडिया, बाउरी, तथा पिथौरागढ़ के मुनस्यारी, धारचुला इत्यादि क्षेत्रों में बोली जाने वाली रजबारी, भूटिया, नेपाली इत्यादि कई अन्य बोलियाँ हैं लेकिन इन्हें बोली का दर्जा क्यों नहीं मिला यह हैरत की बात है.।

टोपियाँ

जब पहाड़ की बात आती है तो हिमाचल की कन्नौरी, नार्थ-ईस्ट की हैट, नेपाल की ढाका, कश्मीर की मिर्जई/जवाहर टोपी इत्यादि मूल रूप से पहाड़ी राज्यों की टोपियाँ गिनीं जाती हैं लेकिन जिस राज्य ने सबसे ज्यादा टोपियाँ अपने हर काल में अपने लोक समाज को दी उस समाज को यही पता नहीं हैं कि उनकी पहनी जाने वाली टोपी का नाम क्या है जबकि आज गढ़वाल राइफल व कुमाऊं रेजिमेंट तक उसी टोपी में खूब सजती फबती है!

उत्तराखंड में इनके नाम फेटशिखोई, शिखोई/शिखोली, कनटोपला/कनटोपी/कनुडिया/कनछुपा, फरफताई, टोपला/टुपल्ला, टोपली/टुपली, मुनौव बादणी,चुंदडी, बंदरमुख्या, चुफावाली टोपली, दुफडक्या टोपली इत्यादि नामों से जानी गयी हैं! जिन्हें कालान्तर में अब गांधी टोपी, जवाहर टोपी, या फिर मिर्जई टोपी के नाम से भी पुकारा जाने लगा है!

फ़िल्म

1- 1911 में जय विजय,

सर्वप्रथम ग्राम -खैड (मवालस्यु) पौड़ी गढ़वाल में जन्मे भवानी दत्त थपलियाल द्धारा लिखित या रचित नाटक “जय विजय” का मंचन सन 1911 में किया गया। जो लगातार कई बर्षों तक होता रहा । फिर उन्होंने सन 1938 में प्रह्लाद नाटक लिखा। गढ़वाली बोली में लिखे जाने वाले ब्रिटिश काल के नाटकों की यह प्रथम कड़ी थी इसी दौर में इनके द्वारा ढोल सागर भी लिखा गया। जबकि 1932 में बिशम्बर दत्त उनियाल द्वारा गढ़वाली नाटक ” बसंती” 1934 में ईश्वरी दत्त सुयाल द्वारा “परिवर्तन” 1936 में बाणीभूषण का ” प्रेम-सुमन” इत्यादि नाटकों का दौर शुरू हुआ जो देश भर के विभिन्न मंचों में गढ़वाली समुदाय के रंगमंचीय कलाकारों द्वारा प्रदर्शित किए गए। लेकिन भवानी दत्त थपलियाल के बाद प्रोफेसर पांथरी का नाटक ” भूतों की खोह” तथा “अंध:पतन” नाटक भी उल्लेख में आये।

फिर तो जैसे नाटकों का स्वर्णिम दौर शुरू हुआ हो। कवि एवं अभिनेता जीत सिंह नेगी के नाटक “भारी भूल” तथा “मलेथा की गूल” दिनेश पहाड़ी का “जुन्याली रात” केशव ध्यानी का “भोलू सौकार”, गिरधारी लाल थपलियाल कंकाल का “इन नि चैन्द”, मोहन थपलियाल का “खाड़ू लापता”, मदन मोहन का “पुरिया नैथानी”, अबोधबंधू बहुगुणा का “माई का लाल” तथा “अंतिम गढ़“, डॉ. हरिदत्त भट्ट शैलेश का एकांकी नाटक “नौबत” डॉ. गोबिंद चातक का एकांकी संग्रह ” जंगली फूल” गोबिंद राम पोखरियाल का “बंटवारों” बद्रीश पोखरियाल की नृत्य नाटिका ” शकुंतला” इत्यादि का मंचन मुम्बई, दिल्ली, लखनऊ, राजस्थान के विभिन्न शहरो, मेरठ, चंडीगढ़, पौड़ी देहरादून कोटद्वार सहित देश के कई बड़े महानगरों में होता रहा। फिर नये दौर में जीत सिंह नेगी का ” वीरवधु देवकी”, “खैट की आंछरी” सहित कन्हैया लाल डंडरियाल, विश्व मोहन बडोला, राजेंद्र धस्माना, स्वरुप ढौण्डियाल, रामेश्वर गौड़, दिनेश पहाड़ी इत्यादि के नाम चर्चित रहे । 1986 में बद्रीश पोखरियाल द्वारा रचित नृत्य नाटिका का मनोज इष्टवाल द्वारा सफल निर्देशन किया गया जिसका मंचन दिल्ली में करने के पश्चात् ” शकुंतला नृत्य नाटिका” नाम से इसका प्रसारण लखनऊ दूरदर्शन से भी किया गया।
सन 1978 में गढ़वाली सिनेमा का स्वर्णिम दौर लौटा । एक गढ़वाली फ़ीचर फ़िल्म की पटकथा पर विचार विमर्श शुरू होने लगा और सन 1983 में विकास खंड कल्जीखाल पौड़ी गढ़वाल के मिरचोड़ा गॉव निवासी पारासर गौड़ द्वारा “जग्वाल” नामक फिल्म को रुपहले परदे पर लाया गया। और इसी फिल्म के माध्यम से वे गढ़वाली ही नहीं बल्कि उत्तराखण्डी सिनेमा के पितामह कहलाये। यह फिल्म सुपरहिट हुई। फिर जैसे गढ़वाली फिल्मों के निर्माण की बाढ़ आई हो एक के बाद एक फिल्म बननी शुरू हुई जिनमे “कवि सुख कवि दुःख”, कौथिग, उदन्कार, प्यारु रुमाल, बेटी-ब्वारी, घरजवैं, फ्योंली, बंटवारु, रैबार, बिरणी बेटी, सात फेरु, आस, मेघा, ब्वारी होत इनी, सतमंगल्या, गढ़ रामी बौराणी, तेरी सौं इत्यादि परदे की व् दर्जन भर वीडिओ फिल्मों का पिछली सदी में निर्माण हुआ जिनमे तरुण धस्माना द्वारा साहसिक कदम उठाकर गढ़वाली पटकथा का हिंदी रूपांतर कर हिंदी फिल्म “हिमालय के आँचल में” बनाई जिसकी पटकथा गढ़-कुमाऊँ को जोड़ती नजर आई। लगभग डेढ़ दर्जन से ज्यादा फिल्में आज भी डिब्बा बंद है क्योंकि धीरे धीरे गढ़वाली सिनेमा से यहाँ के जनमानस का मोह भंग होने लगा।
फिर कई बर्षों की शान्ति के बाद अनुज जोशी द्वारा साहसिक कदम उठाकर उत्तराखण्ड आंदोलन का बिषय उठाकर फिल्म “तेरी सौं” बनाई गयी जो इस सदी की ही नहीं बल्कि उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बाद की पहली फिल्म हुई। जून 2017 में पटकथा लेखक व निर्देशक नरेश खन्ना की पत्नी निर्मात्री सरोज खन्ना अपने पहाड़ प्रेम को भूल नहीं पाई व अपने निर्देशक पति नरेश खन्ना के निर्देशक में “भुली ए भुली” नामक गढवाली फिल्म का निर्माण ऐसे दौर में कर डाला जब मल्टीप्लेक्स पर भी बड़े बड़े हॉलीवुड बॉलीवुड कलाकारों की फ़िल्में देखने के लिए लोग घरों से निकलना पसंद नहीं कर रहे थे!
सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री उर्मी नेगी की फिल्म “सुबेरो घाम” गढवाली सिनेमा की ऐसी पहली फिल्म साबित हुए जिसने बॉक्स ऑफिस में सिर्फ अपनी निर्माण लागत वसूल की बल्कि लाभ भी कमाया! बतौर पटकथा लेखक, अभिनेत्री व निर्माता निर्देशक उर्मी नेगी की माने तो वह कहती हैं अब तक उन्होंने जितनी भी गढ़वाल से जुडी पटकथाएं लिखी या काम किया उसकी लागत वह इसी सिनेमा से वसूलने में कामयाब रही हैं!
मनोज चंदोला द्वारा निर्देशित कुमाउनी फिल्म “राजुला” ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्राप्त किया है ऐसा बताया जाता है! इस फिल्म ने कितना व्यवसाय किया व निर्माता इसकी बाजार से लागत वसूल भी कर पाए कि नहीं इस सम्बन्ध में जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं हो पायी है! हाल ही के महीनों में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के उपन्यास “मेजर निराला” पर केन्द्रित फिल्म “मेजर निराला” का निर्माण उनकी पुत्री आयुषी पोखरियाल द्वारा किया गया जिसका निर्देशन गणेश वीरान द्वारा किया गया! फिल्म देश के विभिन्न हिस्सों में लगी लेकिन वह क्या कारोबार कर पाई इसकी भी पर्याप्त जानकारी प्राप्त हो पाई है

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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