Wednesday, January 21, 2026
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रावतों की भिड़ंत…। समय पर ग़ुस्सा दिखाया होता तो धामी की धूम नहीं रावतों की धूम होती!

(मनोज इष्टवाल)

गढ़वाली में एक कहावत है -“ रौतूँ कु बल्द मोरि बल अप्णी ख़ुशीन।” अब यह कहावत यहाँ क्यों न चरितार्थ हो जहां दो पूर्व मुख्यमंत्री रावत ही रहे हों, साथ ही उत्तराखंड की राजनीति में छत्रप कहे जाते रहे हों। जहां हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनते ही पूरा प्रदेश ख़ुशियों में झूम उठा था कि अब तो पहाड़ी मानसिकता का व्यक्ति मुख्यमंत्री बन गया है जिसे केंद्र व प्रदेश की राजनीति की अच्छी समझ है व उसके पास बड़ा विजन भी। लेकिन शह मात की राजनीति से बाहर निकलने से पहले ही बिशाल आभामंडल का यह राजनेता अपनी पार्टी के अंदरूनी ध्वंध में ही इतना उलझकर रह गया कि जब प्रदेश की सुध लेने की नौबत्त आई तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वहीं ज़ीरो टोलरेंस की नीति पर चलने वाले भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से भी जनता को काफ़ी उम्मीद थी लेकिन वे उस काकस से बाहर नहीं निकल पाए जिसकी चक्रव्यूह रचना उनके सिपहसलारों ने उनके लिए रची थी। उनकी आँखों में घोड़े वाली ऐसी पट्टी लाकर बांध दी गयी जिसके बूते सिर्फ़ वह सीधी सड़क ही देखें और कुछ नहीं। उन्हें वही कटिंग्स लाकर दिखाई जाती वही टीवी न्यूज़ सामने लाकर रखी जाती जिसमें मोटा कमीशन देकर मनमाफ़िक खबरें उनके गुणगान में प्रसारित कर दी जाती।

त्रिवेंद्र सिंह रावत न जनता की नाराज़गी देख पाए न सोशल मीडिया में उनके प्रति पनपता आक्रोश ही वे देख पाए। उल्टा उन्हें एक और नाम मिला – ऐरोगेंट सीएम…। जबकि उनके करीबी मानते हैं कि टीएसआर बेहद व्यवहार कुशल हैं। हठी धामी बिल्कुल नहीं झुके…ना ही उन्होंने इस बात की परवाह की कि वे इस मामले में अकेले पढ़ जाएँगे। उनका चाबुक चला और UKSSSC में 41 गिरफ़्तारियाँ हुई 21 पर गैंगस्टर ऐक्ट लगा। उधर उन्होंने विधान सभा अध्यक्ष से भर्ती घोटाले की माँग पर जाँच बैठाने को कहा। 20 दिन में जाँच समिति ने रिपोर्ट सौंपी 228 विधान सभा कर्मियों की भर्ती निरस्त हुई। देश भर में बवाल मच गया। धामी व ऋतु खंडूरी की सोशल मीडिया में वाहवाही होने लगी। भला यह अब राजनेताओं को सहन कैसे होता। कूटनीति रची गयी, ऋतु खंडूरी के पर्सनल स्टाफ़ पर विवाद पैदा किया गया जिस पर एक न चली।

ख़ैर अतीत किसी का पीछा नहीं छोड़ता। ऐसा ही दोनों मुख्यमंत्रियों के साथ हुआ है। इनके कामों से बढ़कर उन्हें दुष्प्रचार ज़्यादा मिला, वह भी जनता जनार्दन के दरबार में ..! अब जब सब कुछ पीछे छूट गया तब दोनों ही राजनीतिक क्षत्रप जनता से नज़दीकियाँ बढ़ाने में जीतोड़ कोशिश में जुटे हुए हैं। उधर वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शायद यह मन बना चुके हैं कि कुर्सी रहे न रहे, जनसमर्थन व जन आशीर्वाद उन पर बना रहे तो कोई भी काम मुश्किल नहीं है इसीलिए वे धड़ाधड़ ऐसे अभूतपूर्व फ़ैसले जनता के पक्ष में ले रहे हैं जिससे राजनेता व अधिकारी सदमें में हैं। एक बड़ा धड़ा उनके ऐसे फ़ैसलों से असंतुष्ट भी है लेकिन खुलकर विरोध में सामने इसलिए नहीं आ पा रहा है क्योंकि उन्हें केंद्र के हंटर से पहले धामी की ढाल के रूप में खड़ा जनमानस दिखाई दे रहा है।

बीच में आकर अंकिता भंडारी हत्याकांड ने सरकार की खूब किरकिरी करवाई क्योंकि इसमें संघ परिवार के डॉ. विनोद आर्य के पुत्र सहित तीन का नाम आया। यहाँ लगा कि पुष्कर सिंह धामी अब संग संगठन व भाजपा की साख बचाने में जुटे रहेंगे। यह व्यूह रचना वास्तव में बेहद कूट कही जा सकती है लेकिन दिल्ली जाकर धामी ने फिर अपने को साबित किया। केंद्र के समक्ष सारी परिस्थितियों का बखान किया। डॉ विनोद आर्य का काला चिट्ठा बाहर आया तो उन्हें व उनके दायित्वधारी पुत्र को पार्टी से निष्कासित किया गया व उनके अपराधी पुत्र सहित दो अन्य को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया गया। यह सचमुच एक युवा मुख्यमंत्री के लिए बहुत बड़ी चुनौती जैसे प्रकरण हैं। एक ओर UKSSSC का भूत तो दूसरी ओर अंकिता भंडारी के हत्यारों को फाँसी देने की माँग…! गर्म दूध सी इस कुर्सी पर बैठे धामी के लिए यह दूध पीते हैं तो गला जलता है, थूकते हैं तो दूध है जैसा हो रखा है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जैसा युवा नेता जब दुबारा मुख्यमंत्री की शपथ लेकर कुर्सी में बैठा तभी से उनकी कुर्सी हिलाने की साज़िशें शुरू हो गयी थीं। महीना भर भी नहीं हुआ क़ि UKSSSC भर्ती घोटाला उजागर हुआ। जिसे समझा व कहा जाने लगा कि स्वयं मुख्यमंत्री धामी ने इस मामले में रुचि दिखाई है क्योंकि वह उन राजनेताओं को व अधिकारियों व राजनेताओं के मुँहलगों को बेनक़ाब करना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें खटीमा विधान सभा चुनाव में अप्रत्यक्ष रूप में धनबल देकर चुनाव हरवाया। शह मात का यह खेल यहीं नहीं रुका , आगे बढ़ा तो ज्ञात हुआ पार्टी में अंदरखाने ही उनके विरोधियों ने उन्हें विधान सभा भर्ती घोटाले में उलझाकर उनके क़रीबियों की नियुक्तियों में लपेटकर यह चुनौती दे ड़ाली कि अगर UKSSSC घोटाले पर नज़र ड़ाली तो सभी बेनक़ाब होंगे। लेकिन बेचारा लाचार विपक्ष इस मसले को लपक नहीं सका। लपकता भी कैसे…। सभी के हाथ काजल की कोठरी में जो बंद थे।

इतनी मुश्किलों भरी शुरुआती पारी में जहां उनके मंत्रीमंडल संघ व संगठन पर संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं व प्रदेश में पार्टी अंदरखाने गुटों में तब्दील होती दिखाई दे रही है वहीं भाजपा हाई कमान के लिए इस समय अपनी साख को ज़िंदा रखे रखने का बेहद प्रेशर भी है। ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्रियों के आरोप प्रत्यारोप किसी कूटनीति की साझेदारी करते दिखाई दे रहे हैं तभी तो पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर जवाबी हमला करते हुए यहाँ तक लिख दिया कि “यारा बड़ी देर कर दी समझ आते-आते। 2017 में जब हमने जांच शुरू की थी, जब आपके मंत्री ने विधानसभा के पटल पर स्वीकार किया था कि गड़बड़ियां पाई गई है, जांच रिपोर्ट शासन को मिली है‌। यदि तब इतना गुस्सा दिखाया होता तो फिर धामी की धूम नहीं होती, रावतों की धूम होती।

धन्य है उत्तराखंड, दरवाजे की चौखट पर सर टकराए तो घर ही गिरा दो। विधानसभा में भर्तियों में धांधलियां हुई तो विधानसभा भवन ही गिरा दो। संस्थाएं खड़ी की हैं, यदि संस्थाओं का दुरुपयोग हुआ है तो उसको रोकिए, दृढ़ कदम उठाइए, संस्थाएं तोड़ने से काम नहीं चलेगा। यदि हमने मेडिकल और उच्च शिक्षा का वॉक इन भर्ती बोर्ड नहीं बनाए होते तो आज डॉक्टर्स और उच्च शिक्षा में टीचर्स की भयंकर कमी होती। यदि गुस्सा दिखाना ही है तो अपनी पार्टी के लोगों को दिखाइए न, ये जितने घोटालेबाज अब तक प्रकाश में आए हैं इनका कोई न कोई संबंध भाजपा से है और विधानसभा भर्ती, यदि घोटाला है तो उसकी शुरुआत से लेकर के…कहां तक कहूं, तो गुस्सा सही दिशा की तरफ निकलना चाहिए। उत्तराखंड का संकल्प होना चाहिए कि जिन लोगों ने भी इन संस्थाओं में गड़बड़ियां की हैं, हम उनको ऐसा दंड देंगे कि कोई दूसरी बार गड़बड़ी करना तो अलग रहा, कोई भूल करने की भी गलती न करे।”

ज्ञात हो कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने फ़ेसबुक पेज पर यह अब पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के अख़बार में छपे इस बयान पर  टिप्पणी करते हुग़े लिखा था जिसमें त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा था कि “उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग-यूकेएसएसएससी (UKSSSC) बनाने की मंशा सही नहीं थी। ऐसी संस्थाओं की जरूरत नहीं है जो राज्य की साख को गिराने का काम करें। यूकेएसएसएससी भर्ती परीक्षाओं में घपले ही घपले सामने आ रहे हैं।

एसटीएफ अब तक परीक्षाओं में घपले के आरोप में आयोग के पूर्व अध्यक्ष व पूर्व प्रमुख वन संरक्षक डा. आरबीएस रावत, पूर्व सचिव मनोहर कन्याल, परीक्षा नियंत्रक आरएस पोखरिया को गिरफ्तार कर चुकी है, वहीं पूर्व सचिव संतोष बड़ोनी को संस्पेड़ किया जा चुका है। अभी तक एसटीएफ 44 से ज्यादा गिरफ्तारियां इस मामले में हो चुकी हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने ट्वीट कर फिर यूकेएसएसएससी के गठन पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। कहा कि इस आयोग के बनाने के पीछे की नीयत ही खराब थी, इसलिए ऐसी संस्थाओं को भंग कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि अच्छे ईमानदार, चरित्रवान लोग और राज्य के प्रति जिनका समपर्ण हो, ऐसे लोग यदि किसी संस्था में जाएंगे तो ही वो संस्था ठीक चल सकती है।

ऐसी संस्थाओं की कोई आवश्यकता नहीं जो राज्य की साख गिराने और व प्रतिष्ठा को समाप्त करने का काम करें। विदित है पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत सरकार में वर्ष 2014 में समूह ग की भर्तियों के लिए अधीनस्थ सेवा चयन आयोग का गठन हुआ था। आयोग की पहली भर्ती परीक्षा विवादों में आ गई थी। इसके बाद पूर्व सीएम त्रिवेंद्र रावत ने इस आयोग के लिए अलग से बिल्डिंग बनवाई थी।”

बहरहाल यह राजनीतिक घमासान तो यूँही चलता रहेगा लेकिन त्रस्त जनता इस बात को जानने को बेहद उत्सुक है कि जिस हाकम सिंह को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का करीबी कहकर उनका नाम जोड़कर देखा जा रहा था, वही भला UKSSSC पर प्रश्नचिह्न लगाकर क्या साबित करना चाहते या फिर हरीश रावत उनके इस बयान पर काउंटर करके क्या संदेश देना चाहते हैं? क्या यह लड़ाई डॉ आरबीएस रावत व हाकम सिंह को लेकर दिख रही है या पर्दे के पीछे अतीत के कई सच उजागर हो जाने का ख़तरा ….,।

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