(मनोज इष्टवाल)
राज्य निर्माण के बाद से लेकर वर्तमान तक जहां उत्तराखंड में लगातार जारी पलायन से 3000 से अधिक गांव खाली हो गए हैं वहीं बंजर खेतों पर उगी झाड़ियां अब जंगल का रूप धारण करने लगी हैं। जिन गांवों में कुछ परिवार बचे हुए हैं वे खेती करना तो दूर अपने बाग-बगीचों में सब्जी या फल तक सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं। सगोड़ों फल सब्जी का स्वाद जहां रीछ, बानर, सिओल, सुअर उठा रहे हैं वहीं उनकी संगत करते करते गुलदार अब ग्रामीण इलाकों में घुसकर बाघ की जगह ले रहे हैं व बिना रोके टोके दिन दहाड़े पशुओं के आहार के साथ इंसान पर भी आक्रमण कर रहे हैं।
सबसे अहम बात तो यह है कि गुलदारों की नई पौध अब मोटर साइकिल सवारों पर आक्रमण कर उन्हें अपनी गिरफ्त में लेने के लिए नरभक्षी बनने की कगार पर हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि वे पशु प्रेमी तब ही क्यों कुकुरमुत्तों की तरह उग आते हैं जब किसी हिंसक पशु को ग्रामीण जख्मी करते हैं या फिर नरभक्षी का वध करने का साहस करते हैं?
विगत महीनों पाबौ विकास खण्ड के एक गांव की घटना में जहां एक नरभक्षी गुलदार ने काफल के लिए गयी एक महिला को अपना शिकार बना दिया था वहीं गुस्साए ग्रामीणों ने पिंजड़े में बंध गुलदार को आग लगा दी थी। वन विभाग ने कई पर केस दर्ज कर दिया लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं की कि इन नरभक्षी होते गुलदारों का नरभक्षी बनने की पीछे की वजह क्या है। क्या भविष्य में ऐसा कोई कानून बनेगा जो जंगली जानवरों से मनुष्य की हिफाजत के लिए हो!
(गुलदार हमले के शिकार त्रिवेंद्र चौहान व कमल चौहान)
गुलदारों द्वारा अब सड़क में बाइक पर चलते लोगों पर हमले की घटनाएं आम होने लगी हैं। विगत बर्ष पौड़ी जनपद के ग्राम धारकोट कफोलस्यूँ विकास खण्ड कल्जीखाल के संतोष नेगी पुत्र स्व. बचन सिंह नेगी व बाडयूँ गांव के सूरज सिंह रावत पुत्र स्व. उम्मेंद सिंह रावत पर कठुड गांव की रौली के पास गुलदार ने ठीक ऐसा ही हमला किया था जैसे विगत दिवस विकास खंड दुगड्डा पौड़ी गढ़वाल के ऐता गांव बैंड पर पौड़ी गढ़वाल के चौंदकोट क्षेत्र ग्राम – धरासू मवालस्यूँ निवासी बाइक सवार 22 बर्षीय त्रिवेंद्र चौहान पुत्र जगमोहन चौहान व कमल चौहान पुत्र कुशाल सिंह चौहान पर किया गया। जैसे पैर पर घाव इन दोनों के दिखाई दे रहे हैं वैसे ही घाव संतोष नेगी के भी थे।
ज्ञात हो कि उत्तराखंड में सबसे अधिक पलायन पौडी जनपद में ही हुआ है और सबसे अधिक बंजर यहीं ले खेत खलिहान व गांव हुए हैं। ऐसे में गुफाओं में रहने वाले जंगली जानवर अब आये दिन खाली पड़े गांवों के घरों में अपना डेरा जमा रहे हैं व इंसान से डर की जगह उन्हें डरा रहे हैं। वन्य जीवों से सुरक्षा सम्बन्धी अभी तक पहाड़ी राज्यों के लिए ऐसा माकूल कानून नहीं बनाया ज सका है जिससे अपने सेल्फ डिफेंस में यहां के व्यक्ति जंगली जानवर को हताहत कर सके। और तो और सुअर मारने के भी ऐसे नियम है कि उसे मारने के बाद वीडियो बनाकर वन विभाग को भेजना पड़ता है जिस खेत को उसने नुकसान पहुंचाया व उसी खेत में गड्ढा खोदकर उसे दफनाना भी पड़ता है। भले ही इस नियम में अब शिथिलता बरते जाने की खबर भी है लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आखिर माइग्रेशन किया हुआ व्यक्ति क्या अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर रिवर्स माइग्रेशन करे?
क्या कहता है वन कानून।
आईपीसी की धारा 428 और 429 के तहत किसी भी जानवर या विचरण करने वाले जानवर को मारना कानूनी और दंडनीय अपराध है। धारा 38 जे वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 जानवरों को चिढ़ाना खिलाना, परेशान करना, चिड़ियाघर में कचरा फैलाने की 3 साल की सजा और ₹25000 का जुर्माना है। नियम 3 में पशु बलि पर रोक है। भालू, बंदर, बाघों, पैंथर, शेरों और बैलों को प्रशिक्षित करने सर्कस या सड़कों पर इस्तेमाल करने की सख्त मनाही है । धारा 222 पीसीए अधिनियम 1960 में इसका विवरण उल्लिखित है। इसी तरह पशु की लड़ाई में शामिल होना एक संज्ञेय अपराध है।
वन्य जीव संरक्षण के लिए 5 अनुसूचियां बनाई गई हैं। इसमें विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीव शामिल हैं। हाथी अनुसूची 1 में है, जिसकी सुरक्षा और संरक्षण प्राथमिकता से किए जाने का प्रावधान है। अनुसूची 1 और 2 में उल्लिखित जानवरों को मारने पर 3 से 7 साल तक सजा और 25 लाख तक जुर्माने का प्रावधान है। नया प्रस्ताव भी विचाराधीन है, जिसमें 7 साल की सजा और 50 लाख के जुर्माने का प्रावधान किया गया है ।
कानून में सजा का प्राविधान।
कुल छह अनुसूचियां हैं. जो अलग-अलग तरह से वन्यजीवन को सुरक्षा प्रदान करता है।
अनुसूची-1 और अनुसूची-2 – इसके द्वितीय भाग वन्यजीवन को पूरी सुरक्षा प्रदान करते हैं. इनके तहत अपराधों के लिए कड़ा दंड तय है।
अनुसूची-3 और अनुसूची-4- इसके तहत भी वन्य जानवरों को संरक्षण प्रदान किया जाता है लेकिन इस सूची में आने वाले जानवरों और पक्षियों के शिकार पर दंड बहुत कम हैं।
अनुसूची-5 – इस सूची में उन जानवरों को शामिल किया गया है, जिनका शिकार हो सकता है।
छठी अनुसूची- इसमें दुलर्भ पौधों और पेडों पर खेती और रोपण पर रोक है।
अनुसूची-1 में 43 वन्य जीव शामिल हैं जिसमें धारा 2, धारा 8, धारा 9, धारा 11, धारा 40, धारा 41, धारा 43, धारा 48, धारा 51, धारा 61 और धारा 62 के तहत दंड मिल सकता है।
इस सूची में सुअर से लेकर कई तरह के हिरण, बंदर, भालू, चिकारा, तेंदुआ, लंगूर, भेड़िया, लोमड़ी, डॉलफिन, कई तरह की जंगली बिल्लियों, बारहसिंगा, बड़ी गिलहरी, पेंगोलिन, गैंडा, ऊदबिलाव, रीछ और हिमालय पर पाए जाने वाले कई जानवरों के नाम शामिल हैं।
वहीं दूसरी ओर एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 60 फीसदी बाघ रहते हैं, जिसमें साल 2015 में 78 बाघों का शिकार हो चुका है। अब तक शिकार करने पर 25 हजार तक का जुर्माने का प्रावधान है लेकिन अब ये 50 लाख तक हो सकता है। ऐसे में आप सोच सकते हैं कि बाघों की श्रेणी में इन खतरनाक गुलदारों को लेकर वन कानून उनसे भी ज्यादा खतरनाक हैं।
पौड़ी जनपद के वरिष्ठ पत्रकार अजय रावत “अजेय” अपनी फेसबुक वॉल पर वन मंत्री सुबोध उनियाल के संज्ञानार्थ पोस्ट टैग कर लिखते हैं कि गुलदार का बाइक सवारों पर हमला करने की प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक है
बीते कुछ समय से तथाकथित तौर पर खबरें निकल के आ रही हैं कि अमुक स्थान पर गुलदार द्वारा बाइक सवार पर हमला कर दिया गया। अभी बीते दिन ही जनपद पौड़ी के कोटद्वार-दुगड्डा एनएच के साथ नई टेहरी में भी ऐसी ही दो घटनाओं की खबरें सामने आ रहीं हैं।
पहाड़ में अब दो पहिया वाहन के जरिये आवाजाही बहुत सामान्य हो गयी है, रोजमर्रा काम पर जाने वाले कर्मचारी, कारोबारी, स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी आदि अब बड़ी संख्या में दोपहिया वाहनों का उपयोग करने लगे हैं। इसमें बड़ी संख्या युवतियों व महिलाओं की भी है। गनीमत है अभी तक बाइक पर तथाकथित हमले की जितनी भी सूचनाएं मिली हैं, उनमें महिला सवार के बाबत सूचना नहीं आयी। महिला व बच्चों को गुलदार द्वारा हमेशा से सॉफ्ट टारगेट माना जाता रहा है, लिहाज़ा यदि बाइक सवारों पर हमले की गुलदार की प्रवृत्ति बढ़ी तो यह पहाड़ की सड़कों को भी सूना कर देगी।
बहरहाल, अभी ऐसी छिटपुट घटनाएं ही सुनने को मिल रही हैं किंतु वन महकमें को इस पहलू पर गंभीरतापूर्वक चिंतन करना होगा, अन्यथा गुलदार की हमला करने का यह नया तरीका समूचे पहाड़ की आर्थिक गतिविधियों को भी जबरदस्त नुकसान पंहुचा सकता है।




